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सिनेमा का बदलता व्याकरण रोमांस से नग्नता तक का सफर

हिंदी सिनेमा में बढ़ती नग्नता, उत्तेजक दृश्य और हिंसा को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसके लिए ओटीटी प्लेटफाॅर्म को जिम्मेदार ठहराते हैं लेकिन सवाल यह भी है कि 1990 के दशक में जब ओटीटी का अस्तित्व ही नहीं था तब भी बोल्ड फिल्मों की एक पूरी धारा क्यों उभरी थी? आखिर यह बदलाव केवल तकनीक का असर है या समाज और बाजार की मानसिकता का भी परिणाम?

हिंदी सिनेमा लम्बे समय तक एक संकोची कला के रूप में देखा जाता रहा। 1950 और 60 के दशक की फिल्मों में प्रेम का इजहार संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से होता था। नायक-नायिका के बीच दूरी बनाए रखना ही उस समय की मर्यादा मानी जाती थी। फूलों का टकराना, पेड़ों के पीछे छिपना या गीतों के माध्यम से भाव व्यक्त करना, यह सब उस दौर की सिनेमाई भाषा का हिस्सा था लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, फिल्मों की भाषा भी बदलती गई। आज के दौर में हिंदी फिल्मों में अंतरंग दृश्य, खुला रोमांस और अत्यधिक हिंसा आम होती जा रही है। यह बदलाव इतना स्पष्ट है कि अक्सर कहा जाने लगा है कि बोल्ड होता बाॅलीवुड।

हाल के वर्षों में आई फिल्मों ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। उदाहरण के तौर पर ‘एनिमल’ जैसी फिल्में अपने हिंसक दृश्यों और जटिल रिश्तों के कारण लम्बे समय तक चर्चा में रहीं। अभिनेता रणबीर कपूर और अभिनेत्री रश्मिका मंदाना के बीच फिल्माए गए कुछ दृश्य सोशल मीडिया पर खूब बहस का विषय बने लेकिन इस पूरी बहस में एक महत्वपूर्ण प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या यह प्रवृत्ति केवल आज की है? या फिर हिंदी सिनेमा में बोल्डनेस की जड़ें पहले से मौजूद थीं?

1990 का दशक : बिना ओटीटी के भी बोल्ड सिनेमा
आज कई लोग फिल्मों में बढ़ती नग्नता और हिंसा के लिए ओटीटी प्लेटफाॅर्म को जिम्मेदार मानते हैं। यह तर्क कुछ हद तक सही भी हो सकता है क्योंकि ओटीटी ने सेंसर की सीमाओं को कम कर दिया है और फिल्मकारों को अधिक स्वतंत्रता दी है लेकिन यदि हम 1990 के दशक पर नजर डालें तो पाएंगे कि उस समय ओटीटी का अस्तित्व ही नहीं था, फिर भी हिंदी सिनेमा में बोल्ड फिल्मों की एक लहर दिखाई दी थी। उस दौर में कई ऐसी फिल्में आईं जिनमें अंतरंग दृश्य और उत्तेजक प्रस्तुति ने दर्शकों को चैंका दिया था। उदाहरण के लिए ‘जिस्म’ और बाद में आई ‘मर्डर’ जैसी फिल्मों ने अपने साहसी विषयों और रोमांटिक दृश्यों के कारण भारी चर्चा बटोरी। इन फिल्मों के पोस्टर, गीत और दृश्य लम्बे समय तक मीडिया में चर्चा का विषय बने रहे। इन फिल्मों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा कंटेंट देखने में रुचि रखता है जो पारम्परिक प्रेम कहानियों से अलग और अधिक साहसी हो।

बाजार और प्रतिस्पर्धा का दबाव
1990 का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का दौर था। टीवी चैनलों की संख्या बढ़ रही थी, सैटेलाइट टेलीविजन का प्रसार हो रहा था और मनोरंजन उद्योग में प्रतिस्पर्धा तेज हो रही थी।

फिल्म निर्माताओं को यह महसूस होने लगा था कि दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए केवल पारम्परिक कहानियां पर्याप्त नहीं हैं। परिणामस्वरूप फिल्मों में ग्लैमर, रोमांस और उत्तेजक दृश्यों की मात्रा बढ़ने लगी। यह वह दौर था जब फिल्मों के गीतों और नृत्यों में भी एक नया बदलाव दिखाई देने लगा। कैमरे की भाषा अधिक साहसी हो गई और नायिकाओं की प्रस्तुति पहले की तुलना में अधिक ग्लैमरस हो गई।

इस बदलाव को केवल नैतिकता या संस्कृति के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे बाजार की रणनीति भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। फिल्म उद्योग को यह समझ में आ गया था कि विवाद और चर्चा किसी भी फिल्म के लिए मुफ्त प्रचार का काम कर सकते हैं।

सेंसरशिप और रचनात्मक स्वतंत्रता की बहस
हिंदी सिनेमा में बोल्डनेस बढ़ने के साथ ही सेंसरशिप को लेकर भी बहस तेज हो गई। कुछ लोगों का मानना था कि फिल्मों में अत्यधिक अंतरंग दृश्य और हिंसा समाज पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। दूसरी ओर फिल्मकारों का तर्क था कि कला को नियंत्रित करने की कोशिश रचनात्मक स्वतंत्रता के खिलाफ है। उनका कहना था कि सिनेमा समाज का प्रतिबिम्ब है और यदि समाज बदल रहा है तो फिल्मों की भाषा भी बदलना स्वाभाविक है। यह बहस आज भी जारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले यह बहस सिनेमाघरों तक सीमित थी जबकि आज ओटीटी प्लेटफॉर्म के कारण यह और व्यापक हो गई है।
वर्तमान दौर : ओटीटी का प्रभाव
आज के समय में ओटीटी प्लेटफॉर्म ने मनोरंजन उद्योग की संरचना ही बदल दी है। यहां फिल्मों और वेबसीरीज को पारम्परिक सेंसरशिप से अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिलती है। इसका परिणाम यह हुआ कि कई फिल्मकार अब ऐसे विषयों पर काम कर रहे हैं जिन्हें पहले जोखिम भरा माना जाता था। रिश्तों की जटिलता, मनोवैज्ञानिक हिंसा, अपराध और यौन सम्बंधों जैसे विषय अब अधिक खुले रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं। हालांकि यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि ओटीटी ने ही इस प्रवृत्ति को जन्म दिया बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि ओटीटी ने उस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया जो पहले से मौजूद थी।
दर्शकों की बदलती मानसिकता
सिनेमा केवल फिल्मकारों की कल्पना का परिणाम नहीं होता, यह दर्शकों की पसंद से भी प्रभावित होता है। आज का दर्शक इंटरनेट और वैश्विक मीडिया के माध्यम से दुनिया भर के कंटेंट से परिचित है। हाॅलीवुड, यूरोपीय सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय वेब-सीरीज देखने के बाद उसकी अपेक्षाएं भी बदल गई हैं। ऐसे में भारतीय फिल्मकार भी उसी दिशा में प्रयोग करने की कोशिश कर रहे हैं।

नैतिकता बनाम यथार्थ
बोल्ड फिल्मों को लेकर सबसे बड़ी बहस नैतिकता और यथार्थ के बीच है। कुछ लोग मानते हैं कि फिल्मों में बढ़ती नग्नता और हिंसा समाज को गलत दिशा में ले जा सकती है। उनका तर्क है कि सिनेमा केवल
मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव का भी स्रोत है। दूसरी ओर कई फिल्मकार और समीक्षक कहते हैं कि वास्तविक जीवन में मौजूद विषयों को पर्दे पर दिखाना गलत नहीं है। उनके अनुसार सिनेमा का काम केवल आदर्श प्रस्तुत करना नहीं बल्कि समाज की जटिलताओं को भी सामने लाना है।

कुल मिलाकर हिंदी सिनेमा में बढ़ती बोल्डनेस को केवल एक कारण से समझना सम्भव नहीं है। यह कई कारकों का परिणाम है जैसे बाजार की प्रतिस्पर्धा, दर्शकों की बदलती पसंद, तकनीकी बदलाव और रचनात्मक स्वतंत्रता की मांग।

यह भी स्पष्ट है कि इस प्रवृत्ति की शुरुआत केवल आज नहीं हुई। 1990 के दशक में भी ऐसी फिल्मों की एक लहर दिखाई दी थी जबकि उस समय ओटीटी प्लेटफॉर्म का अस्तित्व नहीं था। आज का फर्क सिर्फ इतना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस प्रवृत्ति को और व्यापक बना दिया है।
भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि हिंदी सिनेमा इस संतुलन को कैसे बनाए रखता है, एक ओर रचनात्मक स्वतंत्रता और दूसरी तरफ सामाजिक जिम्मेदारी लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि बदलते समय के साथ बॉलीवुड भी अपनी सीमाओं को चुनौती दे रहा है। इसी प्रक्रिया में एक नया प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि क्या यह रचनात्मक साहस है या बाजार की रणनीति?
शायद इसी सवाल के बीच हिंदी सिनेमा की नई पहचान आकार ले रही है, एक ऐसा उद्योग जो लगातार बदल रहा है, प्रयोग कर रहा है और कभी-कभी विवादों के बीच अपनी दिशा तलाश रहा है।

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