Editorial

सेंसरशिप के साये में लोकतंत्र

हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा द वाॅयस ऑफ हिंद रजब (The Voice of Hind Rajab) पर लगाया गया प्रतिबंध एक साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक व्यापक प्रवृत्ति का संकेत है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर संस्थाओं की भूमिका और उनकी सीमाएं लगातार बहस के केंद्र में आ रही हैं। इस फैसले के खिलाफ भारत ही नहीं बल्कि इजराइल, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोप के विभिन्न हिस्सों से 90 से अधिक फिल्मकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने एकजुट होकर विरोध दर्ज कराया है। इस विरोध में नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक शाह और आनंद पटवर्धन जैसे भारतीय नामों के साथ-साथ मिशेल एवियाद (Michal Aviad)  इयन जीव (Ilan Ziv) मार्क आर्कबर (Mark Achbar)  लिन्ने सेगल (Lynne Segal) और अकील बिल्ग्रामी (Akeel Bilgrami) जैसे अंतरराष्ट्रीय हस्तियों की भागीदारी यह स्पष्ट करती है कि यह विवाद अब केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह वैश्विक लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दिशा को लेकर उठ रही चिंता का हिस्सा बन चुका है।

भारत का संवैधानिक ढांचा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित करता है लेकिन इसके साथ ही ‘उचित प्रतिबंधों’ की भी व्यवस्था की गई है। यही वह बिंदु है जहां से समस्या की शुरुआत होती है। जब ‘उचित’ की व्याख्या अस्पष्ट या अत्यधिक व्यापक हो जाती है, तब वही प्रावधान जो संतुलन बनाए रखने के लिए बनाया गया था, नियंत्रण का उपकरण बन सकता है। द वाॅयस ऑफ हिंद रजब के मामले में विदेशी सम्बंधों को प्रभावित होने की आशंका को आधार बनाया गया लेकिन यह तर्क कई स्तरों पर सवाल खड़े करता है। क्या किसी फिल्म का प्रदर्शन वास्तव में दो देशों के बीच कूटनीतिक सम्बंधों को प्रभावित कर सकता है? और यदि ऐसा सम्भव भी है तो क्या यह इतना गम्भीर कारण है कि एक रचनात्मक अभिव्यक्ति को पूरी तरह रोक दिया जाए? स्मरण रहे लोकतंत्र में असहमति केवल स्वीकार्य नहीं होती बल्कि वह उसकी आत्मा का हिस्सा होती है।

इतिहास इस संदर्भ में हमें बार-बार चेतावनी देता है। आपातकाल के दौरान सेंसरशिप ने जिस तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं को प्रभावित किया, वह किसी भी समाज के लिए एक स्थायी सबक है। उस समय ‘किस्सा कुर्सी का’ जैसी फिल्म की प्रतियां नष्ट कर दी गईं, जो केवल एक फिल्म नहीं बल्कि सत्ता की आलोचना का प्रतीक थी। ‘आंधी’ को इंदिरा जी से समानता के आधार पर प्रतिबंधित किया गया जबकि ‘नसबंदी’ जैसी फिल्म को सरकारी नीतियों पर व्यंग्य करने के कारण रोका गया। ये घटनाएं इस बात को रेखांकित करती हैं कि जब सत्ता असहज होती है तो वह सबसे पहले उन माध्यमों को नियंत्रित करने की कोशिश करती है जिनके जरिए सवाल उठाए जाते हैं।

आज का परिदृश्य उस दौर से भिन्न अवश्य है लेकिन कई मायनों में समान संकेत देता है। अब सेंसरशिप का स्वरूप प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अधिक जटिल और सूक्ष्म हो गया है। यह सीधे प्रतिबंध के बजाय चयनात्मक स्वीकृति और अस्वीकृति के रूप में सामने आता है। एक ओर ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘द केरला स्टोरी’ जैसी फिल्मों को न केवल तुरंत सेंसरशिप मिल जाती है बल्कि उन्हें राजनीतिक और सामाजिक समर्थन भी प्राप्त होता है तो दूसरी तरफ ‘उड़ता पंजाब’ जैसी फिल्म को अत्यधिक कट्स का सामना करना पड़ता है और ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ को ‘महिला केंद्रित’ विषयवस्तु के कारण प्रारम्भिक स्तर पर अस्वीकार कर दिया जाता है। बीबीसी की ‘इंडिया: द मोदी क्वेशचन’ (India: The Modi Question) के प्रदर्शन पर रोक और लीना मनीमेकलाई की ‘काली’ को लेकर उत्पन्न विवाद भी यही संकेत देते हैं कि असहज प्रश्न उठाने वाली फिल्मों सामग्री के प्रति एक स्पष्ट असुरक्षा भाव मौजूद है।

यह विरोधाभास केवल फिल्मों तक सीमित नहीं है बल्कि यह उस व्यापक सांस्कृतिक और राजनीतिक वातावरण का हिस्सा है जिसमें यह तय किया जा रहा है कि कौन सी कहानी ‘स्वीकार्य’ है और कौन सी नहीं। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे उस दिशा में ले जाती है जहां रचनात्मक अभिव्यक्ति को केवल मनोरंजन तक सीमित कर दिया जाता है और उसकी आलोचनात्मक भूमिका कमजोर पड़ने लगती है।

सेंसरशिप का सबसे खतरनाक प्रभाव वह है जो दिखाई नहीं देता, आत्म-सेंसरशिप। जब कलाकार, लेखक और फिल्मकार यह सोचने लगते हैं कि कौन सा विषय सुरक्षित है और कौन सा नहीं, तब वे स्वयं ही अपनी अभिव्यक्ति की सीमाएं तय करने लगते हैं। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे गम्भीर खतरा होती है क्योंकि यह बिना किसी औपचारिक आदेश के ही अभिव्यक्ति को सीमित कर देती है। धीरे-धीरे एक ऐसा वातावरण बनता है जहां असहमति स्वाभाविक रूप से कम होने लगती है और सार्वजनिक विमर्श एकतरफा हो जाता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को लेकर जो प्रतिक्रिया सामने आई है, वह इस पूरे परिदृश्य की गम्भीरता को और स्पष्ट करती है। अगर लोकतांत्रिक देश भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कूटनीतिक या राजनीतिक कारणों से सीमित करने लगेंगे तो यह एक खतरनाक वैश्विक प्रवृत्ति को जन्म देगा। लोकतंत्र केवल चुनावों की प्रक्रिया नहीं है। यह उन मूल्यों पर आधारित व्यवस्था है जिसमें असहमति, आलोचना और विचारों की विविधता को स्थान दिया जाता है।

यह भी जरूरी है कि हम सेंसर बोर्ड जैसी संस्थाओं की भूमिका को स्पष्ट रूप से समझें। उनका कार्य फिल्मों का वर्गीकरण करना है, न कि उन्हें नियंत्रित करना लेकिन जब बार-बार ऐसे निर्णय सामने आते हैं जो अभिव्यक्ति को सीमित करते हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ये संस्थाएं अपने निर्धारित दायरे से आगे बढ़ रही हैं।

डिजिटल युग में यह बहस और भी जटिल हो गई है। ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने के बाद अभिव्यक्ति के नए रास्ते खुले लेकिन इसके साथ ही नियंत्रण की नई बहसें भी शुरू हो गईं। वेब सीरीज और ऑनलाइन कंटेंट को लेकर समय-समय पर उठने वाले विवाद यह संकेत देते हैं कि सेंसरशिप अब केवल सिनेमाघरों तक सीमित नहीं है बल्कि यह डिजिटल स्पेस में भी अपनी जगह बना रही है। यह स्थिति भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है कि क्या हम तकनीक के साथ अभिव्यक्ति को मुक्त करेंगे या उसी के साथ उसे नियंत्रित करने के नए तरीके खोजेंगे?

अंततः यह बहस केवल एक फिल्म या एक निर्णय तक सीमित नहीं है। यह उस दिशा का प्रश्न है जिसमें हमारा लोकतंत्र आगे बढ़ रहा है। क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां असहमति को स्थान मिलेगा जहां कलाकार बिना भय के अपने विचार व्यक्त कर सकेंगे और जहां संस्थाएं अपने संवैधानिक दायरे में रहकर काम करेंगी? या फिर हम धीरे-धीरे उस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं जहां केवल वही आवाजें सुनाई देंगी जो सत्ता के अनुकूल हों?

इतिहास यह बताता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी एक झटके में समाप्त नहीं होती बल्कि यह धीरे-धीरे सीमित होती है। छोटे-छोटे निर्णयों, तर्कों और समझौतों के जरिए। जब तक इसका पूरा प्रभाव सामने आता है, तब तक बहुत कुछ बदल चुका होता है। इसलिए यह समय केवल प्रतिक्रिया देने का नहीं बल्कि गम्भीर आत्ममंथन का है। यह तय करने का है कि हम किस तरह के लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, एक ऐसा लोकतंत्र जो सवालों से मजबूत होता है? या एक ऐसा लोकतंत्र जो सवालों से डरता है?

स्मरण रहे कि जब लोकतंत्र सवालों से डरने लगे तो यह केवल राजनीतिक व्यवस्था की कमजोरी नहीं होती बल्कि यह समाज के भीतर आत्मविश्वास की कमी का भी संकेत होता है। एक सशक्त लोकतंत्र वह होता है जो आलोचना को सहन करता है, उससे संवाद करता है और आवश्यकता पड़ने पर अपने निर्णयों की समीक्षा भी करता है। इसके विपरीत, जब सत्ता या संस्थाएं असहमति को ही खतरे के रूप में देखने लगती हैं तो यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे संवाद की जगह नियंत्रण को स्थापित करने लगती है।

फिल्में, साहित्य और कला केवल अभिव्यक्ति के माध्यम नहीं हैं। वे समाज के भीतर चल रहे विमर्श का प्रतिबिंब होती हैं। जब इन्हें सीमित किया जाता है तो केवल एक रचना को नहीं रोका जाता बल्कि उन विचारों और प्रश्नों को भी रोका जाता है जो समाज को आगे बढ़ाने की क्षमता रखते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि इतिहास में वे समाज ही आगे बढ़े हैं जिन्होंने अपने भीतर असहमति को स्थान दिया, उसे दबाने के बजाय समझने का प्रयास किया।

सवाल है कि क्या हम अपने लोकतंत्र को केवल चुनावों और बहुमत तक सीमित कर रहे हैं? या उसे विचारों की विविधता और असहमति की स्वतंत्रता के साथ देख रहे हैं? यदि अभिव्यक्ति पर नियंत्रण बढ़ता है तो इसका असर केवल इसी संदर्भ में यह भी समझना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई ‘सुविधा’ नहीं बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। इसे परिस्थितियों के अनुसार सीमित करने की प्रवृत्ति अंततः उसी व्यवस्था को कमजोर करती है, जिसे सुरक्षित रखने के नाम पर यह कदम उठाए जाते हैं। जब समाज में भय का वातावरण बनता है तो सबसे पहले विचारों की विविधता प्रभावित होती है और धीरे-धीरे यह असर संस्थाओं और नागरिकों के बीच के विश्वास पर भी पड़ता है।

आखिरकार सवाल केवल यह नहीं है कि कौन सी फिल्म दिखाई जाएगी और कौन सी नहीं बल्कि यह है कि क्या नागरिकों को यह तय करने का अधिकार होगा कि वे क्या देखना, समझना और उस पर क्या राय बनाना चाहते हैं। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह अपने नागरिकों पर भरोसा करे, न कि उनके लिए यह तय करे कि उन्हें क्या सोचना चाहिए। कलाकारों या फिल्मकारों तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह धीरे-धीरे नागरिकों के सोचने और बोलने के अधिकार को भी प्रभावित करता है।

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