उत्तराखण्ड का मिनी पंजाब कहे जाने वाले काशीपुर विधानसभा में सिख और मुस्लिम आबादी काफी संख्या में है। चीमा परिवार विशेषकर हरभजन सिंह चीमा ने इस अल्पसंख्यक बाहुल्य सीट पर एंटी-इनकंबेंसी को दरकिनार करते हुए लगातार चार बार जीत हासिल की है। 2022 के विधानसभा चुनावों में चीमा ने अधिक उम्र होने के चलते स्वयं चुनाव न लड़कर अपने बेटे त्रिलोक सिंह चीमा को भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ाया। लोगों से विधायक के कार्यकाल की बाबत जब पूछा जाता है तो वे मेयर दीपक बाली के कार्यों को गिनाने लगते हैं। लगभग हर तीसरे व्यक्ति ने दीपक बाली द्वारा शहर के चौराहों का सौंदर्यीकरण, हाईटेक शौचालय, पिंक शौचालय, स्ट्रीट लाइट, नए बस स्टाप सहित आरोग्य केंद्रों तथा कई कार्यों को मेयर द्वारा कराए जाने की बात कही। जनता का आरोप है कि विधायक चीमा उनकी समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय अपने कारोबार को गति देने में लगे हुए हैं। जनता के बीच संवाद की कमी के चलते फिलहाल यह कहा जा रहा है कि यहां विधायक त्रिलोक सिंह चीमा से कहीं अधिक मेयर दीपक बाली लोकप्रिय हैं। जिस तरह से मेयर दीपक बाली शहर में आए दिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यक्रम कराते रहते हैं उससे चर्चा यह भी है कि आगामी 2027 में यहां से चीमा की बजाय बाली विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं
उत्तराखण्ड राज्य के गठन बाद से ही ऊधमसिंह नगर भाजपा का सबसे मजबूत जिला रहा है। ऊधमसिंह नगर जिले की काशीपुर विधानसभा सीट पर चीमा परिवार का पिछले दो दशकों से अधिक समय से कब्जा बरकरार है। यह परिवार लगातार पांचवीं बार यहां से जीतकर अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम किए हुए है। पहले लगातार चार बार हरभजन सिंह चीमा विधायक बने। वे भाजपा और अकाली दल के गठबंधन के तहत चुनाव लड़ते रहे और एक कद्दावर सिख नेता के रूप में स्थापित हुए। हरभजन सिंह चीमा बड़े उद्योगपति थे जिनकी कई पेपर मिलें थीं।
उद्योगपति होने के साथ-साथ वे राजनीति में सक्रिय रहे। अपना पूरा जीवन शिरोमणि अकाली दल को दिया। भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन होने के चलते उत्तराखण्ड में उन्हें भाजपा का ही नेता समझा जाता है। उत्तराखण्ड में वे शिरोमणि अकाली दल के प्रदेश अध्यक्ष हैं।
इस विधानसभा में सिख और मुस्लिम आबादी काफी संख्या में है। चीमा परिवार विशेषकर हरभजन सिंह चीमा ने इस अल्पसंख्यक बाहुल्य सीट पर एंटी-इनकंबेंसी को दरकिनार करते हुए लगातार जीत हासिल की है। 2022 के विधानसभा चुनावों में चीमा ने अधिक उम्र होने के चलते स्वयं चुनाव न लड़कर अपने बेटे त्रिलोक सिंह चीमा को भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ाया। त्रिलोक सिंह कांग्रेस के पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा के पुत्र नरेंद्र चंद सिंह को 16,335 वोट के भारी अंतर से हराकर इस सीट से विधायक चुके गए। इस तरह चीमा परिवार के नेतृत्व में यह सीट भाजपा का एक अभेद्य किला बनी हुई है। उत्तराखण्ड का ‘मिनी पंजाब’ कहें जाने वाली काशीपुर विधानसभा में पिछले चार साल के विकास कार्यों का जायजा लेने गई
‘दि संडे पोस्ट’ टीम के समक्ष अधिकतर लोग कहते पाए गए – ‘‘काश! काशीपुर में विकास होता।’’
यहां लम्बे इंतजार के बाद रेलवे ओवरब्रिज निर्माण हुआ था लेकिन एक साल बाद ही इस ओवरब्रिज का कुछ भाग गिरने लगा। सड़कों की दुर्दशा को लेकर आए दिन धरना-प्रदर्शन होते रहते हैं। रामनगर रोड पर वर्षों से बन रहे फ्लाईओवर के आधा-अधूरा रहने से लोग जाम के झाम से परेशान रहते हैं। राधे हरि राजकीय महाविद्यालय में अध्ययनरत छात्रों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कुछ दिन पहले ही यहां के एक किसान के द्वारा आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा लिया था। बावजूद इसके यहां के किसानों की समस्याओं की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जिस रोडवेज बस अड्डे पर कभी रौनक बनीं रहतीं थीं वह आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जगह-जगह से क्षतिग्रस्त होने के साथ-साथ बस अड्डे का सूनापन यात्रियों को निराश करता दिखाई देता है। बसों के खड़े होने के स्थान पर मोटरसाइकिलें खड़ी रहती हैं जबकि सरकारी स्कूलों के जर्जर भवनों में बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं है।
काशीपुर को जिला बनवाने की मांग भी लम्बे समय से लम्बित है। जनता का आरोप है कि विधायक चीमा उनकी समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय अपने कारोबार को गति देने में लगे हुए हैं। जनता के बीच संवाद की कमी के चलते फिलहाल यह कहा जा रहा है कि यहां विधायक त्रिलोक सिंह चीमा से कहीं अधिक मेयर दीपक बाली लोकप्रिय हैं। जिस तरह से मेयर दीपक बाली शहर में आए दिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यक्रम कराते रहते हैं उससे चर्चा यह भी है कि आगामी 2027 में यहां से चीमा की बजाय बाली विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं।
काशीपुर शहर में जब
‘दि संडे पोस्ट’ टीम ने लोगों से विधायक त्रिलोक सिंह चीमा के विकास कार्यों की बाबत बात की तो अजीब तरह की प्रतिक्रिया सामने आई। लोगों से विधायक के कार्यकाल की उपलब्धियों के बारे में पूछा जाता है लेकिन वे मेयर
दीपक बाली के कार्यों को गिनाने लगते। लगभग हर तीसरे व्यक्ति ने दीपक बाली द्वारा शहर के चौराहों का सौंदर्यीकरण, हाईटेक शौचालय, पिंक शौचालय, स्ट्रीट लाइट, नए बस स्टाप सहित आरोग्य केंद्रों तथा कई कार्यों को मेयर द्वारा कराए जाने की बात कही। युवाओं को स्पोर्ट्स में प्रशिक्षण देने का काम कर रहे राजीव चौधरी ने बताया कि मेयर दीपक बाली ने अपने महज एक साल के कार्यकाल में ही इतने कार्य करा दिए हैं जितने विधायक त्रिलोक सिंह चीमा द्वारा अपने चार साल के कार्यकाल में नहीं कराए जा सके हैं। यहां मेयर दीपक बाली के निमंत्रण पर ही एक-एक महीने में दो-दो बार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का आगमन हुआ है। मुख्यमंत्री जब भी काशीपुर आते हैं तो शहर के लिए कुछ ना कुछ देकर ही जाते हैं।
कभी कहलाता था ‘मैनचेस्टर ऑफ हिल्स’
नगर निगम मार्किट में रेडिमेड गारमेंट की दुकान चलाने वाले
राजू अनेजा काशीपुर का अतीत याद करते हुए बताते हैं कि आजादी से पहले काशीपुर में विदेशी कपड़ों की मंडी होती थी। जहां से यूपी से लेकर पूरे कुमाऊं तक कारोबार होता था। कपड़ों की मार्केट के लिए प्रसिद्ध होने की वजह से ही इस शहर को ‘मैनचेस्टर ऑफ हिल्स’ के नाम से भी जाना जाता था। वे बताते हैं कि इंग्लैंड, चीन और जापान तक से कपड़े यहां आते थे। यहां से इनका व्यापार तिब्बत तक होता था। तब व्यापार करने का एकमात्र साधन खच्चर हुआ करते थे। खच्चरों के जरिए पूरे कुमाऊं और तिब्बत तक माल भेजा जाता था। वहां से वापसी में व्यापारी सुहागा और घी लाया करते थे। यही वजह है कि आजादी के बाद यहां उत्तर प्रदेश हथकरघा निगम ने सूती वस्त्र मील भी बनाई थी। अब लेकिन सरकारी उपेक्षा और जनप्रतिनिधि की उदासीनता चलते ऐसा नहीं हो रहा है।
7 साल में बना और एक साल में गिरने लगा फ्लाईओवर
स्थानीय विधायक
त्रिलोक सिंह चीमा और उनके पिता पूर्व विधायक
हरभजन सिंह चीमा की अगर काशीपुर में सबसे बड़ी उपलब्धि को देखें तो चीमा चैराहे पर बना रेलवे फ्लाईओवर है। यह फ्लाईओवर पूरे सात साल में बनकर तैयार हुआ है लेकिन अचंभित करने वाली बात यह है कि बनने के एक साल बाद ही यह गिरने लगा है। पत्रकार
रक्षिता नागर के अनुसार पिछले साल इसका एक मीटर भाग टूटकर गिर गया। इससे लोगों में दहशत का माहौल है। स्थिति यह है कि प्रशासन ने फ्लाईओवर पर भारी वाहनों का प्रवेश निषेध कर दिया है। शायद यह उत्तराखण्ड का पहला ऐसा फ्लाईओवर होगा जो भारी वाहनों के लिए प्रतिबंधित किया गया है। हालांकि वाहन चालकों ने प्रशासन के इस प्रतिबंध को स्वीकार नहीं किया है। प्रशासन भारी वाहनों को फ्लाईओवर पर जाने से रोकने के लिए ऊंचाई अवरोधक लगाता है लेकिन ट्रक ड्राईवर बार-बार उसको तोड़कर निकल जाते हैं।
अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा बस अड्डा
कभी काशीपुर के बस अड्डे में बड़ी चहल-पहल रहा करती थी। तब यहां रामनगर और पहाड़ों से आने वाली हर बस रुका करती थी। रुद्रपुर और हल्द्वानी के साथ ही हरिद्वार और देहरादून जाने वाली प्रत्येक बस का यह मुख्य अड्डा होता था लेकिन जब से रेलवे फ्लाईओवर बना है तब से यहां बसें नहीं आती। कारण यह है कि फ्लाईओवर बस अड्डा के ऊपर से निकल जाता है। बस ड्राइवर बसों को आगे से वापस घुमाकर लाने में परेशानी महसूस करते हैं क्योंकि फ्लाईओवर के नीचे का रास्ता संकरा है। फिलहाल यह बस अड्डा सूनसान पड़ा रहता है। यात्री बसों में जाने के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं। रोडवेज बसें कहा रूकेंगी कोई नहीं जानता है। रोडवेज बस अड्डा फिलहाल खस्ता हाल है। जिस बस अड्डे में रोडवेज खड़ी होनी चाहिए थी उसको अब अवैध रूप से मोटरसाईकिल पार्किंग बना दिया गया है। बरामदें में मोटरसाइकिलें एक लाइन से खड़ी रहती हैं जबकि बस अड्डे के परिसर में लोगों ने अपनी कारें खड़ी की हुई हैं।
जर्जर स्कूल में पढ़ रहे बच्चे
नूरपुर के प्राइमरी स्कूल में बच्चे जान जोखिम में डालकर पढ़ रहे हैं। इस स्कूल की स्थापना वर्ष 1972 में हुई थी। यहां दो कक्ष और एक प्रधानाध्यापक कार्यालय है। विद्यालय में 18 बच्चे पढ़ते हैं जिनका जिम्मा दो शिक्षकों के कंधों पर है। स्कूल भवन बदहाल है। कमरों की छत से प्लास्टर उखड़ गए हैं और सरिया दिख रहे हैं तथा खिड़की, दरवाजों कोे दीमक लग चुके हैं। जगह-जगह से फर्श भी उखड़ चुका है। शौचालय की स्थिति बदतर है। बरसात में कमरों की छत से पानी टपकता है। बच्चे और शिक्षक जान जोखिम में डालकर बरामदे में बैठने को मजबूर हैं। स्कूल में लगा हैंडपम्प सालों से खराब है। कक्षा चार की छात्रा
रवीना और पांचवीं की छात्रा
कुमारी शैली ने बताया कि इस डर से कि कहीं कमरे की छत ना गिर जाए वे बरामदे में बैठकर पढ़ते हैं। पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है। जिसके चलते वे पानी घर से ही लाते हैं।
प्रधानाध्यापक
अश्विनी कुमार शर्मा ने बताया कि उन्होंने 20 अगस्त 2025 को इस स्कूल में तैनाती ली थी। उस समय छात्र संख्या 16 थी जो अब 18 है। कक्षों और ऑफिस जर्जर हो चुके हैं। सरकारी हैंडपम्प खराब पड़ा है। सरकारी पानी सिर्फ सुबह-शाम आता है। भोजनमाता घर से बाल्टी में पानी लाती है। वे इस बाबत तीन बार प्रस्ताव भेज चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। वे बताते हैं कि उन्होंने स्वयं खर्च करके रसोई के लिए गैस सिलेंडर, चूल्हा और अन्य सामान खरीदा है।
लोगों के दिलों में जिले की ज्वाला
काशीपुर को जिला बनाने की मांग बहुत पुरानी है। स्थानीय
रविंद्र कपूर ने बताया कि क्षेत्र के विकास में जिला मुख्यालय एक अहम कड़ी होता है। अगर काशीपुर, बाजपुर और जसपुर का पर्याप्त विकास करना है तो काशीपुर को जिला बनाना जरूरी है। जिला बनने से लाखों लोगों की रुद्रपुर तक 50 किलोमीटर की दौड़ बचेगी और कई दशक से चली आ रही जनमानस की जिला बनाने सम्बंधी मांग पूरी होगी। सरकार काशीपुर को जिला न बनाकर लाखों लोगों की सुविधा को नजरअंदाज कर रही है। वह कहते हैं कि हमारी मांग को बल साल 2011 में मिला। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने चार नए जिले बनाए जाने की घोषणा तक की थी जिसमें गढ़वाल मंडल में 2 जिले कोटद्वार और यमुनोत्री तथा कुमाऊं मंडल में 2 जिले रानीखेत और डीडीहाट बनाने की बात थी। तब काशीपुर के लोगों ने जोर-शोर से जिला बनाने की मांग की थी। निशंक के हटते ही यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद 2016 में फिर से जिले की ज्वाला भड़क उठी। साल 2016 में हरीश रावत सत्ता पर काबिज हुए और उन्होंने इस बार 8 नए जिले बनाने की योजना में काशीपुर को शामिल कर लिया। डीडीहाट, रानीखेत, रामनगर, कोटद्वार, यमुनोत्री, रुड़की, ऋषिकेश के साथ ही काशीपुर जिला को बनाने का खाका भी तैयार कर लिया था लेकिन हरीश रावत सरकार के बाद इस पर किसी भी मुख्यमंत्री ने पहल नहीं की। फिलहाल एक बार फिर काशीपुर के विधायक त्रिलोक सिंह चीमा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से काशीपुर जिला बनाने की मांग की है। धामी ने लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है।
गौवंश में फैली लम्पी बीमारी
कुंडी सेवरा के किसान
टीका सिंह के अनुसार उनके गांव में गोवंश में लम्पी बीमारी फैली हुई है। इससे गांव के किसान बहुत परेशान हैं। इस बीमारी में पशुओं को तेज बुखार आता है। पशु चारा खाना व पानी पीना छोड़ देता है। उसके शरीर में गांठें पड़ जाती हैं जो तीन चार दिन में फूट कर छाले बन जाते हैं। पशुओं में इस बीमारी से बचाव के लिए टीकाकरण अभियान चलाया जाता है लेकिन प्रशासन इस तरफ से थोड़ी-बहुत औपचारिकता करके इतिश्री कर लेता है।
सड़कों के मामले में सबसे बुरा हाल काशीपुर रामनगर रोड का है। यहां से होते हुए रोजाना हजारों पर्यटक विश्व प्रसिद्ध कार्बेट नेशनल पार्क जाते हैं लेकिन सड़क पर हुए गड्ढों से उनका गंतव्य तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। इसी मार्ग पर वर्षों से एक रेलवे फ्लाईओवर बन रहा है जिसके चलते यात्रियों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। सड़क किनारे पंचर बनाने का काम करने वाले रजब अली का कहना है कि जनता ने कई बार प्रशासन से मांग की है कि इस फ्लाईओवर को जल्दी से पूरा किया जाए जिससे आवागमन में समस्या पैदा ना हो लेकिन काम में कोई गति नहीं आती है।
जगह-जगह लगे हुए हैं गंदगी के ढेर
काशीपुर शहर की हालत देखें तो यहां जगह-जगह गंदगी के ढेर लगे हुए हैं। लोग कूड़े को सड़कों पर ही डाल देते हैं। रोडवेज बस अड्डा के पास स्थित फाटक से आगे निकलते ही कई जगह गंदगी के ढेर दिखाई दिए। रिवर्स गियर में कार चलाने का रिकाॅर्ड बनाने वाले मोबिन खान का कहना है कि गंदगी की वजह से इस बार स्वच्छ सर्वेक्षण की रैंकिंग ने यहां के नगर निगम और शहरवासियों की स्वच्छता अभियान पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं। शहर स्वच्छता की सीढ़ी में एक पायदान खिसक गया है। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि स्वच्छता रैंकिंग की रिपोर्ट आने के बाद भी जिम्मेदार नहीं जागे हैं। एक तरफ जहां दूसरे नगर निगमों में साफ-सफाई में और सुधार हुआ है लेकिन हमारे काशीपुर में कई स्थानों पर कूड़ा सड़कों पर फैला पड़ा रहता है।
जीजीआईसी में शिक्षकों का टोटा
काशीपुर के जीजीआईसी में प्रवक्ता और सहायक अध्यापकों के कई पद रिक्त हैं। इस कारण हर साल बोर्ड परिणाम पर बुरा असर देखने को मिल रहा है। यहां 17 प्रवक्ता के पद स्वीकृत हैं। इनमें से सिर्फ आठ पद भरे हुए हैं जबकि अंग्रेजी, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, गृह विज्ञान आदि के नौ पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा सहायक अध्यापकों के 25 पद स्वीकृत हैं। इनमें से विज्ञान, सामान्य विज्ञान, गृह विज्ञान, व्यायाम, हिंदी, संस्कृत, गृह विज्ञान आदि आठ पद रिक्त चल रहे हैं। छात्रों के अनुसार यहां व्यायाम, हिंदी, संस्कृत, गृह विज्ञान, हिंदी के अतिथि शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है। यही वजह है कि लम्बे समय से खाली पद नहीं भरने के कारण हर साल बोर्ड परिणाम पर असर पड़ता है। छात्रा
आशा नेगी कहती हैं ‘‘महत्वपूर्ण विषयों के पद रिक्त होने से गेस्ट टीचर कुछ पाठ्यक्रम तो करा दे रहे हैं लेकिन अधिकतर छात्राएं अपना पाठ्यक्रम ट्यूशन, यू-ट्यूब से पढ़कर पूरा करती हैं।’’
राजकीय चिकित्सालय में डॉक्टरों की कमी
एलडी भट्ट राजकीय अस्पताल कुमाऊं का तीसरे नम्बर के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में गिना जाता है। अस्पताल में काशीपुर के अलावा यूपी के ठाकुरद्वारा, रामपुर, रेहड़, बिजनौर, जसपुर, रामनगर, बाजपुर, सल्ट, बेतालघाट, रानीखेत तक से मरीज इलाज को पहुंचते हैं। इस अस्पताल में मानकों के हिसाब से चिकित्सकों की तैनाती पूरी नहीं है।
इस चलते अस्पताल में आने वाले मरीज निजी अस्पतालों की ओर रुख कर रहे हैं। ऐसे में मरीजों की निजी चिकित्सालयों में इलाज और ऑपरेशन कराने में हालत पतली हो रही है। दूर-दराज के गांव से अस्पताल में इलाज कराने आए प्रताप सिंह ने बताया कि इस अस्पताल में हड्डी रोग विशेषज्ञ, न्यूरो सर्जन, फिजिशियन और नेत्र रोग विशेषज्ञ नहीं है। हालांकि इस अस्पताल में महिला रोग विशेषज्ञ, ईएनटी, दंत रोग विशेषज्ञ, जीडीएमओ, बाल रोग विशेषज्ञ के पद भरे हुए हैं। फिजिशियन ना होने के कारण ज्यादातर मरीजों को हल्द्वानी या रुद्रपुर रेफर किया जाता है। यहां डेंगू के लिए बनाया गया वार्ड सिर्फ नाममात्र का है। यहां न ही सुविधाएं मौजूद हैं और न ही विशेषज्ञ डाक्टर।’
एलडी भट्ट अस्पताल में आने वाले मरीजों को शिफ्ट करने के लिए पूरा नेटवर्क काम करता है जिसमें सरकारी से प्राइवेट लाने के लिए बीच में दलाल काम करते हैं। यहां इलाज कराने आए नदीम अली केे अनुसार डाॅक्टरों की कमी से अस्पताल में आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर रोगी प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करने को मजबूर हैं। वे बताते हैं कि यहां के डाॅक्टर मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों में भेज देते हैं। इस तरह का एक मामला 2022 में उस सामने आया था जब अनुबंध के तौर पर जुड़ी एक महिला चिकित्सक पर मरीजों को प्राइवेट अस्पताल में शिफ्ट करने का आरोप सही पाया गया था।
काशीपुर मुरादाबाद रोड पर एक फैक्ट्री मालिक
राजीव तनेजा के अनुसार प्रदेश में काशीपुर ऐसा शहर है जहां पहले से कई उद्योग धंधे हैं लेकिन इसका विस्तार नहीं हो पाया जबकि शहर से सटे हुए पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के ठाकुरद्वारा में नए-नए उद्योग धंधे खुले हैं लेकिन काशीपुर की तरफ किसी ने भी गम्भीरता से प्रयास नहीं किए। 2015 में जब हरीश रावत की सरकार थी तब काशीपुर को इंडस्ट्री हब बनाने की घोषणा की गई थी। तब उद्योग धंधे से जुड़े लोगों को बहुत उम्मीद जगी थी। हरीश रावत के द्वारा तत्कालीन मुख्य सचिव राकेश शर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित करने की बात कही गई थी। इस कमेटी में प्रमुख सचिव उद्योग और राजस्व सचिव सहित उद्योग जगत के पदाधिकारी भी शमिल होने की बात कही गई थी। इसके तहत काशीपुर के साथ ही बहल्ला और सुल्तानपुर पट्टी जैसे क्षेत्रों को मजबूत औद्योगिक आधार के साथ जोड़ना तय हुआ था। इस उम्मीद को तब झटका लगा जब यह कवायद शुरू नहीं हो सकी। लोगों को आज तक नहीं पता कि उद्योग धंधों के उत्थान के लिए जो कमेटी बनी उसने शहर का क्या उत्थान किया।
काशीपुर शहर के आठ मोहल्लों में दूषित पानी का कहर व्याप्त है। दूषित पानी पीने से लोगों को पीलिया की बीमारी हो रही है। लोगों ने कई बार दूषित पानी की सप्लाई की शिकायतें भी जल संस्थान से की हैं लेकिन उनकी जनसुनवाई नहीं हो रही है। लोगों का कहना है कि यहां दशकों पुरानी पाइप लाइन पड़ी है जिसमें जगह-जगह लीकेज हो गई है। महेशपुरा के रोहित सक्सेना ने बताया कि महेशपुरा सहित काजीबाग, कटोराताल, किला, बांसफोड़ान, औझान, लाहोरियान और खत्रियान आदि मोहल्लों में पांच दशक पुरानी पेयजल लाइनें बिछी हुई हैं। यहां से गंदे पानी की शिकायतें जल संस्थान के पास पहुंचती हैं। वे बताते हैं कि शहरी क्षेत्र में पांच दशक पूर्व जल आपूर्ति के लिए पेयजल लाइनें बिछाई गई थीं। इसी से लोगों के घरों में पेयजल की आपूर्ति हो रही है। कुछ पाईप लाईन में तो काम कर दिया गया है लेकिन अभी भी शहर में ऐसी पुरानी लाइनें बिछी है जो जर्जर हो चुकी है जिनसे आए दिन लीकेज की समस्या बनी रहती है। इससे पानी की बर्बादी तो होती ही है, साथ ही गंदा पानी उनके घरों में पहुंच जाता है। ऐसे पीने से लोगों में पेट से सम्बंधित बीमारियां हो रही हैं।
काशीपुर में वैसे तो हर किसी सड़क पर दुकानदारों का अतिक्रमण हैं जिनकी वजह से सड़कें संकरी हो गई है लेकिन सबसे ज्यादा तहसील रोड पर दुकानदारों ने अतिक्रमण किया हुआ है। यहां दुकानदारों ने मनमानी तरीके से दुकानें बनाकर सड़क पर अतिक्रमण कर दिया है। इसके साथ ही कोतवाली रोड पर अतिक्रमण करके बनाई गई दुकानों से सड़कों का चैड़ीकरण खत्म हो जाता है जिससे लोगों को घंटों जाम की समस्या से जूझना पड़ता है।
स्थानीय
राजेश सूरी कहते हैं कि ‘‘इस बाबत कोर्ट ने भी आदेश दे दिए हैं। आदेशों के बाद भी कुछ नहीं हो रहा है। अधिकारी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के नाम पर ठेली पटरी वालों को हटाकर मात्र खानापूर्ति कर देते हैं। इसके कुछ दिनों बाद ही फिर शहर में अतिक्रमण की वही समस्या सामने आ जाती है।’’
अवैध काॅलोनियों का गढ़ बन रहा
पत्रकार
हरदीप शर्मा के अनुसार काशीपुर अवैध काॅलोनाइजरों के कब्जे में है। अगर कोई उनकी शिकायत दर्ज करवाता है तो उसपर फर्जी मुकदमे दर्ज किए जाते हैं। वह बताते हैं कि उनके गांव चांदपुर में हरे-भरे आम और लीची के फलदार वृक्ष काट दिए गए। यह करीब 150 बीघा जमीन है। जिस पर अवैध कॉलोनी बना दी गई। हरदीप शर्मा बताते हैं कि इसकी शिकायत जब उन्होंने अधिकारियों से की तो उन्होंने जांच कराने की औपचारिकता करके मामले को टाल दिया।
डिग्री कॉलेज में समस्याएं ही समस्याएं
वर्ष 1973 में स्थापित हुए राधे हरि राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय राधेहरि राजकीय स्नातकोत्तर में छात्रों की बहुत सी समस्याएं सामने आई हंै। बीए द्वितीय की छात्रा रवीना कपूर कहती हैं कि ‘‘यह महाविद्यालय न केवल काशीपुर के छात्रों को एजुकेशन देता है बल्कि आस-पास के क्षेत्र से बहुत संख्या में छात्र यहां अध्ययन करने आते हैं। इनमें काशीपुर के अलावा जसपुर, बाजपुर, कौशल्यापुरी, रामनगर, केलाखेड़ा आदि क्षेत्रों से करीब छह हजार छात्र-छात्राएं पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं लेकिन फैकल्टी और सुविधाओं के नाम पर यह शिक्षा संस्थान काफी पीछे है।’’
स्नातक व स्नातकोत्तर कक्षाओं में छात्रों की संख्या इतनी अधिक हो जाती है कि अधिकांश को एडमिशन भी नहीं मिल पाता है। इसलिए यहां कई वर्षों से सीटें बढ़ाने की मांग की जाती रही है लेकिन सीटें नहीं बढाई जा रही हैं। यहां शौचालय और पेयजल की भारी समस्या है जिससे शौचालय और पानी की टंकी के सामने छात्र-छात्राओं की भीड़ लगी रहती है उन्हें काफी इंतजार करना पड़ता है तब जाकर उनका नम्बर आता है। काॅलेज में अलग-अलग क्लासों में पढ़ रहे मुकेश रावत, प्रिंस चैधरी और वरुण अनेजा ने बताया कि उन्होंने महाविद्यालय प्रबंधन से मांग की है कि वह हर विभाग में शौचालय और पानी की सुचारू व्यवस्था कराएं।
चाय की दुकान चलाने वाले राजसिंह बताते हैं कि काशीपुर शहर की सबसे बड़ी समस्या पानी की निकासी नहीं होना है। इस समस्या को देखते हुए शहर के हालात आज किसी से छिपे नहीं हैं। यदि दो दिन लगातार बारिश हो जाए तो जल निकासी के लिए कोई जगह नहीं है। शहरों की सड़कों पर घुटनों तक पानी और लबालब कीचड़ से भरी सड़कें इसकी गवाही देती हैं। ड्रेनेज सिस्टम पर राज सिंह बताते हैं कि 1975 में जब ड्रेनेज प्लान तैयार किया गया था तब शहर की आबादी करीब 70 हजार थी लेकिन अब आबादी बढ़कर तीन लाख के पार हो चुकी है। ड्रेनेज के लिए शहर में बनाई गई नालियां काफी छोटी हैं और कई जगहों पर टूट भी गई है। कई बार घोषणाएं की गई कि नए ड्रेनेज प्लान के तहत शहर के अंदर सभी नालियों को चैड़ा कर पानी निकासी की क्षमता बढ़ाई जाएगी। जिन स्थानों पर यह समस्या सबसे ज्यादा आफत बनी हुई है उनमें मुख्य बाजार, नया और पुराना बाजार, सुभाषनगर, टांडा उज्जैन, जसपुरखुर्द, बाजपुर रोड, सुभाषनगर, महुखेड़ागंज, महेशपुरा, रामनगर रोड आदि शामिल हैं।
नोट:- विधायक त्रिलोक सिंह चीमा से उनका पक्ष जानने के लिए कई बार सम्पर्क किया गया लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए।
बात अपनी-अपनी
हर दृष्टि से फेल हैं जनप्रतिनिधि
काशीपुर में विकास के नाम पर सिर्फ एकमात्र चीमा चौराहे पर पुल बना है। जो कभी भी गिरकर भयावह स्थिति पैदा कर सकता है। यहां ऐतिहासिक गिरिताल उपेक्षित है। गिरिताल को विकसित कर जहां पर्यटक जोन बनाया जाना था वहां सिर्फ उसके नाम पर पैसे की बर्बादी हो रही है। जिस विकास के वादे वहां किए गए थे वह सालों से इंतजार कर रहा है। यहां का अतिक्रमण लोगों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। अतिक्रमण हटाने के नाम पर सिर्फ खोखा पटरी वालों को ही परेशान किया जाता है। रामनगर रोड पर वर्षों से बन रहे पुल की वजह से आवागमन अवरुद्ध हो गया है। यहां से गुजरने वाले काॅर्बेट पार्क के यात्रियों को जाम से जूझना पड़ता है। इस पुल को जल्दी बनाया जाना चाहिए था लेकिन चीमा चैराहे पर जिस तरह से सात साल में पुल बनकर तैयार हुआ है कुछ ऐसी ही लेट-लतीफी इस पुल को लेकर भी की जा रही है। काशीपुर में जनप्रतिनिधि सिर्फ एक काम बखूबी करते हैं हिंदू-मुस्लिम को आपस में लड़ाते हैं और धर्म के नाम पर अपनी रोटियां सेंकते हैं। जनता धर्म जाति के बहकावे में आ जाती है और हर बार एक ही पार्टी के नेता को जिता देती है।
संदीप सहगल, कांग्रेस नेता
काशीपुर विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : त्रिलोक सिंह चीमा (अवधि: 4 वर्ष)
क्र. क्षेत्र मुद्दा/जमीनी स्थिति अंक (10 में)
- सड़क व सम्पर्क मार्ग मुख्य सड़कों की बेहद खराब हालत, फ्लाईओवर अधूरा/क्षतिग्रस्त, जाम गम्भीर 2.5/10
- स्वास्थ्य सेवाएं बड़े अस्पताल में विशेषज्ञों की भारी कमी, मरीजों को रेफर, दलाली के आरोप 3/10
- शिक्षा व उच्च शिक्षा कॉलेज में अव्यवस्था, स्कूल जर्जर, शिक्षकों की कमी 3/10
- रोजगार व उद्योग इंडस्ट्री हब योजना ठप, औद्योगिक विस्तार नहीं 3/10
- पलायन व युवा स्थिति रोजगार की कमी, युवाओं में असंतोष 3.5/10
- खेल व बुनियादी ढांचा खेल सुविधाओं का अभाव, बस अड्डा बदहाल 2.5/10
- प्रशासनिक व्यवस्था अतिक्रमण, अवैध कॉलोनियां, कार्रवाई सिर्फ औपचारिक 3/10
- शहरी समस्याएं जल निकासी फेल, गंदगी, दूषित पानी की गम्भीर समस्या 2.5/10
- कानून व्यवस्था व सामाजिक मुद्दे अव्यवस्था, अवैध गतिविधियों के आरोप, नियंत्रण कमजोर 3/10
- जनसम्पर्क व राजनीतिक सक्रियता परिवार का प्रभाव बरकरार, लेकिन जनता से दूरी, मेयर ज्यादा सक्रिय 5/10
औसत : 3.0/10 फाइनल ग्रेड : फेल