जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की रिहाई के तुरंत बाद लद्दाख का माहौल तेजी से बदलता नजर आ
रहा है। लम्बे समय से लम्बित राजनीतिक और संवैधानिक मांगों को लेकर अब जन आंदोलन ने फिर रफ्तार पकड़ ली है
लेह और करगिल जिलों में हजारों लोगों ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करते हुए लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग दोहराई। लेह में लेह एपेक्स बाॅडी (एलएपी) के आह्वान पर सिंग्गे नामग्याल चैक से पोलो ग्राउंड तक विशाल रैली निकाली गई, जिसमें बौद्ध भिक्षुओं समेत बड़ी संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और युवा शामिल हुए। ‘हमें छठी अनुसूची चाहिए’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारों के बीच प्रदर्शनकारियों ने लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली की मांग उठाई।
एलएपी और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके चार सूत्रीय एजेंडे में लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करना, राज्य का दर्जा देना, लेह और करगिल के लिए अलग-अलग संसदीय सीटें और स्थानीय युवाओं की भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग की स्थापना शामिल है।
एलएपी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लाकरूक ने कहा कि उनकी मांगों को लेकर केंद्र सरकार को पहले ही प्रस्ताव सौंपा जा चुका है लेकिन अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि यह प्रदर्शन सरकार पर सार्थक वार्ता फिर से शुरू करने का दबाव बनाने के लिए आयोजित किया गया था ताकि लद्दाख के लोगों के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार सुनिश्चित किए जा सकें।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को पोलो ग्राउंड तक पहुंचने से रोकने के लिए कई स्थानों पर बैरिकेड लगाए थे लेकिन इसके बावजूद करीब 10,000 लोग वहां एकत्रित हुए और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी। हालांकि इस प्रदर्शन के लिए औपचारिक बंद का आह्वान नहीं किया गया था लेकिन लेह, करगिल, द्रास सहित कई क्षेत्रों में स्वतःस्फूर्त बंद देखने को मिला। दूसरी ओर करगिल में भी केडीए के नेतृत्व में हजारों लोगों ने मुख्य सड़कों पर मार्च करते हुए ‘लद्दाख के लिए न्याय’ के नारे लगाए और पिछले साल 24 सितम्बर की घटनाओं के बाद गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों की रिहाई की मांग उठाई।
गौरतलब है कि 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद से ही यहां के लोग संवैधानिक सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं। इस सम्बंध में गृह मंत्रालय द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति (एचपीसी) के साथ एलएपी-केडीए गठबंधन की बातचीत अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है।
प्रशासन ने हाल ही में इन प्रदर्शनों को लेकर चिंता जताई थी और कहा था कि पर्यटन सीजन के बीच इस तरह की गतिविधियां क्षेत्र की छवि को प्रभावित कर सकती हैं। साथ ही, नव-नियुक्त उपराज्यपाल ने स्पष्ट किया था कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहना चाहिए और किसी भी प्रकार की हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। इस बीच, आंदोलन से पहले एलएपी ने प्रदर्शनकारियों से अनुशासन बनाए रखने की अपील की थी जिसमें चेहरे न ढकने और केवल स्वीकृत नारों का ही इस्तेमाल करने की बात कही गई थी।
ज्ञात हो कि लद्दाख में लम्बे समय से नागरिक समाज समूह छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक संरक्षण, राज्य का दर्जा, स्थानीय रोजगार में आरक्षण और बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग करते रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत छठी अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को विशेष अधिकार प्रदान करती है, जिसमें भूमि, कृषि और स्थानीय प्रशासन से जुड़े कानून बनाने के अधिकार शामिल हैं।