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हार के बाद राहुल का आक्रामक दांव

दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस की रैली को केवल सत्ता विरोधी प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि राहुल गांधी की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बावजूद ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को केंद्र में रखकर राहुल गांधी न सिर्फ पार्टी कैडर को सक्रिय बनाए रखना चाहते हैं बल्कि पश्चिम बंगाल और केरल में होने वाले आगामी चुनावों की जमीन भी तैयार कर रहे हैं। केरल के हालिया स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस के दमदार प्रदर्शन ने इस रणनीति को नया आत्मविश्वास दिया है, 2029 के लोकसभा चुनाव को लेकर पार्टी की दीर्घकालिक योजना भी इसी पृष्ठभूमि में आकार लेती दिख रही है


दिल्ली के रामलीला मैदान में 14 दिसम्बर के दिन हुई कांग्रेस की रैली को यदि सतही तौर पर देखा जाए तो यह सत्ता के खिलाफ नाराजगी और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाला एक और राजनीतिक आयोजन लग सकती है। लेकिन राजनीति में अक्सर जो दिखाई देता है, वह पूरा सच नहीं होता। इस रैली के पीछे कांग्रेस और विशेषकर राहुल गांधी की वह रणनीति छिपी है जो तात्कालिक हार-जीत से आगे जाकर पार्टी के भविष्य को गढ़ने की कोशिश कर रही है। बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद यह रैली अचानक नहीं आई बल्कि यह उस राजनीतिक गणित का हिस्सा है जिसमें हार के बावजूद नैरेटिव को अपने पक्ष में मोड़ना सबसे बड़ी चुनौती होती है।

बिहार की हार कांग्रेस के लिए केवल सीटों का नुकसान नहीं थी बल्कि उसने एक बार फिर पार्टी की संगठनात्मक कमजोरियों, गठबंधन राजनीति की सीमाओं और जमीनी पकड़ के सवालों को उजागर कर दिया। चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस के भीतर निराशा का माहौल बनना स्वाभाविक था। ऐसे में किसी भी राजनीतिक दल के सामने दो विकल्प होते हैं या तो वह आत्ममंथन के नाम पर चुप्पी साध ले या फिर आक्रामक राजनीति के जरिए अपने समर्थकों को यह विश्वास दिलाए कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। राहुल गांधी ने दूसरा रास्ता चुना।
‘वोट चोरी’ का मुद्दा इसी रणनीति का केंद्रीय औजार है। राहुल गांधी इस मुद्दे को केवल बीते चुनावों की व्याख्या के तौर पर नहीं बल्कि भविष्य की राजनीति के नैरेटिव के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। बिहार की हार को वे संगठन की अक्षमता के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर उठते सवालों से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह रणनीति दोहरे उद्देश्य को साधती है, एक तरफ पार्टी नेतृत्व को तत्काल जवाबदेही से राहत मिलती है तो दूसरी ओर कार्यकर्ताओं को यह महसूस कराया जाता है कि हार किसी विचार की नहीं बल्कि व्यवस्था की खामी का नतीजा है।

रामलीला मैदान की रैली में राहुल गांधी के भाषणों का लहजा इसी सोच को प्रतिबिंबित करता है। उन्होंने बार-बार यह दोहराया कि लोकतंत्र की असली ताकत जनता के वोट में होती है और यदि वोट की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, तो पूरी राजनीतिक व्यवस्था संकट में आ जाती है। यह बात केवल सरकार के लिए चुनौती नहीं है बल्कि कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक आधार भी है, जिसके सहारे वह खुद को लोकतंत्र के रक्षक के रूप में प्रस्तुत कर सकती है।

इस रैली का दूसरा बड़ा संदर्भ आगामी चुनाव हैं, विशेषकर पश्चिम बंगाल और केरल। राहुल गांधी अच्छी तरह जानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की वापसी सीधे तौर पर कुछ अहम राज्यों में प्रदर्शन से जुड़ी है। बंगाल और केरल इस लिहाज से अलग-अलग, लेकिन समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। बंगाल में कांग्रेस लम्बे समय से हाशिए पर है लेकिन भाजपा बनाम तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के बीच वह खुद को लोकतांत्रिक और वैचारिक विकल्प के रूप में जिंदा रखना चाहती है। ‘वोट चोरी’ और चुनावी पारदर्शिता का मुद्दा कांग्रेस को बंगाल में एक नैतिक मंच देता है, भले ही उसका संगठनात्मक आधार सीमित हो।

केरल के मामले में स्थिति अलग और कहीं अधिक निर्णायक है। केरल कांग्रेस के लिए केवल एक राज्य नहीं बल्कि राजनीतिक अस्तित्व और पुनरुत्थान का केंद्र है। राहुल गांधी स्वयं इस राज्य से गहरे रूप से जुड़े रहे हैं और पार्टी के भीतर यह साफ समझ बन चुकी है कि यदि कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति में फिर से मजबूती हासिल करनी है तो केरल में सत्ता में लौटना अनिवार्य है। हालिया स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन पार्टी के लिए उत्साहजनक रहा है और यही कारण है कि नेतृत्व के स्तर पर केरल को लेकर रणनीतिक फोकस और तेज हुआ है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, राहुल गांधी की मौजूदा आक्रामकता के पीछे केरल को लेकर एक स्पष्ट योजना है। यदि कांग्रेस केरल में सरकार बनाने में सफल होती है तो यह केवल एक राज्य सरकार की वापसी नहीं होगी बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के पुनर्जीवन का संकेत बनेगी। एक मजबूत राज्य सरकार पार्टी को संसाधन, संगठनात्मक स्थिरता और राजनीतिक आत्मविश्वास देगी जिसका सीधा असर 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी पर पड़ेगा।

इसी संदर्भ में ‘वोट चोरी’ का मुद्दा एक दीर्घकालिक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह मुद्दा कांग्रेस को हर चुनाव, हर नतीजे और हर राजनीतिक संघर्ष को लोकतंत्र बनाम सत्ता के नैरेटिव में ढालने का मौका देता है। इससे पार्टी हर बार हार की स्थिति में भी खुद को नैतिक रूप से मजबूत स्थिति में दिखा सकती है और अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश दे सकती है कि वे किसी बड़ी लड़ाई का हिस्सा हैं।

बिहार की हार के बाद यदि कांग्रेस नेतृत्व केवल आत्मालोचना तक सीमित रहता तो पार्टी के भीतर हताशा और निष्क्रियता बढ़ सकती थी। इसके उलट रामलीला मैदान की रैली ने यह संकेत दिया कि राहुल गांधी संघर्ष को लम्बा खींचने के लिए तैयार हैं। यह रणनीति जोखिम भरी भी है क्योंकि लगातार चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने से संस्थागत टकराव बढ़ सकता है लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने फिलहाल इस जोखिम को स्वीकार किया है।
राहुल गांधी की राजनीति को अब तत्काल चुनावी सफलता के बजाय दीर्घकालिक पुनर्निर्माण के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। वे यह समझ चुके हैं कि कांग्रेस की वापसी किसी एक चुनाव से नहीं होगी बल्कि राज्यों की एक श्ृंखला में बेहतर प्रदर्शन के जरिए होगी। केरल इस श्रृंखला का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है जबकि बंगाल राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखने का मंच।

रामलीला मैदान की रैली इसी दीर्घकालिक योजना का सार्वजनिक संकेत थी। यहां कांग्रेस ने यह दिखाने की कोशिश की कि वह बिहार की हार से डरी नहीं है और न ही वह पीछे हटने वाली है। इसके बजाय पार्टी ने संघर्ष का नैरेटिव चुना है, जिसमें लोकतंत्र, वोट और संविधान को केंद्र में रखा गया है। यह नैरेटिव न केवल सत्ता को चुनौती देता है बल्कि कांग्रेस के भीतर नई ऊर्जा पैदा करने का प्रयास भी करता है।

इस रैली का असली महत्व इसके नारों या भाषणों से ज्यादा उस राजनीतिक संदेश में छिपा है जो इसके जरिए दिया गया। बिहार की करारी हार के बावजूद राहुल गांधी ने यह साफ कर दिया है कि वे कांग्रेस को हाशिए पर जाने देने के लिए तैयार नहीं हैं। ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उनके लिए केवल एक आरोप नहीं बल्कि एक रणनीतिक उपकरण है, जिसके सहारे वे पार्टी कैडर को सक्रिय रखना, आगामी राज्य चुनावों की तैयारी करना और 2029 के आम चुनाव के लिए जमीन तैयार करना चाहते हैं।

कुल मिलाकर रामलीला मैदान में उमड़ा विशाल जनसमूह यह संकेत दे रहा है कि भले ही भाजपा चुनाव दर चुनाव कांग्रेस को शिकस्त  देने में कामयाब रही है, आमजन अब धर्म के मकड़जाल से उबर असली मुद्दों को लेकर छटपटाने लगा है और यही वह संकेत है जो राहुल को लगातार संघर्ष करते रहने की ताकत दे रहा है।

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