पंजाब विधानसभा चुनाव में अभी एक साल का समय शेष है लेकिन राजनीतिक दल ने अभी से अपने-अपने कील कांटे दुरुस्त करने शुरू कर दिए हैं। इन तैयारियों के बीच कांग्रेस ने चुनाव प्रचार, घोषणा पत्र और चुनाव प्रबंधन समितियों का जो गठन किया है उसमें चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी को किसी भी प्रमुख समिति में जगह नहीं मिली है। वहीं समितियों से बाहर रखे जाने के तुरंत बाद मनीष तिवारी ने अपने सोशल मीडिया पेज पर लिखा, ‘काश व्यक्तियों और संस्थाओं की इनसिक्योरिटी का भी कोई इलाज होता।’ उनके इस पोस्ट को न केवल कांग्रेस नेतृत्व पर परोक्ष टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है बल्कि इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या कांग्रेस ने उन्हें संगठन में हाशिए पर डाल दिया है। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि मनीष तिवारी और कांग्रेस आलाकमान के बीच दूरी कोई नई बात नहीं है। जी-23 समूह के सदस्य के रूप में उन्होंने पार्टी में संगठनात्मक सुधार की मांग उठाई थी, जिसके बाद से उनकी भूमिका लगातार सीमित होती गई। यही नहीं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद विदेश गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में उनकी सक्रिय भूमिका और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी। इसके बाद लोकसभा में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर बहस के दौरान उन्हें बोलने का अवसर नहीं मिला जिसे उनके समर्थकों ने नेतृत्व की नाराजगी से जोड़कर देखा। गौरतलब है कि कभी यूपीए सरकार में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे मनीष तिवारी लम्बे समय तक कांग्रेस के प्रमुख राष्ट्रीय चेहरों में गिने जाते रहे हैं। पंजाब की राजनीति में भी उनका व्यापक अनुभव रहा है। उन्होंने कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने का खुलकर विरोध किया था और उसे कांग्रेस की रणनीतिक भूल बताया था। अब जब भूपेश बघेल की निगरानी में पंजाब कांग्रेस का नया चुनावी ढांचा तैयार हो गया है तब भी मनीष तिवारी को किसी प्रमुख समिति में स्थान नहीं मिला। पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि वह फिलहाल चंडीगढ़ से सांसद हैं इसलिए उन्हें पंजाब चुनाव की जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई, वहीं उनके समर्थकों का तर्क है कि पंजाब की राजनीति में उनके अनुभव और हिंदू चेहरे के तौर पर उनकी स्वीकार्यता को नजरअंदाज किया गया है। बहरहाल यह स्पष्ट नहीं है कि मनीष तिवारी को संगठन में सीमित भूमिका न देना केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा है या कांग्रेस नेतृत्व और उनके बीच बढ़ती राजनीतिक दूरी का संकेत लेकिन पंजाब चुनाव से पहले गठित नई चुनावी समितियों से उनका बाहर रहना कई सवाल खड़े कर रहा है।
उद्धव के सामने टूट का खतरा?
महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। सांसदों और विधायकों की लगातार हो रही बगावत के बीच शिवसेना उद्धव ठाकरे ने बीती सात जुलाई को एक बार फिर से पार्टी के सभी विधायकों की आपात बैठक बुलाई। इस बैठक को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हाल ही में विधान परिषद के उपसभापति और आदित्य ठाकरे के करीबी माने जाने वाले सचिन अहीर ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना का दामन थाम लिया था। इसके बाद से चर्चा तेज हो गई है कि उद्धव के और कुछ विधायक भी शिंदे गुट के सम्पर्क में हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक उद्धव ठाकरे को इस बात की चिंता सता रही है कि सांसदों की तरह कहीं विधायक भी पार्टी छोड़ने का फैसला न कर लें। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही उद्धव गुट के 9 में से 6 सांसदों ने पार्टी से बगावत कर शिंदे गुट में शामिल हो गए थे। इस घटनाक्रम ने शिवसेना (उद्धव) की राजनीतिक ताकत को कमजोर कर दिया है। चर्चा है कि एकनाथ शिंदे की नजर उद्धव गुट के बाकी विधायकों और नगरसेवकों पर भी है। हालांकि पार्टी नेतृत्व का कहना है कि यह बैठक संगठनात्मक मजबूती, आगामी चुनावों की रणनीति और विधायकों के साथ समन्वय बनाए रखने के उद्देश्य से आयोजित की गई है लेकिन विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक इसे मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर देख रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति ने कई बड़े घटनाक्रम देखे हैं। शिवसेना में विभाजन, सत्ता परिवर्तन और लगातार बदलते राजनीतिक गठबंधनों के कारण राज्य का राजनीतिक माहौल पहले से ही संवेदनशील बना हुआ है। पार्टी नेतृत्व अपने सभी विधायकों की एकजुटता का संदेश देना चाहता है ताकि किसी भी तरह की अटकलों पर विराम लगाया जा सके, वहीं सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के नेताओं ने इन बैठकों को विपक्ष की अंदरूनी कमजोरी का संकेत बताया है। ऐसे में जब भी किसी बड़े दल की विधायक बैठक बुलाई जाती है राजनीतिक हलकों में नए समीकरण बनने या टूटने की चर्चाएं तेज हो जाती हैं। फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चाओं का दौर जारी है लेकिन किसी भी बड़े राजनीतिक बदलाव या दल-बदल की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में राजनीतिक घटनाक्रम किस दिशा में आगे बढ़ते हैं और क्या मौजूदा अटकलें वास्तव में किसी बड़े बदलाव का संकेत बनती हैं या केवल सियासी चर्चाओं तक ही सीमित रहती हैं।
हरियाणा भाजपा में रार
हरियाणा के रेवाड़ी में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चैहान के कार्यक्रम से केंद्रीय राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह की दूरी ने हरियाणा की राजनीति में नई अटकलों को जन्म दे दिया है। राजनीतिक हलकों में इसे प्रोटोकाॅल विवाद से लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में सम्भावित फेरबदल से पहले दबाव की राजनीति तक से जोड़कर देखा जा रहा है। असल में बीते दिनों बावल स्थित कृषि महाविद्यालय में आयोजित ‘खेत बचाओ अभियान’ के समापन समारोह में राव इंद्रजीत सिंह के साथ रेवाड़ी जिले के तीनों भाजपा विधायक और उनके कई समर्थक नेता भी शामिल नहीं हुए। इससे भाजपा के भीतर गुटबाजी की चर्चाएं और तेज हो गईं। राव समर्थकों का आरोप है कि केंद्रीय राज्य मंत्री होने के बावजूद उन्हें नियमानुसार निमंत्रण नहीं दिया गया और मंच पर भी अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। उनका यह भी दावा है कि क्षेत्रीय मुद्दों पर मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री को मांगपत्र सौंपने का अवसर भी नहीं दिया गया। हालांकि, हिसार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. बी.आर. कंबोज ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कार्यक्रम में सभी सरकारी नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरियाणा में भाजपा लम्बे समय से अलग-अलग गुटों में बंटी हुई है जिसमें राव इंद्रजीत सिंह और राव नरबीर सिंह के गुट सबसे प्रभावशाली माने जाते हैं। ऐसे में किसी भी बड़े सरकारी कार्यक्रम में नेताओं की अनुपस्थिति राजनीतिक संदेश के रूप में देखी जाती है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि राव इंद्रजीत सिंह की नाराजगी केवल प्रोटोकाॅल तक सीमित है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है लेकिन इतना तय है कि इस घटनाक्रम ने हरियाणा भाजपा की अंदरूनी राजनीति और सम्भावित शक्ति संतुलन को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।