राज्य आंदोलन के एक युग का अंत
दिवाकर भट्ट का निधन उस पीढ़ी का अंत है जिसने पहाड़ की अस्मिता और स्वाभिमान के लिए अपना पूरा जीवन दे दिया। उत्तराखण्ड की राजनीति आज जिस मोड़ पर है, वहां दिवाकर भट्ट जैसी आवाजें लगातार कम होती जा रही हैं। वे उन आखिरी नेताओं में थे जिनकी राजनीति मूल्य आधारित थी और जो स्वयं को जनता के प्रति जवाबदेह मानते थे। उनका जाना उत्तराखण्ड आंदोलन के इतिहास में एक अध्याय का बंद होना है। यूकेडी के लिए यह क्षति अपूरणीय है क्योंकि जिन मूल कारणों से यह दल बना था, उन सबका प्रतिनिधित्व दिवाकर भट्ट करते थे। वे उस आंदोलन की जीवित स्मृति थे जिसने 90 के दशक में पूरे पहाड़ को एक साझा लक्ष्य से जोड़ दिया था। आने वाली पीढ़ियां जब राज्य आंदोलन को पढ़ेंगी तो दिवाकर भट्ट का नाम उसमें सिर्फ एक नेता के रूप में नहीं बल्कि एक उस चेतना के वाहक के रूप में मौजूद रहेगा जिसने पहाड़ के लोगों को अपनी पहचान और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की प्रेरणा दी


पच्चीस नवम्बर 2025 की शाम उत्तराखण्ड के सामाजिक, राजनीतिक इतिहास में एक ऐसी खबर लेकर आई जिसने पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया। उत्तराखण्ड क्रांति दल (यूकेडी) के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष, पूर्व कैबिनेट मंत्री और राज्य आंदोलन के सशक्त स्तम्भ दिवाकर भट्ट का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। लम्बे समय से बीमार चल रहे दिवाकर भट्ट ने देहरादून स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली और इसके साथ ही उत्तराखण्ड आंदोलन की वह पीढ़ी, जिसने पहाड़ की अस्मिता को लेकर संघर्ष की लौ जगाई थी, एक और अहम योद्धा खो बैठी।

दिवाकर भट्ट सिर्फ एक राजनीतिक नेता नहीं थे बल्कि उत्तराखण्ड के संघर्षों की जीवित कथा थे। वे उन चुनिंदा नेताओं में रहे जिन्होंने राज्य बनने के दशकों पहले से लेकर राज्य गठन के बाद तक लगातार इस मिट्टी की चिंताओं और अपेक्षाओं को अपनी राजनीति का केंद्रीय तत्व बनाए रखा। पहाड़ से उनका रिश्ता भावनात्मक भी था और मूल्यगत भी। वे पहाड़ की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने पहाड़ में प्रशासनिक उपेक्षा, बेरोजगारी, पलायन और विकास की असमानता के मुद्दों को सिर्फ भाषणों में नहीं बल्कि अपने जीवन के केंद्र में रखा।

दिवाकर भट्ट का जन्म पौड़ी गढ़वाल के एक साधारण परिवार में हुआ था। पहाड़ की कठिन भौगोलिक स्थिति, सीमित संसाधन और सामाजिक चुनौतियों ने उनके भीतर कम उम्र से ही एक संघर्षशील मानसिकता
विकसित कर दी। पढ़ाई के दौरान उनकी रुचि जनांदोलनों और सामाजिक गतिविधियों में बढ़ने लगी। उन्होंने बहुत जल्दी समझ लिया था कि उत्तराखण्ड की समस्या महज विकास का प्रश्न नहीं बल्कि पहचान और अधिकार का सवाल भी है। इसी दीक्षा ने उन्हें राजनीति से पहले आंदोलन का कार्यकर्ता बनाया।

उत्तराखण्ड क्रांति दल की स्थापना में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। मंच पर उनकी उपस्थिति शांत लेकिन प्रभावशाली होती थी। वे गुस्से से नहीं, तथ्यों और तर्कों से बात करते थे। जब पहाड़ में लोग पलायन, सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और युवाओं के रोजगार को लेकर निरंतर आवाज उठा रहे थे तब दिवाकर भट्ट उस संघर्ष को एक संगठित विमर्श में बदलने वालों में शामिल थे। यूकेडी को राजनीतिक पहचान दिलाने और उसे पहाड़ की भावनाओं का प्रतीक बनाने में उनका योगदान उतना ही अहम है जितना इंद्रमणि बडोनी या काशी सिंह ऐरी जैसे अग्रणी नेताओं का।

दिवाकर भट्ट की सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी संगठन क्षमता और जनसम्पर्क। वे किसी गांव में पहुंचते तो सबसे पहले स्थानीय समस्याओं को समझते फिर उसका समाधान खोजने में स्थानीय लोगों को जोड़ते। उन्हें यह भलीभांति पता था कि पहाड़ की राजनीति का मतलब है उसकी जनसंख्या, उसके भौगोलिक फैलाव और उसकी कठिनाइयों को एक साथ समझना। वे शिक्षकों, छात्रों, महिलाओं, व्यापारियों, नौकरीपेशा और किसानों यानी हर वर्ग से संवाद करते थे।

राज्य आंदोलन के उभरते वर्षों में दिवाकर भट्ट की भूमिका बेहद सक्रिय रही। वे सिर्फ मंच पर भाषण देने वाले नेता नहीं थे बल्कि आंदोलन की कठिन परिस्थितियों, गिरफ्तारियां, लाठियां, बंद, चक्का जाम और अनिश्चितता, सब में अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखाई देते थे। जब कुमाऊं और गढ़वाल में राज्य की मांग ने व्यापक आकार लिया और दिल्ली तक यह आवाज पहुंची तब दिवाकर भट्ट जैसे नेताओं का संघर्ष निर्णायक साबित हुआ। वे आंदोलन के दौरान कई बार हिरासत में लिए गए लेकिन उनकी दृढ़ता कभी नहीं टूटी।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद जब यूकेडी धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिए पर जाती दिखी तब भी दिवाकर भट्ट ने अपनी प्रतिबद्धता नहीं छोड़ी। उन्होंने संगठन को पुनर्जीवित करने, उसे जिलों और ब्लाॅकों तक पुनः सक्रिय करने की दिशा में वर्षों तक काम किया। हालांकि यह भी सच है कि राज्य गठन के बाद यूकेडी आंतरिक संघर्षों, टूट-फूट और नेतृत्व विवादों से जूझती रही। कुछ आलोचकों का मानना है कि अगर दिवाकर भट्ट जैसे नेताओं को और अधिक अधिकार और स्वतंत्रता मिलती तो दल का भविष्य बेहतर हो सकता था। लेकिन दिवाकर भट्ट ने कभी इन विवादों को अपने मूल लक्ष्य से ऊपर नहीं रखा।

राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें एक दौर में भाजपा तक पहुंचाया। भाजपा में शामिल होना उनके लिए एक राजनीतिक निर्णय था न कि विचारधारा का परित्याग। यहां भी उन्होंने उत्तराखण्ड को लेकर अपनी
प्राथमिकताएं नहीं बदलीं। वे मंत्री बने, विधायक रहे और अपनी शैली में पहाड़ के मुद्दों को उठाते रहे। हालांकि भाजपा में रहते हुए वे उतने प्रभावी नहीं दिखे जितना यूकेडी में। बाद में वे पुनः अपने मूल दल यूकेडी में लौट आए। यह उनकी संवेदना का प्रमाण था कि उनका राजनीतिक घर वही है जो राज्य आंदोलन की जड़ों से निकला है।

उनकी वाणी और लेखन दोनों में एक स्पष्टता और शुद्धता थी। वे पलायन को पहाड़ की सबसे बड़ी त्रासदी मानते थे। उनका कहना था कि ‘‘उत्तराखण्ड गांवों से नहीं, गांव उत्तराखण्ड से निकलते जा रहे हैं।’’ वे पर्यावरणीय संतुलन के प्रबल समर्थक थे। चारधाम सड़क, खनन और वनों पर बढ़ते दबाव जैसे मुद्दों पर उन्होंने कई बार सरकारों को कटघरे में खड़ा किया। वे यह भी कहते रहे कि उत्तराखण्ड को पर्वतीय राज्य की विशिष्टताओं के अनुरूप विशेष नीति चाहिए चाहे शिक्षा हो, उद्योग हो, कृषि हो या पर्यटन।

उनकी ईमानदार आलोचना का प्रभाव यह था कि वे विपक्ष में हों या सत्ता में, दोनों स्थितियों में सुने जाते थे। वे पहाड़ में शराबबंदी, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, बेसिक शिक्षा की गुणवत्ता और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग इंजीनियरिंग-डिजाइन नीति के पक्षधर थे। उनके राजनीतिक करियर में कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन वे कभी व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करते हुए नहीं दिखाई दिए।

उनका व्यक्तित्व भी उतना ही सरल था जितनी उनकी भाषा। वे
बेहतरीन वक्ता थे, लेकिन उससे कहीं ज्यादा अच्छे श्रोता थे। विभिन्न

राजनीतिक दलों के नेता भी उनकी सज्जनता का सम्मान करते थे। उनका घर राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा खुला रहता था। बीमार होने के बावजूद भी वे सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह अलग नहीं हुए। उनके विचारों में हमेशा एक संदेश स्पष्ट रहता था, उत्तराखण्ड को याद रखना होगा कि उसका जन्म संघर्ष से हुआ है, सुविधाओं और समझौतों से नहीं।

दिवाकर भट्ट का निधन उस पीढ़ी का अंत है जिसने पहाड़ की अस्मिता और स्वाभिमान के लिए अपना पूरा जीवन दे दिया। उत्तराखण्ड की राजनीति आज जिस मोड़ पर है, वहां दिवाकर भट्ट जैसी आवाजें लगातार कम होती जा रही हैं। वे उन आखिरी नेताओं में थे जिनकी राजनीति मूल्य आधारित थी और जो स्वयं को जनता के प्रति जवाबदेह मानते थे। उनका जाना उत्तराखण्ड आंदोलन के इतिहास में एक अध्याय का बंद होना है। यूकेडी के लिए यह क्षति अपूरणीय है क्योंकि जिन मूल कारणों से यह दल बना था, उन सबका प्रतिनिधित्व दिवाकर भट्ट करते थे। वे उस आंदोलन की जीवित स्मृति थे जिसने 90 के दशक में पूरे पहाड़ को एक साझा लक्ष्य से जोड़ दिया था। आने वाली पीढ़ियां जब राज्य आंदोलन को पढ़ेंगी तो दिवाकर भट्ट का नाम उसमें सिर्फ एक नेता के रूप में नहीं बल्कि एक उस चेतना के वाहक के रूप में मौजूद रहेगा जिसने पहाड़ के लोगों को अपनी पहचान और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की प्रेरणा दी।

दिवाकर भट्ट की विरासत संघर्ष, सादगी और सत्यनिष्ठा की विरासत है। उनका जीवन बताता है कि राजनीति केवल पद और सत्ता का खेल नहीं बल्कि विचार और समर्पण का दायित्व भी है। पहाड़ की माटी ने एक ऐसा बेटा खोया है जिसने उसके हितों के लिए अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी।

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