मतदान के बाद भाजपा आश्वस्त है कि मोदी मैजिक उसके लिए सुखद संदेश लेकर आएगा। पार्टी के रणनीतिकारों को क्लीन स्विप की उम्मीदें हैं। दूसरी ओर कांग्रेस को लगता है कि राज्य और केंद्र सरकार के प्रति जनता की नाराजगी बड़ा उलटफेर कर देगी। चुनाव नतीजों को लेकर दोनों पार्टियों के अपने-अपने गणित और दावे हैं। फिलहाल चुनाव संचालन और चुनावी माहौल बनाने की बात करें तो कांग्रेस के मुकाबले भाजपा आगे रही है
लोकसभा चुनाव के पहले चरण में उत्तराखण्ड के मतदाताओं ने राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के भविष्य का फैसला कर दिया है। 23 मई को परिणाम सामने आएंगे। लेकिन इस बीच राजनीतिक गलियारां में भाजपा ओैर कांग्रेस दोनां ही पार्टियों की हार-जीत को लेकर कई तरह की चर्चाएं और कयास लग रहे हैं। जहां कांग्रेस इस बार बड़े बदलाव की उम्मीद के सहारे अपनी जीत के दावे कर रही है, तो वहीं भाजपा मोदी मैजिक के बलबूते पांचों सीटां पर जीत हासिल होने की बात कर रही है। जिस तरह से प्रदेश में 61.50 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया उससे कहीं न कहीं भाजपा की जीत के कयास लगाए जा रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी 61.67 फीसदी मतदान हुआ था और भाजपा ने पांचों सीटां पर जीत हासिल की थी। इसको देखते हुए राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस बार जो 61.50 मतदान हुआ है, वह भाजपा के लिए चुनाव में सुखद संदेश लेकर आया है।
अगर लोकसभा क्षेत्रवार मतदान के आंकड़ों को देखें तो हरिद्वार सीट पर सबसे अधिक और अल्मोड़ा सीट पर सबसे कम मतदान हुआ है। हरिद्वार में 68.92, नैनीताल में 68 ़89, टिहरी सीट पर 58 ़30, पौड़ी सीट पर 54.47 तथा अल्मोड़ा में 51.82 प्रतिशत मतदान हुआ है। इस चुनाव में मतदाताओं ने जिस तरह खुलकर मतदान किया है वह अपने आप ही बड़ा सुखद है। जबकि इस बार के चुनाव के लिए नामांकन से लेकर मतदान तक महज 20-25 दिन ही थे। प्रचार के लिए कम दिन होने के बावजूद जनता ने मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यह राजनीतिक जानकारां के लिए नई इबारत लिखने के जैसे माना जा रहा है।
लोकसभा का यह चुनाव कई कारणों से प्रदेश की राजनीति में असर डालने वाला हो सकता है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो भले ही यह चुनाव मुख्यतः भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटा रहा, परंतु दोनों ही दलों के लिए चुनाव के परिणाम खासा असर डाल सकते हैं। भाजपा के लिए क्लीन स्वीप को दोहराने की चुनौती है, तो कांग्रेस के लिए अपने गिरते जनाधार को बचाए रखने की बड़ी चुनौती है।
भाजपा की बात करें तो शुरुआती दौर से ही भाजपा चुनाव संचालन औेर प्रचार में कांग्रेस से आगे रही है। भाजपा के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत चुनाव में अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की संभावनाओं को नई धार देने के लिए मजबूती से डटे रहे तो पूर्व मुख्यमंत्री निशंक और केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा के साथ- साथ दो बार लगातार सांसद रहीं माला राजलक्ष्मी शाह चुनाव में मतदाताओं के सामने थे। भाजपा उम्मदीवारों के लिए चुनावी परिणाम उनकी राजनीति की दिशा और दशा को बदलने में कितना सफल होंगे, इसके लिए अभी इंतजार करना पड़ेगा, लेकिन फिलहाल इतना तो कहा जा सकता है कि भाजपा के लिए मतदान का प्रतिशत कहीं न कहीं अच्छे दिन आने की उम्मीद जगा रहा है। हालांकि राजनीतिक जानकार इस पर एक राय नहीं हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से भाजपा प्रदेश की सत्ता में काबिज हुई लेकिन इन दो वर्षों के अंतराल में प्रदेश सरकार के कामकाज पर भी सवाल खड़े होते रहे। जिसके चलते जनता में सरकार के प्रति नाराजगी भी देखने को मिलती रही। हालात यहां तक देखे जा सकते हैं कि कई क्षेत्रां में चुनाव बहिष्कार की खबरें सुनाई देती रही। सड़क, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने जनता को बहिष्कार के लिए विवश किया।
भाजपा के दिग्गज नेताओं ओैर सरकार के मंत्रियों के क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत कम होने को जनता में सरकार के प्रति नाराजगी के तौर पर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के विधानसभा क्षेत्र डोईवाला में मत प्रतिशत जहां 2014 में 66.57 था, तो इस बार 66.23 ही रहा। विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद  अग्रवाल की विधानसभा सीट ऋषिकेश में 2014 में मत प्रतिशत 63 ़71 था जो इस बार घटकर 61 ़12 ही रह गया। इसी तरह से  कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य की विधानासभा सीट में 2014 में मत प्रतिशत 73 ़32 था, लेकिन इस बार घटकर 72 ़27 ही रहा।
इसी तरह से मंत्री हरक सिंह रावत की विधानासभा सीट कोटद्वार, मदन कौशिक की विधानसभा सीट हरिद्वार, सुबोध उनियाल की सीट नरेंद्रनगर हो या फिर अरविंद पाण्डे की सीट गदरपुर, राज्य मंत्री धन सिंह रावत की विधानसभा सीट श्रीनगर और राज्य मंत्री रेखा आर्य की विधानसभा सीट सोमेश्वर में 2014 के मुकाबले इस बार मत प्रतिशत गिरा है। यही नहीं भाजपा के दिग्गज नेताओं के क्षेत्र में भी मतदान का प्रतिशत 2014 के मुकाबले कम ही रहा है। प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट की राजनीतिक कर्मभूमि रानीखेत में तो इस बार 2014 के मुकाबले तकरीबन 5 फीसदी कम मतदान हुआ है। इन आंकड़ां को देखते हुए राजनीतिक जानकारों का स्पष्ट मानना है कि भले ही जनता में मोदी का मैजिक 2014 के मुकाबले पूरी तरह से बरकरार नहीं है, लेकिन उसमें ज्यादा कमी भी नहीं देखने को मिली है। खासतौर पर वीआईपी विधानसभा क्षेत्रों में मतदान में आई कमी को अवश्य प्रदेश सरकार के खिलाफ नाराजगी के तौर पर लिया जाना चाहिए।
पूर्व चुनावां के आंकड़ां को देखें तो महिलाओं के मत प्रतिशत का सबसे अधिक फायदा भाजपा को मिलता रहा है। इस बार के चुनाव में प्रदेश के 54 विधानसभा क्षेत्रां में महिलाओं का मत प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा है। 2014 के चुनाव में भाजपा की पांचों सीटों पर जबरदस्त जीत का श्रेय महिला मतदाताओं को दिया जाता रहा है। मोदी लहर का प्रदेश की महिला मतदाताओं में सबसे अधिक प्रभाव देखा गया था। 2014 में 63 ़05 फीसदी महिला मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था जिससे भाजपा को बड़ी जीत हासिल हुई। इस बार के चुनाव में महिला मतदाताओं का प्रतिशत 64 ़37 रहा। इन आंकड़ां से माना जा रहा है कि इस बार भी महिला मतदाओं में मोदी मैजिक का असर बना हुआ है। इसके चलते भाजपा कांग्रेस से बढ़त बनाए हुए है। खास बात यह है कि जिस तरह से 2014 के चुनाव में पर्वतीय क्षेत्रों की महिलाओं के मत प्रतिशत के चलते भाजपा को फायदा हुआ था वही फायदा इस बार भी देखने को मिल सकता है। इस बार फिर से पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया है।
कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस चुनाव संचाल और प्रचार के मामले में भाजपा से पिछड़ती दिखाई दी है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की राजनीतिक साख और भविष्य पूरी तरह से दांव पर लगा हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी के पुत्र मनीष खण्डूड़ी के लिए भी यह लेकसभा चुनाव बहुत खास बना हुआ है। अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने का दावा करने वाले मनीष खण्डूड़ी हां या फिर कभी विधायक कभी सांसद और कभी राज्य सभा सांसद बनने वाले प्रदीप टम्टा इन सभी का राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा हुआ है।
जब इतने बड़े नेताओं का राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा हुआ हो तो किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए चुनाव एक बड़ी चुनौती माना जाता है। लेकिन जिस तरह से कांग्रेस के कमजोर चुनावी संचालन और आपसी गुटबाजी की खबरें चुनावों में सुनने को मिलती रही उससे तो इतना कहा ही जा सकता है कि कांग्रेस नेताओं ने किसी तरह का सबक लेने की जरूरत नहीं समझी। जबकि कुछ ही माह पूर्व निकाय चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई और कांग्रेस संगठन में भारी विरोधाभाष रहा। फिर भी कांग्रेस एक साथ न होकर खेमों में ही बंटी रही। जबकि भाजपा का संगठन पूरी तरह से चुनाव में जुटा रहा।
चुनाव में मतदान के बाद कांग्रेस नेताओं की तमाम तरह की खबरें सामने आ रही थी। कई नेताओं पर तो कार्यकर्ता सीधे-सीधे आरोप लगा रहे थे कि मतदान के समय उनकी भूमिका उतनी सक्रिय नहीं थी जितनी होनी चाहिए थी। यह भी देखा गया कि मतदान के दिन जिन नेताओं को संसदीय क्षेत्रों में जाना था वे देहरादून में ही डटे रहे। यहां तक कहा जा रहा है कि कई नेता मतदान के दिन अपने क्षेत्र से बाहर चले गए पोड़ी सीट पर यह सबसे ज्यादा देखने को मिला है। कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो कई ऐसे नेता हैं जिन्हें मनीष खण्डूड़ी की जीत के लिए काम करने में सबसे आगे रहना चाहिए था, लेकिन वे भी चुनाव से एक-दो दिन पूर्व अपने-अपने क्षेत्रों से गायब होते गए।
माना जा रहा है कि कांग्रेस के भीतर आपसी मतभेद और एक दूसरे को नीचा दिखाने की जो राजनीति चल रही है उसके चलते चुनाव में इसका प्रतिकूल असर दिखाई दिया। कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए चुनाव संचालन और प्रचार तकरीबन सब कुछ व्यक्तिगत ही रहा। हरीश रावत के बारे में तो यहां तक खबरें सुनाई दी हैं कि कई बूथों पर कांग्रेस के कार्यकर्ता नदारद थे।
कांग्रेस के सूत्रां की मानें तो कांग्रेस नेता एक तरह से पहले ही अपनी हार स्वीकार कर चुके हैं। अगर कांग्रेस पांचां सीट पर जीतती है तो उसे प्रदेश में अपने जनाधार को बचाने में बड़ी कामयाबी मिल सकती है। अगर कांग्रेस एक भी सीट जीत जाती है तो उसे विधानसभा और निकाय चुनावां में मिली हार से उबरने में सहारा मिल सकता है। ऐसे में कांग्रेस का पूरा जोर कम से कम दो सीटां पर जीत हासिल करने पर रहा है। माना जा रहा है कि कांग्रेस नैनीताल, टिहरी, पौड़ी में से कम से कम दो सीटों पर अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है।
शायद इसको कांग्रेस के दिग्गज नेताओं और उम्मीदवारों ने भी भांप लिया था। वैसे भी कांग्रेस चुनाव प्रचार में कोई खास महौल नहीं बना पाई है जबकि भाजपा के दर्जनों स्टार प्रचारकों की ताबड़तोड़ जनसभाओं ने मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए जी जान लगा दी थी। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी और सचिन पायलट के अलावा कोई बड़ा नेता उत्तराखण्ड नहीं पहुंचा। ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस ने स्टार प्रचारकों की सूची न तैयार की हो। सूत्रां के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गुलामनबी आजाद, प्रियंका गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कपिल सिब्बल, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेताओं का नाम लिस्ट में था। लेकिन इनमें से कोई भी चुनाव प्रचार में नहीं आ पाया।

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