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इंडी से ‘हाथी मेरे साथी’ तक अभिनय ने तोड़ी प्रजाति की दीवार

हाॅरर फिल्म ‘गुड बाॅय’ में अभिनय करने वाले कुत्ते इंडी को अस्ट्रा फिल्म अवार्ड्स में बेस्ट परफाॅरमेंस इन हाॅरर एंड सस्पेंस श्रेणी के लिए नामांकन मिला है। यह पहला मौका है जब किसी जानवर को बड़े अभिनय पुरस्कार के लिए नामित किया गया। इस ऐतिहासिक निर्णय ने न सिर्फ हाॅलीवुड बल्कि भारतीय सिनेमा के उस लम्बे इतिहास को भी नई रोशनी में ला खड़ा किया है जहां जानवर दशकों से कहानी की आत्मा रहे हैं लेकिन अभिनय की औपचारिक मान्यता से वंचित


विश्व सिनेमा में अभिनय की परिभाषा को चुनौती देने वाला यह क्षण केवल एक पुरस्कार तक सीमित नहीं है। ‘गुड बाॅय’ फिल्म में नोवा स्कोटिया डक टोलिंग रिट्रीवर नस्ल का कुत्ता इंडी जिस तरह पूरी कहानी को अपने भाव, प्रतिक्रियाओं और मौन अभिनय से आगे बढ़ाता है, उसने आलोचकों और दर्शकों, दोनों को चैंका दिया है। फिल्म की कहानी एक ऐसे व्यक्ति और उसके पालतू कुत्ते के इर्द-गिर्द घूमती है जो शहर छोड़कर एक शांत ग्रामीण इलाके के पुराने घर में रहने आते हैं। धीरे-धीरे घर में मौजूद किसी अदृश्य, अलौकिक खतरे को सबसे पहले महसूस करता है कुत्ता और वहीं से फिल्म का डर जन्म लेता है।

इंडी बिना किसी संवाद के केवल आंखों की बेचैनी, शरीर की भाषा और अपने मालिक के प्रति सतर्कता से डर, तनाव और भावनात्मक गहराई रच देता है। समीक्षकों का कहना है कि ‘गुड बाॅय’ का हाॅरर किसी भूत, खून-खराबे या तेज संगीत से नहीं बल्कि कुत्ते की प्रतिक्रियाओं से पैदा होता है। यही कारण है कि इंडी का प्रदर्शन सहायक भूमिका नहीं बल्कि फिल्म का केंद्रीय भाव बन जाता है।

इस नामांकन के साथ एक बड़ी बहस भी शुरू हो गई है कि क्या अभिनय केवल संवाद और मानवीय अभिव्यक्ति तक सीमित है या दर्शक के भीतर प्रभाव पैदा कर पाना ही अभिनय की असली कसौटी है? अगर इसका जवाब दूसरे विकल्प में है तो भारतीय सिनेमा इस परीक्षा को बहुत पहले ही पास कर चुका है।

भारत में जानवरों की केंद्रीय भूमिका की बात आते ही 1971 की ऐतिहासिक फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ याद आती है। इस फिल्म में हाथी सिर्फ दृश्य भर नहीं थे बल्कि वे कहानी की आत्मा थे। अपने मालिक के प्रति उनका प्रेम, उसकी पीड़ा पर उनका आक्रोश और अंत में उनका बलिदान, इन दृश्यों ने पूरी पीढ़ी को भावुक कर दिया। यह फिल्म बिना किसी शब्द के यह साबित करती है कि संवेदना की भाषा मौन भी हो सकती है।

इसी तरह 1979 ‘नूरी’ को आमतौर पर एक मासूम प्रेम कहानी के रूप में देखा जाता है लेकिन इसमें कुत्ते की भूमिका कथा को आगे बढ़ाने और भावनात्मक जुड़ाव बनाने में बेहद अहम है, वहीं 1985 की ‘तेरी
मेहरबानियां’ में कुत्ता अन्याय के खिलाफ खड़ा एक मौन नायक बन जाता है, जिसकी पीड़ा और बदले की भावना दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती है। ‘कालीचरण’ जैसी फिल्मों में भी कुत्तों की भूमिका निर्णायक रही जबकि आधुनिक सिनेमा में ‘दिल धड़कने दो’ का ‘प्लूटो’ पूरे परिवार की सच्चाई बयान करने वाला प्रतीकात्मक नैरेटर बनकर उभरा।

इसके बावजूद भारतीय सिनेमा में जानवरों को कभी अभिनय की औपचारिक मान्यता नहीं मिली। इसके पीछे एक गहरी सांस्कृतिक और सत्ता-राजनीति काम करती है। अभिनय की दुनिया में वही मान्य होता है जो बोल सकता है, मंच पर आ सकता है, लाॅबी कर सकता है। जानवर न भाषण दे सकते हैं, न पुरस्कार समारोहों में अपनी ‘उपस्थिति’ दर्ज करा सकते हैं इसलिए वे दशकों तक सिनेमा की आत्मा होकर भी ट्रॉफियों से बाहर रहे।
इंडी का ‘अस्ट्रा’ नामांकन इस सत्ता-संतुलन को चुनौती देता है। यह केवल एक कुत्ते की जीत नहीं बल्कि उस सोच के खिलाफ एक मौन हस्तक्षेप है जिसने अभिनय को इंसानी एकाधिकार मान लिया था। भले ही आॅस्कर जैसी संस्थाओं के मौजूदा नियम जानवरों को अभिनय श्रेणी से बाहर रखते हों लेकिन यह नामांकन भविष्य में नियमों और दृष्टिकोण, दोनों पर पुनर्विचार का दबाव बनाएगा।

आज जब सिनेमा में प्रतिनिधित्व, समावेशन और विविधता की बात हो रही है, तब जानवरों का अभिनय भी उसी विमर्श का हिस्सा बनता है। सवाल सीधा है कि अगर अभिनय का मापदंड प्रभाव और संवेदना है तो दशकों से भारतीय परदे पर मौन अभिनय करने वाले ये जानवर क्या कम कलाकार थे?

‘गुड बाॅय’ का इंडी और भारतीय सिनेमा के ‘हाथी मेरे साथी’ के हाथी, ‘तेरी मेहरबानियां’ का कुत्ता, सभी मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि सिनेमा की दुनिया अब एक नई बहस के मोड़ पर खड़ी है। यह बहस सिर्फ पुरस्कारों की नहीं बल्कि सिनेमा की आत्मा को समझने की है और शायद यहीं से अभिनय की परिभाषा का अगला अध्याय शुरू होगा।

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