पश्चिम बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने विभिन्न राज्यों, विशेषकर भाजपा-शासित राज्यों में कार्यरत बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ कथित हिंसा और हमलों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। इसी वजह से इस बैठक ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है। सवाल है कि क्या अधीर रंजन चौधरी कांग्रेस का हाथ छोड़ कमल थामेंगे? भाजपा के एक वर्ग का मानना है कि अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता मुस्लिम बहुल इलाकों में पार्टी के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। मुर्शीदाबाद और आस-पास के क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर रही है जबकि तृणमूल कांग्रेस वहां मजबूत स्थिति में है। ऐसे में चौधरी की भूमिका को लेकर चर्चा जोरों पर है। हालांकि इन अटकलों को खारिज करते हुए अधीर रंजन चौधरी ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात पूरी तरह मानवीय और जनहित से जुड़ी थी। गौरतलब है कि अधीर रंजन चौधरी मुर्शीदाबाद जिले से आने वाले एक प्रभावशाली जमीनी नेता माने जाते हैं और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुखर आलोचक रहे हैं। इस मुद्दे पर उनका रुख भाजपा के रुख से मेल खाता नजर आ रहा है, जिससे राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं। चौधरी ने लम्बे समय तक पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का मजबूत आधार बनाए रखा। उन्होंने बहरामपुर लोकसभा सीट से लगातार पांच बार जीत दर्ज की, जबकि राज्य में कांग्रेस संगठन समय के साथ कमजोर होता चला गया। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार यूसुफ पठान के हाथों हार का सामना करना पड़ा और इसके बावजूद उनकी पहचान एक सशक्त जमीनी नेता के रूप में बनी हुई है।

महायुति में टूट के आसार


महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की राज्य मंत्रिमंडल बैठक में अनुपस्थिति रहने से राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ गई है। नगर निगम चुनावों को लेकर चल रही गठबंधन वार्ताओं के बीच इसे महायुति में बढ़ती खटास से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा है कि भाजपा द्वारा गठबंधन वार्ताओं को लटकाए जाने से नाराज होकर शिंदे ने बैठक से दूरी बनाई। हालांकि मंत्री उदय सामंत ने इन अटकलों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि एकनाथ शिंदे स्वास्थ्य कारणों से बैठक में शामिल नहीं हो सके और ठाणे स्थित अपने निवास पर आराम कर रहे हैं। गौरतलब है कि नगर निगम चुनावों से पहले शिवसेना (शिंदे गुट) और भाजपा के बीच 11 नगर निगमों में गठबंधन तय हो चुका है जबकि 18 नगर निगमों में दोनों दलों के बीच समझौता नहीं हो पाया है। इसको लेकर स्थानीय स्तर पर शिवसेना नेताओं में नाराजगी देखी जा रही है। उनका आरोप है कि भाजपा ने पूर्व-नियोजित रणनीति के तहत शिवसेना को अंतिम समय तक लम्बी वार्ताओं में उलझाए रखा जिससे पार्टी को राजनीतिक नुकसान हुआ। इसी पृष्ठभूमि में यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मंत्रिमंडल बैठक से अनुपस्थित रहकर शिंदे ने भाजपा के प्रति अपनी नाराजगी का संकेत दिया है।

योगी कैबिनेट में होंगे बड़े बदलाव!


हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास पर बैठक हुई। इस अहम बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह, आरएसएस के क्षेत्र प्रचारक (पूर्व) अनिल और (पश्चिम) महेंद्र कुमार मौजूद रहे। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट है कि भाजपा संगठन और योगी मंत्रिमंडल में जल्द बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। प्रदेश संगठन में नई कायज़्कारिणी के गठन के साथ ही मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल पर भी गम्भीर मंथन चल रहा है। सूत्रों के अनुसार, संगठन और मंत्रिमंडल के बीच अदला-बदली पर भी विचार किया जा रहा है। कुछ संगठन पदाधिकारियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है, जबकि कुछ मौजूदा मंत्रियों को संगठन में जिम्मेदारी दी जा सकती है। इन बदलावों के मकर संक्रांति के बाद अमल में आने की सम्भावना जताई जा रही है। वर्तमान में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  सरकार में कुल 54 मंत्री हैं। प्रस्तावित बदलावों के बाद मंत्रियों की संख्या बढ़ाकर 60 तक की जा सकती है। लोकसभा चुनाव के बाद दो मंत्री पूर्व पीडब्ल्यूडी मंत्री जितिन प्रसाद और राजस्व राज्य मंत्री अनूप प्रधान वाल्मीकि सांसद चुने जा चुके हैं, जिससे उनके पद रिक्त हैं। अब इन पदों पर नए चेहरों को मौका मिल सकता है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को भी मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की चर्चा है। इसके अलावा संगठन से कुछ नेताओं और राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के रूप में कार्य कर रहे कुछ नेताओं का कद बढ़ाकर उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाए जाने की भी सम्भावना है। साथ ही आयोगों और बोर्डों में भी कुछ नेताओं के समायोजन पर चर्चा हुई है। सूत्रों का कहना है कि संगठन और मंत्रिमंडल में होने वाले ये बदलाव विधानसभा चुनाव 2027 को ध्यान में रखकर किए जाएंगे। इसमें मंत्रियों और पदाधिकारियों के प्रदर्शन, जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता दी जाएगी। फिलहाल पूर्वांचल का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत अधिक है, ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से कुछ चेहरों को आगे लाकर संतुलन साधने की कोशिश होगी वहीं हाल के दिनों में ब्राह्मण, ठाकुर सहित विभिन्न जातीय वर्गों के विधायकों के साथ हुई बैठकों को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि नए संगठन और मंत्रिमंडल में सभी वर्गों और क्षेत्रों को साधने की कोशिश की जाएगी। गौरतलब है कि पंकज चौधरी के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद यह कोर कमेटी की पहली बैठक थी। इससे पहले पंकज चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने आरएसएस कार्यालय भारती भवन जाकर वरिष्ठ पदाधिकारियों से संगठनात्मक मुद्दों पर चचाज़् की। इसके बाद   मुख्यमंत्री आवास पर कोर कमेटी की बैठक हुई। बैठक में मंत्रिमंडल और संगठन में बदलाव के अलावा विभिन्न आयोगों और बोर्डों में लम्बे समय से खाली पड़े पदों को भरने पर भी मंथन किया गया। फिलहाल खरमास चलने के कारण निर्णयों को मकर संक्रांति के बाद लागू करने पर सहमति बनी है। इस दौरान प्रदेश अध्यक्ष को संगठन के साथ व्यापक सलाह-मशविरा का समय भी मिलेगा, जिसके बाद केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी से बदलाव किए जाएंगे।

कब होगी निशांत की राजनीति में एंट्री?


नए साल 2026 की शुरुआत में एक बार फिर पटना में पोस्टरों के जरिए अपील की गई है कि निशांत कुमार राजनीति में आएं और जेडीयू में युवाओं का भविष्य संवारें। छात्र जदयू के प्रदेश उपाध्यक्ष कृष्णा पटेल की तरफ से यह पोस्टर लगाया गया है। इस पोस्टर में नववर्ष और मकर संक्रांति की शुभकामनाएं भी दी गई हैं जो पोस्टर पटना की सड़कों पर लगाए गए हैं उसमें लिखा गया है कि ‘चाचा जी के हाथों में सुरक्षित अपना बिहार’ अब पार्टी के अगले जेनरेशन का भविष्य संवारें निशांत कुमार।’ इसके बाद से सियासी गलियारों में सवाल उठ रहा है कि निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री कब होगी? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अभी तक निशांत कुमार या नीतीश कुमार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। निशांत पहले भी राजनीति से दूरी बनाए रखते आए हैं और कभी सक्रिय भूमिका नहीं निभाई। यह मांग पार्टी के अंदर से उठ रही है खासकर युवा कार्यकर्ताओं और छात्र विंग से लेकिन यह सिर्फ पोस्टरबाजी और प्रदर्शन तक सीमित है। लेकिन निशांत की राजनीतिक एंट्री कब होगी इस पर सस्पेंस बना हुआ है। गौरतलब है कि कार्यकर्ताओं ने निशांत की एंट्री की मांग को लेकर 12 घंटे की भूख हड़ताल भी की थी। जेडीयू नेता संजय झा और श्रवण कुमार ने कहा है कि पार्टी कार्यकर्ता निशांत को राजनीति में देखना चाहते हैं क्योंकि वे पढ़े-लिखे और सक्षम हैं लेकिन अंतिम फैसला नीतीश कुमार और निशांत का होगा।

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