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आपातकाल से 2014 के बाद के भारत तक न्यायपालिका का विचलन

न्यूज एंकर अर्नब गोस्वामी के लिए रात में खुली सर्वोच्च न्यायालय
आपातकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही के सामने नतमस्तक हो जाने वाली भारतीय न्यायपालिका ने बाद में पश्चाताप भी किया, चेतावनियां भी दीं लेकिन 2014 के बाद वह एक ऐसे दौर में जा पहुंची है जहां आधी रात को अदालतें कुछ खास लोगों के लिए खुलती हैं जबकि हजारों नागरिक वर्षों से जेल में बिना सुनवाई पड़े रहते हैं। इसलिए 2026 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय केवल व्यक्तिगत मामलों का निपटारा नहीं होंगे बल्कि वे यह निर्धारित करेंगे कि न्यायपालिका लोकतंत्र की प्रहरी के रूप में पुनः स्थापित होगी या फिर सत्ता, धर्म और प्रशासनिक सुविधा के साथ तालमेल बिठाने वाली संस्था के रूप में स्थायी रूप से देखी जाएगी


भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को केवल संविधान की व्याख्याकार संस्था नहीं बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं की अंतिम प्रहरी के रूप में कल्पित किया गया था। संविधान निर्माताओं ने उसे जान-बूझकर असाधारण शक्तियां दीं ताकि निर्वाचित सत्ता की तात्कालिक इच्छाएं नागरिक अधिकारों को कुचल न सकें। लेकिन यह आदर्श स्थिति कभी स्थायी नहीं रही। आजादी के बाद से ही भारतीय न्यायपालिका प्रतिरोध, समर्पण, भय, समझौते और कभी-कभार पश्चाताप के बीच झूलती रही है। 2014 के बाद यह स्थिति एक नई, अधिक संगठित और अधिक खतरनाक दिशा में मुड़ती दिखाई देती है।

वर्ष 1975-77 का आपातकाल इस यात्रा का पहला बड़ा नैतिक पतन था। ‘एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला’ में सुप्रीम कोर्ट की बहुमत पीठ ने यह कह दिया था कि आपातकाल के दौरान नागरिक अदालतों के दरवाजे भी नहीं खटखटा सकते। यह फैसला केवल कानूनी नहीं बल्कि न्यायपालिका नैतिक आत्मसमर्पण भी था। इसी फैसले में शामिल जस्टिस पी.एन. भगवती ने बाद के वर्षों में सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उनका फैसला गलत था और उन्होंने क्षमा मांगी। यह भारतीय न्यायिक इतिहास का दुर्लभ क्षण था लेकिन यह भी संकेत था कि न्यायपालिका अक्सर अपनी गलती तब मानती है जब नुकसान हो चुका होता है।

आपातकाल के अंधेरे में जस्टिस एच.आर. खन्ना का असहमति-मत एक नैतिक प्रकाश स्तंभ जरूर बना। उन्होंने इस पीठ के अन्य न्यायाधीशों से इत्तेफाक न रखते हुए अलग से फैसला दिया जिसमें उन्होंने कहा कि जीवन और स्वतंत्रता राज्य की कृपा पर नहीं छोड़ी जा सकती। इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। नाराज इंदिरा गांधी ने उन्हें मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया था। यही पैटर्न आगे भी नजर आता है। सत्ता के सामने खड़े होने की कीमत कई न्यायाधीशों को व्यक्तिगत स्तर पर चुकानी पड़ी जबकि संस्था समग्र रूप से सुरक्षित रास्ता चुनती रही।

1990 के बाद उदारीकरण के दौर में न्यायपालिका के सामने भूमि अधिग्रहण, श्रम अधिकार और पर्यावरण संरक्षण जैसे प्रश्न आए। अनेक मामलों में अदालतों ने इन्हें ‘नीतिगत प्रश्न’ बताकर सीमित हस्तक्षेप किया। इससे पूंजी को राहत और हाशिए के समाज को नुकसान पहुंचा। यह खुला अधिनायकवाद नहीं था लेकिन इसी दौर ने 2014 में न्यायपालिका के विचलन के लिए जमीन तैयार की।

आजाद भारत में न्यायपालिका की जवाबदेही पर सबसे गम्भीर प्रश्न महाभियोग की असफल परम्परा ने खड़े किए। जस्टिस वी. रामास्वामी पर लगे गम्भीर आरोपों के बावजूद संसद में महाभियोग असफल रहा। संदेश साफ था कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति न हो तो न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार पर कार्रवाई भी ठिठक सकती है। इसके बाद कई मामलों में ‘इन हाउस इन्क्वायरी’ के नाम पर आरोप दबाए गए, न रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, न निष्कर्ष। पारदर्शिता के अभाव ने भरोसा कमजोर किया।

निचली अदालतों में स्थिति और भी चिंताजनक है। दिल्ली में एक जज के घर से भारी मात्रा में नकदी की बरामदगी, मध्य प्रदेश में एक महिला जज द्वारा वरिष्ठ पर यौन उत्पीड़न के आरोप और हाल ही में बिहार के तीन न्यायाधीशों का नेपाल में अवैध गतिविधियों में पकड़े जाने के बाद बर्खास्त होना, ये घटनाएं बताती हैं कि समस्या केवल वैचारिक नहीं बल्कि आचरण और जवाबदेही का भी गम्भीर संकट है।

जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ, कैमरे के सामने आए और कहा कि यदि वे नहीं बोलेंगे तो लोकतंत्र खतरे में है। यह संस्था के भीतर से आई एक बड़ी चेतावनी थी। इसके बाद सुधार की जगह सन्नाटा और समायोजन बढ़ता गया।

इसी पृष्ठभूमि में वरिष्ठ संवैधानिक वकील फाली एस. नरीमन की पुस्तक ‘गाॅड  सेव द सुप्रीम कोर्ट’ (God Save the Supreme Court) केंद्रीय संदर्भ बनती है। नरीमन प्रस्तावना में लिखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट को अचूक मानने की संस्कृति ने जवाबदेही को क्षीण किया, कॉलेजियम पारदर्शिता खो बैठा और आलोचना को अवमानना समझा जाने लगा, जो 2014 के बाद और तीव्र हुआ। 2014 के बाद न्यायपालिका के व्यवहार में भारी बदलाव स्पष्ट नजर आता है। यूएपीए जैसे कठोर कानूनों में जमानत लगभग असम्भव होती जा रही है। असहमति को सुरक्षा खतरे के बराबर रखने की प्रवृत्ति को न्यायालय भी मान्यता देते नजर आ रहे हैं। सत्ता- समर्थक हेट स्पीच पर चयनात्मक मौन है। तबादले अनुशासन के औजार बन चुके हैं और चुप्पी प्रस्कार।

इसी चयनात्मकता का सबसे स्पष्ट प्रतीक ‘रात में खुली अदालतें’ हैं। नवम्बर 2020 में पत्रकार अर्णब गोस्वामी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण तत्परता दिखाते हुए लगभग रातों-रात सुनवाई कर जमानत दी थी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भावुक टिप्पणियां की थी। सवाल यह नहीं कि जमानत क्यों दी गई? सवाल यह है कि यही संवेदनशीलता उन सैकड़ों अभियुक्तों के लिए क्यों नहीं दिखती जो पांच-पांच साल से जेल में हैं? छात्र, कार्यकर्ता, लेखक जिनकी जमानत अर्जियां सूचीबद्ध तक नहीं होतीं।

यहीं पर न्याय का विचलन अधिनायकवाद का रूप लेता है जब अदालतें अपराध से ज्यादा व्यक्ति की राजनीतिक उपयोगिता के आधार पर प्रतिक्रिया देती प्रतीत हों। यही वह बिंदु है जहां नरीमन की चेतावनी और वरिष्ठ अधिवक्ता काॅलिन गोंजाल्वेस का विश्लेषण एक-दूसरे से जुड़ता है। काॅलिन कहते हैं कि आज न्यायपालिका डर से नहीं, संरचना से नियंत्रित है और फासीवाद आदेशों, चुप्पी और चयनात्मक सक्रियता के जरिए सामान्य बनाया जा रहा है। वे यह भी कहते हैं कि फासीवाद सच से डरता है और सच बोलना ही सबसे बड़ा प्रतिरोध है।

भारतीय न्यायपालिका का इतिहास बताता है कि विचलन कोई एक क्षण नहीं बल्कि एक सतत् प्रक्रिया है लेकिन 2014 के बाद यह प्रक्रिया अपने सबसे संगठित, सबसे असमान और सबसे खतरनाक रूप में सामने आई है।
 
आज प्रश्न यह नहीं कि न्यायपालिका गिरी या नहीं? प्रश्न यह है कि क्या समाज उसे गिरते हुए देखकर भी चुप रहेगा? या संविधान की उस अंतिम ढाल को बचाने के लिए बोलेगा? 2026 में जब जस्टिस सूर्यकांत भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायालय का नेतृत्व करेंगे, तब सुप्रीम कोर्ट के सामने आने वाले प्रश्न सामान्य न्यायिक विवाद नहीं होंगे बल्कि वे ऐसे संवैधानिक मुद्दे होंगे जो नागरिकता, धर्म, स्वतंत्रता और राज्य की शक्ति की सीमाओं को नए सिरे से परिभाषित करेंगे। नागरिकता से जुड़े मामलों में अदालत को यह तय करना होगा कि राज्य नागरिक की पहचान निर्धारित करने में कितनी दूर तक जा सकता है, चाहे वह मतदाता सूची का पुनरीक्षण हो, दस्तावेजों की वैधता का प्रश्न हो या फिर नागरिक अधिकारों को प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जोड़ने की प्रवृत्ति। धर्म और आस्था से जुड़े मामलों में ‘essential religious practices’ सिद्धांत की पुनव्र्याख्या एक बार फिर अदालत के सामने होगी, जहां यह सवाल निर्णायक होगा कि क्या न्यायपालिका धर्म की व्याख्याकार बनेगी या केवल संविधान की सीमाओं में रहकर धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करेगी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट को घृणा भाषण, राजनीतिक वक्तव्यों, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफाम्र्स की भूमिका पर स्पष्ट और सुसंगत दिशा तय करनी होगी क्योंकि हाल के वर्षों में इन मामलों में अदालत की चयनात्मक सक्रियता पर गम्भीर प्रश्न उठे हैं। विशेष रूप से कठोर कानूनों जैसे यूएपीए के दायरे और उनकी व्याख्या पर अदालत का रुख यह तय करेगा कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की आड़ में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कितनी हद तक सीमित किया जा सकता है। दिल्ली दंगों, सार्वजनिक भाषणों और राजनीतिक उकसावों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई यह संकेत देगी कि क्या ‘बेल नियम है’ का सिद्धांत वास्तव में सार्वभौमिक रहेगा या केवल कुछ वर्गों तक सीमित रहेगा।

इसके साथ ही चुनावी लोकतंत्र से जुड़े प्रश्न, निर्वाचन आयोग की भूमिका, मतदाता सूचियों की शुद्धता, चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता और नागरिकों के मतदान अधिकार भी न्यायालय के समक्ष निर्णायक रूप से आएंगे। डिजिटल युग में डेटा संरक्षण, निगरानी, निजता और राज्य की सूचना संग्रह शक्ति जैसे मुद्दे भी अदालत को यह तय करने के लिए बाध्य करेंगे कि नागरिक स्वतंत्रता और तकनीकी शासन के बीच संतुलन कैसे साधा जाए। इन सभी मामलों की सुनवाई ऐसे समय में होगी जब न्यायपालिका पहले से ही अपनी निष्पक्षता, पारदर्शिता और स्वतंत्रता को लेकर आलोचनाओं के घेरे में है। इसलिए 2026 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय केवल व्यक्तिगत मामलों का निपटारा नहीं होंगे बल्कि वे यह निर्धारित करेंगे कि न्यायपालिका लोकतंत्र की प्रहरी के रूप में पुनः स्थापित होगी या फिर सत्ता, धर्म और प्रशासनिक सुविधा के साथ तालमेल बिठाने वाली संस्था के रूप में स्थायी रूप से देखी जाएगी।

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