चकराता रोड देहरादून स्थित एलआईसी बिल्डिंग ध्वस्त होती मंसाराम बिल्डिंग
प्रदेश की अस्थायीनुमा स्थायी राजधानी देहरादून में 2009 से प्रशासन जानता है कि शहर में जर्जर और जानलेवा इमारतें खड़ी हैं। पुलिस विभाग की चेतावनी वाली चिट्ठी, नगर निगम की 48 जर्जर भवनों की सूची और 2015 में नगर मजिस्ट्रेट के दो स्पष्ट न्यायिक आदेश, सब रिकाॅर्ड पर हैं। इसके बावजूद आज तक इन इमारतों को नहीं गिराया जा सका है। दूसरी ओर गरीबों के अतिक्रमण पर तुरंत बुलडोजर चलता है। यह तब है जब उत्तराखण्ड हिमालय में टेक्टाॅनिक स्ट्रेस खतरनाक स्तर तक बढ़ चुका है और किसी भी समय बड़े भूकम्प की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सवाल सीधा है, कानून सबके लिए बराबर क्यों नहीं?


देहरादून में जर्जर भवनों का संकट किसी एक साल या एक सरकार की देन नहीं है। यह एक लम्बे समय से दर्ज, लिखित चेतावनियों, प्रशासनिक रिपोर्टों और न्यायिक आदेशों से भरी कहानी है जिसकी शुरुआत कम से कम 2009 से होती है। उसी वर्ष देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने पुलिस चौकी धारा के पास स्थित एक चार मंजिला भवन को लेकर नगर प्रशासन और मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण को लिखित पत्र भेजा था। चिट्ठी में स्पष्ट किया गया था कि भवन अत्यंत जर्जर हो चुका है, उसकी दीवारों से ईंटें गिर रही हैं और मलबा गिरने से पुलिस परिसर में खड़े वाहनों को नुकसान पहुंच चुका है। पत्र में यह चेतावनी भी दर्ज थी कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो किसी भी दिन जान-माल की गम्भीर हानि हो सकती है।

यह चेतावनी कागजी नहीं थी बल्कि मौके पर दर्ज वास्तविक स्थिति का विवरण थी। इसके बावजूद न तो उस भवन को गिराया गया और न ही कोई स्थायी सुरक्षा उपाय किए गए। यह लापरवाही धीरे-धीरे सामने आई एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा थी। नगर निगम देहरादून ने बाद में एक सूची तैयार की जिसमें 48 ऐसे भवन चिन्हित किए गए जिन्हें अत्यंत जर्जर और खतरनाक बताया गया। ये भवन शहर के घनी आबादी वाले इलाकों में स्थित हैं जहां इनके गिरने से बड़े पैमाने पर जन-हानि की आशंका दर्ज की गई। इन तथ्यों के आधार पर मामला न्यायालय पहुंचा। 30 मार्च 2015 को नगर मजिस्ट्रेट, देहरादून ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के तहत आदेश पारित करते हुए कहा कि ये जर्जर भवन लोक सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष खतरा हैं और प्रशासन का यह दायित्व है कि वह बिना देरी के कार्रवाई करे। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि लापरवाही के चलते कोई हादसा होता है तो जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

जब इसके बाद भी जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो 27 जुलाई 2015 को नगर मजिस्ट्रेट ने दूसरा आदेश पारित किया। इस आदेश में और अधिक सख्त भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा गया कि जिन भवनों को पहले ही खतरनाक घोषित किया जा चुका है, वे किसी भी समय ढह सकते हैं। नगर मजिस्ट्रेट ने साफ लिखा कि उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 331 के तहत नगर निगम को ऐसे भवनों को गिराने का पूरा अधिकार है और इसके लिए किसी अतिरिक्त अनुमति की आवश्यकता नहीं है। इसके बावजूद ये आदेश भी फाइलों से बाहर नहीं निकल पाए।

यहीं से यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं बल्कि सम्भावित आपदा को आमंत्रित करने का रूप ले लेता है। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड हिमालय में भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच टकराव के कारण टेक्टाॅनिक स्ट्रेस लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय प्लेट हर वर्ष लगभग 5 सेंटीमीटर की गति से उत्तर की ओर खिसक रही है जिससे मेन सेंट्रल थ्रस्ट और मेन बाउंड्री थ्रस्ट जैसे फाॅल्ट जोन पर दबाव खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है।

पिछले कुछ दशकों में बड़े भूकम्प न आने के कारण हिमालयी क्षेत्र में ऊर्जा का भारी संचय हुआ है। वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘साइलेंट स्ट्रेन बिल्ड-अप’ कहा गया है जिसका मतलब यह है कि जमीन के भीतर दबाव लगातार बढ़ रहा है लेकिन उसका विसर्जन नहीं हो रहा। यही स्थिति अचानक बड़े और विनाशकारी भूकम्प का कारण बन सकती है। उत्तराखण्ड जैसे राज्यों में यदि मध्यम तीव्रता का भी भूकम्प आता है तो सबसे पहले वही संरचनाएं ढहेंगी जो पहले से कमजोर, पुरानी और जर्जर हैं।

इसी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि में हाल में जारी नई सेस्मिक हजार्ड मैप ने हिमालयी राज्यों को अत्यंत उच्च जोखिम वाले जोन-6 में रखा है। यह आकलन साफ करता है कि देहरादून जैसे शहर अब केवल जोन-4 या जोन-5 तक सीमित नहीं माने जा सकते बल्कि यहां बड़े भूकम्प का खतरा पहले से कहीं अधिक गम्भीर हो चुका है।

इन तमाम चेतावनियों के बावजूद प्रशासन का रवैया दोहरा दिखाई देता है। सरकारी जमीन पर गरीबों द्वारा किए गए छोटे अतिक्रमणों पर तत्काल बुलडोजर कार्रवाई होती है लेकिन न्यायालय द्वारा खतरनाक घोषित बहुमंजिला इमारतें वर्षों से खड़ी रहने दी जाती हैं। 2009 की पुलिस चेतावनी, 48 जर्जर भवनों की सूची, 2015 के दो न्यायिक आदेश और नई सेस्मिक हजार्ड मैप, ये सभी एक ही बात कह रहे हैं कि खतरा वास्तविक है, स्पष्ट है और टलने वाला नहीं। फिर भी यदि कार्रवाई नहीं होती तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? और यदि ऐसा हुआ तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

देहरादून की ये जर्जर इमारतें अब केवल ईंट-पत्थर की संरचनाएं नहीं हैं। वे प्रशासनिक उदासीनता, कानून की असमानता और चयनात्मक कार्रवाई का जीवित प्रतीक बन चुकी हैं और यहीं से वह सवाल और तीखा हो जाता है, जिसे अब टालना सम्भव नहीं कि यह अंधा कानून क्यों?

गिरासू भवनों के फेर में गिरा नगर निगम देहरादून

5 नवम्बर 2009 में देहरादून वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण देहरादून को एक पत्र लिखा कि राजपुर रोड स्थित धारा पुलिस चौक से सटी हुई मंसाराम बिल्डिंग के जीर्ण-शीर्ण होने के कारण उसकी कुछ ईंटें पुलिस चैकी में आ गिरी है जिससे कुछ वाहन क्षतिग्रस्त हो गए हैं। एसएसपी देहरादून ने इस इमारत को ध्वस्तीकरण करने की कार्यवाही करने का उल्लेख किया। नगर निगम एक्ट के अनुसार नगर निगम क्षेत्र में इस तरह की कार्यवाही के लिए निगम ही अधिकृत है। इसी के चलते मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण देहरादून ने इस पत्र को 4 दिसम्बर 2009 को नगर निगम देहरादून को कार्यवाही करने के लिए भेजा। नगर निगम ने इस मामले में कार्यवाही की और इसके लिए समूचे नगर क्षेत्र में जीर्ण-शीर्ण भवनों की सूची बनाई जिसमें 48 ऐसे भवन थे जो रहने बेहद पुराने और जीर्ण-शीर्ण हो गए जिस कारण रहने योग्य नहीं पाए गए जबकि इन भवनों में बसावट चली आ रही थी।

ज्यादातर भवन ऐसे हैं जिसमें वर्षों पुराने किराएदार है जो कि भवन खाली नहीं करना चाहते। इनमें कई भवनों के किराएदारों और मालिकों के बीच न्यायालयों में वाद भी चल रहे हैं जिसके चलते नगर निगम ध्वस्तीकरण की कार्यवाही करने से बचता रहा लेकिन इसी बीच प्रीतम रोड स्थित मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण का पुराना कार्यालय जो स्वयं जीर्ण हो चुका था, को ट्रांसपोर्ट नगर देहरादून में स्थानांतरित करके पुराने भवन को ध्वस्त कर ‘गांधी शताब्दी नेत्र चिकित्सालय’ का निर्माण कर दिया गया। यह पहला ‘गिरासू भवन’ है जिस पर ध्वस्तीकरण की कार्यवाही हुई। हालांकि यह कार्यवाही नगर निगम ने नहीं की स्वयं मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण द्वारा की गई।

इसी तरह ये राजपुर रोड स्थित मंसाराम के मामले में भी हाईकोर्ट में वाद लम्बित था जिसका निर्णय आने के बाद अब मंसाराम इमारत को भी ध्वस्तीकरण की कार्यवाही की जा रही है। जिस मंसाराम बिल्डिंग के कारण देहरादून में ‘गिरासू भवनों’ का मामला सबसे ज्यादा चर्चित रहा वह अब लगभग ध्वस्त हो चुकी है। लेकिन चकराता रोड की चर्चित एलआईसी बिल्डिंग पर अभी तक कोई कार्यवाही अमल में नहीं ला पाई है। इसके कारण किराएदारों का एलआईसी के साथ न्यायालयों में मुकदमा लम्बित है जिस कारण ध्वस्तीकरण की कार्यवाही नहीं हो पा रही है। नगर निगम प्रशासन का कहना है कि ‘‘नगर निगम सिर्फ नोटिस जारी कर सकता है या तो भवन स्वामी भवना की मरम्मत करवाए या उसे ध्वस्त करवाए। नगर निगम इस पर सिर्फ नोटिस ही दे सकता है।’’ दिलचस्प बात यह है कि 2009 से लेकर 2025 तक 16 वर्ष बीत चुके हैं। इसके बाद भी नगर निगम नोटिस की कार्यवाई से इतर ज्यादा कुछ नही कर पाया है।

बात अपनी-अपनी

हमने नगर निगम को वार्निंग देते हुए पत्र भी दिया है। अगर इन भवनों के कारण किसी भी प्रकार की जानमाल की हानि होती है तो उसकी समस्त जिम्मेदारी नगर निगम की ही होगी। हमने यह भी कहा है कि अगर निगम को ध्वस्तीकरण की कार्यवाही में कानून व्यवस्था की समस्या आएगी तो जिला प्रशासन उसमें पूरा सहयोग करेगा। फोर्स, पुलिस की आवश्यकता होगी तो उसकी व्यवस्था भी जिला प्रशासन करेगा लेकिन ऐसे भवनों पर तुरंत ही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करना ही होगा।

सविन बंसल, जिलाधिकारी, देहरादून

हम सिर्फ नोटिस ही इश्यू कर सकते हैं या तो भवन स्वामी अपने भवन की मरम्मत करवाए नहीं तो उसको ध्वस्त करे। अभी हमने नए नोटिस सर्कुलेट किए है। नोटिस का पीरियड पूरा होने के बाद हम कोई कार्यवाही करेंगे। कई भवन स्वामियों ने हमें कहा है कि वे स्वयं ही ध्वस्त कर देंगे। ज्यादातर मामलों में कोर्ट में मुकदमें भी चल रहे हैं जिस कारण कार्यवाही नहीं हो पा रही है। जो न्यायालय के अधीन है उस पर तो न्यायालय से जैसा निर्णय आएगा उसी आधार पर निगम कार्यवाही करेगा। ऐसे भवनों से खतरा तो है ही, इसीलिए हमें लगता है कि जल्द ही ऐसे मामलों में कोर्ट भी निर्णय लेगा जैसे मंसाराम के मामले में कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से ध्वस्तीकरण की कार्यवाही करने के आदेश दिए तो हमने कार्यवाही शुरू कर दी।

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