बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति का पूर्व हमेशा से सियासी हलचल का संकेत रहा है। दही- चूड़ा भोज केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि राजनीतिक संदेशों और सम्भावित गठजोड़ों का मंच भी बनता रहा है। इस बार 14-15 जनवरी को आयोजित दही-चूड़ा भोज के साथ ही राज्य की राजनीति में नए कयासों ने जन्म ले लिया है। मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित पटेल समाज के दही-चूड़ा भोज में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मौजूदगी खास रही। संयोग से इसी कार्यक्रम में जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह भी उपस्थित थे। हालांकि आरसीपी सिंह कार्यक्रम में तब पहुंचे जब नीतीश कुमार वहां से जा चुके थे लेकिन उनके बयान ने राजनीतिक हलकों में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है। आरसीपी सिंह ने कहा कि वे और नीतीश कुमार एक ही हैं और उनके बीच पिछले 25 वर्षों से गहरे सम्बंध रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों एक-दूसरे को भलीभांति समझते हैं। इस बयान को सीधे तौर पर जेडीयू में वापसी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। गौरतलब है कि जेडीयू से निकाले जाने के बाद आरसीपी सिंह ने भाजपा का दामन थामा था लेकिन वहां अपेक्षित राजनीतिक भूमिका न मिलने पर उन्होंने अपनी पार्टी ‘आसा’ बनाई। बाद में उसका विलय प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी में कर दिया। अब यदि आरसीपी सिंह अपने पुराने सम्बंधों का हवाला दे रहे हैं तो यह माना जा रहा है कि वे जन सुराज से भी किनारा कर दोबारा नीतीश कुमार के साथ घर वापसी कर नई सियासी पारी शुरू कर सकते हैं।
बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा भोज की सियासत कोई नई बात नहीं है। राष्ट्रीय जनता दल भी हर साल बड़े पैमाने पर इस भोज का आयोजन करता रहा है लेकिन इस बार उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा का दही-चूड़ा भोज इसलिए खास रहा क्योंकि इसमें जनशक्ति जनता दल के नेता तेज प्रताप यादव भी शामिल हुए। तेज प्रताप को भोज में न केवल आमंत्रित किया गया बल्कि उन्होंने स्वयं शिरकत भी की। भोज के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में तेज प्रताप ने कहा कि भले ही राजनीतिक विचार अलग-अलग हों लेकिन नेता आपस में मिलते-जुलते रहते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे एनडीए में शामिल होंगे तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि अगर ऐसा कुछ होगा तो आपको सूचित कर दिया जाएगा, वहीं जब डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा से तेज प्रताप यादव की मौजूदगी के सियासी मायने पूछे गए तो उन्होंने इसे सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से जोड़ा। सिन्हा ने कहा कि सनातन संस्कृति के भाव में जो भी आमंत्रण स्वीकार करता है, वह सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। उन्होंने मकर संक्रांति को उत्तरायण की शुरुआत बताते हुए इसे शुभ कार्यों और सकारात्मकता से जोड़ते हुए कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार सुशासन से समृद्धि की ओर बढ़ रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मागज़्दशज़्न में विकसित बिहार के संकल्प को पूरा किया जा रहा है। इन बयानों ने राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर अटकलों को हवा दे दी है। चर्चा जोरों पर है कि क्या तेज प्रताप एनडीए में शामिल होंगे? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि मकर संक्रांति सनातनियों का त्योहार है और इस दिन सभी दलों के लोग एक साथ मिलकर पर्व मनाते हैं। लेकिन डिप्टी सीएम के दही-चूड़ा भोज में तेज प्रताप यादव की मौजूदगी ने प्रदेश की सियासत में नए कयासों को जन्म दे दिया है। अब यह केवल संयोग था या किसी सम्भावित राजनीतिक समीकरण की भूमिका इसका जवाब आने वाले दिनों में ही मिलेगा।
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में अभी दो साल का समय शेष है लेकिन प्रदेश कांग्रेस में अभी से बड़े राजनीतिक बदलाव होने की अटकलें तेज हो गई हैं। पार्टी के प्रदेश पीसीसी चीफ को लेकर रायपुर से दिल्ली तक चर्चाओं का बाजार गर्म है। कांग्रेस की सीडब्ल्यूसी बैठक के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज को बदला जा सकता है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस मुद्दे पर लगातार चर्चा हो रही है और कई दावेदार इस दौड़ में दिखाई दे रहे हैं। सवाल है कि आखिर छत्तीसगढ़ कांग्रेस की कमान किसे मिलेगी? सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद दिल्ली में कई वरिष्ठ नेताओं के साथ इस विषय पर चर्चा हुई है। इसी बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर दावा जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व कई राज्यों में प्रदेश अध्यक्ष बदलने की तैयारी में है जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। इसके बाद से छत्तीसगढ़ कांग्रेस के पीसीसी चीफ को बदलने की चर्चाओं ने और जोर पकड़ लिया है। ऐसे में नए प्रदेश अध्यक्ष के नाम को लेकर बड़े चेहरों की चर्चा हो रही है। एक ओर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की ओर से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के बेटे और पूर्व मंत्री उमेश पटेल का नाम सामने आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ टीएस बाबा भी कई बार सार्वजनिक रूप से प्रदेश अध्यक्ष बनने की इच्छा जता चुके हैं तो उमेश पटेल खरसिया विधानसभा सीट से तीन बार विधायक रह चुके हैं। वे ओबीसी समाज से आते हैं और अब तक किसी बड़े विवाद से उनका नाम नहीं जुड़ा है। विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने उनके समर्थन में प्रचार किया था। इसके अलावा ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान राहुल ने मंच से उमेश पटेल की खुले तौर पर सराहना भी की थी। इससे पहले उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने की चर्चाएं भी चल चुकी हैं। इस लिहाज से उमेश पटेल की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करीब एक साल का समय बाकी है लेकिन प्रदेश में नेताओं का दल बदल अभी से शुरू हो गया है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी तेज है कि जौनपुर के पूर्व सांसद और बाहुबली नेता धनंजय सिंह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल होंगे या नहीं? इस सवाल ने पूर्वांचल की राजनीति में नई अटकलें तेज कर दी हैं। वर्तमान में धनंजय सिंह जेडीयू से जुड़े हैं जो एनडीए में भाजपा की सहयोगी पार्टी है और हाल के महीनों में भाजपा नेताओं के लगातार करीब नजर आ रहे हैं। उनके बयानों और गतिविधियों से यह कयास मजबूत हुए हैं कि वे सीधे भाजपा का दामन थाम सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि 2027 विधानसभा या 2029 लोकसभा चुनाव से पहले धनंजय सिंह का सीधे भाजपा में शामिल होना सम्भव तो है लेकिन इसकी सम्भावना कम है। वे पहले से ही जेडीयू के जरिए एनडीए का हिस्सा हैं और अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को समर्थन दे रहे हैं। इससे भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलता है जबकि विवादों से दूरी बनी रहती है। भाजपा उन्हें सहयोगी दल के जरिए ही साथ रखना ज्यादा सुरक्षित समझेगी। हालांकि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी के भाजपा में शामिल होने की संभावना अधिक है। ऐसा होने पर भाजपा को पूर्वांचल में राजपूत वोट बैंक को साधने में बड़ा फायदा मिल सकता है। जौनपुर, अमेठी और वाराणसी के कुछ इलाकों में धनंजय सिंह का प्रभाव भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से अहम माना जाता है। यह सियासी समीकरण भाजपा के लिए पूर्वांचल में गेम-चेंजर साबित हो सकता है, जबकि सपा और बसपा जैसी विपक्षी पाटिज़्यां इसे लेकर सतर्क हैं। बसपा से जेडीयू और अब भाजपा से बढ़ती नजदीकियों तक धनंजय सिंह की राजनीतिक यात्रा उन्हें संभावित ‘किंगमेकर’ की भूमिका में बनाए रख सकती है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह नजदीकी केवल रणनीति है या किसी बड़े राजनीतिक फेरबदल की भूमिका। यह सियासी समीकरण 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले और तेज हो सकता है जहां पूर्वांचल की सीटें निर्णायक भूमिका निभाएंगी। पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए और कांग्रेस-नेतृत्व वाले महाजोट के वोट शेयर में अंतर एक फीसदी से भी कम था, हालांकि सीटों में बड़ा अंतर दिखा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दोनों दलों का वोट प्रतिशत लगभग बराबर रहा। कांग्रेस को भरोसा है कि यदि ध्रुवीकरण सीमित रहा और स्थानीय अस्मिता का मुद्दा हावी हुआ तो मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है। दूसरी ओर भाजपा घुसपैठ और सांप्रदायिक मुद्दों को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाए हुए है। यही कारण है कि इस बार असम में उसकी राह आसान नहीं मानी जा रही और यह सवाल अहम बना हुआ है कि क्या असम में कांग्रेस की मुराद पूरी होगी।

