उत्तर प्रदेश के बंटवारे का मुद्दा पिछले कई वर्षों से किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में नहीं रहा है। बीजेपी छोटे राज्यों का पक्षधर रही है लेकिन यूपी के विभाजन के विरोध में है तो कभी हरित प्रदेश की वकालत करने वाली राष्ट्रीय लोक दल ने भी इसे भुला दिया है। मायावती ने जरूर आज से बारह साल पहले यूपी के बंटवारे का प्रस्ताव विधानसभा में पास करवा लिया था। वहीं अब आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर ने संसद में इस मुद्दे को उठाकर राजनीति गरमा दी है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि लोकसभा में यूपी विभाजन की मांग चंद्रशेखर ने क्यों की? आखिर इसके पीछे की
राजनीति क्या है? क्या रावण मायावती की राह पर चल रहे हैं? जबकि मायावती और चंद्रशेखर एक-दूसरे के विरोधी माने जाते हैं तो फिर ये महज संयोग है या फिर किसी तरह का प्रयोग? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि दोनों नेताओं का वोट बैंक एक जैसा ही है। बीएसपी की घटती लोकप्रियता और चंद्रशेखर का बढ़ता प्रभाव आपस में जुड़े हुए हैं। चंद्रशेखर की कोशिश एक तरह से मायावती की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की है। यूपी की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती की पार्टी बीएसपी संकट में है। लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला। यूपी चुनाव में बीएसपी का एक ही विधायक जीत दर्ज कर पाया। मायावती पार्टी से नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए अपने भतीजे आकाश आनंद को राजनीति में लेकर आईं। आकाश को उन्होंने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया। फिर अचानक लोकसभा चुनाव के बीच में उनके प्रचार पर रोक लगा दी और चुनाव खत्म होते ही फिर से बीएसपी में नंबर दो बना दिया। लेकिन तब तक चंद्रशेखर रावण अपने लिए लम्बी लकीर खींच चुके थे। पश्चिमी यूपी में दलित और मुस्लिम मायावती की ताकत रहे हैं। इनके दम पर ही बीएसपी सालों तक पश्चिमी यूपी में सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी रही। एक समय में मायावती को जाट समाज का भी वोट मिला। बीएसपी कमजोर हुई तो मुसलमानों ने साथ छोड़ दिया। दलित में सिर्फ जाटव उनके साथ बच गए। लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर नगीना से सांसद बन गए। उन्हें मुसलमानों, दलितों और जाट समाज के लोगों ने भी वोट दिया। अब चंद्रशेखर इसी सोशल इंजीनियरिंग के दम पर यूपी के बंटवारे के मुद्दे में जान फूंकने की तैयारी में हैं। उन्हें लगता है कि अगर पश्चिमी यूपी अलग राज्य बना तो फिर उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता बन सकता है। पश्चिमी यूपी में दलित, मुस्लिम और जाट बिरादरी के वोटर मिलकर उनका मिशन पूरा कर सकते हैं।

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