दुख से दूर पहुंचकर गांधी।
सुख से मौन खड़े हो
मरते-खपते इंसानों के
इस भारत में तुम्हीं बड़े हो।
-केदारनाथ अग्रवाल

गत् सप्ताह 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए मुझे केदारजी की उपरोक्त कविता स्मरण हो आई। गांधी को याद करना मेरे लिए केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को नहीं बल्कि एक नैतिक विचारधारा को याद करने सरीखा है जिसने 20वीं सदी की राजनीति, समाज और मानव चेतना की दिशा बदल दी। ‘इस भारत में तुम्हीं बड़े हो’ यह वाक्य कोई भावनात्मक अतिशयोक्ति नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक सत्य की स्वीकृति है। फिर भी विडम्बना यह है कि जितना बड़ा उनका कद है, उतनी ही तीव्रता से आज उनके विचारों, उनके व्यक्तित्व और उनके योगदान को लेकर विवाद, आलोचनाएं और कभी-कभी दुर्भावनापूर्ण अभियानों का स्वर भी सुनाई देता है। एक ओर दुनिया हिंसा, ध्रुवीकरण और असहिष्णुता से जूझ रही है वहीं दूसरी तरफ गांधी का नाम लेने वाला समाज ही उनके मूल संदेश से धीरे-धीरे दूर होता दिखाई देता है।

गांधी को समझने के लिए भारत से पहले दक्षिण अफ्रीका को समझना आवश्यक है क्योंकि वहीं मोहनदास करमचंद गांधी नामक महात्मा बनने की दिशा में अग्रसर हुआ था। 1893 में एक युवा वकील के रूप में गांधी दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे जहां उन्हें नस्लभेद की क्रूर व्यवस्था का सामना करना पड़ा। पीटरमैरिट्सबर्ग स्टेशन पर प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें केवल इसलिए ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया क्योंकि वे गोरे नहीं थे। यह घटना केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं थी बल्कि एक ऐसी चिंगारी थी जिसने अन्याय के विरुद्ध उनके भीतर स्थायी प्रतिरोध की भावना जगाई। वहीं उन्होंने देखा कि भारतीय मजदूरों और व्यापारियों के साथ तीसरे दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार किया जाता है। यहीं से उन्होंने सत्य और आत्मसम्मान पर आधारित संघर्ष का मार्ग चुना। दक्षिण अफ्रीका में ही उन्होंने ‘सत्याग्रह’ की अवधारणा विकसित की, ऐसा प्रतिरोध जो हिंसा का सहारा नहीं लेता लेकिन अन्याय के सामने झुकता भी नहीं। उन्होंने पंजीकरण कानूनों के खिलाफ आंदोलन चलाया, जेल गए, दमन झेला, पर पीछे नहीं हटे। यह वही प्रयोगशाला थी जहां गांधी ने सीखा कि नैतिक बल, यदि संगठित जनशक्ति के साथ जुड़ जाए तो साम्राज्यवादी ताकतों को भी चुनौती दे सकता है। भारत लौटते समय वे केवल बैरिस्टर गांधी नहीं थे, वे एक सिद्धांत लेकर लौटे थे, सत्याग्रह जो आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा बना।

भारत में गांधी का आगमन एक राजनीतिक घटना से अधिक एक नैतिक हस्तक्षेप था। उन्होंने राजनीति को जनसाधारण के जीवन से जोड़ा। चम्पारण में नील किसानों का संघर्ष, खेड़ा में कर माफी की लड़ाई, अहमदाबाद मिल मजदूरों का आंदोलन, इन सबने दिखाया कि गांधी का राष्ट्रवाद केवल सत्ता प्राप्ति का अभियान नहीं बल्कि न्याय की खोज था। उन्होंने स्वतंत्रता को केवल अंग्रेजों की विदाई तक सीमित नहीं रखा बल्कि वे चाहते थे कि भारत आत्मनिर्भर बने, गांव मजबूत हों, समाज से अस्पृश्यता मिटे, स्त्रियों को सम्मान मिले और धर्म राजनीति का हथियार न बने। उनका ‘ग्राम स्वराज’ का विचार आज भी विकेंद्रीकृत लोकतंत्र की सबसे सशक्त अवधारणाओं में गिना जाता है। गांधी का मानना था कि सच्चा स्वराज तब होगा जब सबसे कमजोर व्यक्ति भी यह महसूस करे कि यह देश उसका है।

यही गांधी जब आज के समय में चर्चा में आते हैं तो स्पष्ट रूप से दो ध्रुव दिखाई देते हैं। एक ओर वे लोग हैं जो उन्हें राष्ट्रपिता, नैतिक आदर्श और मानवता के सबसे बड़े प्रवक्ताओं में मानते हैं वहीं दूसरी तरफ एक ऐसी प्रवृत्ति भी उभरती दिखाई देती है जो गांधी को कमतर साबित करने, उनके योगदान को संदिग्ध बनाने या उन्हें ऐतिहासिक भूल के रूप में पेश करने की कोशिश करती है। निश्चित ही आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है और गांधी स्वयं आलोचना से कभी नहीं घबराए पर आज जो कुछ देखने को मिल रहा है वह मुझे वैचारिक बहस से आगे बढ़कर नकारात्मक छवि निर्माण का अभियान प्रतीत होता है।

सोशल मीडिया के दौर में आधी-अधूरी ऐतिहासिक सूचनाओं, संदर्भहीन उदाहरणों और वैचारिक पूर्वाग्रहों के आधार पर गांधी को कठघरे में खड़ा करने का चलन बढ़ा है। यह प्रवृत्ति खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह इतिहास को जटिलता सहित समझने के बजाय उसे राजनीतिक सुविधा के अनुसार सरल और विकृत बना देती है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसी माहौल में महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के प्रति सहानुभूति या महिमामंडन की आवाजें भी समय-समय पर सुनाई देती हैं। 30 जनवरी 1948 को गोडसे ने गांधी की हत्या केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं की थी वरन् उसने उस विचार पर हमला किया था जो धार्मिक सद्भाव, संवाद और
अहिंसा की बात करता था। गांधी उस समय हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अनशन कर रहे थे, वे विभाजन की हिंसा से टूटे समाज को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे। आज जब कोई गोडसे को ‘देशभक्त’ कहने की कोशिश करता है या उसे वैचारिक नायक की तरह प्रस्तुत करता है तो यह समाज के नैतिक संतुलन के लिए गम्भीर खतरे का संकेत है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में असहमति की जगह होती है पर हत्या का महिमामंडन उस सीमा को पार करना है जहां विचार विमर्श समाप्त हो जाता है और नफरत का वैधीकरण शुरू हो जाता है। यह गांधी की विरासत के साथ ही भारतीय संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है।

इस दौर में सार्वजनिक जीवन से गांधी के नाम और प्रतीकों का धीरे-धीरे कम करने का भी षड्यंत्र चल रहा है। यह केवल मूर्तियों या तस्वीरों की बात नहीं बल्कि उन नीतियों और योजनाओं की भी बात है जिनमें गांधी का नाम केवल औपचारिकता नहीं बल्कि एक विचारधारा का संकेत था। उदाहरण के तौर पर महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) जैसी योजनाओं को लम्बे समय तक गांधी के ग्राम स्वराज और श्रम गरिमा के विचार से जोड़ा जाता रहा। जब ऐसी योजनाओं के नाम बदलने या गांधी के संदर्भ को कम महत्व देने की चर्चाएं उठती हैं तो यह बहस केवल नाम की नहीं रह जाती बल्कि इस प्रश्न में बदल जाती है कि क्या हम नीतियों से उन वैचारिक स्रोतों को भी अलग कर देना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें जन्म दिया था। नाम परिवर्तन अपने आप में अपराध नहीं लेकिन यदि उसके पीछे इतिहास से दूरी बनाने या किसी विचारधारा को प्रतीकात्मक रूप से हटाने की मंशा दिखाई दे तो यह स्वाभाविक है कि समाज में चिंता पैदा हो।

गांधी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने भारत को आजादी दिलाने में भूमिका निभाई बल्कि इसलिए भी है कि उन्होंने संघर्ष की भाषा बदल दी। उन्होंने दिखाया कि नैतिकता भी राजनीतिक शक्ति हो सकती है। आज की दुनिया में जहां युद्ध, आतंक, नक्सलवाद और कट्टरता फिर से सिर उठा रहे हैं, गांधी का अहिंसा का सिद्धांत किसी आदर्शवादी कल्पना जैसा नहीं बल्कि व्यावहारिक आवश्यकता जैसा लगता है। जलवायु संकट से लेकर सामाजिक असमानता तक, कई वैश्विक बहसें गांधी के सादगी, संयम और जरूरत बनाम लालच के विचारों की ओर लौटती दिखाई देती हैं। उन्होंने बहुत पहले चेताया था कि पृथ्वी हर व्यक्ति की जरूरत पूरी कर सकती है लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं। यह वाक्य आज के उपभोक्तावादी युग में और भी प्रासंगिक हो उठता है।
याद रखिए गांधी को पूजास्थल पर रखकर भूल जाना भी उनके साथ न्याय नहीं होगा। उन्हें जीवित रखने का अर्थ है उनके विचारों से भी असहज प्रश्न पूछना, उन्हें अपने समय के संदर्भ में समझना और यह देखना कि हम कहां उनके रास्ते से भटक गए। यदि समाज में नफरत बढ़ रही है, यदि राजनीति में संवाद की जगह आरोप ले रहे हैं, यदि असहमति को देशद्रोह और हिंसा को साहस समझा जाने लगे तो यह गांधी की प्रासंगिकता कम होने का नहीं बल्कि उनके विचारों की और अधिक आवश्यकता का संकेत है।

गांधी जैसा दूसरा इसलिए नहीं क्योंकि उन्होंने हमें केवल आजादी नहीं दी बल्कि आजादी का अर्थ समझाया। उन्होंने बताया कि राष्ट्र केवल भूगोल से नहीं बनता बल्कि साझा नैतिकता से बनता है। वे त्रुटिहीन देवता नहीं थे, प्रयोग करने वाले मनुष्य थे जो अपनी गलतियों को स्वीकार कर सीखते थे। यही उन्हें महान बनाता है। उनका मानव होना, उनका निरंतर आत्ममंथन और सत्य की खोज में उनका अडिग रहना। उनकी हत्या करने वाली गोली इतिहास की एक तारीख बन गई लेकिन उनके विचार हर उस क्षण जीवित हो उठते हैं जब कोई अन्याय के सामने अहिंसक ढंग से खड़ा होता है, जब कोई सत्ता से सच बोलता है, जब कोई कमजोर के पक्ष में खड़ा होने का साहस करता है।

बापू को हमारी असली श्रद्धांजलि यही होगी कि हम यह तय करें कि हम किस भारत के साथ खड़े हैं, उस भारत के साथ जो मतभेद के बावजूद साथ जीने की कोशिश करता है या उस भारत के साथ जो असहमति से डरता है और इतिहास को अपने हिसाब से गढ़ना चाहता है। गांधी को गाली देना आसान है, उनकी राह पर चलना कठिन। लेकिन यह भी सच है कि जब भी दुनिया अंधेरे दौर से गुजरती है, गांधी जैसे विचार ही रास्ता दिखाते हैं। अंत में यह याद रखना जरूरी है कि महात्मा गांधी केवल अतीत की एक स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की एक कसौटी भी हैं। हम उन्हें कितना याद करते हैं, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह कि हम उनके बताए सत्य, अहिंसा, करुणा और नैतिक साहस जैसी मूल्यों को अपने सार्वजनिक और निजी जीवन में कितनी जगह देते हैं। यदि समाज में नफरत सामान्य और संवेदना असामान्य होती जा रही है तो गांधी को फिर से पढ़ना, समझना और जीने की कोशिश करना ही शायद सबसे बड़ा राष्ट्रधर्म है। सचमुच, गांधी जैसा दूसरा नहीं था और शायद इसलिए उनकी जरूरत आज पहले से कहीं ज्यादा है। कवि सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में –

तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन;
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समासीन!

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