महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर महाविकास अघाड़ी के भीतर खींचतान खुलकर सामने आ गई है। आदित्य ठाकरे ने स्पष्ट कहा है कि आगामी राज्यसभा चुनाव में एमवीए की ओर से जीतने योग्य एकमात्र सीट शिवसेना (उद्धव गुट) को मिलनी चाहिए। उनका तर्क विधानसभा में संख्या बल पर आधारित है। 288 सदस्यीय सदन में यूबीटी के 20 विधायक, कांग्रेस के 16 और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद गुट) के 10 विधायक हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्यसभा की सात रिक्त सीटों पर चुनाव की अधिसूचना जारी होने वाली है और मतदान मार्च में प्रस्तावित है। इनमें सबसे चर्चित नाम शरद पवार का है जिनका कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है। पहले संकेत मिले थे कि वे फिर से चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन आदित्य ठाकरे के दावे ने एमवीए में असहजता बढ़ा दी है। एनसीपी (एसपी) के लिए यह सीट केवल एक पद नहीं बल्कि दिल्ली की राजनीति में शरद पवार की सक्रिय उपस्थिति और विरासत से जुड़ा है। ऐसे में सवाल है कि क्या शरद पवार का संसदीय सफर थम जाएगा? राज्यसभा चुनाव में एक सीट जीतने के लिए लगभग 37 प्रथम वरीयता वोट आवश्यक होते हैं। महायुति (भाजपा, शिंदे शिवसेना और एनसीपी) के पास स्पष्ट बहुमत है जिससे छह सीटें उनके खाते में जाती दिख रही हैं। एमवीए के पास कुल मिलाकर लगभग 46 विधायक हैं जो एक सीट दिला सकते हैं बशर्ते तीनों दल एकजुट रहें तब। यदि मतों में विभाजन हुआ तो विपक्ष शून्य पर सिमट सकता है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो यह विवाद केवल राज्यसभा तक सीमित नहीं है। विधान परिषद की सीटों और भविष्य की रणनीति को लेकर भी अंदरूनी समीकरण बन रहे हैं। कुछ संकेत यह भी हैं कि यूबीटी राज्यसभा सीट छोड़कर उद्धव ठाकरे की विधान परिषद में पुनर्नियुक्ति सुनिश्चित करने की राह चुन सकती है। वहीं शरद पवार का संसदीय भविष्य भी एमवीए की आंतरिक सहमति पर निर्भर करेगा। यदि गठबंधन एकजुट रहा तो उनकी वापसी सम्भव है अन्यथा यह टकराव विपक्ष की एकता और विश्वसनीयता दोनों पर सवाल खड़े कर सकता है।

फिर साथ चलेंगे ‘साइकिल’ और ‘हाथी’?


उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सपा-बसपा गठबंधन की अटकलें तेज हैं। अखिलेश यादव ने ‘पीडीए प्रेम प्रसार समारोह’ में डॉ. भीमराव अम्बेडकर और डॉ. राम मनोहर लोहिया के साझा संघर्षों का हवाला देकर सामाजिक एकजुटता का संदेश दिया। इसी बीच बसपा के पूर्व नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में शामिल होना राजनीतिक संकेतों को और मजबूत करता है। हालांकि मायावती ने साफ कर दिया है कि बहुजन समाज पार्टी आगामी चुनाव ‘एकला चलो’ की नीति पर लड़ेगी लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती कहती कुछ हैं और करती कुछ। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या साइकिल और हाथी फिर साथ चलेंगे या यह सिर्फ सियासी दबाव की रणनीति है? गौरतलब है कि सपा-बसपा रिश्तों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने साथ आकर भाजपा को चुनौती दी थी लेकिन 1995 के ‘गेस्ट हाउस कांड’ ने रिश्तों में दरार डाल दी। 2019 में ‘बुआ-बबुआ’ गठबंधन बना पर लोकसभा चुनाव के बाद राहें फिर अलग हो गईं। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नए समीकरणों की चर्चा है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि सपा पर अतीत में यादव वर्चस्व के आरोप लगे, जिससे दलित मतदाताओं में दूरी बनी रही। मगर 2024 लोकसभा चुनाव में अयोध्या से दलित नेता अवधेश प्रसाद की जीत ने सपा को नई ऊर्जा दी है। अखिलेश अब ‘पीडीए’ (पिछड़ा दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले के जरिए सामाजिक इंजीनियरिंग को मजबूत करने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ और भाजपा को वैचारिक मुद्दों पर घेरने की रणनीति भी साफ दिखती है। औपचारिक गठबंधन की घोषणा भले दूर हो पर राजनीतिक संकेत बताते हैं कि सपा-बसपा समीकरण पूरी तरह खारिज भी नहीं है। यदि सामाजिक समीकरण साधे गए और पुरानी कड़वाहट कम हुई तो आगामी विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीति का नक्शा पूरी तरह बदल सकता है।

नीतीश की राह पर ममता?


बिहार चुनाव में नीतीश कुमार की जीत से सबक लेते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा सामाजिक-राजनीतिक दांव चला है। बेरोजगार युवाओं को साधने के लिए शुरू की गई ‘युवा साथी’ योजना के तहत 21 से 40 वर्ष के उन युवाओं को हर महीने 1,500 रुपए देने की प्रक्रिया शुरू की है जिन्होंने दसवीं के बाद पढ़ाई नहीं की है। इसके लिए रजिस्ट्रेशन शुरू होते ही राज्य के 294 विधानसभा क्षेत्रों में लगे शिविरों के बाहर सुबह से ही लम्बी कतारें नजर आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या लगातार तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राह पर चल रहीं हैं। गौरतलब है कि ‘युवा साथी’ योजना की घोषणा 6 फरवरी 2026-27 के वोट- ऑन-अकाउंट बजट में की गई थी। इसके लिए 5,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है और सरकार का अनुमान है कि करीब 27.8 लाख युवा इससे लाभान्वित होंगे। पहले भुगतान 15 अगस्त से प्रस्तावित था, जिसे अब राज्य चुनाव से ठीक पहले 1 अप्रैल से लागू करने का निर्णय लिया गया है। विपक्षी भाजपा ने इसे चुनावी लुभावनी योजना बताया है। नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने ऑनलाइन आवेदन न होने पर सवाल उठाए और पुरानी योजनाओं के परिणामों का हिसाब मांगा। भाजपा का आरोप है कि सरकार स्थायी रोजगार के बजाय भत्ते के जरिए युवाओं को प्रभावित करना चाहती है। पार्टी संकेत दे चुकी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित कोलकाता रैली में बेरोजगारी बड़ा मुद्दा बनेगा। वहीं तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि केंद्र द्वारा बकाया राशि रोके जाने के बावजूद राज्य सरकार जनकल्याणकारी योजनाएं चला रही है। वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य के अनुसार उनकी सरकार सीमित संसाधनों में भी योजनाओं को बीच में बंद नहीं करती। राजनीतिक पंडितों और लाभार्थियों का कहना है कि यह राशि अस्थायी सहारा देगी। नौकरी छूटने के बाद संघर्ष कर रहे कई युवाओं के लिए यह भत्ता रोजमर्रा के खर्च में मददगार साबित हो सकता है। कुल मिलाकर, ‘युवा साथी’ योजना ने चुनाव से पहले बंगाल की राजनीति को गरमा दिया है। अब देखना यह होगा कि यह आर्थिक सहारा मतदाताओं के फैसले पर कितना असर डालता है।

असम में आसान नहीं कांग्रेस की राह


असम में विधानसभा चुनाव इसी साल होने हैं लेकिन चुनाव से ठीक पहले विपक्षी एकता चकनाचूर होती दिख रही है। खासकर कांग्रेस के लिए मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। इसका ताजा उदाहरण बीते दिनों गुवाहाटी में रायजोर दल और असम जातीय परिषद की एक सीक्रेट मीटिंग के रूप में दिखा। इस अहम बैठक में वामपंथी दलों के नेता भी मौजूद रहे लेकिन कांग्रेस को पूरी तरह आउट रखा गया। इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस के बिना भी विपक्षी फ्रंट बन सकता है। भूपेन बोरा के इस्तीफे के बाद कांग्रेस पहले ही बैकफुट पर है। अब अखिल गोगोई ने कांग्रेस को सीट शेयरिंग पर स्टैंड क्लियर करने के लिए अल्टीमेटम दिया है और अगर कांग्रेस फेल होती है तो क्षेत्रीय दल अकेले मैदान में उतरेंगे। ऐसे में विपक्ष की यह फूट बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। गौरतलब है कि असम की राजनीति में कांग्रेस के लिए वापसी की डगर आसान नजर नहीं आती। कभी राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकत रही कांग्रेस आज कई मोर्चों पर चुनौतियों से घिरी हुई है। पिछले एक दशक में राज्य की सियासत का केंद्र बदल चुका है और भाजपा ने संगठन, नेतृत्व और रणनीति के स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत की है। असम में भाजपा ने क्षेत्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और विकास जैसे मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की आक्रामक शैली और संगठनात्मक सक्रियता ने पार्टी को जमीनी स्तर तक मजबूती दी है। दिलचस्प यह है कि हिमंत कभी कांग्रेस का ही हिस्सा थे लेकिन उनके भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस का ढांचा राज्य में कमजोर होता गया। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व और संगठन की है। राज्य स्तर पर मजबूत और सर्वमान्य चेहरा उभर नहीं पाया है। दूसरी ओर एआईयूडीएफ जैसे दलों के साथ सम्भावित गठबंधन को लेकर भी पार्टी दुविधा में रहती है। अल्पसंख्यक वोट बैंक पर निर्भरता की छवि कांग्रेस को व्यापक जनसमर्थन जुटाने में बाधा बनती है जबकि असम की राजनीति अब अधिक ध्रुवीकृत हो चुकी है। कांग्रेस यदि असम में वापसी चाहती है तो उसे स्थानीय मुद्दों बाढ़, बेरोजगारी, चाय बागान श्रमिकों की स्थिति और बुनियादी ढांचे पर ठोस और विश्वसनीय विकल्प पेश करना होगा। साथ ही युवा नेतृत्व को आगे लाकर संगठन में नई जान फूंकनी होगी। बहरहाल असम की सियासत में कांग्रेस की राह कांटों भरी है। मजबूत प्रतिद्वंद्वी, बदली हुई राजनीतिक धारा और आंतरिक कमजोरियां पार्टी के सामने बड़ी बाधा हैं। आने वाले चुनाव तय करेंगे कि कांग्रेस इन चुनौतियों को अवसर में बदल पाती है या नहीं।

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