केंद्र सरकार ने देश के 61 कैंटोनमेंट बोर्ड को समाप्त कर उनके नागरिक क्षेत्रों को नगर निकायों में विलय करने का फैसला लिया है। सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल मोहन भंडारी के अनुसार यह औपनिवेशिक व्यवस्था से आधुनिक प्रशासन की ओर बढ़ने का कदम है लेकिन इसे सुरक्षा, पर्यावरण और स्थानीय जरूरतों के संतुलन के साथ लागू करना बेहद जरूरी होगा
देशभर में 61 कैंटोनमेंट बोर्ड को समाप्त कर उनके नागरिक क्षेत्रों को नगर निकायों में विलय करने के फैसले को लेकर बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में नीति-स्तर पर निर्णय लेते हुए चरणबद्ध तरीके से इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना शुरू किया है जिसके तहत कई क्षेत्रों में सर्वे, सीमांकन और प्रशासनिक पुनर्गठन का काम जारी है। रानीखेत में निवास कर रहे सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल मोहन भंडारी के अनुसार यह निर्णय ‘समय की जरूरत के अनुरूप एक सोचा-समझा कदम’ है।
उन्होंने कहा कि कैंटोनमेंट व्यवस्था मूलतः औपनिवेशिक दौर की देन है, जिसे ब्रिटिश शासन ने अपनी सैन्य आवश्यकताओं और प्रशासनिक नियंत्रण के लिए विकसित किया था। बदलते भारत में जहां लोकतांत्रिक ढांचा मजबूत हुआ है और शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है, वहां एक ही क्षेत्र में सैन्य और नागरिक प्रशासन की दोहरी व्यवस्था व्यवहारिक रूप से कई समस्याएं पैदा करती है। उनके अनुसार, निर्णय लेने में देरी, विकास कार्यों में बाधा और नागरिकों के सीमित अधिकार इस व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियां रही हैं।
जनरल मोहन भंडारी का मानना है कि सेना को अपने मूल कार्य, राष्ट्रीय सुरक्षा पर केंद्रित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में सेना पर नागरिक प्रशासन की जिम्मेदारियां भी होती हैं जिससे संसाधनों और प्राथमिकताओं का बंटवारा होता है। बकौल जनरल भंडारी ‘यदि नागरिक क्षेत्रों को पूरी तरह शहरी स्थानीय निकायों के अधीन कर दिया जाता है तो सेना अपने मूल कार्यों पर अधिक प्रभावी ढंग से ध्यान केंद्रित कर सकेगी’। जनरल भंडारी का मानना है कि इस परिवर्तन को केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, शहरी विकास और पर्यावरणीय संतुलन, तीनों के संदर्भ में संतुलित ढंग से लागू करना होगा। उन्होंने कहा कि सैन्य क्षेत्रों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसमें किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। इसलिए जरूरी है कि सैन्य क्षेत्रों को पूरी तरह अलग और सुरक्षित ‘मिलिट्री स्टेशन’ के रूप में विकसित किया जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि इस बदलाव के बाद नगर निकायों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां आएंगी। ‘जीएसटी लागू होने के बाद नगर निकायों के कई पारम्परिक राजस्व स्रोत सीमित हो गए हैं। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।’
पर्यावरणीय दृष्टि से चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि कैंटोनमेंट क्षेत्रों की पहचान उनकी स्वच्छता, अनुशासन और नियंत्रित विकास रही है। यदि इस व्यवस्था को समाप्त करने के बाद इन मानकों को बनाए रखने के लिए स्पष्ट नीति नहीं बनाई गई तो अव्यवस्थित शहरीकरण और पर्यावरणीय समस्याएं बढ़ सकती हैं। विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों, जैसे रानीखेत, अल्मोड़ा में अनियोजित विकास भविष्य में भूस्खलन, जल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है।
औपनिवेशिक विरासत से आधुनिक बदलाव तक
भारत में कैंटोनमेंट बोर्ड की शुरुआत 18वीं और 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। इनका उद्देश्य सैन्य ठिकानों को सुरक्षित रखना और सैनिकों को नागरिक आबादी से अलग व्यवस्थित करना था। 1857 के विद्रोह के बाद इस व्यवस्था को और अधिक मजबूत किया गया ताकि प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखा जा सके।
आजादी के बाद इस प्रणाली को समाप्त नहीं किया गया बल्कि इसे कानूनी रूप देकर जारी रखा गया। पहले कैंटोनमेंट्स एक्ट 1924 लागू था, जिसे बाद में संशोधित कर कैंटोनमेंट्स एक्ट 2006 लागू किया गया। वर्तमान में देश के 61 कैंटोनमेंट बोर्ड रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करते हैं। देश के विभिन्न राज्यों में इनकी मौजूदगी है, उत्तर प्रदेश में मेरठ, लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, बरेली, शाहजहांपुर और आगरा, उत्तराखण्ड में अल्मोड़ा, रानीखेत, लैंसडाउन, देहरादून और चकराता। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में ये कैंटोनमेंट फैले हुए हैं। इसके अलावा बबीना, झांसी, गोरखपुर, पठानकोट, पटियाला, त्रिवेंद्रम, तेजपुर, मुम्बई और अन्य कई प्रमुख स्थानों में भी कैंट क्षेत्र हैं।
आजादी के बाद इस प्रणाली को समाप्त नहीं किया गया बल्कि इसे कानूनी रूप देकर जारी रखा गया। पहले कैंटोनमेंट्स एक्ट 1924 लागू था, जिसे बाद में संशोधित कर कैंटोनमेंट्स एक्ट 2006 लागू किया गया। वर्तमान में देश के 61 कैंटोनमेंट बोर्ड रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करते हैं। देश के विभिन्न राज्यों में इनकी मौजूदगी है, उत्तर प्रदेश में मेरठ, लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, बरेली, शाहजहांपुर और आगरा, उत्तराखण्ड में अल्मोड़ा, रानीखेत, लैंसडाउन, देहरादून और चकराता। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में ये कैंटोनमेंट फैले हुए हैं। इसके अलावा बबीना, झांसी, गोरखपुर, पठानकोट, पटियाला, त्रिवेंद्रम, तेजपुर, मुम्बई और अन्य कई प्रमुख स्थानों में भी कैंट क्षेत्र हैं।
कैंटोनमेंट बोर्ड की खासियत इसकी मिश्रित प्रशासनिक व्यवस्था है, जिसमें सेना और नागरिक प्रशासन दोनों शामिल होते हैं। यह व्यवस्था नगर निगम की तरह काम करती है लेकिन इसमें सैन्य नियंत्रण भी होता है। ये बोर्ड पानी, सफाई, सड़क, स्ट्रीट लाइट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाएं प्रदान करते हैं, साथ ही भवन निर्माण की अनुमति और कर वसूली का काम भी करते हैं।
क्यों लिया गया यह फैसला?
केंद्र सरकार द्वारा कैंटोनमेंट बोर्ड को समाप्त करने के फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण दोहरी प्रशासनिक व्यवस्था को खत्म करना बताया जा रहा है। लम्बे समय से यह देखा गया कि सेना और नागरिक प्रशासन के बीच समन्वय की कमी के कारण निर्णय लेने में देरी होती थी।
इसके अलावा, निर्माण और भूमि उपयोग से जुड़े सख्त नियमों के कारण शहरी विकास भी बाधित हो रहा था। सरकार का मानना है कि यदि इन क्षेत्रों को नगर निकायों में शामिल किया जाता है तो इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, निवेश और स्थानीय शासन को मजबूती मिलेगी। साथ ही नागरिकों को अधिक अधिकार मिलेंगे और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा।
न्यायालयों में भी पहुंचा मामला
इस फैसले को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में उच्च न्यायालयों में याचिकाएं दायर की गई हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बिना स्थानीय जनता की सहमति के इस प्रकार का प्रशासनिक परिवर्तन उनके अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। कुछ याचिकाओं में भूमि स्वामित्व और सैन्य सुरक्षा से जुड़े सवाल भी उठाए गए हैं। न्यायालयों ने केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय से जवाब मांगा है और प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने पर जोर दिया है। हालांकि अभी तक इस नीति को पूरी तरह रोकने का कोई अंतिम आदेश सामने नहीं आया है लेकिन न्यायिक निगरानी के कारण यह प्रक्रिया संवेदनशील तरीके से आगे बढ़ रही है।
जमीनी हकीकत : रानीखेत का उदाहरण
उत्तराखण्ड का रानीखेत कैंटोनमेंट इस पूरे मुद्दे का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। कुमाऊं रेजीमेंट के मुख्यालय के रूप में इसकी रणनीतिक अहमियत है, वहीं प्राकृतिक सुंदरता के कारण यह पर्यटन का प्रमुख केंद्र भी है लेकिन जमीनी स्तर पर यहां के लोगों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। भवन निर्माण की अनुमति, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार के अवसरों की कमी और प्रशासनिक जटिलताएं यहां की प्रमुख चुनौतियां हैं। कूड़ा निस्तारण की समस्या यहां सबसे गम्भीर मुद्दों में से एक बन चुकी है। स्थानीय होटल और होम-स्टे संचालकों के अनुसार, क्षेत्र में डम्पिंग जोन तक पहुंच न होने के कारण उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
स्थानीय व्यवसायियों का कहना है कि नगरपालिका और कैंटोनमेंट के बीच अनुमति की प्रक्रिया में मामला फंस जाता है, जिससे महीनों तक कोई समाधान नहीं निकल पाता। इसका सीधा असर उनके व्यवसाय और आय पर पड़ रहा है, यहां तक कि सरकारी सब्सिडी भी अटक रही है।
सुरक्षा बनाम विकास
इस पूरे मुद्दे में सबसे बड़ी बहस सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन को लेकर है। एक ओर शहरों के विस्तार और आधुनिक बुनियादी ढांचे की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ सैन्य क्षेत्रों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भूमि स्वामित्व और नियंत्रण का मुद्दा भी जटिल है क्योंकि अधिकांश कैंटोनमेंट भूमि रक्षा मंत्रालय के अधीन आती है। ऐसे में भविष्य में इस पर विवाद की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
आगे का रास्ता
फिलहाल कई क्षेत्रों में सर्वे और सीमांकन की प्रक्रिया जारी है। कुछ स्थानों पर नगर निकायों में विलय की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है जबकि कई जगहों पर विरोध और असमंजस बना हुआ है। कुल मिलाकर, 61 कैंटोनमेंट बोर्ड को समाप्त करने का यह फैसला केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि यह औपनिवेशिक ढांचे से आधुनिक, लोकतांत्रिक और उत्तरदायी शासन की ओर एक बड़ा परिवर्तन है। अब यह देखना अहम होगा कि इस बदलाव को किस तरह लागू किया जाता है, क्या यह विकास और बेहतर शासन का मार्ग प्रशस्त करेगा या नई चुनौतियों को जन्म देगा।