Uttarakhand

पहाड़ों पर गूंज रही सुमित की धुन

 

  •     संजय चौहान

 

सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ निवासी 20 वर्षीय बांसुरी वादक सुमित रतूड़ी की मनमोहक धुन इन दिनांे सोशल मीडिया साइट्स पर लोगों को बेहद भा रही है। सुमित पहाड़ की लोक संस्कृति को चरितार्थ करती हुई मनमोहक धुन से लोगों को आनंदित और रोमांचित कर रहें हैं

संगीत की धुन से हमेशा प्रेम प्रकट होता है। बांसुरी की धुन पौराणिक काल से प्रेम का प्रतीक रही है। बांसुरी सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग बजाते हैं। बांसुरी की चर्चा होते ही भगवान कृष्ण की मनमोहक छवि मन में आती है। कृष्ण जब भी तस्वीरों में, मन के मंदिर में दिखते हैं उनके दोनों हाथों में बांसुरी होती है। कृष्ण बांसुरी से प्रेम की तान छेड़ते हैं और गोपियों को रिझाते हैं। बांसुरी की धुन से प्रेम मार्ग बताते हैं। धुन से प्रेम करना सिखाते हैं। बांसुरी की धुन से मानव जाति का कल्याण करते हैं। कहते हैं कि बांसुरी को कई नाम मिले हैं। उनको लोग वंशी, बेन, वेणु, बीन और बंसी भी कहते हैं। भगवान कृष्ण को बांसुरी की वजह से वंशिका, बंशीधर और मुरलीधर जैसे नामों से पुकारा जाता है। इसकी चर्चा भागवत गीता में भी है।

सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ निवासी बांसुरी वादक सुमित रतूड़ी की बांसुरी की मनमोहक धुन इन दिनांे सोशल साइट्स पर लोगों को बेहद भा रही है। 20 वर्षीय बांसुरी वादक सुमित रतूड़ी बांसुरी से पहाड़ की लोक संस्कृति को चरितार्थ करती हुई मनमोहक धुन से लोगों को आनंदित और रोमांचित कर रहें हैं। सुमित बांसुरी से प्रख्यात कुमाऊंनी लोकगायक गोपाल बाबू गोस्वामी, पप्पू कार्की से लेकर गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी, प्रीतम भरतवाण, माया उपाध्याय सहित विभिन्न गायकों के लोकप्रिय गीतों की धुन को अपनी आवाज देते हैं, युवा पीढ़ी सोशल नेटवर्किंग साइट इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स पर सुमित की बांसुरी की मनमोहक धुन की दिवानी है। उनके हर एक बांसुरी वीडियोज पर हजारों व्यूज, लाईक और शेयर मिलते हैं।
वाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, मोबाइल, मॉल और गैजेट के इस दौर में सुमित जैसे युवा का परम्परागत वाद्य यंत्र बांसुरी की ओर झुकाव वाकई काबिलेतारीफ है। लोकसंगीत में अपना भविष्य देखने वाले महज 20 वर्षीय सुमित बीए प्रथम वर्ष के छात्र हैं। उनके पिताजी प्रकाश चंद्र रतूड़ी बद्रीनाथ मंदिर समिति में कार्यरत हैं जबकि उनकी माता सरला देवी गृहणी हैं। बेहद सरल, मिलनसार, सौम्य और मृदुभाषी व्यक्तित्व के धनी सुमित बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। संगीत से लगाव उन्हें बचपन से ही था, सुमित को अपने पिताजी से लोकसंगीत की समझ मिली। जबकि उनकी प्रेरणा उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध बांसुरी वादक महेश चंद्र हैं। जिनकी वजह से ही उनका बांसुरी वादन के प्रति झुकाव हुआ है।

सुमित ने ‘कैलै बाजे मुरूली’, ‘छाना बिलौरी’, ‘कन क्वे हिटण मेन’, ‘दिदो ये भू बुग्याल माटी पाणी बिक जालू’, ‘उतराणी कौथिग लागिरै सरयूं का किनारा’, ‘तेरू मछोई गाड बगिगे’, ‘घुघुती घुरेण लगी मेरा मैत की’, ‘सैरा गौं की माया बांद’, ‘सुलपा की साज’, ‘ह्यूंदा का दिन फिर बोडी ऐगिने’, ‘सुण ले दगडिया बात सुणी जा’, ‘सरूली मेरू जिया लगिगे’, ‘क्रीम पाउडर घिसने किले नी’, ‘द्वी गति बैशाख सुरूमा…’ सहित अन्य गीतांे को अपनी नौसुरिया मुरूली की मनमोहक धुन से आवाज दी है।

जोशीमठ की थाती ने उन्हें पहाड़ों से लगाव और जुड़ाव की सीख दी। बकौल सुमित मेरी कोशिश है कि बांसुरी से पहाड़ की आवाज बन सकूं। पहाड़ की थाती माटी, जल, जंगल, जीवन से लेकर पहाड़ के लोक संगीत को बांसुरी के जरिए नई पहचान दिला सकूं, अभी तो महज शुरुआत भर है मंजिल कोसों दूर है।

उम्मीद की जानी चाहिए की आने वाले समय में ये युवा बांसुरी की मनमोहक धुन के जरिए हिमालय की आवाज बनकर वैश्विक पटल पर पहाड़ की पहचान बनाएगा।

You may also like

MERA DDDD DDD DD