Uttarakhand

‘उत्तराखण्ड में अगली सरकार हमारी बनेगी’

 

समकालीन भारतीय राजनीति की सशक्त महिला नेताओं में में शुमार कुमारी शैलजा की पहचान  सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में निरंतर आवाज उठाने वाले राजनेता की है। दलित समुदाय से आने वाली शैलजा का राजनीतिक जीवन संघर्ष, अनुभव और संतुलित नेतृत्व का उदाहरण रहा है। हरियाणा की राजनीति से अपना सफर शुरू करने वाली कुमारी शैलजा कई बार लोकसभा सांसद रह चुकी हैं और केंद्र सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी भी सम्भाल चुकी हैं। उन्होंने शहरी विकास, आवास और गरीबी उन्मूलन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करते हुए प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया। वर्तमान में उत्तराखण्ड की प्रभारी महासचिव के रूप में वे न केवल संगठन को पुनर्गठित करने में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं बल्कि राज्य की जमीनी राजनीतिक परिस्थितियों को समझते हुए पार्टी को मजबूती देने की रणनीति पर भी काम कर रही हैं। कुमारी शैलजा की पहचान एक स्पष्टवादी, सहज और जमीनी नेता के रूप में है जो आम कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद बनाए रखने में विश्वास रखती हैं। सामाजिक समावेश, महिला सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें कांग्रेस की प्रमुख आवाजों में शामिल करती है। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की अत्यंत करीबी मानी जाने वाली कुमारी शैलजा से हमारे राजनीतिक सम्पादक संजय स्वार की विशेष बातचीत

उत्तराखंड में कांग्रेस लम्बे समय से सत्ता से बाहर है, आपके नेतृत्व में संगठन को पुनर्जीवित करने की क्या ठोस रणनीति है?

सवाल मेरी लीडरशिप का नहीं है। नेतृत्व राज्य के लोग हैं, हमारी पार्टी है, हमारी लीडरशिप है, हमारे कांग्रेसजन हैं, हमारे आम कार्यकर्ता हैं। आपने देखा है कि पहले भी भाजपा ने किस तरह हथकंडे अपनाए लेकिन अब आम लोग भी तैयार हैं, कांग्रेसजन भी तैयार हैं और भाजपा के लोग जो भी रणनीति अपनाएंगे उसका सामना करते हुए हम राज्य में जीत हासिल करेंगे।

क्या आपको लगता है कि उत्तराखण्ड में कांग्रेस का संघर्ष केवल संगठनात्मक कमजोरी है या नेतृत्व स्तर पर भी कहीं कमी रही है?

जब हम कोई चुनाव हारते हैं तो उस पर मंथन करते हैं, उसकी समीक्षा भी होती है, आंतरिक तौर पर हम देखते हैं कि क्या कमी रही, उसको दुरुस्त किया जाता है। हम संगठन को पूरी मजबूती के साथ आगे ले जा रहे हैं। आने वाले दिनों में हमारा संगठन और मजबूत होगा और 2027 के विधानसभा चुनाव में पूरी तरह से जमीनी स्तर पर हम अपने संगठन को मजबूत करते हुए यह लड़ाई लड़ेंगे।

भाजपा के मुकाबले कांग्रेस का नैरेटिव उत्तराखण्ड में क्यों कमजोर पड़ता दिख रहा है?
नहीं, कांग्रेस का नैरेटिव कहीं पर भी कमजोर नहीं है क्योंकि कांग्रेस जमीन पर काम करती है। नैरेटिव का मतलब आज के दिन कुछ अलग है क्योंकि भाजपा में सत्ता है और सत्ता में रहते इनका तंत्र मीडिया को बहुत हद तक ‘इंफ्लुएंस’ करता है। सोशल मीडिया को भी ये इंफ्लुएंस करते हैं लेकिन जब आप जमीन पर देखते हैं, आम लोगों को देखते हैं, उनका रिस्पांस सोशल मीडिया, जमीन पर, सड़कों पर तब लोगों का रुझान कांग्रेस की ओर स्पष्ट दिखाई देता है। अब आमजन भी कहने लगा है कि अगली सरकार कांग्रेस की बनेगी और कांग्रेसजन भी अब इस लड़ाई को एकजुट हो लड़ रहा है और इसे जीतेगा भी।
उत्तराखण्ड कांग्रेस में गुटबाजी लगातार चर्चा का विषय रही है कि क्या यह केवल मीडिया का नैरेटिव है या वास्तव में संगठन को नुकसान पहुंचा रही है?

देखिए सबके अपने-अपने ‘एम्बीशन’ होते हैं। यह हर संगठन का हिस्सा होता है और हर पार्टी में होता है। आप भाजपा में देखें या किसी अन्य दल में देखें, वहां भी आप ऐसा ही पाएंगे। हर राजनीतिक दल में कुछ लेवल तक ये चीज चलती हैं। ऐसी कोई बात नहीं है जिससे ज्यादा नुकसान हो। अगर थोड़ा बहुत हमें लगता है तो उसको दुरुस्त किया जाता है लेकिन सब लोगों ने मन बनाया हुआ है कि अगली सरकार हम बनाएंगे। मिलजुल कर बैठकर सब लोग इस रणनीति का हिस्सा होते हुए आगे कार्य करते रहेंगे।

क्या हाईकमान इस गुटबाजी को खत्म करने के लिए कोई सख्त कदम उठाने जा रहा है?

ऐसी स्थिति पर हर राजनीतिक दल परिस्थिति के अनुसार काम करता है।

क्या आपको लगता है कि स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय की कमी ही कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती है?

ऐसा मुझे कुछ विशेष नजर आया नहीं कि कोऑर्डिनेशन की कोई कमी है। हम अभी जैसे-जैसे पार्टी के प्रोग्राम बनाते रहेंगे सभी लोग उसमें मिलजुल कर कार्य करते रहेंगे।

हाल ही में कांग्रेस में कई नए नेताओं को शामिल कराया गया है। क्या यह ‘विनिंग एबिलिटी’ का प्रयोग है या वैचारिक समझौता? ऐसा भी सुनने में आया है कि हरीश रावत कुछ अन्य नेताओं को शामिल करना चाहते थे उन्हें शामिल करने से इनकार कर दिया गया जिससे रावत नाराज हैं?

नहीं, इस तरह की कोई बात नहीं है। बात यह है कि अभी बहुत से लोग हैं जो पार्टी ज्वाइन करना चाह रहे हैं। हम एकदम नहीं बल्कि बारी-बारी से इस पर विचार करके सबके साथ आपस में राय मशविरा करके फैसले लेते रहेंगे। अभी तो बहुत लम्बा रास्ता है चुनाव तक। बहुत से लोगों को ज्वाइन करना है। हमारे साथ बातचीत चल रही है और समय-समय पर हम लोगों को ज्वाइन कराते रहेंगे। चुनाव से पहले तक ये सिलसिला चलता रहेगा।
क्या पुराने कार्यकर्ताओं में इससे असंतोष नहीं बढ़ रहा?

देखिए यह भावना थोड़ी-बहुत स्वाभाविक तौर पर होती है लेकिन यह हमारा काम है, पार्टी का काम है कि सबको ‘कम्फर्टेबल’ करें और जो पुराने लोग हैं उनकी मेहनत को और उनकी पहचान बरकरार रखी जाए, उनका मानसम्मान बरकरार रखा जाए।

क्या कांग्रेस अब ‘इलेक्टेबल फेस’ पर ज्यादा भरोसा कर रही है बजाय जमीनी कार्यकर्ताओं के?

देखिए ऐसा नहीं है। हम दोनों चीजों को देखते हुए काम कर रहे हैं, जमीन से जुड़ा होना चाहिए और जिसका लोगों से जुड़ाव हो, पार्टी के प्रति भी उसका जुड़ाव हो।

हरीश रावत की नाराजगी समय-समय पर सामने आती रही है कि क्या यह व्यक्तिगत असंतोष है या संगठनात्मक उपेक्षा?

हरीश रावत हमारे वरिष्ठ नेता हैं। संगठन में तो उन्हें हमेशा जगह मिलती रहती है, मिली भी है। उनको पूरी इज्जत हमेशा मिलती रही है। वह ‘कांग्रेस वर्किंग कमेटी’ (सीडब्लूसी) जो कांग्रेस की सबसे ऊंची समिति है, उस समिति के मेम्बर हैं। पहले से ही पूरी स्टेट में उनका बहुत योगदान रहा है। ऐसी कोई बात नहीं है। सब को साथ लेकर चलेंगे।

क्या हाईकमान और आपके स्तर पर हरीश रावत को मनाने की कोई ठोस पहल हुई है?

देखिए रूठना-मनाना जैसी कोई चीज है नहीं। सब पार्टी का हिस्सा हैं।

क्या आपको लगता है कि यदि हरीश रावत को संतुष्ट नहीं किया गया तो 2027 में कांग्रेस को नुकसान हो सकता है?

जब इस तरह की कोई स्थिति है ही नहीं तो इस प्रकार की चर्चा गैर जरूरी है।

2027 विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस का क्या रोडमैप है?

हम सभी लोग आला लीडरशिप, स्टेट लीडरशिप और नीचे जमीन तक हमारे कार्यकर्ताओं को कार्य दिया गया है। कार्य होते रहेंगे। हमारे इस अभियान में सभी ने जुड़कर, मिलकर कर पहले से भी काम किया है और जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, जैसा आपने कहा एक रणनीति के तहत काम करेंगे। असली बात तो यह है कि भाजपा ने जो गलतियां की हैं जो भाजपा की नीतियां हैं, उनकी सरकार की जो गलत नीतियां हैं, वो जनता के सामने आ चुकी हैं, इनको जनता समझ चुकी है। लोग भी अब इनसे ऊब चुके हैं। उनके हर तरह के वादे न केवल खोखले साबित हुए बल्कि सरकार को जो डिलीवरी करनी चाहिए थी, शासन प्रशासन जिस प्रकार चलना चाहिए था, वो ये नहीं कर पा रहे हैं। आप क्राइम को ही देख लीजिए, कितना क्राइम बढ़ गया है। उत्तराखण्ड के बड़े-बड़े शहरों से लेकर छोटी से छोटी जगह तक ऐसा लगता है कि इस स्टेट को एक ऐसा संरक्षण स्थल बना दिया है कि देशभर के जो भी क्रिमिनल लोग हैं, वो यहां आएं और अपना काम धंधा चलाएं। सवाल है कि ऐसी स्थिति आखिर बनी ही क्यों? महिलाओं की आप बात करें तो महिलाओं की सुरक्षा के मामले में  देश भर में उत्तराखण्ड का नाम बदनाम क्यों हुआ? महिलाओं पर अत्याचार के मामले में अंकिता भंडारी वाला प्रकरण देख लीजिए। मैं हमेशा कहती हूं कि यह केवल अंकिता भंडारी की बात नहीं है, पूरे उत्तराखण्ड में हो रहा है, दलितों के साथ हो रहा है, बच्चियों के साथ हो रहा है, उसका जवाब सरकार को देना होगा कि यहां पर ‘लाॅ एंड आर्डर’ की इतनी जर्जर स्थिति क्यों है? फिर बड़ा माफिया जिसका हर जगह बोलबाला चल रहा है। आप सुबह वाॅक पर निडर होकर जा सकते हैं क्या? आम नागरिक सुबह-सुबह जब घर से निकलता है तो सोचता है कि मैं सुरक्षित वापस आ जाऊंगा? इसका उदाहरण आपने देख लिया एक रिटायर ब्रिगेडियर के साथ जो हुआ। तो मैं मानती हूं कि ये सरकार टोटल नाकाम रही है।

क्या कांग्रेस उत्तराखण्ड में किसी नए चेहरे को आगे लाने की तैयारी कर रही है?

फिलहाल तो सामूहिक लीडरशिप तरीके पर हम काम कर रहे हैं।

क्या उत्तराखण्ड में गठबंधन की राजनीति पर भी विचार किया जा रहा है?

हम अपनी पार्टी को पूरी तरह से सक्षम रखते हुए पूरी मजबूती से चुनाव लड़ेंगे। आज के दिन हमारे सामने ऐसा कोई प्रश्न नहीं है।

कांग्रेस अब भी ‘व्यक्ति आधारित राजनीति’ में उलझी है जबकि भाजपा ‘संगठन आधारित राजनीति’ से आगे बढ़ रही है?

देखिए हमारा संगठन भी मजबूत है और हमारे यहां नेतृत्व भी मजबूत है। तो दोनों के समन्वय के साथ आगे बढ़ रहे हैं। नेतृत्व भी चाहिए और संगठन भी चाहिए। इंस्पिरेशन तो चाहिए ना लोगों, प्रेरणा तो चाहिए ना। दोनों चीजों के समन्वय से ही काम चलता है।

क्या आप मानती हैं कि कांग्रेस को अब कठोर फैसले लेने होंगे, चाहे वह वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ ही क्यों न हों?

जब कभी ऐसी स्थिति आती है तो पार्टी उस पर विचार करती है। इसमें सब मिल बैठकर विचार करते हैं लेकिन आज के दिन हमको ऐसी स्थिति दिख नहीं रही है।

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