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क्या गुल खिलाएगा ओवैसी-कबीर गठजोड़

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय उबाल पर है। एक तरफ ममता बनर्जी अपनी सत्ता को बरकरार रखने में जुटी हैं तो दूसरी ओर भाजपा पूरी ताकत के साथ चुनौती दे रही है। इसी बीच असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर का सम्भावित गठजोड़ राज्य की सियासत में नई हलचल पैदा कर रहा है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों से आमजन तक सवाल उठा रहे हैं कि यह गठबंधन गेमचेंजर बनेगा या महज ‘वोट कटवा’ साबित होगा? क्या गठबंधन बंगाल की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव ला पाएगा? ओवैसी-कबीर गठजोड़ क्या गुल खिलाएगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से बहुस्तरीय और बहु-आयामी रही है जहां जाति, धर्म, क्षेत्रीय पहचान और वैचारिक संघर्ष एक साथ चलते हैं। अगर यह गठजोड़ मजबूत रूप में सामने आता है तो इसका सीधा असर तृणमूल कांग्रेस पर पड़ सकता है। बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक पर अब तक तृणमूल का मजबूत नियंत्रण रहा है लेकिन ओवैसी-हुमायूं कबीर गठजोड़ उस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर सकता है खासकर सीमांचल और दक्षिण बंगाल के कुछ जिलों में। हालांकि इस गठजोड़ के सामने कई चुनौतियां भी हैं। बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलता है। ऐसे में तीसरे मोर्चे के लिए जगह बनना आसान नहीं है। 2021 के चुनाव में आईएसएफ और वाम- कांग्रेस गठबंधन अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल गठबंधन बनाना ही पर्याप्त नहीं बल्कि मजबूत संगठन और जमीनी पकड़ भी जरूरी है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ओवैसी की राजनीति को अक्सर ध्रुवीकरण से जोड़कर देखा जाता है। भाजपा इस नैरेटिव का फायदा उठाकर हिंदू वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करने की कोशिश कर सकती है। ऐसे में यह गठजोड़ अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को लाभ पहुंचा सकता है, जैसा कि कई राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं। दूसरी ओर इस गठजोड़ को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। अगर ओवैसी और हुमायूं कबीर स्थानीय मुद्दों जैसे बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और अल्पसंख्यकों के अधिकार को प्रभावी ढंग से उठाते हैं तो वे युवाओं और हाशिए पर खड़े वर्गोें को अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं। इससे बंगाल की राजनीति में एक नया विकल्प उभर सकता है। गौरतलब है कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। यही वजह है कि ओवैसी-कबीर गठजोड़ ने सीधे इसी वर्ग पर फोकस किया है। अगर अल्पसंख्यक वोटों में थोड़ा भी बंटवारा हुआ तो नुकसान तृणमूल कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है जिसकी अब तक इस वर्ग पर मजबूत पकड़ रही है।

सूत्रों के मुताबिक ओवैसी की पार्टी 50 से कम सीटों पर चुनाव लड़कर टारगेटेड स्ट्राइक करना चाहती है। कुछ वैसा ही जैसा उसने बिहार में किया था। इस रणनीति का मकसद कम संसाधनों में अधिक प्रभाव पैदा करना है। ओवैसी का कोलकाता दौरा भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। रैलियों, जनसभाओं और ग्राउंड कनेक्ट के जरिए पार्टी अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश करेगी। इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ने और गठजोड़ को जमीनी फायदा मिलने की उम्मीद है। मालदा और मुर्शिदाबाद इस पूरे समीकरण के केंद्र में हैं। मुर्शिदाबाद की 22 में से 20 सीटें पिछली बार तृणमूल कांग्रेस के खाते में गई थीं जबकि मालदा में भी पार्टी का अच्छा प्रदर्शन रहा था। इन जिलों में अल्पसंख्यक मतदाताओं की बड़ी संख्या होने के कारण अगर वोटों में जरा भी बदलाव आता है तो नतीजे चैंकाने वाले हो सकते हैं।

हुमायूं कबीर का प्रभाव खासकर मुर्शिदाबाद के कुछ इलाकों में माना जाता है। पहले तृणमूल कांग्रेस में रहे कबीर अब अलग राह पर हैं और अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। भले ही उनका संगठन अभी कमजोर हो लेकिन स्थानीय पकड़ इस गठजोड़ को ताकत दे सकती है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस इस गठजोड़ को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रही। पार्टी का दावा है कि चुनाव ममता बनर्जी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा और जनता का भरोसा उनके साथ है। कुल मिलाकर बंगाल का चुनाव इस बार सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं बल्कि वोटों के बंटवारे का भी खेल बनता दिख रहा है। ओवैसी-कबीर गठजोड़ भले ही सीधे सत्ता तक न पहुंचे लेकिन अगर यह अल्पसंख्यक वोटों में सेंध लगाने में सफल रहा तो तृणमूल के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं और मुकाबला बेहद कड़ा हो सकता है। फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि यह गठजोड़ ‘गेमचेंजर’ बनेगा या सिर्फ चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने तक ही सीमित रह जाएगा।

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