सत्ता के शिखर से फिसलती पकड़, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर असहजता, भीतर से उठते सवाल और अब मधु किश्वर जैसे संघ करीबी माने जाने वाले चेहरे के गम्भीर आरोप, क्या यह सिर्फ आलोचना का दौर है या वास्तव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के अवसानकाल की शुरुआत हो चुकी? क्या इन संकेतों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी किसी नए विकल्प की तलाश में है? क्या संघ अब मोदी से मुक्ति का रास्ता टटोल रहा है? खासकर तब जब आरोप लगाने वाली आवाज खुद उसी वैचारिक परिधि से आती रही है?
यह प्रकृति का अटल नियम है, सूर्य उदय होता है तो अस्त भी होता है। यही सत्य मनुष्य के जीवन पर भी लागू होता है। जो जितना ऊंचा उठता है, वह उतना ही यह मान बैठता है कि अब उसका पतन असम्भव है लेकिन इतिहास बार-बार इस भ्रम को तोड़ता रहा है। सत्ता, प्रभाव और जनसमर्थन का शिखर जितना आकर्षक होता है, उसका पतन उतना ही कठोर और निर्णायक होता है।
इतिहास के पन्ने इस सत्य के गवाह हैं। जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने नारीवाद को विश्व की सबसे शक्तिशाली विचारधारा मान लिया था। लम्बे समय तक उन्होंने जर्मनी की जनता को एक उन्माद में बांधे रखा, विरोध को कुचल दिया और अपने व्यक्तित्व को एक अजेय शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया। लेकिन जब पतन का समय आया तो वह इतना तीव्र और अंतिम था कि उनके पास पुनरुत्थान का कोई अवसर ही नहीं बचा। अंततः उन्हें आत्महत्या करनी पड़ी। यह केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं था बल्कि उस मिथक का भी अंत था कि सत्ता स्थायी होती है।
भारतीय राजनीति में भी समय-समय पर ऐसे उतार-चढ़ाव देखने को मिलते रहे हैं। बहुत अधिक समय नहीं बीता है जब सोशल मीडिया, विशेषकर तथाकथित ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के माध्यम से कांग्रेस नेता राहुल गांधी की छवि को व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया। मीम्स, कटाक्ष और आधे-अधूरे बयानों के जरिए एक ऐसा नैरेटिव गढ़ा गया कि वे अयोग्य हैं। ‘पप्पू’ जैसे शब्दों को इस तरह स्थापित किया गया कि वह एक राजनीतिक ब्रांड बन गया।
विडम्बना यह है कि कई ऐसे कथन जो वास्तव में उन्होंने कभी कहे ही नहीं, उन्हें उनके नाम से जोड़ दिया गया, जैसे ‘मशीन में आलू डालो और सोना निकलेगा।’ इस तरह की रणनीति ने जनमानस पर गहरा प्रभाव डाला। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर कथन को लगभग निर्विवाद सत्य के रूप में स्वीकार किया गया। चाहे वह ‘चाय वाला’ नैरेटिव हो, ‘गटर की गैस से चाय बनाना’ जैसी बात हो या ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भों में असंगत दावे, जनता का एक बड़ा वर्ग उन्हें बिना सवाल किए स्वीकार करता रहा।
अब लेकिन परिदृश्य बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ समय में सोशल मीडिया पर एक नई प्रवृत्ति उभर कर आई है। वही प्लेटफार्म, जिसने कभी एकतरफा नैरेटिव को स्थापित किया था, अब सवाल पूछने लगा है। प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों, बयानों और निर्णयों की बारीकी से जांच हो रही है। पहले जो बातें अनदेखी रह जाती थीं, अब वे वायरल हो जाती हैं। आलोचना का दायरा भी बढ़ा है और उसका स्वर भी अधिक तीखा हुआ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बदलते माहौल का प्रभाव केवल विपक्षी राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि आम नागरिकों के बीच भी एक प्रकार की संशयात्मक दृष्टि विकसित हो रही है। जो जनता पहले बिना प्रश्न किए स्वीकार करती थी, अब वह तुलना कर रही है, तथ्यों को जांच रही है और वैकल्पिक दृष्टिकोण सुन रही है। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह स्थिति इसलिए चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है क्योंकि सोशल मीडिया के इस नए नैरेटिव का प्रभावी प्रतिकार अब उतना सहज नहीं रह गया है। पहले जहां एक संगठित डिजिटल तंत्र के माध्यम से संदेशों को नियंत्रित किया जाता था वहीं अब विकेंद्रीकृत और स्वतःस्फूर्त
आलोचना सामने आ रही है। यह केवल विपक्ष का अभियान नहीं बल्कि एक व्यापक डिजिटल प्रतिक्रिया का रूप लेती दिख रही है।
आलोचना सामने आ रही है। यह केवल विपक्ष का अभियान नहीं बल्कि एक व्यापक डिजिटल प्रतिक्रिया का रूप लेती दिख रही है।
प्रधानमंत्री के इस ‘अवसानकाल’ की आहट स्पष्ट सुनाई देने लगी है। यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि यह पूर्ण पतन का संकेत है लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि वह अजेयता का मिथक, जो कभी प्रधानमंत्री मोदी के इर्द-गिर्द निर्मित हुआ था, अब दरकने लगा है। इसी संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य भी ध्यान देने योग्य है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, जिन्हें कभी प्रधानमंत्री मोदी का घनिष्ठ मित्र बताया जाता था, के हाल के बयानों में कई बार भारत को असहज स्थिति में रखते नजर आए हैं। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर यह दावा किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को कम कराने में उनकी निर्णायक भूमिका रही, जिससे भारत की कूटनीतिक स्थिति को लेकर सवाल खड़े हुए। इसके साथ ही व्यापार और टैरिफ के मुद्दों पर भी उन्होंने भारत को निशाने पर लिया और पाकिस्तान को लेकर अपेक्षाकृत नरम रुख दिखाया। इस तरह के बयान प्रधानमंत्री की उस अंतरराष्ट्रीय छवि पर प्रभाव डालते हैं जिसे वर्षों में निर्मित किया गया था।
घरेलू स्तर पर भी कुछ घटनाएं इस बदलते परिदृश्य की ओर संकेत करती हैं। हाल ही में हितेंद्र जोशी और प्रसार भारती से जुड़े घटनाक्रम, विशेषकर नवनीत सहगल का अध्यक्ष पद से इस्तीफा, ने यह संदेश दिया कि संस्थागत स्तर पर भी स्थिरता के बजाय असहजता का माहौल बन रहा है। ये घटनाएं भले ही अलग-अलग कारणों से हुई हों लेकिन व्यापक राजनीतिक संदर्भ में इन्हें सत्ता की गिरती पकड़ के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। इसी बदलते परिदृश्य के बीच मधु किश्वर के गम्भीर आरोप भारतीय बौद्धिक जगत में मधु किश्वर का नाम एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में सामने आता है जिसने समय-समय पर अपने वैचारिक रुख में बड़े बदलाव दिखाए हैं। वह लम्बे समय तक ‘सेंटर फाॅर दि स्टडी आॅफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ (सीएसडीएस) से जुड़ी रहीं जो देश का एक प्रतिष्ठित सामाजिक विज्ञान संस्थान है और ‘मनुषी’ पत्रिका के जरिए महिला अधिकार, समाज और संस्कृति के मुद्दों पर गहरा हस्तक्षेप करती रही हैं। शुरुआती दौर में उन्हें वाम-उदार विचारधारा की प्रमुख आवाज माना जाता था लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने उस धारा की आलोचना शुरू की और भारतीय परम्परा, धर्म और राष्ट्रवादी विमर्श के करीब आती गईं। इसी वैचारिक परिवर्तन के दौरान वह नरेंद्र मोदी के समर्थन में खुलकर सामने आईं और उनकी चर्चित किताब ‘मोदी, मुस्लिम्स एंड मीडिया’ प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने 2002 के बाद के मीडिया नैरेटिव को चुनौती देते हुए मोदी का बचाव किया और यह तर्क दिया कि उन्हें एकतरफा तरीके से प्रस्तुत किया गया लेकिन वर्तमान विवाद ने इस पूरी पृष्ठभूमि को उलट दिया है।
अपने हालिया सोशल मीडिया पोस्ट में मधु किश्वर ने जिस तरह के आरोप लगाए हैं वे बेहद गम्भीर, बहुस्तरीय और विवादास्पद हैं। वह अपने बयान की शुरुआत इस बात से करती हैं कि उन्होंने 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद उनसे ‘सुरक्षित दूरी’ बनाई रखी (अर्थात जान-बूझकर सम्पर्क सीमित रखा)। यहां तक कि अपनी ही लिखी किताब देने के लिए भी उनसे मिलने नहीं गईं (यानी व्यक्तिगत स्तर पर भी दूरी बनाए रखी)। इसके बाद वह दावा करती हैं कि सत्ता के शुरुआती दौर में ही ‘संघी नेटवर्क’ के भीतर ऐसी चर्चाएं चल रही थीं कि कुछ महिलाओं को कथित निजी नजदीकी के आधार पर सांसद और मंत्री बनाया गया यानी सैद्धांतिक पदों में नियुक्तियों को व्यक्तिगत सम्बंधों से जोड़ने का आरोप।
इसी क्रम में वह हरदीप सिंह पुरी और एस. जयशंकर जैसे नामों का जिक्र करते हुए संकेत देती हैं कि उनके बारे में भी ‘विशेष सेवाओं’ की चर्चाएं थीं। आगे वह लिखती हैं कि मोदी के निजी जीवन को लेकर ‘एय्याशी’ की कहानियां भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका तक में चर्चा का विषय थीं। इसका सीधा अर्थ यह कि प्रधानमंत्री के निजी चरित्र को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अफवाहों की चर्चाएं होने का दावा मधु किश्वर खुलकर कर रही हैं। इसी संदर्भ में वह स्मृति ईरानी की शिक्षा मंत्री के रूप में नियुक्ति का उल्लेख करती हैं और कहती हैं कि इससे इन चर्चाओं को और बल मिला। पोस्ट में वह ‘मानसी सोनी’ से जुड़े कथित मामले का जिक्र करती हैं और दावा करती हैं कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, साथ ही यह भी कहती हैं कि मोदी के एक करीबी व्यक्ति ने उन्हें उस मामले से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराए। इसके बाद वह यह भी लिखती हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान और उससे पहले के समय को लेकर भी उनके पास ‘घिनौनी और आपत्तिजनक कहानियां’ साझा की गईं यानी लम्बे समय से निजी जीवन से जुड़े आरोपों का संकेत। वह यह भी कहती हैं कि इन सब बातों का उन पर इतना गहरा मानसिक असर पड़ा कि उन्होंने उन कार्यक्रमों से दूरी बना ली जहां मोदी के आने की सम्भावना होती थी और वह अवसाद में चली गईं।
सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब वह एक ‘वरिष्ठ संघ विचारक’ का हवाला देते हुए लिखती हैं कि जब उन्होंने ये बातें साझा कीं तो जवाब मिला कि ‘व्यक्तिगत जीवन से हमें क्या लेना-देना’ अर्थात इन आरोपों को गम्भीरता से नहीं लिया गया, यह उनका दावा है। इसके बाद वह सीधे भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय पर हमला करती हैं और उन्हें बेहद अपमानजनक शब्दों में सम्बोधित करते हुए उनकी नियुक्ति को शीर्ष नेतृत्व की प्रवृत्तियों का उदाहरण बताती हैं। पोस्ट का सबसे विस्फोटक हिस्सा वह है जहां मधु किश्वर यह दावा करती हैं कि मोदी ‘पहले दिन से ही ब्लैकमेल के शिकार हैं’ और उनकी सत्ता के फैसलों पर बाहरी दबाव रहता है। वह यह भी कहती हैं कि ‘56 इंच की छवि’ इसी कमजोरी को छिपाने का एक आवरण है। वह मोदी को ‘सीआईए प्लांट’ और ‘देश को नुकसान पहुंचाने के लिए सत्ता में लाया गया व्यक्ति’ तक कहती हैं और अंत में यह दावा करती हैं कि वह जल्द ही इन सब आरोपों के समर्थन में सबूत प्रस्तुत करेंगी।
इस पूरे प्रकरण का निष्पक्ष विश्लेषण यह बताता है कि ये आरोप अत्यंत गम्भीर हैं और यदि इनमें सच्चाई है तो इसके दूरगामी राजनीतिक और संस्थागत परिणाम हो सकते हैं लेकिन समान रूप से महत्वपूर्ण यह तथ्य भी है कि अभी तक इन आरोपों के समर्थन में कोई सार्वजनिक, सत्यापित या कानूनी रूप से स्थापित प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए वस्तुनिष्ठ रूप से इन्हें फिलहाल आरोप ही माना जाएगा, न कि स्थापित तथ्य। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोप लगाने वाली वही व्यक्ति हैं जिन्होंने कभी मोदी के समर्थन में वैचारिक लड़ाई लड़ी थी। इस संदर्भ में सुब्रमणयन स्वामी का उदाहरण भी सामने आता है, जिन्होंने समय-समय पर मोदी पर गम्भीर आरोप लगाए हैं हालांकि वे भी व्यापक रूप से सिद्ध नहीं हो सके हैं।
अंततः यह पूरा विवाद भारतीय राजनीति के उस जटिल चरित्र को उजागर करता है जहां व्यक्तियों, विचारधाराओं और सत्ता के समीकरण लगातार बदलते रहते हैं। मधु किश्वर का यह रूपांतरण, सीएसडीएस से जुड़ी एक अकादमिक और कभी मोदी समर्थक रही आवाज से लेकर आज उनके सबसे तीखे आलोचकों में शामिल होने तक, अपने आप में एक बड़ी राजनीतिक कहानी है लेकिन इसके अंतिम निष्कर्ष का निर्धारण केवल आरोपों से नहीं बल्कि प्रमाण और जांच से ही होगा और यहीं आकर सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न खड़ा होता है, क्या मधु किश्वर ने जो ‘बम’ फोड़ा है, उसके धागे कहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से तो नहीं जुड़ते? क्या संघ के भीतर भी अब यह भावना आकार ले रही है कि नरेंद्र मोदी का दौर अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है? क्या यह सम्भव है कि संघ अब ‘मोदी से मुक्ति’ की दिशा में सोच रहा हो, खासकर तब, जब आरोप लगाने वाली आवाज खुद उसी वैचारिक परिधि के बेहद करीब मानी जाती रही है? यह सवाल अभी खुला है लेकिन राजनीति में अक्सर संकेत ही आने वाले समय की सबसे बड़ी खबर होते हैं।