अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की रिपोर्ट भारत के बदलते रोजगार संकट की एक गम्भीर तस्वीर पेश करती है जहां 2004 में बेरोजगार युवाओं में ग्रेजुएट्स की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत थी जो 2023 तक बढ़कर 67 फीसदी हो गई है। यह आंकड़ा सिर्फ बेरोजगारी का नहीं बल्कि शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती खाई का संकेत है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो भारत की सबसे शिक्षित ‘जेन जेड’ पीढ़ी अवसरों के अभाव में निराशा, पलायन और असंतोष की ओर बढ़ सकती है जिससे भविष्य में सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता की स्थिति पैदा होने का खतरा बढ़ रहा है
भारत लम्बे समय से ‘युवा देश’ कहलाता रहा है। यहां की आबादी का बड़ा हिस्सा कामकाजी उम्र में है और इसे देश की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है लेकिन हाल के वर्षों में सामने आए आंकड़े इस ताकत को एक गम्भीर संकट में बदलते दिख रहे हैं। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की ताजा रिपोर्ट इस संकट को बेहद स्पष्ट रूप से सामने रखती है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में बेरोजगारी का चेहरा बदल चुका है, अब यह समस्या अशिक्षितों की नहीं बल्कि पढ़े-लिखे युवाओं की होती जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2004 में बेरोजगार युवाओं में ग्रेजुएट्स की हिस्सेदारी लगभग 32 प्रतिशत थी जो 2023 तक बढ़कर 67 प्रतिशत हो गई है। इस आंकड़े को अक्सर गलत तरीके से यह कहकर प्रस्तुत किया जाता है कि 67 प्रतिशत ग्रेजुएट्स बेरोजगार हैं जबकि सच्चाई यह है कि जो युवा बेरोजगार हैं उनमें से दो तिहाई अब ग्रेजुएट हैं। यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था और शिक्षा प्रणाली में गहरे असंतुलन का संकेत है।
इस बदलाव को समझने के लिए हमें पिछले दो दशकों के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों पर नजर डालनी होगी। 2000 के दशक के बाद भारत में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ। निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। लाखों युवा हर साल ग्रेजुएट होकर नौकरी की तलाश में निकलने लगे। लेकिन इसके समानांतर रोजगार के अवसरों में वह वृद्धि नहीं हुई, जिसकी जरूरत थी। परिणामस्वरूप, बाजार में डिग्रीधारी युवाओं की संख्या बढ़ती गई जबकि नौकरियां सीमित रहीं। यह स्थिति ‘डिग्री इन्फ्लेशन’ को जन्म देती है जहां डिग्री का मूल्य धीरे-धीरे कम होने लगता है। पहले जो काम 12वीं पास व्यक्ति कर सकता था, अब उसी काम के लिए ग्रेजुएट की मांग होने लगी है लेकिन जब हर व्यक्ति ग्रेजुएट हो जाता है तो डिग्री का अंतर खत्म हो जाता है और प्रतिस्पर्धा असाधारण रूप से बढ़ जाती है। इसका सीधा असर बेरोजगारी के रूप में सामने आता है।
एक और महत्वपूर्ण कारण है, स्किल और नौकरी के बीच का मिसमैच। भारत की शिक्षा प्रणाली आज भी बड़े पैमाने पर सैद्धांतिक ज्ञान पर आधारित है जबकि उद्योगों को व्यावहारिक कौशल वाले कर्मचारी चाहिए। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट या सामान्य ग्रेजुएशन करने के बावजूद बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए ‘तैयार’ नहीं माने जाते। कई सर्वेक्षणों में यह सामने आया है कि कम्पनियां बड़ी संख्या में आवेदकों को इसलिए नहीं चुन पातीं क्योंकि उनमें आवश्यक स्किल्स की कमी होती है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि युवा वर्ग में बेरोजगारी दर खुद भी बहुत अधिक है। 15 से 25 वर्ष के आयु वर्ग में बेरोजगारी 40 प्रतिशत तक पहुंच जाती है जबकि 25 से 29 वर्ष के युवाओं में भी यह लगभग 20 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। खासतौर पर 25 वर्ष से कम उम्र के ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी दर 40 प्रतिशत से अधिक देखी गई है। इसका मतलब यह है कि उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी युवाओं को नौकरी मिलने की कोई गारंटी नहीं है।
सम्भावित खतरा : ‘नेपाल जैसा परिदृश्य’ और ‘जेन जेड’ का असंतोष
यहीं पर यह समस्या केवल आर्थिक नहीं रह जाती बल्कि एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक संकट का रूप लेने लगती है। यदि इतने बड़े पैमाने पर शिक्षित युवा बेरोजगार रहते हैं तो भारत में भी वैसी ही स्थिति बन सकती है जैसी पिछले वर्षों में नेपाल में देखने को मिली है जहां बड़ी संख्या में युवा बेरोजगारी, अवसरों की कमी और व्यवस्था से निराश होकर या तो बड़े पैमाने पर विदेश पलायन करते हैं या फिर सिस्टम के प्रति गहरा असंतोष विकसित कर लेते हैं।
भारत में ‘जेन जेड’ यानी 18 से 30 वर्ष की आबादी आज सबसे ज्यादा शिक्षित पीढ़ी है लेकिन यदि यही पीढ़ी रोजगार से वंचित रहती है तो इसके कई गम्भीर परिणाम हो सकते हैं। पहला, ‘ब्रेन ड्रेन’ तेज हो सकता है जहां योग्य युवा बेहतर अवसरों की तलाश में विदेशों का रुख करेंगे। दूसरा, देश के भीतर ही ‘फ्रस्ट्रेटेड यंग क्लास’ का निर्माण होगा जो न तो आर्थिक रूप से स्थिर होगा और न ही सामाजिक रूप से संतुष्ट।
इतिहास बताता है कि जब किसी देश में शिक्षित युवाओं की बड़ी आबादी बेरोजगार रहती है तो वह सामाजिक अस्थिरता, विरोध आंदोलनों और राजनीतिक उथल-पुथल की जमीन तैयार करती है। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती भीड़, पेपर लीक के खिलाफ आंदोलनों और रोजगार को लेकर लगातार हो रहे विरोध इसी दिशा के संकेत हैं।
महिलाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है। शिक्षित महिलाओं में बेरोजगारी दर पुरुषों की तुलना में अधिक है। कई महिलाएं पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश ही नहीं करतीं या फिर सामाजिक कारणों से काम छोड़ देती हैं। इससे न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रगति प्रभावित होती है बल्कि देश की कुल आर्थिक क्षमता भी घटती है।
औपचारिक रोजगार (फाॅर्मल जाॅब्स) की कमी भी इस संकट का एक बड़ा कारण है। भारत में अधिकांश रोजगार अनौपचारिक क्षेत्र में हैं जहां न तो स्थायित्व होता है और न ही सामाजिक सुरक्षा। पढ़े-लिखे युवा इन नौकरियों को अपनाने से हिचकते हैं लेकिन उनके पास विकल्प भी सीमित होते हैं। परिणामस्वरूप वे लम्बे समय तक बेरोजगार रहते हैं या फिर अपनी योग्यता से कम स्तर के काम करने को मजबूर हो जाते हैं।
कोविड-19 महामारी ने इस समस्या को और गम्भीर बना दिया।
कोविड-19 महामारी ने इस समस्या को और गम्भीर बना दिया।
लाॅकडाउन और आर्थिक मंदी के कारण बड़ी संख्या में नौकरियां खत्म हुईं और नई नौकरियों का सृजन धीमा पड़ गया। इसका सबसे ज्यादा असर युवाओं पर पड़ा जो पहली बार नौकरी की तलाश में थे।
इस पूरी स्थिति का सामाजिक असर भी गहरा है। युवाओं में निराशा और हताशा बढ़ रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं में अभूतपूर्व भीड़ इसका उदाहरण है जहां लाखों उम्मीदवार कुछ हजार पदों के लिए आवेदन करते हैं। कई युवा वर्षों तक तैयारी करते रहते हैं लेकिन सफलता नहीं मिलती। इससे मानसिक तनाव और असंतोष बढ़ता है।
यह समस्या केवल आर्थिक नहीं बल्कि नीतिगत भी है। सरकारों ने शिक्षा के विस्तार पर तो जोर दिया लेकिन रोजगार सृजन और स्किल डेवलपमेंट को उतनी प्राथमिकता नहीं दी। ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’ जैसी योजनाएं शुरू तो हुईं लेकिन उनका प्रभाव अभी तक व्यापक स्तर पर दिखाई नहीं देता।
यह समस्या केवल आर्थिक नहीं बल्कि नीतिगत भी है। सरकारों ने शिक्षा के विस्तार पर तो जोर दिया लेकिन रोजगार सृजन और स्किल डेवलपमेंट को उतनी प्राथमिकता नहीं दी। ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’ जैसी योजनाएं शुरू तो हुईं लेकिन उनका प्रभाव अभी तक व्यापक स्तर पर दिखाई नहीं देता।
आगे का रास्ता क्या हो सकता है? सबसे पहले, शिक्षा प्रणाली में सुधार की जरूरत है ताकि यह बाजार की जरूरतों के अनुरूप हो। व्यावसायिक शिक्षा (वोकेशनल ट्रेनिंग) और स्किल आधारित कोर्स को बढ़ावा देना होगा। दूसरे, उद्योगों और शिक्षा संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना जरूरी है। तीसरे, रोजगार सृजन को नीति के केंद्र में रखना होगा, खासकर मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र में।
इसके अलावा, स्टार्टअप और उद्यमिता को बढ़ावा देना भी एक महत्वपूर्ण समाधान हो सकता है। यदि युवा खुद रोजगार पैदा करने वाले बनें तो समस्या का दायरा कम किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और एक अनुकूल माहौल जरूरी है।
अंततः अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की यह रिपोर्ट एक चेतावनी है, यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो भारत की सबसे बड़ी ताकत यानी उसकी युवा आबादी, एक बड़े संकट में बदल सकती है। आज जरूरत है कि शिक्षा और रोजगार के बीच की इस खाई को पाटा जाए ताकि डिग्री केवल कागज का टुकड़ा न रह जाए बल्कि एक सम्मानजनक जीवन का आधार बन सके।