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अमेरिकी आयोग के निशाने पर संघ और रॉ

अमेरिकी सरकार के एक आयोग ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और खुफिया एजेंसी ‘राॅ’ पर गम्भीर आरोप लगा इन दोनों संगठनों को अमेरिका में प्रतिबंधित करने की सिफारिश करने के साथ-साथ भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर गम्भीर चिंता जताई है

धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (यूएससीआईआरएफ)  की 2026 की वार्षिक रिपोर्ट जारी होते ही भारत में तात्कालिक राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) पर धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघनों में कथित भूमिका का आरोप लगाते हुए उन पर प्रतिबंध की सिफारिश की है। साथ ही आयोग ने लगातार सातवें वर्ष भारत को ‘विशेष चिंता वाला देश’ घोषित करने की मांग भी दोहराई है। हालांकि अब तक अमेरिकी विदेश विभाग ने ऐसी सिफारिशों पर कोई औपचारिक कार्रवाई नहीं की है।

रिपोर्ट के सामने आते ही देश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस ने आयोग की सिफारिशों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार और आरएसएस पर निशाना साधा है। पार्टी ने कहा है कि यह रिपोर्ट उसकी उन चिंताओं की पुष्टि करती है जिनमें संघ की विचारधारा और उसकी भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। कांग्रेस ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए यह भी कहा कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद सरदार पटेल द्वारा आरएसएस पर लगाए गए प्रतिबंध से भी यह स्पष्ट होता है कि संगठन की विचारधारा को लेकर पहले भी गम्भीर आशंकाएं जताई गई थीं।
दूसरी ओर भारत सरकार ने इन आरोपों को तुरंत और सख्ती से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि आयोग की यह रिपोर्ट मनगढ़ंत, पक्षपातपूर्ण और चुनिंदा तथ्यों पर आधारित है। उन्होंने आरोप लगाया कि यूएससीआईआरएफ कई वर्षों से भारत की विकृत तस्वीर पेश करता रहा है और निष्पक्ष तथ्यों के बजाय संदिग्ध स्रोतों तथा वैचारिक नैरेटिव पर भरोसा करता है। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग को भारत को निशाना बनाने के बजाय अमेरिका में हिंदू मंदिरों पर हो रहे हमलों, भारतीय समुदाय के खिलाफ बढ़ती असहिष्णुता और डराने-धमकाने की घटनाओं पर ध्यान देना चाहिए।
आयोग ने अपनी सिफारिशों में अमेरिकी सरकार से यह भी कहा है कि भारत के साथ सुरक्षा सहयोग और द्विपक्षीय व्यापारिक सम्बंधों को धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति में सुधार से जोड़ा जाए। इसके अलावा अमेरिकी कांग्रेस से हथियार निर्यात नियंत्रण कानून के तहत भारत को हथियारों की बिक्री रोकने की भी सिफारिश की गई है। आयोग का कहना है कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न और डराने-धमकाने की घटनाएं जारी हैं, जिन पर सख्त रुख अपनाने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट में वर्ष 2025 के दौरान भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति के ‘लगातार खराब’ होने का दावा किया गया है। इसमें नागरिकता संशोधन कानून, धर्मांतरण विरोधी कानूनों और गौ-हत्या से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इनका प्रभाव विशेष रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर पड़ा है। इसके अलावा हालिया वक्फ विधेयक का भी जिक्र किया गया है, जिसमें वक्फ सम्पत्तियों के प्रबंधन से जुड़े प्रावधानों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था और कुछ राज्यों में विरोध-प्रदर्शन भी हुए थे।
आयोग ने उत्तराखण्ड में पारित अल्पसंख्यक शिक्षा से जुड़े कानून का उल्लेख करते हुए कहा है कि इससे मदरसा व्यवस्था और अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही रिपोर्ट में कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले का भी जिक्र किया गया है, जिसमें हिंदू पर्यटकों को निशाना बनाया गया था। आयोग के अनुसार, इस हमले के बाद की परिस्थितियों का उपयोग कथित रूप से कुछ समुदायों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए किया गया।
रिपोर्ट में असम से बांग्ला-भाषी मुसलमानों के निर्वासन, विदेशी नागरिक कानून के तहत नियमों में बदलाव तथा कुछ मामलों में लम्बी न्यायिक हिरासत का भी उल्लेख किया गया है। उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे मामलों को उदाहरण के तौर पर पेश करते हुए आयोग ने न्यायिक प्रक्रिया की अवधि पर सवाल उठाए हैं। इसके अलावा ब्रिटिश नागरिक जगतार सिंह जोहल और कुछ शिक्षाविदों से जुड़े मामलों का भी जिक्र किया गया है।
आयोग ने यह भी टिप्पणी की है कि उच्चस्तरीय भारत-अमेरिका कूटनीतिक बैठकों के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा सार्वजनिक चर्चा में प्रमुखता से नहीं उठाया गया।
कुल मिलाकर, यूएससीआईआरएफ की यह ताजा रिपोर्ट भारत और अमेरिकी संस्थाओं के बीच धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर लम्बे समय से चले आ रहे मतभेदों को एक बार फिर सामने ले आई है। जहां एक ओर आयोग अपनी सिफारिशों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है वहीं भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज करती है और उन्हें देश की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला मानती है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और कूटनीतिक प्रतिक्रिया और तेज होने की सम्भावना है।

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