पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही देश में बड़े चुनावी दौर की शुरुआत हो गई है। लगभग सत्रह करोड़ मतदाता इन राज्यों में नई सरकार चुनेंगे और नतीजे राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। सबसे अधिक नजरें पश्चिम बंगाल के चुनाव पर टिकी हुई हैं। 294 सीटों वाली विधानसभा में इस बार फिर से सत्ता की कड़ी लड़ाई होने की सम्भावना है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस सत्ता बनाए रखने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। तमिलनाडु में भी इस बार का चुनाव काफी दिलचस्प होने की सम्भावना है। 234 सीटों वाली विधानसभा में मुख्य मुकाबला द्रविड़ मुनेत्र कषगम और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम के बीच माना जा रहा है। 140 सीटों वाली विधानसभा में केरल की राजनीति हमेशा से वैचारिक टकराव के लिए जानी जाती रही है। यहां मुख्य मुकाबला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के बीच होता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में है और उसने पिछले चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत लगा रहा है। असम में भी चुनाव को लेकर काफी उत्साह दिखाई दे रहा है। 126 सीटों वाली विधानसभा में वर्तमान में भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकार है। इस बार कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी का चुनाव भले ही आकार में छोटा हो लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यहां 30 सीटों वाली विधानसभा के लिए चुनाव होगा
भारत में लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव एक बार फिर शुरू होने जा रहा है। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की विधानसभाओं के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। इस घोषणा के साथ ही इन पांचों राज्यों में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं और सत्ता की लड़ाई में उतरने के लिए सभी दल अपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं। अगले कुछ सप्ताह तक इन राज्यों की राजनीति पूरी तरह चुनावी रंग में रंगी रहेगी और देश की नजरें भी इन्हीं चुनावों पर टिकी रहेंगी क्योंकि इन राज्यों के नतीजे केवल स्थानीय सरकारों का भविष्य तय नहीं करेंगे बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
इन पांच राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल लगभग एक ही समय में समाप्त हो रहा है, इसलिए चुनाव आयोग ने संवैधानिक व्यवस्था के तहत नई सरकारों के गठन के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू कर दी है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम बड़े राज्य हैं जबकि पुडुचेरी एक छोटा केंद्र शासित प्रदेश है लेकिन राजनीतिक महत्व के लिहाज से इन सभी चुनावों को काफी अहम माना जा रहा है। इन राज्यों में कुल मिलाकर आठ सौ से अधिक विधानसभा सीटों पर चुनाव होंगे और लगभग सत्रह करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।
चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही सभी राज्यों में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। इसके चलते सरकारें अब कोई नई योजना या घोषणा नहीं कर सकेंगी और प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह चुनाव आयोग के नियंत्रण में आ गई है। राजनीतिक दलों ने भी चुनाव प्रचार की तैयारियां तेज कर दी हैं। रैलियों, सभाओं और जनसंपर्क अभियानों का दौर जल्द ही शुरू होने वाला है। चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष और शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की जाएगी और बड़ी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती भी की जाएगी।
चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही सभी राज्यों में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। इसके चलते सरकारें अब कोई नई योजना या घोषणा नहीं कर सकेंगी और प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह चुनाव आयोग के नियंत्रण में आ गई है। राजनीतिक दलों ने भी चुनाव प्रचार की तैयारियां तेज कर दी हैं। रैलियों, सभाओं और जनसंपर्क अभियानों का दौर जल्द ही शुरू होने वाला है। चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष और शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की जाएगी और बड़ी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती भी की जाएगी।
पांच राज्यों के चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं क्योंकि इनमें देश के अलग-अलग हिस्सों की राजनीतिक तस्वीर झलकती है। पश्चिम बंगाल पूर्वी भारत की राजनीति का केंद्र है, तमिलनाडु दक्षिण भारत की द्रविड़ राजनीति का गढ़ माना जाता है, केरल अपनी वैचारिक और जागरूक राजनीति के लिए जाना जाता है, असम पूरे उत्तर-पूर्व की राजनीति को प्रभावित करता है और पुडुचेरी दक्षिण भारतीय राजनीति के समीकरणों में अहम भूमिका निभाता है। इन राज्यों की सामाजिक संरचना, राजनीतिक इतिहास और चुनावी मुद्दे एक-दूसरे से अलग हैं, इसलिए चुनावी परिणाम भी अलग-अलग संदेश दे सकते हैं।
सबसे अधिक नजरें पश्चिम बंगाल के चुनाव पर टिकी हुई हैं। 294 सीटों वाली विधानसभा में इस बार फिर से सत्ता की कड़ी लड़ाई होने की सम्भावना है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस सत्ता बनाए रखने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने भारी जीत हासिल की थी और भाजपा को सत्ता से दूर रखा था। हालांकि उसके बाद से भाजपा ने राज्य में अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश की है और वह इस बार बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है। वाम दल और कांग्रेस भी बंगाल में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के प्रयास में हैं। भ्रष्टाचार के आरोप, केंद्र-राज्य सम्बंध, रोजगार, विकास और स्थानीय पहचान जैसे मुद्दे बंगाल की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
तमिलनाडु में भी इस बार का चुनाव काफी दिलचस्प होने की सम्भावना है। 234 सीटों वाली विधानसभा में मुख्य मुकाबला द्रविड़ मुनेत्र कषगम और आॅल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम के बीच माना जा रहा है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके सरकार पिछले पांच वर्षों से सत्ता में है और वह अपने कामकाज के आधार पर जनता से समर्थन मांग रही है। दूसरी ओर एआईएडीएमके सत्ता में वापसी के लिए जोरदार तैयारी कर रही है। तमिलनाडु की राजनीति लम्बे समय से द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही है और इस बार भी सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय पहचान, भाषा और केंद्र-राज्य सम्बंध जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में रह सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी भी राज्य में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश कर रही है हालांकि तमिलनाडु में उसकी स्थिति अभी सीमित मानी जाती है।
140 सीटों वाली विधानसभा में केरल की राजनीति हमेशा से वैचारिक टकराव के लिए जानी जाती रही है। यहां मुख्य मुकाबला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के बीच होता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार सत्ता में है और उसने पिछले चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। केरल में परम्परागत रूप से सत्ता परिवर्तन की प्रवृत्ति रही है लेकिन पिछले चुनाव में वाम मोर्चा ने इस परम्परा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत लगा रहा है। केरल में चुनावी मुद्दा सामाजिक कल्याण योजनाएं, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास प्रमुख हो सकते हैं। इसके अलावा धार्मिक और सामुदायिक संतुलन यहां की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
असम में भी चुनाव को लेकर काफी उत्साह दिखाई दे रहा है। 126 सीटों वाली विधानसभा में वर्तमान में भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकार है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने पिछले चुनाव में बहुमत हासिल किया था और उत्तर-पूर्व में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की थी। इस बार कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। असम की राजनीति में नागरिकता, प्रवासन, आर्थिक विकास, बाढ़ और पर्यावरण जैसे मुद्दे प्रमुख रहते हैं। राज्य की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां भी चुनावी मुद्दों को प्रभावित करती हैं। असम का चुनाव पूरे उत्तर-पूर्व के राजनीतिक समीकरणों पर असर डाल सकता है, इसलिए इसे राष्ट्रीय स्तर पर भी काफी महत्व दिया जा रहा है।
केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी का चुनाव भले ही आकार में छोटा हो, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यहां 30 सीटों वाली विधानसभा के लिए चुनाव होगा। पुडुचेरी की राजनीति अक्सर गठबंधन की राजनीति के लिए जानी जाती है और यहां सरकारें कई बार छोटे-छोटे राजनीतिक समीकरणों के आधार पर बनती और गिरती रही हैं। इस बार भी भाजपा और उसके सहयोगी दल सत्ता बनाए रखने की कोशिश करेंगे जबकि कांग्रेस और अन्य दल सत्ता में वापसी के लिए मैदान में उतरेंगे। पुडुचेरी में पर्यटन, रोजगार, प्रशासनिक अधिकार और विकास जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रह सकते हैं।
इन पांच राज्यों के चुनाव को राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों के परिणाम आने वाले वर्षों की राजनीतिक रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। यदि राष्ट्रीय दल इन राज्यों में अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत होगी, वहीं क्षेत्रीय दलों की सफलता भारत की बहुदलीय राजनीति की मजबूती का संकेत मानी जाएगी। इन चुनावों को आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारी के रूप में भी देखा जा रहा है, इसलिए सभी दल इन्हें बेहद गम्भीरता से ले रहे हैं।
चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। मतदान केंद्रों पर बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है ताकि मतदाताओं को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांग मतदाताओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं भी की गई हैं। इसके अलावा मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं।
राजनीतिक दलों ने भी अपने-अपने चुनावी अभियान की रूपरेखा तैयार कर ली है। आने वाले दिनों में बड़े-बड़े नेताओं की रैलियां और सभाएं देखने को मिलेंगी। सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार का इस्तेमाल भी पहले की तुलना में अधिक होने की सम्भावना है। चुनावी घोषणापत्रों के माध्यम से दल जनता को अपनी नीतियों और योजनाओं के बारे में बताने की कोशिश करेंगे।
भारत में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं होते बल्कि लोकतंत्र की जीवंतता का उत्सव भी होते हैं। करोड़ों मतदाता मतदान केंद्रों पर जाकर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं और अपने प्रतिनिधियों का चयन करते हैं। पांच राज्यों में होने वाले ये चुनाव भी उसी लोकतांत्रिक परम्परा का हिस्सा हैं। आने वाले कुछ सप्ताह तक इन राज्यों में राजनीतिक गतिविधियां अपने चरम पर रहेंगी और जनता भी अपने मुद्दों और अपेक्षाओं के साथ चुनावी प्रक्रिया में भाग लेगी। अंततः जब मतगणना के दिन परिणाम सामने आएंगे तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जनता ने किस दल और किस नेतृत्व पर भरोसा जताया है लेकिन इतना तय है कि इन पांच राज्यों के चुनाव केवल स्थानीय सत्ता की लड़ाई नहीं हैं बल्कि वे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति और विविधता का एक और उदाहरण बनकर सामने आएंगे। चुनावी मैदान में उतरने वाले सभी दलों के लिए यह परीक्षा की घड़ी होगी और मतदाताओं के लिए यह अवसर होगा कि वे अपने राज्यों के भविष्य की दिशा तय करें।