बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक अंदाज भी बदलता दिख रहा है। हाल ही में पटना के पॉश इलाकों से लेकर गंगा के कछार तक जिस तरह अवैध कब्जों पर बुलडोजर और कई स्थानों के नाम बदलने के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की तुलना यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मॉडल से होने लगी है। पटना समेत कई इलाकों में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई यह संकेत देती है कि सम्राट खुद को एक सख्त प्रशासक के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। यह छवि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘सुशासन बाबू’ वाली संयमित और संतुलित राजनीति से अलग मानी जा रही है। हालांकि इस ‘बुलडोजर माॅडल’ को लेकर बहस भी तेज है। समर्थक इसे त्वरित न्याय और सख्त शासन का प्रतीक मानते हैं जबकि आलोचक इसे राजनीतिक स्टंट और दबाव की राजनीति बता रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि बिहार में सम्राट चैधरी का लक्ष्य केवल अतिक्रमण हटाना नहीं है बल्कि यह साबित करना है कि वे नीतीश कुमार से कहीं अधिक प्रभावी और निर्णायक नेता हैं। वे 5 लाख करोड़ के निवेश का दावा कर रहे हैं और उनका मानना है कि निवेश तभी आएगा जब राज्य में माफिया राज का खात्मा होगा, चाहे इसके लिए बुलडोजर का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। सम्राट ने साफ कर दिया है कि अपराधियों और भू-माफियाओं के लिए अब कोई नरमी नहीं होगी। उनका फोकस फाइलों से ज्यादा जमीन पर कार्रवाई दिखाने पर है। वे लम्बे समय तक नीतीश कुमार के साथ रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद से सम्राट के सामने सबसे बड़ी चुनौती नीतीश के राजनीतिक साये से बाहर निकलना था। ऐसे में योगी के बुलडोजर माॅडल को चलाकर उन्होंने यह संदेश दिया है कि यह एनडीए 2.0 नहीं बल्कि ‘सम्राट का बिहार’ है और वे अपराधियों और भू-माफियाओं के खिलाफ सीधी कार्रवाई का संदेश दे रहे हैं। आने वाले समय में यह साफ होगा कि सम्राट का यह आक्रामक माॅडल उन्हें बिहार में नई पहचान दिलाता है या फिर यह रणनीति सीमित असर ही छोड़ पाती है। फिलहाल इतना तय है कि बिहार की सियासत में ‘बुलडोजर’ एक नया राजनीतिक प्रतीक बनकर उभरा है। गौरतलब है कि यूपी में योगी आदित्यनाथ ने बुलडोजर को भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बनाया जिससे उन्हें भारी जनसमर्थन मिला। सम्राट चैधरी इसी फाॅर्मूले को बिहार में दोहराकर युवाओं और कानून-पसंद मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करना चाहते हैं।

पंजाब बीजेपी का चेहरा होंगे राघव चड्ढा?
अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी के सात सांसदों के बीजेपी में विलय को राज्यसभा के सभापति ने मंजूरी दे दी है। इस सम्बंध में अधिसूचना भी जारी कर दी गई है। इस घटनाक्रम ने जहां आप के भविष्य पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं तो वहीं बीजेपी के लिए पंजाब और राष्ट्रीय राजनीति में नई सम्भावनाओं के दरवाजे खोल दिए हैं। राजनीतिक गलियारों चर्चा है कि अगले साल प्रस्तावित पंजाब विधानसभा चुनाव में क्या राघव चड्ढा बीजेपी का चेहरा बन सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बीजेपी के लिए पंजाब एक चुनौतीपूर्ण राज्य रहा है जहां उसे लम्बे समय से एक मजबूत, सर्वमान्य चेहरा नहीं मिल पाया है। ऐसे में राघव चड्ढा जैसे युवा और चर्चित नेता पार्टी के लिए आकर्षक विकल्प हो सकते हैं। उनकी साफ छवि और मीडिया में पकड़ बीजेपी की रणनीति को मजबूती दे सकती है, खासकर शहरी और युवा मतदाताओं के बीच लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं होंगी। राघव चड्ढा की राजनीतिक पहचान आम आदमी पार्टी की विचारधारा से गहराई से जुड़ी रही है जो कई मामलों में बीजेपी से अलग रही है। ऐसे में विचारधारात्मक बदलाव को जनता कितनी सहजता से स्वीकार करेगी यह बड़ा सवाल होगा। साथ ही बीजेपी के भीतर पहले से मौजूद नेताओं के साथ संतुलन बनाना भी आसान नहीं होगा।

बृजभूषण की प्रेशर पॉलिटिक्स!
भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह इन दिनों अपने बयानों को लेकर लगातार सुर्खियों में हैं। उनके तीखे तेवर और बदलते राजनीतिक संकेतों ने अटकलों का बाजार गर्म कर दिया। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सब सियासी रणनीति का हिस्सा है या सच में बृजभूषण अपने लिए नया ठिकाना तलाश रहे हैं? क्या साइकिल उनका अगला सियासी सफर बनेगी या फिर यह भाजपा नेतृत्व पर दबाव बनाने की कोशिश है? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि बृजभूषण के हालिया बयान सीधे तौर पर भाजपा नेतृत्व की ओर इशारा करते नजर आते हैं। भले ही उन्होंने किसी का नाम न लिया हो लेकिन उनके सियासी इरादों को लेकर चर्चाएं तेज होनी स्वाभाविक हैं। खास बात यह है कि वह पहले भी समाजवादी पार्टी से जुड़े रह चुके हैं जिससे यह सम्भावना और भी मजबूत हो जाती है। दिलचस्प बात यह है कि बृजभूषण भी कई मौकों पर अखिलेश यादव की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने उन्हें धार्मिक और श्रीकृष्ण वंशज बताते हुए कहा कि वह धर्म विरोधी नहीं हो सकते। साथ ही यह भी जोड़ा कि अखिलेश जो कुछ करते हैं वह मजबूरी में करते हैं। उनका यह बयान अपने आप में कई राजनीतिक अर्थ समेटे हुए है तो वहीं दूसरी ओर उनके हालिया इंटरव्यू और बयानों में एक तरह की नाराजगी और चुनौती दोनों दिखाई देती है। उनका बयान कि उन्हें  षड्यंत्र ने हटाया है और वह एक दिन वापसी जरूर करेंगे उनके आत्मविश्वास को दर्शाता है। बहरहाल उनके लगातार दिए जा रहे बयान राजनीतिक दबाव बनाने जैसे प्रतीत होते हैं। गौरतलब है कि 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा द्वारा उनकी जगह उनके बेटे को टिकट दिया जाना भी इस पूरे घटनाक्रम की अहम कड़ी है। इसके बाद से ही बृजभूषण के सुर बदले हुए नजर आ रहे हैं। हाल ही में उन्होंने यह तक कह दिया कि अगर पार्टी को लगता है कि उनकी जरूरत नहीं है तो खुलकर बता दिया जाए, वह अपनी उपयोगिता साबित कर देंगे। इस बात को बल तब मिला जब इस मुद्दे पर अखिलेश यादव से सवाल किया गया तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा कि भाजपा के भीतर ही कई लोग परेशान, दुखी और अपमानित महसूस कर रहे हैं और पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (पीडीए) के साथ जुड़ना चाहते हैं। हालांकि उन्होंने बृजभूषण के सपा में शामिल होने को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया और इसे परिस्थितियों पर छोड़ दिया लेकिन अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मध्यनजर उनके इस जवाब को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है।

सपा के लिए चुनौती या चांस?
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लेकर भाजपा अभी से एक्टिव मोड में दिख रही है। इसी दिशा में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने आगामी चुनाव के लिए योगी आदित्यनाथ को चेहरा घोषित कर सियासी तस्वीर काफी हद तक साफ करने के साथ संकेत दे दिया है कि बीजेपी डबल इंजन और मजबूत नेतृत्व के फाॅर्मूले पर ही चुनाव लड़ेगी। दूसरी तरफ अखिलेश यादव लगातार पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक की राजनीति को धार दे रहे हैं। उनका फोकस यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर व्यापक ओबीसी वोट बैंक को साधने पर है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या योगी का चेहरा अखिलेश यादव के लिए मुफीद होगा या फिर मुसीबत बनेगा? राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विपक्ष योगी की छवि को अगड़ा बनाम पिछड़ा के फ्रेम में ढालने की कोशिश करेगा, जिससे सपा को जातीय गोलबंदी का मौका मिल सकता है। ब्राह्माण नाराजगी और ओबीसी समीकरण जैसे मुद्दों को भी हवा दी जा सकती है। हालांकि योगी की मजबूत कानून व्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर एक्सप्रेसवे, निवेश और भ्रष्टाचार-मुक्त छवि बीजेपी के लिए बड़ा प्लस प्वाइंट है। खासकर पश्चिम यूपी में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का मुद्दा बीजेपी को बढ़त दिला सकता है तो वहीं योगी को आगे करना सपा के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकता है। बीजेपी का यह ऐलान रणनीतिक तौर पर स्पष्टता लाता है लेकिन इससे सपा को भी अपनी रणनीति और धारदार करने का मौका मिलता है। ऐसी स्थिति में 2027 की लड़ाई काफी हद तक ‘गवर्नेंस बनाम सामाजिक समीकरण’ के बीच तय होती दिख रही है।

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