तेलंगाना की राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, जिन्हें कभी आक्रामक हिंदुत्व राजनीति के विरोधी चेहरे के रूप में देखा जाता था, अब मंदिरों के पुनर्निर्माण, धार्मिक पर्यटन और सनातन परम्पराओं के संरक्षण को अपनी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल कर रहे हैं। राज्य में बड़े पैमाने पर मंदिर विकास योजनाओं और धार्मिक आयोजनों के जरिए रेवंत रेड्डी एक नई राजनीतिक जमीन तैयार करते नजर आ रहे हैं।
रेवंत रेड्डी सरकार ने तेलंगाना के प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों के विकास के लिए हजारों करोड़ रुपए की योजनाएं शुरू की हैं। इनमें यादाद्री लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर, भद्राचलम सीता रामचंद्र स्वामी मंदिर, वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर और कई क्षेत्रीय देवस्थानों का विस्तार शामिल है। सरकार का जोर केवल मंदिरों के सौंदर्यीकरण तक सीमित नहीं है बल्कि उन्हें बड़े धार्मिक-पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित करने पर है।
मुख्यमंत्री स्वयं लगातार धार्मिक आयोजनों में भाग ले रहे हैं। वे मंदिरों में दर्शन, पूजा-अर्चना और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में सक्रिय रूप से शामिल हो रहे हैं। हाल के महीनों में उन्होंने कई मंदिरों में विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया और यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी सरकार ‘आस्था और विकास’ दोनों को साथ लेकर चलना चाहती है। यादाद्री मंदिर परियोजना को लेकर सरकार विशेष रूप से सक्रिय है। मंदिर परिसर का विस्तार, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विकास और आसपास के क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन हब के रूप में
विकसित करने की योजना बनाई जा रही है। इसी तरह भद्राचलम मंदिर में घाटों के विस्तार, विवाह मंडपों और तीर्थयात्रियों के लिए आधुनिक सुविधाओं पर काम चल रहा है। सरकार का दावा है कि इन परियोजनाओं से राज्य में पर्यटन और स्थानीय रोजगार दोनों को बढ़ावा मिलेगा।
रेवंत रेड्डी की यह रणनीति केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं मानी जा रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस दक्षिण भारत में हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ‘साॅफ्ट हिंदुत्व’ की राह पर आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि रेवंत रेड्डी कई मौकों पर खुद को ‘गर्वित हिंदू’ बताते हुए दिखाई दिए हैं। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से यह भी कहा कि धर्म और परम्परा भारतीय समाज की आत्मा है और सरकार का दायित्व उन्हें संरक्षित करना है।
हालांकि विपक्ष इसे चुनावी रणनीति करार दे रहा है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस चुनावी लाभ के लिए हिंदुत्व की भाषा बोल रही है जबकि बीआरएस का कहना है कि रेवंत रेड्डी सरकार विकास और कल्याणकारी मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक राजनीति का सहारा ले रही है। इसके बावजूद राज्य में मंदिर विकास योजनाओं की रफ्तार लगातार बढ़ रही है।
रेवंत रेड्डी ने चार प्रमुख धार्मिक सर्किट विकसित करने की भी योजना बनाई है, जिनके जरिए बड़े और छोटे मंदिरों को आपस में जोड़ा जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे तेलंगाना धार्मिक पर्यटन के राष्ट्रीय नक्शे पर मजबूत पहचान बना सकेगा। कई परियोजनाओं को ‘दक्षिण की काशी’ और ‘आध्यात्मिक काॅरिडोर’ जैसे नामों से प्रचारित किया जा रहा है।
राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो रेवंत रेड्डी की यह नई छवि कांग्रेस की पारम्परिक राजनीति से अलग नजर आती है। एक ओर वे सामाजिक न्याय और कल्याणकारी योजनाओं की बात करते हैं, वहीं तरफ ओर मंदिरों और धार्मिक आयोजनों के जरिए हिंदू समाज के बड़े वर्ग को साधने की कोशिश भी कर रहे हैं। तेलंगाना की राजनीति में यह बदलाव आने वाले समय में बड़ा असर डाल सकता है।