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फिर विवादों के घेरे में विनेश फोगाट संघर्ष, सियासत और अब वापसी पर संकट

कभी भारतीय कुश्ती की सबसे बुलंद आवाज रहीं विनेश फोगाट आज फिर विवादों के केंद्र में हैं। भाजपा नेता और भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष रहे बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन शोषण आंदोलन से लेकर ओलम्पिक निराशा, राजनीति में प्रवेश और अब कुश्ती महासंघ की कार्रवाई तक, उनकी कहानी केवल एक खिलाड़ी की नहीं बल्कि भारतीय खेल व्यवस्था, सत्ता और प्रतिरोध के टकराव की कहानी बन चुकी है

भारतीय महिला कुश्ती की सबसे चर्चित चेहरों में शामिल विनेश फोगाट एक बार फिर सुर्खियों में हैं। कभी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का गौरव बढ़ाने वाली विनेश अब अपने खेल जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजरती दिखाई दे रही हैं। भारतीय कुश्ती संघ (डब्ल्यूएफआई) ने उन पर अनुशासनहीनता, यूनाइटेड वल्र्ड रेसलिंग (यूडब्ल्यू) के नियमों के उल्लंघन और एंटी-डोपिंग ‘वेयरअबाउट्स’ नियम तोड़ने के आरोप लगाते हुए 15 पन्नों का कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही उन्हें 26 जून तक घरेलू प्रतियोगिताओं में भाग लेने से रोक दिया गया है। यह वही विनेश फोगाट हैं जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में केवल खेल के मैदान पर ही नहीं बल्कि भारतीय खेल प्रशासन और राजनीति के केंद्र में भी खुद को स्थापित किया। उनका नाम उस समय राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया था जब देश के कई शीर्ष पहलवानों के साथ तत्कालीन यूडब्ल्यूएफआई प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

साल 2023 भारतीय कुश्ती के इतिहास का सबसे उथल-पुथल भरा दौर साबित हुआ। दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश के नामी पहलवान धरने पर बैठे थे। ओलम्पिक और विश्वस्तरीय पदक जीतने वाले खिलाड़ी सड़कों पर न्याय की मांग कर रहे थे। इस आंदोलन का सबसे मजबूत और सबसे मुखर चेहरा थीं विनेश फोगाट। उन्होंने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि महिला पहलवान वर्षों से मानसिक उत्पीड़न और यौन शोषण जैसी समस्याओं का सामना कर रही थीं लेकिन करियर खत्म होने के डर से कोई सामने नहीं आ रहा था।

आरोप सीधे बृजभूषण शरण सिंह पर लगाए गए थे। भारतीय कुश्ती संघ के तत्कालीन अध्यक्ष रहे बृजभूषण पर कई महिला पहलवानों ने अनुचित व्यवहार और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। यह मामला केवल खेल जगत तक सीमित नहीं रहा। संसद से लेकर सड़क तक इसकी गूंज सुनाई दी। विपक्षी दलों ने सरकार पर दबाव बनाया कि खिलाड़ियों को न्याय दिलाया जाए जबकि सरकार की ओर से जांच और कानूनी प्रक्रिया की बात कही जाती रही।

धरना लगातार लम्बा खिंचता गया। जंतर- मंतर पर पहलवानों के आंसू, पुलिस के साथ धक्का-मुक्की और खिलाड़ियों को हिरासत में लिए जाने की तस्वीरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। उस समय विनेश फोगाट ने कहा था कि जिन खिलाड़ियों ने देश के लिए पदक जीते, आज उन्हें अपराधियों की तरह घसीटा जा रहा है। यह बयान पूरे आंदोलन का प्रतीक बन गया। इस आंदोलन ने भारतीय कुश्ती को दो हिस्सों में बांट दिया। एक पक्ष खिलाड़ियों के समर्थन में था तो दूसरा पक्ष इसे राजनीति से प्रेरित अभियान बताता रहा। लेकिन इतना स्पष्ट था कि विनेश और कुश्ती महासंघ के रिश्ते पूरी तरह टूट चुके थे। आंदोलन के बाद महासंघ और खिलाड़ियों के बीच अविश्वास लगातार बढ़ता गया।

दिल्ली पुलिस ने बाद में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया लेकिन विवाद समाप्त नहीं हुआ। अदालतों, जांच एजेंसियों और राजनीतिक मंचों पर यह मामला लगातार चर्चा में बना रहा। इसी दौरान विनेश फोगाट भारतीय खेल व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध का सबसे बड़ा चेहरा बन गईं हालांकि इस संघर्ष का असर उनके खेल करियर पर भी दिखाई देने लगा। लगातार विवाद, मानसिक दबाव और प्रशासनिक तनाव के बावजूद उन्होंने पेरिस ओलम्पिक 2024 की तैयारी जारी रखी। पेरिस में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और फाइनल तक पहुंचकर इतिहास रचने के करीब पहुंच गईं। पूरे देश को उनसे स्वर्ण पदक की उम्मीद थी लेकिन फाइनल मुकाबले से पहले जो हुआ, उसने करोड़ों भारतीयों को झकझोर दिया। निर्धारित वजन से थोड़ा अधिक पाए जाने के कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह खबर सामने आते ही देशभर में भावनात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली। सोशल मीडिया पर उनके समर्थन में अभियान चल पड़ा। कई खिलाड़ियों और राजनीतिक नेताओं ने कहा कि इतनी छोटी तकनीकी वजह से किसी खिलाड़ी का सपना टूट जाना बेहद दुखद है। इसके बाद विनेश फोगाट ने भावुक संदेश के साथ कुश्ती से संन्यास की घोषणा कर दी थी। उन्होंने कहा था कि अब उनमें आगे लड़ने की ताकत नहीं बची लेकिन कुछ समय बाद संकेत मिलने लगे कि वह दोबारा अखाड़े में लौटना चाहती हैं। इसी बीच उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस के टिकट पर हरियाणा विधानसभा चुनाव लड़ा। जुलाना सीट से जीत दर्ज कर उन्होंने राजनीतिक पारी की शुरुआत की।

राजनीति में सक्रिय होने के बावजूद उन्होंने कुश्ती से रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं किया। कई मौकों पर उन्होंने कहा कि उनका सपना अभी समाप्त नहीं हुआ है और वह 2028 लाॅस एंजिलिस ओलंपिक को ध्यान में रखते हुए वापसी की कोशिश कर सकती हैं लेकिन अब उनकी इसी वापसी पर संकट खड़ा हो गया है।

भारतीय कुश्ती महासंघ ने उन पर एंटी-डोपिंग नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत अपनी लोकेशन और ट्रेनिंग सम्बंधी जानकारी नियमित रूप से साझा करनी होती है ताकि किसी भी समय डोप टेस्ट किया जा सके। इसे ‘वेयरअबाउट्स’ नियम कहा जाता है। महासंघ का आरोप है कि विनेश फोगाट इस प्रक्रिया का पालन सही तरीके से नहीं कर पाईं। इसके अलावा उन पर अनुशासनहीनता और विश्व कुश्ती संघ के  नियमों के उल्लंघन के आरोप भी लगाए गए हैं। भारतीय कुश्ती संघ  ने 15 पन्नों के नोटिस में कहा है कि फिलहाल उन्हें घरेलू प्रतियोगिताओं में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी। 26 जून तक उन पर रोक लगा दी गई है।

यह कार्रवाई केवल तकनीकी नहीं मानी जा रही। खेल जगत के कई लोग इसे पुराने संघर्ष की निरंतरता के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आंदोलन के बाद से विनेश और महासंघ के बीच टकराव लगातार बना हुआ है। आलोचकों का कहना है कि जिस खिलाड़ी ने महिला पहलवानों की आवाज उठाई, आज वही लगातार प्रशासनिक दबाव झेल रही है। दूसरी ओर महासंघ का पक्ष है कि नियम सभी खिलाड़ियों के लिए समान होते हैं। यदि कोई खिलाड़ी एंटी-डोपिंग या अनुशासन सम्बंधी प्रक्रियाओं का पालन नहीं करता, तो कार्रवाई होना स्वाभाविक है। महासंघ यह भी कह रहा है कि खेल में भावनाओं से अधिक नियम महत्त्वपूर्ण होते हैं लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बार फिर भारतीय खेल प्रशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या खिलाड़ियों और खेल संघों के बीच संवाद पूरी तरह समाप्त हो चुका है? क्या भारतीय खेल व्यवस्था अपने सबसे बड़े खिलाड़ियों के साथ संतुलित व्यवहार कर पा रही है? क्या आंदोलन करने वाले खिलाड़ियों के साथ अलग रवैया अपनाया जा रहा है?

विनेश फोगाट की कहानी अब केवल पदकों और हार-जीत की कहानी नहीं रह गई है। यह संघर्ष, प्रतिरोध, राजनीति और व्यवस्था से टकराव की कहानी बन चुकी है। उन्होंने अखाड़े में दुनिया की बड़ी पहलवानों को हराया लेकिन अखाड़े के बाहर उन्हें भारतीय खेल व्यवस्था, राजनीति और प्रशासनिक ढांचे से लगातार संघर्ष करना पड़ा।

आज स्थिति यह है कि एक ओर उनके समर्थक उन्हें महिला खिलाड़ियों की आवाज और साहस की प्रतीक मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके आलोचक कहते हैं कि खेल में अनुशासन सर्वोपरि होता है और कोई खिलाड़ी नियमों से ऊपर नहीं हो सकता। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विनेश फोगाट फिर से अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में वापसी कर पाएंगी या उनका करियर विवादों और संघर्षों के बीच ही सीमित होकर रह जाएगा? लेकिन इतना तय है कि भारतीय खेल इतिहास में उनका नाम केवल एक पहलवान के रूप में नहीं बल्कि व्यवस्था को चुनौती देने वाली एक मजबूत आवाज के रूप में हमेशा याद किया जाएगा।

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