मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी से मेरा परिचय उस दौर में हुआ जब वे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सड़क परिवहन मंत्री थे। दिल्ली में उनसे मुलाकातें होती रहती थीं। सेना की पृष्ठभूमि से आए जनरल खण्डूड़ी अपने काम करने के तरीके में बिल्कुल अलग दिखाई देते थे। मंत्रालय में उनकी छवि एक ऐसे मंत्री की थी जो फाइलों को सिर्फ औपचारिकता के तौर पर नहीं देखते थे बल्कि हर परियोजना की बारीकियों में जाते थे। अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच यह स्पष्ट संदेश था कि जनरल साहब के सामने काम में ढिलाई या अनियमितता की कोई गुंजाइश नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी के ड्रीम प्रोजेक्ट, स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना को सफलतापूर्वक धरातल पर उतारने में जनरल खण्डूड़ी की बड़ी भूमिका रही। देश को चारों दिशाओं से जोड़ने वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना ने भारत की अर्थव्यवस्था, परिवहन व्यवस्था और विकास की गति को बदलने का काम किया। उस समय राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में जो तेजी आई, उसने भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को एक नई दिशा दी।

जनरल खण्डूड़ी की पहचान सिर्फ एक मंत्री की नहीं बल्कि एक ऐसे प्रशासक की बनी जो समयसीमा, गुणवत्ता और जवाबदेही पर जोर देता था। सड़क परियोजनाओं की समीक्षा बैठकों में उनका सख्त रवैया अक्सर चर्चा का विषय रहता था। वे अधिकारियों से सीधा सवाल पूछते थे और काम में देरी पर नाराजगी जताने से भी नहीं हिचकते थे। शायद यही कारण था कि राष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि एक ‘नो नॉनसेंस मिनिस्टर’ की बनी। दिल्ली में उनसे होने वाली मुलाकातों में अक्सर विकास, प्रशासन और उत्तराखण्ड के भविष्य पर चर्चा होती थी। उनमें एक सैनिक की स्पष्टता थी कि कम बोलना, सीधे मुद्दे पर आना और निर्णय लेने में अनावश्यक राजनीतिक दिखावे से बचना। यही शैली बाद में उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी ताकत भी बनी और कई बार चुनौती भी।

बाद में जब नारायण दत्त तिवारी जी के बाद वे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बने तो जनता को उनसे भारी अपेक्षाएं थीं। एक ईमानदार, सख्त और प्रशासनिक पकड़ रखने वाले मुख्यमंत्री के रूप में लोग उन्हें देखते थे। उस समय मेरा उनसे लगातार मिलना-जुलना होता था। मैं समय-समय पर उन्हें यह बताता था कि राज्य में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है लेकिन सम्भवतः मेरी बातें उन्हें अच्छी नहीं लगती थीं।

धीरे-धीरे हमारे सम्बंधों में कुछ तल्खी भी आ गई थी। फिर वह समय आया जब हमने अपनी चर्चित खोजी खबर ‘सारंगी की भ्रष्ट धुन’ प्रकाशित की। यह खबर खण्डूड़ी जी के प्रमुख सचिव प्रभात कुमार सारंगी, आईएएस, के विवादित फैसलों और कथित भ्रष्टाचार से जुड़ी थी। इस समाचार को प्रकाशित करने से पहले मैंने विस्तार से एक पत्र जनरल साहब को लिखा था, जिसे हमारे हरिद्वार संवाददाता एहसान अंसारी उनके पास लेकर गए थे। जनरल साहब ने पत्र अपने पास रख लिया लेकिन कोई जवाब नहीं दिया। हमारे पास इसके बाद कोई विकल्प नहीं था और हमने समाचार प्रकाशित कर दिया। उस दौर में हम लगातार सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरें प्रकाशित कर रहे थे। जनरल साहब इससे बेहद नाराज हुए। उन्होंने मुझे देहरादून बुलाया। शाम के समय जब मैं उनसे मिला तो उन्होंने बहुत गम्भीर स्वर में कहा- “You stabbed me in my back… तुमने मेरी पीठ में छुरा भोंका।’’ मैंने उन्हें याद दिलाया कि मैंने आपको पहले ही पत्र लिखा था लेकिन आपने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद हमारे बीच लम्बी बातचीत हुई।

फिर 2009 का लोकसभा चुनाव आया। उत्तराखण्ड की पांचों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी हार गई और कांग्रेस विजयी हुई। इसके बाद जनरल खण्डूड़ी को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और डाॅ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ मुख्यमंत्री बने। निशंक सरकार के दौरान भ्रष्टाचार किस तरह दिन दूनी, रात चैगुनी गति से बढ़ा, यह हमने अपनी आंखों से देखा। इसी दौर में ऋषिकेश का चर्चित साढ़े चार सौ करोड़ रुपए का भू-घोटाला सामने आया, जिसे हमने ‘सिटूर्जिया भू-घोटाला’ के नाम से प्रकाशित किया। यह एक लम्बी कहानी है लेकिन सार यह था कि हजारों करोड़ की जमीन की बंदरबांट का हमने पर्दाफाश किया। डाॅ. निशंक इससे बेहद नाराज हुए। उन्होंने कुछ ऐसी बातें कहीं, जिन्होंने मुझे अपनी पहली जनहित याचिका दायर करने के लिए प्रेरित किया। इस जनहित याचिका को अदालत में अधिवक्ता श्री दुष्यंत मैनाली ने प्रस्तुत किया। उच्च न्यायालय का फैसला आया, बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी उसी दिशा में निर्णय दिया और पूरी जमीन राज्य सरकार को वापस मिली। यह मेरे जीवन का बड़ा संतोष था। इसी संघर्ष ने मुझे एक अद्भुत मित्र भी दिया- अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली।

यहां एक रोचक प्रसंग याद आता है। भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड के सचिव और कर्नाटक के वरिष्ठ नेता, अटल सरकार तथा बाद में मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे अनंत कुमार मेरे बेहद घनिष्ठ मित्र थे। उनका निधन वर्ष 2018 में हुआ। उन्होंने एक बार मुझसे जानना चाहा कि निशंक सरकार के बारे में मेरी क्या धारणा है। मैंने उनसे साफ कहा कि मेरी राय पूर्वग्रसित भी हो सकती है क्योंकि मेरा अख़बार लगातार सरकार के खिलाफ खबरें प्रकाशित कर रहा है। इसके बावजूद उन्होंने मुझसे एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी, यह विश्वास करते हुए कि मेरी रिपोर्ट निष्पक्ष होगी। कुछ समय बाद डाॅ. निशंक को हटा दिया गया और जनरल खण्डूड़ी एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाए गए। मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद जनरल साहब ने मुझे बुलाया और पूछा कि राज्य के लिए क्या किया जा सकता है। वह दौर देश में अन्ना आंदोलन के प्रभाव का था। जनरल साहब चिंतित थे कि चुनाव में बहुत कम समय बचा है और जनता के भीतर भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रोश बढ़ रहा है। उसी समय मैं टीम अन्ना के साथ काम कर रहा था। अरविंद केजरीवाल ने मुझसे आग्रह किया था कि किसी एक राज्य में मजबूत लोकायुक्त कानून बनाने की दिशा में काम किया जाए ताकि आंदोलन की मंद पड़ती ऊर्जा को फिर से धार दी जा सके। मैं जनरल खण्डूड़ी से मिला और उनसे सीधी बात कही- ‘‘सर, अब आपको यह विचार करना होगा कि इतिहास आपको कैसे याद करेगा…How history is going to remember you.”

जनरल साहब ने मुझसे पूछा कि मैं आखिर कहना क्या चाहता हूं। मेरा उत्तर साफ था कि ‘‘इतिहास निर्मम होता है। आपके पहले कार्यकाल में भ्रष्टाचार के कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने आपकी छवि को नुकसान पहुंचाया है। अब समय आ गया है कि आप उसे सुधारें।’’ इस बात पर थोड़ी बहस भी हुई। जनरल साहब का स्वभाव ऐसा ही था, वे हर बात को सीधे सुनते थे लेकिन अपनी असहमति भी उतनी ही स्पष्टता से रखते थे। कुछ देर बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरी राय में क्या किया जाना चाहिए। मैंने उनसे कहा कि यदि वे सचमुच एक अलग पहचान छोड़ना चाहते हैं तो उत्तराखण्ड में ऐसा लोकायुक्त कानून बनाइए जैसा उस समय अन्ना हजारे मांग रहे थे, ऐसा कानून जिसमें मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक लोकायुक्त के दायरे में हों।

इसके बाद मैंने जनरल साहब की मुलाकात टीम अन्ना से कराई। बाकी सब इतिहास है। ब्यूरोक्रेसी की भारी नाराजगी और राजनीतिक दबावों के बावजूद जनरल खण्डूड़ी ने उत्तराखण्ड विधानसभा से बेहद सख्त लोकायुक्त कानून पारित कराया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने इस विषय में अपने केंद्रीय नेतृत्व से भी कोई औपचारिक सहमति नहीं ली थी। मैंने जनरल साहब से वादा किया था कि यदि वे यह कानून बनाते हैं तो अन्ना हजारे स्वयं उनसे मिलकर देश को बताएंगे कि उन्होंने कितना बड़ा काम किया है और इसका राजनीतिक लाभ भी उन्हें मिलेगा। ऐसा ही हुआ। मेरे अनुरोध पर अन्ना हजारे लोकायुक्त कानून पारित होने के बाद उत्तराखण्ड भवन में जनरल साहब से मिलने पहुंचे। उस मुलाकात का वीडियो आज भी मौजूद है जिसमें अन्ना हजारे खुले मंच से जनरल खण्डूड़ी की भूरी-भूरी प्रशंसा कर रहे हैं।

उस बैठक में मेरे साथ अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास और किरण बेदी भी मौजूद थी। इसी बैठक के दौरान मेरे पास हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल जी का फोन आया, जिनसे मेरे अत्यंत घनिष्ठ संबंध थे। उन्होंने हंसते हुए मुझसे कहा ‘‘तुमने अपने जनरल को तो हीरो बना दिया, मगर हमें भूल गए।’’ उनके आग्रह पर हम बैठक बीच में छोड़कर निकल पड़े। अन्ना हजारे और जनरल साहब की बातचीत जारी रही जबकि मैं, अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास और मनीष सिसोदिया रात लगभग 11 बजे हिमाचल सदन पहुंचे, जहां धूमल जी ठहरे हुए थे। वहां लम्बी चर्चा हुई और यह विचार सामने आया कि हिमाचल भी इसी तर्ज पर मजबूत लोकायुक्त कानून बनाएगा। बाद में टीम अन्ना हिमाचल भी गई लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ पाया। कुछ समय बाद धूमल जी ने मुझे बताया कि जनरल खण्डूड़ी ने दिल्ली को विश्वास में लिए बिना ही इतना बड़ा कदम उठा लिया था और इसके बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से यह संदेश चला गया था कि कोई अन्य राज्य ऐसा लोकायुक्त कानून न बनाए।

यह प्रसंग जनरल खण्डूड़ी के व्यक्तित्व को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अपनी दूसरी पारी में वे पूरी तरह स्पष्ट थे कि यदि जनता उन्हें दोबारा अवसर देती है तो वे पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ राज्यहित में काम करेंगे। जनता ने उन पर भरोसा भी किया। उन्होंने केवल कठोर लोकायुक्त कानून ही नहीं बनाया बल्कि ट्रांसफर नीति के लिए भी कानून लाए। प्रशासनिक सुधारों से जुड़े कई अन्य फैसले भी उसी दौर में हुए। भाजपा की राजनीतिक स्थिति भी सुधरी। दरअसल जब डाॅ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को हटाकर जनरल खण्डूड़ी को दोबारा मुख्यमंत्री बनाया गया था, तब भाजपा के एक आंतरिक सर्वे में पार्टी को मात्र 17 सीटें मिलती दिखाई जा रही थीं। जनरल साहब ने अथक मेहनत की और भाजपा को 34 सीटों तक पहुंचा दिया। विडम्बना यह रही कि वे स्वयं भीतरघात का शिकार होकर चुनाव हार गए और तीसरी बार मुख्यमंत्री नहीं बन सके। आज उनके न रहने पर ये सारी बातें एक-एक कर याद आ रही हैं।

एक और बेहद रोचक प्रसंग स्मृतियों में ताजा है। 2011 के विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तराखण्ड में प्रचार समाप्त होने के बाद जनरल साहब नोएडा आए थे। वहीं से वे मेरे घर भी आए। मेरी बेटी तब पांच या छह साल की रही होगी। उन दिनों उत्तराखण्ड की राजनीति में एक नारा बहुत लोकप्रिय हुआ था- ‘खण्डूड़ी है जरूरी।’ मेरी छोटी सी बेटी बड़ी मासूमियत से जनरल साहब के पास जाकर खड़ी हो गई और उनसे पूछ बैठी कि ‘‘क्या आपकी पार्टी में आप ही अकेले नेता हैं? हर जगह आपका ही नाम क्यों लिखा है?’’ उसका प्रश्न सुनकर मैं एक क्षण के लिए असहज हो गया। मैंने तुरंत जनरल साहब से कहा कि ‘‘सर, यह सवाल इस बच्ची का है, मैंने नहीं पूछा है।’’ जनरल साहब ठहाका लगाकर हंस पड़े। उन्होंने बड़े स्नेह से मेरी बेटी को आशीर्वाद दिया। यही उनका एक अलग मानवीय पक्ष था। बाहर से बेहद सख्त दिखने वाले जनरल खण्डूड़ी भीतर से अत्यंत संवेदनशील और स्नेही व्यक्ति थे।

बाद के वर्षों में जब राजनीति से उनका सक्रिय जुड़ाव कम हुआ तो कई बार उनसे लम्बी बातचीत होती थी। वे संतोष के साथ अपने जीवन को देखते थे। उन्होंने मुझे बताया था कि सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद वे अपने नाती-पोतों के साथ शांत और प्रसन्न जीवन बिताना चाहते थे। लगभग 1990 के आस-पास वे सेना से रिटायर हुए थे। भारतीय सेना की इंजीनियरिंग कोर में उन्होंने सर्वोच्च स्तर तक पहुंचकर मेजर जनरल का पद प्राप्त किया था। उन्होंने कई बार मुझे यह भी बताया कि राजनीति में आने की उनकी मूल योजना नहीं थी। परिस्थितियां, लोगों का आग्रह और उत्तराखण्ड की आकांक्षाएं उन्हें सार्वजनिक जीवन में ले आईं। फिर बाकी सब, जैसा कहा जाता है इतिहास है।

वे राजनीति में आए और शानदार ढंग से चमके। यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने एक सार्थक जीवन जिया। हां, जैसे हर मनुष्य से गलतियां होती हैं, उनसे भी हुईं। अपने पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल में वे वह सब नहीं कर पाए जिसकी लोगों को उनसे अपेक्षा थी लेकिन जब वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपनी छवि सुधारने और राज्य हित में निर्णायक काम करने का पूरा प्रयास किया। आज जब वे इस दुनिया में नहीं हैं तो स्मृतियों का एक लम्बा सिलसिला आंखों के सामने से गुजर रहा है। ऐसे समय में मुझे कवि हरिओम पवार की वे पंक्तियां याद आ रही हैं जो उन्होंने इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद लिखी थीं। आज वही पंक्तियां मैं जनरल साहब की स्मृति को समर्पित करना चाहता हूं-
‘‘मैं लिखते-लिखते रोया था,
मैं भारी मन से गाता हूं,
जो हिम-शिखरों का फूल बनी,
मैं उनको फूल चढ़ाता हूं।
मैंने उनके सिंहासन के विपरीत लिखा, कविता गायी,
पर उनके ना रहने पर आंखें आंसू भर-भर आईं।’’

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