अमेरिका में गौतम अडानी और अडानी समूह के खिलाफ चल रहे कथित रिश्वत और निवेशक धोखाधड़ी मामले में समझौते की खबरों ने देश और दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और काॅरपोरेट जगत में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी एजेंसियों के साथ सम्भावित समझौते को जहां अडानी समूह के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है वहीं भारतीय विपक्ष ने इसे लेकर केंद्र सरकार पर फिर गम्भीर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं

भारतीय उद्योग जगत के सबसे प्रभावशाली नामों में शामिल गौतम अडानी एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों के केंद्र में हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार चर्चा किसी नए बंदरगाह, हवाई अड्डे या ऊर्जा परियोजना की नहीं बल्कि अमेरिका में उनके खिलाफ चल रहे उस मुकदमे की है जिसने बीते डेढ़ वर्ष से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों, भारतीय राजनीति और वैश्विक निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींच रखा था। अब खबरें आ रही हैं कि अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) और अमेरिकी न्याय विभाग के साथ इस मामले में समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। यदि यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो यह अडानी समूह के लिए केवल कानूनी राहत नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा की आंशिक वापसी भी मानी जाएगी।

यह मामला अचानक पैदा नहीं हुआ था। इसकी पृष्ठभूमि कई वर्षों से बन रही थी। अडानी समूह बीते एक दशक में जिस तेजी से बढ़ा, उसने भारतीय काॅरपोरेट इतिहास में अभूतपूर्व उदाहरण पेश किए। बंदरगाहों से लेकर बिजली, कोयला, हवाई अड्डे, डेटा सेंटर, हरित ऊर्जा और मीडिया तक समूह का विस्तार इतना व्यापक हुआ कि गौतम अडानी कुछ समय के लिए दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में दूसरे स्थान तक पहुंच गए। लेकिन जितनी तेजी से उनका साम्राज्य बढ़ा, उतनी ही तेजी से उस पर सवाल भी उठने लगे।

2023 में अमेरिकी रिसर्च फर्म हिंडनबर्ग की रिपोर्ट ने अडानी समूह पर शेयरों में हेरफेर, अपारदर्शी कम्पनियों और कर्ज आधारित विस्तार के आरोप लगाए थे। उस रिपोर्ट ने भारतीय शेयर बाजार को हिला दिया था। समूह की कम्पनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई, निवेशकों को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ और विपक्ष ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह अडानी समूह को संरक्षण दे रही है। हालांकि अडानी समूह ने हिंडनबर्ग रिपोर्ट को ‘भारत पर हमला’ बताते हुए सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था।

हिंडनबर्ग विवाद पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि अमेरिका से एक और बड़ा झटका सामने आया। अमेरिकी एजेंसियों ने आरोप लगाया कि भारत में सौर ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़े सौदों में कथित रिश्वतखोरी हुई और उससे सम्बंधित जानकारी अमेरिकी निवेशकों से छिपाई गई।

अमेरिकी जांच एजेंसियों का दावा था कि अडानी समूह ने निवेशकों को यह भरोसा दिलाया कि उसकी कारोबारी प्रक्रियाएं पूरी तरह पारदर्शी हैं और उसके पास मजबूत एंटी-ब्राइबरी सिस्टम मौजूद है जबकि अंदरखाने कथित रूप से अलग गतिविधियां चल रही थीं।

बच निकलने की खुली राह
अमेरिकी कानूनों के तहत यदि कोई कम्पनी अमेरिकी निवेशकों से धन जुटाती है या अमेरिकी बाजार से जुड़े वित्तीय साधनों का उपयोग करती है तो उस पर अमेरिकी नियामकीय अधिकार लागू हो सकते हैं। इसी आधार पर सिक्योरिटीज एक्सचेंज कमीशन और अमेरिकी अभियोजकों ने कार्रवाई शुरू की। आरोपों में कहा गया कि निवेशकों से महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाई गईं और कुछ सौदों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। यह मामला केवल कॉरपोरेट अनुपालन का नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के भरोसे का मुद्दा बन गया। हालांकि अडानी समूह ने लगातार इन आरोपों का विरोध किया। समूह का कहना था कि अमेरिकी एजेंसियां अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई कर रही हैं। अडानी पक्ष के वकीलों ने अदालत में यह तर्क भी रखा कि सम्बंधित बाॅन्ड अमेरिकी एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध नहीं थे, इसलिए अमेरिकी कानूनों का प्रत्यक्ष प्रयोग उचित नहीं माना जा सकता। समूह ने यह भी कहा कि वह सभी कारोबारी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और नियामकीय मानकों का पालन करता है।

अब जो खबरें सामने आ रही हैं उनके अनुसार अडानी पक्ष और अमेरिकी एजेंसियों के बीच एक वित्तीय समझौते पर सहमति बन चुकी है। बताया जा रहा है कि गौतम अडानी और सागर अडानी आर्थिक दंड भरने पर सहमत हुए हैं। हालांकि उन्होंने किसी भी आरोप को स्वीकार नहीं किया है। अंतरराष्ट्रीय काॅरपोरेट मामलों में इस तरह के समझौते असामान्य नहीं माने जाते। कई बार कम्पनियां वर्षों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई और उससे होने वाले कारोबारी नुकसान से बचने के लिए आर्थिक दंड भरकर मामला समाप्त करना बेहतर समझती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार अडानी समूह के लिए यह समझौता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में समूह को लगातार अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की आशंकाओं, शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव और राजनीतिक विवादों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में यदि अमेरिकी मुकदमा समाप्त होता है तो यह संदेश जाएगा कि समूह अब अपने ऊपर लगे सबसे बड़े वैश्विक कानूनी दबावों में से एक से बाहर निकल रहा है।

विपक्ष हुआ हमलावर
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल कारोबारी दुनिया तक सीमित नहीं रहा। भारत में यह मामला शुरू से ही राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार अडानी मुद्दे को केंद्र सरकार से जोड़ते रहे हैं। राहुल गांधी ने कई बार सार्वजनिक मंचों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गौतम अडानी के सम्बंधों पर सवाल उठाए। संसद में भी विपक्ष ने बार-बार संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की मांग उठाई। विपक्ष का कहना था कि इतने बड़े कारोबारी विवाद की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या सरकारी नीतियों का लाभ किसी विशेष काॅरपोरेट समूह को मिला।

अब जब अमेरिका में समझौते की खबरें सामने आई हैं तो विपक्ष ने फिर इस मुद्दे को तेज कर दिया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि अमेरिकी एजेंसियां इतने गम्भीर आरोपों की जांच कर सकती हैं तो भारत में ऐसी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं हुई। विपक्षी दलों का आरोप है कि भारतीय एजेंसियां बड़े उद्योग समूहों के मामलों में अपेक्षित आक्रामकता नहीं दिखातीं। कई विपक्षी नेताओं ने इसे ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ यानी सत्ता और काॅरपोरेट गठजोड़ का उदाहरण बताया।

विपक्ष यह सवाल भी उठा रहा है कि यदि समझौता हुआ है तो उसकी शर्तें क्या हैं और क्या यह केवल आर्थिक दंड तक सीमित रहेगा या भविष्य में भी कुछ निगरानी और प्रतिबंध लागू किए जाएंगे। कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि यदि किसी कम्पनी को निवेशकों से सम्बंधित जानकारी छिपाने के आरोपों में समझौता करना पड़ रहा है तो यह अपने आप में गम्भीर मामला है। दूसरी ओर भाजपा और सरकार समर्थक नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। उनका कहना है कि किसी भी कानूनी समझौते को दोष स्वीकार करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भाजपा नेताओं का तर्क है कि विपक्ष लगातार भारतीय उद्योगपतियों को निशाना बनाकर देश की आर्थिक छवि को नुकसान पहुंचा रहा है। उनका यह भी कहना है कि अडानी समूह भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा जरूरतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और विपक्ष विदेशी रिपोर्टों के आधार पर भारतीय कंपनियों को बदनाम करने का अभियान चलाता रहा है। सरकार समर्थकों का एक तर्क यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में काम करने वाली लगभग हर बड़ी कम्पनी को किसी न किसी समय नियामकीय जांचों का सामना करना पड़ता है। अमेरिका में कई बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अरबों डाॅलर के समझौते कर चुकी हैं। इसलिए केवल समझौते के आधार पर किसी कंपनी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
आर्थिक विशेषज्ञ इस पूरे मामले को भारत की वैश्विक आर्थिक छवि के संदर्भ में भी देख रहे हैं। अडानी समूह केवल एक निजी कम्पनी नहीं बल्कि भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक बन चुका है।
बंदरगाह, बिजली, लॉजिस्टिक्स, ग्रीन एनर्जी और एयरपोर्ट जैसे क्षेत्रों में उसका व्यापक निवेश है। ऐसे में समूह से जुड़ा कोई भी बड़ा विवाद सीधे तौर पर विदेशी निवेशकों के विश्वास को प्रभावित करता है।

अमेरिका में बड़े निवेश का वादा
हिंडनबर्ग विवाद के बाद विदेशी निवेशकों में जो आशंकाएं पैदा हुई थीं, उनसे उबरने के लिए अडानी समूह ने कई कदम उठाए। समूह ने कर्ज कम करने, पारदर्शिता बढ़ाने और वैश्विक निवेशकों के साथ संवाद मजबूत करने की कोशिश की। कुछ विदेशी निवेशकों और बैंकों ने दोबारा समूह पर भरोसा जताया। लेकिन अमेरिकी मुकदमे की वजह से अनिश्चितता बनी रही। अब यदि समझौता अंतिम रूप लेता है तो यह समूह के लिए एक मनोवैज्ञानिक और वित्तीय राहत साबित हो सकता है।

इस मामले का एक बड़ा पहलू भारत-अमेरिका आर्थिक सम्बंधों से भी जुड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और निवेश जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के सम्बंध नई ऊंचाइयों पर पहुंचे हैं। ऐसे समय में किसी भारतीय कारोबारी समूह के खिलाफ अमेरिका में चल रहा हाई-प्रोफाइल मामला स्वाभाविक रूप से संवेदनशील माना जा रहा था। हालांकि अमेरिकी एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि यह केवल कानूनी और नियामकीय प्रक्रिया है और इसका कूटनीतिक सम्बंधों से कोई लेना-देना नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि अडानी समूह ने भी अमेरिका में बड़े निवेश की योजनाओं का उल्लेख किया था। समूह की ओर से कहा गया था कि वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अरबों डाॅलर का निवेश और हजारों नौकरियों का सृजन कर सकता है। हालांकि आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या ऐसे आर्थिक हित किसी कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने इन आशंकाओं को खारिज किया।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह समझौता वास्तव में अडानी समूह की परेशानियों का अंत साबित होगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि कानूनी राहत मिलने के बावजूद समूह को पारदर्शिता, काॅरपोरेट गवर्नेंस और
निवेशकों के भरोसे के मोर्चे पर लगातार काम करना होगा। वैश्विक निवेशक अब केवल विस्तार और मुनाफे को नहीं बल्कि प्रशासनिक संरचना, जवाबदेही और नियामकीय अनुपालन को भी उतना ही महत्व देते हैं। भारत में भी यह विवाद जल्दी समाप्त होता नहीं दिख रहा। विपक्ष आने वाले समय में इसे फिर चुनावी मुद्दा बना सकता है। संसद से लेकर सड़क तक अडानी समूह और सरकार के सम्बंधों पर बहस जारी रहने की सम्भावना है। वहीं सरकार और भाजपा इस मुद्दे को ‘भारत विरोधी नैरेटिव’ बताकर पलटवार करती रहेगी। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित किया है कि आज के दौर में बड़े कारोबारी समूह केवल आर्थिक संस्थाएं नहीं रह गए हैं। वे राजनीति, कूटनीति, मीडिया, अंतरराष्ट्रीय कानून और जनमत, सभी के केंद्र में आ चुके हैं। गौतम अडानी का मामला इसी बदलते दौर का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है, जहां एक काॅरपोरेट विवाद केवल अदालत तक सीमित नहीं रहता बल्कि वैश्विक राजनीति और  लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है।

अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अमेरिकी अदालतें और एजेंसियां अंतिम रूप से क्या फैसला लेती हैं। यदि समझौता औपचारिक रूप से स्वीकार हो जाता है तो अडानी समूह इसे अपनी बड़ी जीत के रूप में पेश करेगा लेकिन विपक्ष और आलोचकों के लिए यह बहस शायद अभी खत्म नहीं होगी। भारत की राजनीति में ‘अडानी मुद्दा’ आने वाले समय में भी उतना ही प्रभावशाली बना रह सकता है जितना पिछले दो वर्षों में रहा है।

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