उत्तराखण्ड का ‘मिनी कश्मीर’ कहे जाने वाला सीमांत शहर पिथौरागढ़ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ ही आपदाओं के लिए जाना जाता है। यहां के विकास कार्य प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव चलते दूर की कौड़ी साबित हो रहे हैं। सरकारी इंजीनियरिंग काॅलेज 16 करोड़ खर्च कर शहर से 13 किलोमीटर दूर जंगल में बना दिया गया। जिस अस्पताल पर 768 करोड़ खर्च किए जा रहे हैं वह महज डायलिसिस और ओपीडी सेवाओं तक सीमित होकर रह गया है। जिला अस्पताल और बेस अस्पताल के बीच भटकते मरीजों का दर्द किसी को नहीं दिखाई दे रहा है। कई सालों में बनकर तैयार हुई घाट पम्पिंग योजना शहरवासियों की प्यास बुझाने में नाकामयाब रही है। जगह- जगह लगे गंदगी के ढेर, बदहाल सड़क, पानी और सीवर की समस्या मुंह बाए खड़ी है। नैनी-सैणी हवाई अड्डा अभी भी अपने पूर्ण अस्तित्व में नहीं आ सका है। अनियमित उड़ान और इस पर होने वाली राजनीति ने सीमांत की समस्याओं को और भी गहरा कर दिया है। स्थानीय विधायक मयूख महर की विकास कार्यों के प्रति गहरी रूचि तो है लेकिन विपक्ष में रहकर विकास योजनाओं को न ला पाने की उनकी मजबूरी भी है। पिथौरागढ़ के विकास पथ पर उन्नति और अवरोध के बीच जनता जनार्दन के मन में उठे सवाल और समस्याओं के पहाड़ को प्रस्तुत किया गया है इस जमीनी रिपोर्ट में
पिथौरागढ़ के विधायक मयूख महर सीमांत क्षेत्र की राजनीति में सक्रिय और जमीनी नेता के रूप में पहचाने जाते हैं। वे सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और सीमांत क्षेत्रों की आम समस्याओं को विधानसभा में उठाते रहे हैं। विधायक बनने के बाद मयूख महर ने क्षेत्र में कई विकास कार्यों और योजनाओं को आगे बढ़ाने की पहल की है। शहर और कुछ ग्रामीण इलाकों में सड़क, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं से जुड़े कार्य भी देखने को मिले। लेकिन इसके बावजूद आज भी पिथौरागढ़ विधानसभा के कई गांव ऐसे हैं जहां लोगों को मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
कई ग्रामीणों ने बताया कि उनके गांवों में आज भी पानी की समस्या बनी हुई है। कहीं सड़कें कच्ची हैं तो कहीं सड़क की हालत इतनी खराब है कि वाहनों का आवागमन मुश्किल से हो पाता है। विधायक मयूख महर अपनी बेवसी प्रकट करते हुए कहते हैं कि ‘‘भाजपा की झोली से कांग्रेस (विपक्षी विधायक) को ज्यादा कुछ नहीं मिल पाता है।’’ राज्य सरकार द्वारा विपक्षी विधानसभा क्षेत्रों के साथ बजट और योजनाओं में भेदभाव किया जाता है, जिसके कारण सीमांत क्षेत्रों के विकास कार्यों में बाधा आ रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास कार्य राजनीति और दलों के आधार पर तय होने चाहिए?
यहां गांवों में लोग राजनीतिक विचारधाराओं में बंटे हुए दिखाई देते हैं। कुछ ग्रामीणों का कहना था कि अगर उनके क्षेत्र में भाजपा का प्रतिनिधित्व होता तो शायद विकास कार्य अधिक होते। वहीं जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने अपनी समस्याओं को लेकर विधायक मयूख महर से बात क्यों नहीं की तो कई लोगों ने कहा कि वे भाजपा समर्थक हैं, इसलिए विधायक के पास नहीं जाना चाहते।
पिथौरागढ़ विधानसभा क्षेत्र की इस ग्राउंड रिपोर्ट में ‘दि संडे पोस्ट’ टीम ने गांव-गांव जाकर जनता की समस्याओं, विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति, अस्पतालों की सुविधाओं, पेयजल संकट, सड़क व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों के दावों की सच्चाई को प्रस्तुत किया है।
स्वास्थ्य व्यवस्था और अल्ट्रासाउंड की समस्या
पिथौरागढ़ जिला अस्पताल सीमांत क्षेत्र के हजारों लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का सबसे बड़ा केंद्र है। पिथौरागढ़ के अलावा बेरीनाग, गंगोलीहाट, डीडीहाट, धारचूला, मुनस्यारी और यहां तक कि नेपाल से भी कई लोग बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर यहां पहुंचते हैं लेकिन इतनी बड़ी आबादी के बावजूद जिला अस्पताल में सप्ताह में केवल दो दिन ही अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध होना लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन चुका है। जिस दिन अल्ट्रासाउंड होता है उन दिनों में अस्पताल में भारी भीड़ देखने को मिलती है। कई मरीज सुबह से घंटों लाइन में खड़े रहते हैं, फिर भी उनका नम्बर नहीं आ पाता और उन्हें बिना जांच कराए वापस लौटना पड़ता है।
सबसे ज्यादा परेशानी दूरदराज के गांवों से आने वाले गरीब परिवारों को होती है। पहाड़ में सफर आसान नहीं होता। कई लोग किराया जुटाने के लिए उधार लेकर अस्पताल पहुंचते हैं। ऐसे में उस व्यक्ति पर क्या गुजरती होगी जो उम्मीद लेकर अस्पताल आया हो लेकिन भीड़ और सीमित व्यवस्था के कारण बिना इलाज कराए ही वापस घर लौटना पड़े। स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े दावे जरूर किए जाते हैं लेकिन सवाल यह है कि लोगों को आज भी बुनियादी जांच के लिए इतनी परेशानियों का सामना क्यों करना पड़ रहा है?
भूकम्प संवेदनशील क्षेत्र और बढ़ते बहुमंजिला भवन
पिथौरागढ़ जिला भूकम्प की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यह क्षेत्र उच्च जोखिम वाले भूकम्प जोन 4 और 5 में शामिल है जहां तेज भूकम्प आने की सम्भावना हमेशा बनी रहती है। विशेषज्ञ समय- समय पर चेतावनी देते रहे हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण कार्य सुरक्षा मानकों के अनुसार होने चाहिए। इसके बावजूद पिथौरागढ़ शहर और आस-पास के क्षेत्रों में चार से पांच मंजिला भवन तेजी से बनते दिखाई दे रहे हैं। सवाल है कि क्या इन भवनों का निर्माण पूरी सुरक्षा जांच और भूकम्परोधी मानकों के तहत किया जा रहा है? यहां के लोगों को भय सता रहा है कि पहाड़ की संवेदनशील जमीन और भूकम्प के खतरे को देखते हुए अनियंत्रित निर्माण आने वाले समय में बड़ा खतरा बन सकता है।
प्रदूषण फैलाने वाले पुराने वाहन
पिथौरागढ़ जैसे शांत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरे जिले में भी प्रदूषण धीरे-धीरे चिंता का विषय बनता जा रहा है। जिले में बड़ी संख्या में पुराने वाहन, खासकर महिंद्रा मेजर और पुरानी जीपें सड़कों पर दौड़ती दिखाई देती हैं। इनमें से कई वाहन अत्यधिक धुआं छोड़ते हैं, एक ओर सरकार पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण की बात करती है वहीं दूसरी तरफ कई पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले वाहन आज भी बिना रोकटोक सड़कों पर चल रहे हैं।
13 साल में 16 करोड़ खर्च के बावजूद वीरान पड़ा काॅलेज मढ़धूरा क्षेत्र में स्थित सरकारी इंजीनियरिंग काॅलेज की स्थिति चिंताजनक है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस भवन के निर्माण में करीब 16 करोड़ रुपए खर्च किए गए लेकिन आज यह काॅलेज भवन लगभग वीरान पड़ा हुआ है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद यहां न नियमित रूप से छात्र दिखाई देते हैं और न ही काॅलेज की गतिविधियां संचालित हो रही हैं।
करीब 13 साल पहले शुरू हुए इस इंजीनियरिंग काॅलेज का अपना भवन नहीं था और इसका संचालन पिथौरागढ़ शहर के जीआईसी स्कूल भवन से किया जाता था। बाद में काॅलेज के स्थायी भवन के लिए मढ़धूरा क्षेत्र में जमीन चयनित की गई और करोड़ों रुपए की लागत से भवन निर्माण कार्य शुरू हुआ। भवन बनने के बाद कुछ समय तक यहां कक्षाएं भी संचालित हुईं, लेकिन बाद में यह क्षेत्र विवादों में आ गया।
छात्रों के लिए मुश्किल यह है कि यह भवन पिथौरागढ़ शहर से करीब 13 किलोमीटर दूर एकांत और जंगल वाले इलाके में स्थित है। यहां के लिए कोई यातायात की सुविधा भी नहीं है। साथ ही यहां भूस्खलन का खतरा भी लगातार बना रहता है। सुरक्षा और आवाजाही की समस्याओं के चलते बहरहाल काॅलेज को दोबारा जीआईसी भवन में शिफ्ट करना पड़ा।
सफाई व्यवस्था, सड़क, पानी और सीवर की समस्या
पिथौरागढ़ को ‘मिनी कश्मीर’ कहा जाता है लेकिन कई क्षेत्रों में आज भी गंदगी की समस्या देखने को मिलती है। यहां देखने को मिला कि नगर निगम क्षेत्र से लेकर कई ग्राम सभाओं तक जगह-जगह कचरा और सफाई व्यवस्था की कमी नजर आई। हालांकि कुछ वार्डों में सफाई व्यवस्था बेहतर भी दिखाई दी। जिले के कई क्षेत्रों में आज भी सड़क, पानी और सीवर लाइन जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। कहीं सड़कें खराब हैं तो कहीं सीवर व्यवस्था ठीक न होने के कारण लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
जिला और बेस अस्पताल के बीच भटकते मरीज
सीमांत क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के दावों के साथ खोला गया पिथौरागढ़ बेस अस्पताल अब तक उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर पाया है। करीब 768 करोड़ रुपए की लागत से बन रहे इस अस्पताल में वर्तमान समय में केवल सीटी स्कैन, डायलिसिस और ओपीडी सेवाएं ही संचालित हो रही हैं। मरीजों को अभी भर्ती नहीं किया जा रहा क्योंकि निर्माण कार्य जारी है।
अस्पताल में डायलिसिस यूनिट भी ‘हंस फाउंडेशन’ के सहयोग से संचालित हो रही है जबकि अन्य कई जरूरी स्वास्थ्य सुविधाओं का अब भी अभाव बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद यह अस्पताल पूरी तैयारी के साथ शुरू नहीं हो पाया है। लोगों का कहना है कि बेस अस्पताल को चलता हुआ दिखाने के लिए जिला अस्पताल की व्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं। जिला अस्पताल के डाॅक्टरों को ही बेस अस्पताल और जिला अस्पताल दोनों जगह सेवाएं देनी पड़ रही हैं वहीं कई महंगी मशीनें अस्पताल में रखी होने के बावजूद उनका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है।
मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी जिला अस्पताल और बेस अस्पताल के बीच भटकने में हो रही है। पर्ची जिला अस्पताल से कटती है जिसके बाद मरीजों को करीब दो किलोमीटर दूर बेस अस्पताल जाना पड़ता है। यदि डाॅक्टर किसी जांच की सलाह देते हैं तो मरीज को फिर जांच के लिए जिला अस्पताल लौटना पड़ता है।
भूस्खलन क्षेत्र में बना सीसीयू
लिंठ्यूड़ा में निर्माणाधीन क्रिटिकल केयर यूनिट (सीसीयू) को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं। विधानसभा में विधायक मयूख महर ने बेस अस्पताल की भूमि को लेकर सवाल उठाते हुए कहा था कि निर्माण से पहले भू-वैज्ञानिकों की राय नहीं ली गई थी। क्षेत्र में लगातार भूस्खलन हो रहा है और जमीन भी धंस रही है, कई जगह दीवारों और सीढ़ियों में दरारें तक आ चुकी हैं।
धारचूला से यहां अपने बच्चे के इलाज कराने आई रेखा रावल के अनुसार उनके बेटे को एक सप्ताह से खांसी की समस्या थी लेकिन स्थानीय स्तर पर इलाज से कोई खास लाभ नहीं मिला। बेहतर उपचार के लिए उन्हें धारचूला से पिथौरागढ़ आना पड़ा जहां इलाज के बाद उसके बच्चे की तबियत में काफी सुधार हुआ। यदि यही सुविधा उनके हाॅस्पिटल में होती तो उन्हें इतनी दूर नहीं आना पड़ता।
धारचूला से ही जिला अस्पताल इलाज कराने आए चंदन सिंह ठाकुर बताते हैं कि उनके शरीर में जहर फैल गया था जिसके कारण उनकी हालत गम्भीर हो गई थी। धारचूला में उपचार नहीं हो पाया जिसके बाद उन्हें धारचूला से जिला अस्पताल पिथौरागढ़ रेफर किया गया।
पिथौरागढ़ में भर्ती होने के बाद उनका उपचार किया गया जिससे उनकी तबियत में सुधार हुआ और अब वे पहले से बेहतर महसूस कर रहे हैं। उन्होंने अस्पताल की सुविधाओं को अच्छा बताया और कहा कि इलाज से उन्हें काफी राहत मिली।
पिथौरागढ़ के सरकोट गांव की पूजा ने बताया कि उन्हें पेट दर्द की शिकायत थी जिसके बाद उन्होंने पिथौरागढ़ के अस्पताल में इलाज कराया। जांच के दौरान अल्ट्रासाउंड में उनकी ट्यूब में थक्के (क्लाॅट्स) पाए गए जिसके बाद उनका रक्त परीक्षण किया गया और आगे उपचार किया गया। उपचार की पूरी प्रक्रिया और अस्पताल में मिली सुविधाओं को उन्होंने बहुत अच्छा बताया और कहा कि यह उनका यहां पहला अनुभव था जो सकारात्मक रहा।
ग्यारह किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर
सजाई गांव निवासी बहादुर सिंह भंडारी ने बताया कि क्षेत्र में कुछ बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी बनी हुई है जिनमें सड़क सम्पर्क और स्वास्थ्य सेवाएं प्रमुख हैं। गांव शहर के पास होने के बावजूद, मुख्य सड़क से ऊपरी गांवों तक पहुंचने के लिए लगभग 11 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। इस कारण बुजुर्गों और गम्भीर रूप से बीमार लोगों को अस्पताल तक ले जाना काफी कठिन हो जाता है। कई बार मरीजों को रास्ते में ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने गांव के ऊपरी हिस्सों तक सड़क पहुंचाने की आवश्यकता जताई और यह भी कहा कि भूमि उपलब्धता की समस्याओं के कारण वैकल्पिक मार्ग बनाने की जरूरत महसूस होती है।
ग्राम पांडा के वार्ड सदस्य राजेश कुमार आर्या कहते हैं कि अभी तक विधायक द्वारा कोई विशेष विकास कार्य देखने को नहीं मिला है। मंदिरों से जुड़े कुछ कार्य जरूर हुए हैं लेकिन ओझा- अवस्थी क्षेत्र की ओर लगभग नगण्य काम हुआ है। उन्होंने कहा कि सरकार की ‘हर-घर नल योजना’ में काफी अनियमितताएं देखने को मिल रही हैं।
पानी के पाइपलाइन सही तरीके से जमीन के अंदर नहीं बिछाई गई है बल्कि कई जगह खुले में ही पाइप डाल दिए गए हैं। इस सम्बंध में जांच की मांग भी की गई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
शिक्षा के लिए हो रहा है पलायन
स्थानीय निवासी गौरव सानी ने बताया कि क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं अभी भी सीमित हैं, डाॅक्टरों की कमी और रेफर सेंटर हैं, जिसके कारण गम्भीर स्थिति में लोगों को बाहर के शहरों जैसे बरेली या हल्द्वानी जाना पड़ता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस दिशा में और बेहतर व्यवस्थाएं विकसित होनी चाहिए थी लेकिन नहीं हो पाई।
शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कहा कि पिथौरागढ़ में उच्च शिक्षा के पर्याप्त साधन नहीं हैं जिससे छात्रों को देहरादून और दिल्ली जैसे शहरों का रुख करना पड़ता है। यदि स्थानीय स्तर पर बेहतर सुविधाएं मिलें तो छात्रों को कम खर्च में अच्छी शिक्षा प्राप्त हो सकती है।
शहर की व्यवस्थाओं पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि बाजार में अतिक्रमण के कारण पैदल चलने में दिक्कत होती है, इसलिए इस ओर नगर निगम और जिला प्रशासन का ध्यान जाना जरूरी है। पार्किंग को लेकर भी कई जगहों पर काम चल रहा है और नई पार्किंग व्यवस्थाएं बनाई जा रही हैं जिससे लोगों को सुविधा मिल रही है।
अल्ट्रासाउंड की समस्या से परेशान महिलाएं
लिंठ्यूड़ा की निवासी तुलसी लुंठी बताती हैं कि क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। सबसे बड़ी समस्या सफाई व्यवस्था की है जहां जगह-जगह गंदगी दिखाई देती है और नालियों की स्थिति भी ठीक नहीं है। कई नाले टूटे पड़े हैं जिससे गंदा पानी, कूड़ा खेतों तक पहुंच जाता है। इसके अलावा, क्षेत्र में रास्तों की सुविधा भी पर्याप्त नहीं है, जिससे लोगों को आने-जाने में दिक्कत होती है जबकि पानी की उपलब्धता बनी रहती है।
स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर उन्होंने कहा कि अस्पतालों की इमारतें तो बड़ी हैं लेकिन डाॅक्टरों की कमी के कारण लोगों को अपेक्षित इलाज नहीं मिल पाता। खासकर डिलीवरी के लिए दूर-दराज के गांवों से आने वाली महिलाओं को अल्ट्रासाउंड करने के लिए काफी इंतजार करना पड़ता है जबकि अल्ट्रासाउंड के लिए महिला को कई बार आना पड़ता हैं, सबसे बड़ी समस्या तो यही है।
नेता आते हैं, वायदे करके चले जाते हैं
इसी गांव की नीलम लुंथी ने बताया कि लिंठ्यूड़ा में सफाई की भी बड़ी जरूरत है क्योंकि नालियों की सफाई समय पर नहीं हो पाती, आवारा कुत्ते भी घूमते हैं, जिससे महिलाओं को अकेले बाहर जाना मुश्किल हो जाता है।
हूडीति निवासी पंकज कुमार कोहली के अनुसार सबसे बड़ी समस्या पानी की है। इसके अलावा, पलायन भी एक गम्भीर मुद्दा है क्योंकि गांव में रोजगार के अवसर कम हैं जिससे युवा पीढ़ी मजबूर होकर बाहर जाने के लिए तैयार होती है। हूडीति गांव को जोड़ने वाले रास्ते पर हाल ही में नगर निगम द्वारा सुरक्षा दीवार और नालियां बनाई लेकिन पहले भी वहां जलभराव की समस्या थी और अब भी बारिश के समय यह समस्या बनी रहती है जिससे लोगों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
विधायक विकास कराते हैं, बातें भी सुनते हैं
सात्सिलिंग ग्राम सभा के निवासी जीवन सिंह ने बताया कि उनके गांव में विधायक मयूख महर द्वारा काफी कार्य कराए गए हैं, जैसे सड़क और रास्तों का निर्माण। हालांकि उनकी मुख्य समस्या पानी की है। उन्होंने कहा कि विधायक जी उनकी बातों को सुनते हैं और पूरा समर्थन भी देते हैं। गांव में अन्य कार्य भी हो रहे हैं जिनमें एक-दो पोल लगाने का काम बाकी है। प्रधान विक्रम सिंह के निर्देशन में ये कार्य जारी हैं।
सरकारी स्कूल कम, प्राइवेट ज्यादा
वड्डा निवासी नरेंद्र बिष्ट प्रीतम ने बताया कि गांव में कुछ सकारात्मक विकास कार्य हुए हैं लेकिन कई गम्भीर समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। उन्होंने बताया कि गांव में सड़कों का निर्माण किया गया है और पारम्परिक जल स्रोतों, यानी नौलों की मरम्मत भी की गई है। ‘हर घर नल, हर घर जल’ योजना के तहत पानी की सुविधा संतोषजनक ढंग से संचालित हो रही है।
शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने बताया कि निजी स्कूलों का चलन काफी बढ़ गया है और लगभग 80 प्रतिशत स्कूल निजी हो चुके हैं जिससे आम लोगों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। खासकर दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवारों के लिए निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना कठिन हो जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और उन्हें मजबूत बनाया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना चाहिए जिससे अन्य बच्चे भी प्रेरित हों और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाए जाने चाहिए ताकि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सके।
‘सबसे बड़ी समस्या सीवर लाइन’
चुनाव अभियान के दौरान पिथौरागढ़ की सबसे बड़ी समस्या सीवर की पाई गई। जल्द ही 5 वार्डों में सीवर लाइन का काम शुरू होने वाला है। नगर निगम ने एक सीवर टैंक खरीदा है, जिसका उपयोग सड़क से लगे क्षेत्रों में सीवर समस्याओं के समाधान के लिए किया जाएगा। ‘इवनिंग ड्राइव’ अभियान शुरू किया गया है जिसमें समिति के सदस्य और पर्यावरण मित्र एक साथ काम करते हैं जिससे अधिक क्षेत्रों को कवर किया जा सके। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप पिथौरागढ़ को स्वच्छता सर्वेक्षण में राज्य के निगमों में दूसरा स्थान मिला है।
डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण वाहन नियमित रूप से संचालित होते हैं। उनकी निगरानी सीसीटीवी और जीपीएस सिस्टम के माध्यम से की जाती है। किसी भी शिकायत को अगले दिन तक हल करने का प्रयास किया जाता है। पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण गलियों और सम्पर्क सड़कों में भू-धंसाव से सड़कें खराब होती रहती हैं। इन्हें समय-समय पर ठीक करने का प्रयास किया जा रहा है।
इंदिरा पार्क में एक सुंदर लाइब्रेरी विकसित की गई है जिसे डिजिटल लाइब्रेरी में बदलने का प्रयास किया जा रहा है। संपूर्ण पार्क में जल्द ही एक और लाइब्रेरी और कैफे खोला जाएगा। वार्डों में भी उपयुक्त स्थानों पर लाइब्रेरी बनाने की योजना है। स्वास्थ्य पिथौरागढ़ की एक बहुत बड़ी समस्या है। इसे खत्म करने के लिए मेडिकल काॅलेज का कार्य लगभग 80 प्रतिशत पूरा हो चुका है और जल्द ही वरिष्ठ डाॅक्टरों की टीम के सर्वे के बाद इसके शुरू होने की उम्मीद है। हाल ही में 18 मार्च को पिथौरागढ़ जिले को 22 नए डाॅक्टर मिले हैं।
नगर निगम द्वारा 2 आरोग्य मंदिर स्थापित किए जा रहे हैं जहां डाॅक्टर और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी। लगभग 16 करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद इंजीनियरिंग काॅलेज की इमारत 13 वर्षों से बंद है जिसका मुख्य कारण उसका भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र में होना है। भू-वैज्ञानिकों की टीम द्वारा सर्वेक्षण किया जाएगा और सुरक्षात्मक उपायों पर कार्य प्रक्रिया में है। पहाड़ों में भूस्खलन और भू-धंसाव की घटनाएं होती रहती हैं। इसी कारण इंजीनियरिंग काॅलेज की इमारत खतरे की जद में आई। अब उसकी सुरक्षा के लिए आगे कार्य किया जा रहा है।
कल्पना देवलाल, मेयर, नगर निगम, पिथौरागढ़
बात अपनी-अपनी
बेस अस्पताल के साथ-साथ जिला अस्पताल और महिला अस्पताल को भी मेडिकल कॉलेज के
अधीन लाया गया है। चिकित्सक शिक्षकों (फैकल्टी) की नियुक्ति की प्रक्रिया लगातार जारी है। 19 मार्च को सीनियर रेजिडेंट पदों के लिए इंटरव्यू आयोजित किए गए थे जबकि 27 मार्च को असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पदों के लिए भी साक्षात्कार आयोजित किए गए। उम्मीद जताई जा रही है कि इन प्रक्रियाओं के बाद जल्द ही पर्याप्त फैकल्टी उपलब्ध हो जाएगी। यदि एनएमसी से स्वीकृति मिल जाती है तो काॅलेज को प्रति वर्ष 100 छात्रों का बैच संचालित करने की अनुमति मिल जाएगी।
डाॅ. ए.के. सिंह, प्राचार्य, मेडिकल काॅलेज, पिथौरागढ़
पिछले कुछ वर्षों में अस्पताल की सेवाओं और जांच सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है लेकिन मैन पावर की भारी कमी कार्यप्रणाली को प्रभावित कर रही है। अब जिला अस्पताल में ही दूरबीन विधि (लेप्रोस्कोपिक) से
ऑपरेशन किए जा रहे हैं। ईएनटी (नाक, कान, गला) और चेस्ट सम्बंधी रोगों के इलाज के लिए आवश्यक उपकरण उपलब्ध हैं। सीटी स्कैन की सुविधा सुचारू है और महिला विंग में भी एक अतिरिक्त सीटी स्कैन मशीन स्थापित की गई है। लम्बे समय से रिक्त चल रहे पैथोलॉजिस्ट के पदों पर राहत मिली है, जहां तीन में से दो पदों पर नियुक्ति हो चुकी है और जल्द ही माइक्रोबायोलॉजिस्ट भी जॉइन करने वाले हैं। सबसे ज्यादा संकट स्त्री रोग और रेडियोलॉजी विभाग में है। स्त्री रोग विशेषज्ञ के तीन पदों में से एकमात्र स्थायी डॉक्टर वर्तमान में अवकाश पर हैं जबकि एक डॉक्टर एनएचएम के तहत कार्यरत हैं। अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट और न्यूरोलॉजिस्ट जैसे सुपर स्पेशलिस्ट पद स्वीकृत ही नहीं हैं। नर्सिंग स्टाफ में भी लगभग 34 कर्मियों की कमी के कारण मौजूदा स्टाफ पर काम का बोझ अत्यधिक है।
डॉ. भगीरथी गब्र्याल, प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल, पिथौरागढ़
पिथौरागढ़ विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : मयूख महर (अवधि : 4 वर्ष)
क्र. क्षेत्र मुद्दा / जमीनी स्थिति अंक (10 में)
- जनसम्पर्क व क्षेत्रीय सक्रियता विधायक जनता के बीच सक्रिय, सीमांत मुद्दों को विधानसभा में उठाते रहे 7/10
- स्वास्थ्य सेवाएं (जिला अस्पताल) अल्ट्रासाउंड सप्ताह में सिर्फ दो दिन, दूरदराज के मरीज परेशान 4/10
- बेस अस्पताल परियोजना 768 करोड़ की परियोजना, लेकिन अभी अधूरी, मरीज जिला और बेस अस्पताल के बीच भटकते 4/10
- भूस्खलन व अव्यवस्थित निर्माण भूकम्प संवेदनशील क्षेत्र में बहुमंजिला निर्माण, बेस अस्पताल क्षेत्र में दरारें / भूस्खलन चिंता 3.5/10
- इंजीनियरिंग काॅलेज (मढ़धूरा) 16 करोड़ खर्च, 13 साल बाद भी काॅलेज व्यवस्था अस्थिर, भवन वीरान 2.5/10
- सड़क व कनेक्टिविटी कई गांव अब भी पैदल निर्भर, कई सड़कों की हालत खराब 4/10
- पेयजल व हर घर नल योजना पाइप लाइन अनियमितता, गर्मियों में संकट, दूषित पानी की शिकायतें 4/10
- सफाई, सीवर व नगर व्यवस्था स्वच्छता रैंकिंग बेहतर, पर कई क्षेत्रों में गंदगी / नाले / जलभराव समस्या 5.5/10
- शिक्षा व पलायन उच्च शिक्षा सीमित, छात्र देहरादून, दिल्ली पलायन को मजबूर 4/10
- रोजगार व युवाओं की स्थिति बेरोजगारी बड़ी समस्या, योजनाओं / लोन में बाधाएं, स्वरोजगार सीमित 3.5/10
औसत : 4.2/10 फाइनल ग्रेड : पास
‘सरकार मस्त और जनता त्रस्त’
सीमांत शहर पिथौरागढ़ में कांग्रेस के कद्दावर नेता मयूख महर अपनी विकासोन्मुख सोच के कारण तीसरी बार यहां का नेतृत्व कर रहे हैं। वे ऐसे नेता हैं जो विकास के लिए अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन तक करने से पीछे नहीं हटते। हालांकि विधायक मयूख महर विधानसभा में जनता के मुद्दों को उठाने और विकास कार्यों में सीमांत को प्राथमिकता देने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से समय-समय पर गुजारिश करते रहते हैं लेकिन फिलहाल विपक्षी विधायक होने की मजबूरी के चलते ‘मिनी कश्मीर’ को कोई खास सौगात देने में कामयाब होते नजर नहीं आ रहे हैं
आपने विधायक के रूप में अपने लगभग चार वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है। इस दौरान किए गए कार्यों, विकास योजनाओं और अपनी उपलब्धियों का आप किस तरह आत्म मूल्यांकन करते हैं?
इन चार सालों में मैं विपक्ष के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहा हूं। मैंने अपनी विधायक निधि के माध्यम से आवश्यक कार्यों को आगे बढ़ाने और जरूरी चीजों को पूरा करने का प्रयास किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का एकसूत्रीय कार्यक्रम है कि विपक्षी विधायकों को कोई भी ऐसी उपलब्धि या श्रेय लेने का मौका ना दिया जाए जिससे आगामी चुनाव में उनकी पार्टी के लिए कोई परेशानी हो सके। सरकार का ध्यान मुख्य रूप से अपने विधायकों के क्षेत्रों और क्षेत्रीय विकास पर केंद्रित दिखाई देता है। मेरे विधानसभा क्षेत्र में कुछ कार्य जरूर हुए हैं। ऐसा नहीं है कि कोई काम नहीं हुआ लेकिन जिन कार्यों को मैंने अपने स्तर पर आगे बढ़ाया, उनका श्रेय अलग तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
करीब चार साल पहले विधायकों से उनके क्षेत्र की दस प्रमुख विकास योजनाएं मांगी गई थीं जिन्हें प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने की बात कही गई थी। मैंने भी अपने क्षेत्र की दस महत्वपूर्ण विकास योजनाएं दी थीं। आज लगभग साढ़े चार साल होने को आए हैं लेकिन अब तक उन दस विकास कार्यों में से किसी पर भी धनराशि जारी नहीं हो पाई है और सभी कार्य लम्बित हैं। ये सभी कार्य जनहित से जुड़े हुए और अत्यंत आवश्यक थे, जिनसे पूरे विधानसभा क्षेत्र का समग्र विकास सम्भव हो सकता था। इसके बावजूद उन पर अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी है। वर्तमान में कुछ सीमित बजट के कार्य, जैसे छोटे सड़क निर्माण या अन्य कार्य, किए जा रहे हैं, वह भी भाजपा द्वारा सिर्फ अपने कार्यकर्ताओं को दिए जा रहे हैं और यही विकास है आज की सरकार का।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान आपने जनता से कई महत्वपूर्ण वादे किए थे। अब तक उनमें से कितनों को आप जमीनी स्तर पर पूरा करने में सफल रहे हैं?
हर नेता जनता से वादा करता है, अनेक घोषणाएं करता है। हमने भी कई सारे वादे किए थे और बहुत से लोगों की समस्याओं का निवारण करने का आश्वासन दिया था लेकिन आज वे वादे और समस्याएं मानो भाजपा की झोली में ही सिमटकर रह गई हैं। उस झोली से कांग्रेस के विपक्षी विधायकों को कुछ खास नहीं मिल पाता और जो मिलता भी है उसे बड़ी उपलब्धि नहीं कहा जा सकता।
हमारी सरकार के समय किए गए कार्य आज भी धरातल पर दिखाई दे रहे हैं और फिलहाल वही काम आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त, कांग्रेस सरकार के कार्यकाल (2012 से 2017) में जिन योजनाओं की नींव रखी गई थी, वर्तमान सरकार उन्हीं कार्यों को पूरा करने में लगी हुई है।
लगभग 10 साल का कार्यकाल पूरा होने के बावजूद न तो मेडिकल काॅलेज पूरी तरह बन पाया है, न ही देहरादून-पिथौरागढ़ के बीच हवाई सेवा शुरू हो पाई है वहीं पहले से बने इंजीनियरिंग काॅलेज में भी नए भवनों का निर्माण नहीं हुआ है। पर्यटन या सौंदर्यीकरण के क्षेत्र में भी कोई खास काम धरातल पर नजर नहीं आता। इस वजह से जनता के बीच एक तरह का उदासीनता का माहौल बना हुआ है।
आने वाले समय में पिथौरागढ़ के समग्र विकास, विशेष रूप से पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए आपकी क्या प्राथमिकताएं हैं? क्या कोई विशेष योजनाएं या प्रोजेक्ट्स हैं, जिन पर आप वर्तमान में काम कर रहे हैं?
मैंने पर्यटन को विकास से जोड़ने के लिए कई मुख्य प्रस्ताव माननीय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी के सामने रखे थे। इनमें कुछ प्रमुख स्थानों को विकसित करने की बात थी, जैसे कमलेश्वर और दसोड का झरना। मैंने यह भी प्रस्ताव दिया था कि दिक्टोली से गंगोलीहाट पाताल भुवनेश्वर तक सड़क बनाई जाए, ताकि पिथौरागढ़ से सीधी कनेक्टिविटी हो सके और आने वाले पर्यटकों को सुविधा मिले। वर्तमान में उन्हें 50-70 किलोमीटर अतिरिक्त घूमकर यात्रा करनी पड़ती है लेकिन इन प्रस्तावों पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो पाई। आज भी पर्यटन विकास के लिए मुख्य मांग यही है कि पिथौरागढ़ के पुराने और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों, जैसे गंगोलीहाट और मोस्ट मानु मंदिर को विकसित किया जाए और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए लेकिन मुख्यमंत्री जी का अपना एजेंडा है और अपनी ही पार्टी को प्रोत्साहित करने में लिप्त हैं, हमें कोई अवसर नहीं मिल पा रहा है। पिथौरागढ़ जिला अस्पताल में मूलभूत सुविधाओं की कमी, डाॅक्टरों के खाली पद और सीमित जांच सेवाएं, जैसे अल्ट्रासाउंड का सप्ताह में केवल दो दिन उपलब्ध होना, गम्भीर चिंता का विषय बना हुआ है।
अस्पतालों के उच्चीकरण के बावजूद यह स्थिति क्यों बनी हुई है? क्या मरीजों को आगे भी इसी तरह बाहर रेफर किया जाता रहेगा या स्वास्थ्य सेवाओं में कोई ठोस और स्थायी सुधार देखने को मिलेगा?
पिछले कुछ वर्षों में स्थिति ऐसी बन गई है कि जिला अस्पताल एक रेफर केंद्र के रूप में कार्य करता नजर आ रहा है। यहां सुविधाओं, डाॅक्टरों की कमी और दवाइयों का अभाव प्रमुख कारण हैं। ऐसी परिस्थितियों में डाॅक्टर भी जटिल मामलों में जोखिम लेने से बचते हैं और मरीजों को रेफर करना उचित समझते हैं।
गरीब मरीज बड़ी मुश्किल से अस्पताल तक पहुंच पाते हैं, कई बार आने-जाने के लिए भी पड़ोसियों से टिकट के पैसे मांग कर अस्पताल आते हैं। मरीज को क्या सुविधा देंगे, इस पर सरकार के पास कोई रूपरेखा नहीं है। सरकार अपने में मस्त है और अपनी सुविधाओं को बढ़ाने में मस्त है और जनता की ओर सरकार का कोई ध्यान नहीं है और जनता सरकार की उदासीनता से काफी परेशान है। इस मुद्दे को लेकर समय-समय पर धरना-प्रदर्शन और आंदोलन भी हुए हैं जिनके बाद कुछ समय के लिए सुधार दिखाई देता है लेकिन फिर स्थिति पूर्ववत हो जाती है।
डाॅक्टरों के तबादलों को लेकर भी यह देखने में आता है कि विभिन्न क्षेत्रों की मांग के अनुसार जिला अस्पताल से डाॅक्टरों को अन्य स्थानों पर भेज दिया जाता है जिससे यहां और कमी हो जाती है। कई बार प्रशिक्षण के लिए आए स्टाफ से ही काम चलाना पड़ता है। कहा जाता है कि पिथौरागढ़ में सुविधाओं के अभाव के कारण डाॅक्टर नहीं आना चाहते?
डाॅक्टर जहां जाएंगे वहां पैसा कमा सकते हैं, वह एक सुविधाजनक स्थान को चयन करते हैं पर मेरे सोचने के हिसाब से पिथौरागढ़ शहर आज एक सुविधाजनक स्थान है। जब डाॅक्टर जनसेवा के उद्देश्य इस फील्ड में आते हैं और जनसेवा के लिए नियुक्त किए गए हैं तो उन्हें यहां आना चाहिए और जन सेवा देनी चाहिए और अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
पिथौरागढ़ में बन रहे बेस अस्पताल के लिए कुल कितना बजट स्वीकृत हुआ है उसमें से कितना खर्च हो चुका है और आगे कितना बजट प्रस्तावित है? यह अस्पताल पूरी तरह से आम जनता के लिए कब तक शुरू हो पाएगा?
पिथौरागढ़ का बेस अस्पताल सरकार का एक बहुत बड़ा ड्रामा बनकर रह गया है। इस मुद्दे को मैंने विधानसभा सत्र में भी उठाया था। मैंने सरकार से पूछा था कि अब तक इस अस्पताल पर कितना खर्च हो चुका है, आगे कितना खर्च होना बाकी है और आखिर यह अस्पताल पूरी तरह कब से शुरू होगा लेकिन माननीय स्वास्थ्य मंत्री सदन में इसका जवाब नहीं दे पाए और उन्होंने कहा कि इसका उत्तर लिखित में दिया जाएगा।
जब सरकार के स्वास्थ्य मंत्री को ही यह जानकारी नहीं है कि अस्पताल में कितना पैसा खर्च हो चुका है, कितना खर्च होना बाकी है और कब तक इसे पूर्ण किया जाएगा तो आप मुझसे यह उम्मीद मत कीजिए, जब स्वास्थ्य मंत्री जी इसे नहीं बता पा रहे हैं, मैं इस विषय पर गलत कहने में असमर्थ हूं जहां तक मेरा सवाल है, सबसे बड़ी गलती उस भूमि के चयन में हुई जिस पर यह बेस अस्पताल बनाया गया। इस मुद्दे पर मैंने पहले भी प्रश्न उठाए थे। आज वहां जमीन धंस रही है और लगातार भूस्खलन हो रहा है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि अस्पताल को बनाने में जितना पैसा खर्च किया गया, उससे कहीं अधिक पैसा अब भूस्खलन से बेस अस्पताल को बचाने में लगाया जा रहा है, जिसे सरकार छुपाना चाहती है। लापरवाही को दबाना चाहती है क्योंकि अगर जनता को वास्तविक स्थिति का पता चलेगा तो सरकार के प्रति उनका आक्रोश और बढ़ेगा क्योंकि भूमि चयन के समय ही सरकार ने बहुत बड़ी गलती की थी।
भूमि चयन के समय भू-विज्ञानियों की सलाह लिए बिना ही ऐसी कच्ची और अस्थिर जमीन पर बेस अस्पताल बना दिया गया जो आज खतरे के मुहाने पर खड़ा है। अस्पताल से 200 किलोमीटर की दूरी पर वर्तमान सरकार मल्टी लेवल कार पार्किंग बना रही थी जो आधा बनने के बाद भूस्खलन की वजह से पूरी तरह ध्वस्त हो गया और उसका नामोनिशान तक मिट गया। इसी तरह इंजीनियरिंग काॅलेज पर लगभग 16 करोड रुपए खर्च होने के बाद लोकेशन और भूस्खलन जैसी समस्यायाएं सामने आई, जिस पर भी भू वैज्ञानिकों की राय नहीं ली गई थी, ऐसी जगहों पर भारी-भरकम भवनों का निर्माण किया जाना मैं सरकार की बड़ी लापरवाही मानता हूं। आने वाले समय में यहां कोई अनहोनी न हो, ऐसी कामना करता हूं।
पिथौरागढ़ में 750 करोड़ रुपए की लागत से बन रहे मेडिकल काॅलेज का करीब 45 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और 2026 के अंत तक इसके शुरू होने की उम्मीद है। इस पर आपका क्या कहना है? क्या यह तय समय पर शुरू हो पाएगा?
मेडिकल काॅलेज में वर्तमान सरकार ने काफी रुचि दिखाई है और इस पर अच्छा-खासा पैसा भी लगाया है। मैं यह कहूंगा कि लगभग 75 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और निर्धारित समय तक इसके शुरू होने की उम्मीद है जिससे हमारे बच्चों को बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी, ऐसा मेरा मानना है। किसी भी बड़े संस्थान के आने से रोजगार के अनेक अवसर भी खुलते हैं, जिससे क्षेत्र का समग्र विकास होता है।
अंत में पिथौरागढ़ की जनता के लिए यही संदेश है कि यहां के लोग जागरूक और समझदार हैं और अपने अधिकारों के लिए लड़ना जानते हैं। हमेशा अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहें और किसी भी सरकार या दल के दबाव में आए बिना जो काम जनता के हित में हो उसका समर्थन करें। जो कार्य जनता की जरूरत से जुड़े हैं और जो लोग उन कार्यों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनका साथ देना चाहिए।