दिल्ली और बिहार की ताजा घटनाएं केवल दो हादसे नहीं हैं बल्कि पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी हैं। यदि अब भी सुरक्षा मानकों को कड़ाई से लागू नहीं किया गया तो ऐसे हादसे भविष्य में भी लोगों की जान लेते रहेंगे। जरूरत केवल जांच और मुआवजे की नहीं, जवाबदेही तय करने और सुरक्षा संस्कृति विकसित करने की है। जब तक नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं होगा और लापरवाही पर कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक हर अग्निकांड के बाद यही सवाल गूंजता रहेगा कि आखिर कब जागेगा सिस्टम?

देश में आग की घटनाएं लगातार चिंता का विषय बनती जा रही हैं। दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर स्थित ‘फ्लोरिश स्टे होटल’ में लगी भीषण आग और बिहार के एक निजी अस्पताल में हुए अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सुरक्षा नियमों के बावजूद ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं। इन दोनों हादसों में कई लोगों की जान चली गई और दर्जनों लोग घायल हुए। सबसे दुखद बात यह है कि दोनों घटनाओं में शुरुआती जांच सुरक्षा मानकों की अनदेखी और संभावित लापरवाही की ओर इशारा कर रही हैं ।

मालवीय नगर स्थित ‘फ्लोरिश स्टे होटल’ में लगी आग देश की राजधानी में हाल के वर्षों की सबसे भयावह घटनाओं में से एक बन गई। बीते 3 जून को सुबह के समय होटल और उससे जुड़े रेस्टोरेंट परिसर में आग भड़की और कुछ ही मिनटों में पूरी इमारत धुएं और लपटों से घिर गई। हादसे में 21 लोगों की मौत हो गई जबकि कई अन्य गम्भीर रूप से झुलस गए। मृतकों में विदेशी नागरिक भी शामिल थे। हादसे के बाद जांच में कई गम्भीर अनियमितताएं भी सामने आईं। खबरों के अनुसार होटल को केवल छह कमरों के संचालन की अनुमति थी लेकिन वहां लगभग 25 कमरे चलाए जा रहे थे। इसके अलावा अग्निशमन विभाग की एनओसी और आपातकालीन निकास मार्ग जैसी आवश्यक व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं। यही कारण है कि इस घटना ने केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि प्रशासनिक निगरानी और नियामक तंत्र की खामियों को उजागर किया है।
दूसरी ओर 4 जून की सुबह बिहार के एक निजी अस्पताल के आईसीयू में लगी आग ने स्वास्थ्य संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। शाॅर्ट सर्किट से शुरू हुई आग ने कुछ ही देर में वार्ड को अपनी चपेट में ले लिया। इस हादसे में कई मरीजों की मौत हुई है और सबसे गम्भीर आरोप यह है कि आग लगने के बाद अस्पताल का कुछ स्टाफ और डॉक्टर मौके से चले गए जबकि मरीज और उनके परिजन अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष करते रहे।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मरीजों को बचाने के लिए परिजनों और स्थानीय लोगों को खिड़कियां तथा दरवाजे तोड़ने पड़े। अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान में इस प्रकार की घटना कई गम्भीर प्रश्न खड़े करती है। आईसीयू में भर्ती मरीज स्वयं चलने-फिरने में सक्षम नहीं होते इसलिए वहां सुरक्षा व्यवस्था और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली का अत्यंत मजबूत होना आवश्यक है। यदि समय रहते बचाव की उचित व्यवस्था होती तो शायद जानमाल का नुकसान कम हो सकता था।
भवन निर्माण और फायर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली और बिहार की इन दोनों घटनाओं में एक समानता स्पष्ट दिखाई देती है कि सुरक्षा नियमों की अनदेखी की गई है। चाहे होटल हो या अस्पताल, दोनों स्थानों पर बड़ी संख्या में लोगों की जिम्मेदारी सम्बंधित प्रबंधन पर होती है लेकिन जब अग्निशमन उपकरणों का रखरखाव, आपातकालीन निकास, विद्युत सुरक्षा और नियमित निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रह जाएं, तब ऐसी त्रासदियां लगभग तय हो जाती हैं। इन हादसों ने प्रशासन, स्थानीय निकायों और अग्निशमन विभागों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि नियमों का नियमित पालन कराया जाए, समय-समय पर सुरक्षा आॅडिट हों और दोषी संस्थानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए तो ऐसी घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। केवल हादसे के बाद जांच बैठाना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि सुरक्षा को औपचारिकता नहीं बल्कि अनिवार्य जिम्मेदारी माना जाए।
मालवीय नगर के होटल और बिहार के अस्पताल में लगी आग ने कई परिवारों को गहरा दर्द दिया है। यह घटनाएं केवल आंकड़े नहीं हैं बल्कि उन लोगों की त्रासदी हैं जो बेहतर इलाज, रोजगार या यात्रा के उद्देश्य से इन संस्थानों में पहुंचे थे। अब यह सरकार, प्रशासन और संस्थानों की जिम्मेदारी है कि इन हादसों से सबक लिया जाए और ऐसी व्यवस्थाएं विकसित की जाएं जिनसे भविष्य में किसी परिवार को ऐसी पीड़ा का सामना न करना पड़े। हालांकि भारत में आग की ऐसी घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं।
पिछले कुछ वर्षों में देश ने कई दर्दनाक अग्निकांड देखे हैं। वर्ष 2019 में दिल्ली के अनाज मंडी इलाके में एक फैक्ट्री में लगी आग में 43 लोगों की मौत हो गई थी। उसी वर्ष गुजरात के सूरत में एक कोचिंग सेंटर में आग लगने से 22 छात्रों की जान चली गई थी। वर्ष 2021 में महाराष्ट्र के भंडारा जिला अस्पताल में आग लगने से नवजात शिशुओं सहित 10 बच्चों की मौत हुई थी जबकि इसी वर्ष अहमदाबाद के एक कोविड अस्पताल में भीषण आग ने कई मरीजों की जान ले ली थी। इसके अलावा कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल अग्निकांड 2011 में 90 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जिसे देश के सबसे बड़े अस्पताल अग्निकांडों में गिना जाता है। इन घटनाओं के बाद हर बार जांच समितियां बनीं, रिपोर्टें आईं और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के दावे किए गए लेकिन समय के साथ अधिकांश सुझाव फाइलों में ही दबकर रह गए। इन सभी हादसों में एक ही समानता थी सुरक्षा नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही।
एनसीआरबी के हालिया आंकड़ों के अनुसार आग लगने की घटनाएं भारत में दुर्घटना जनित मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इनमें बड़ी संख्या उन हादसों की होती है जो शाॅर्ट सर्किट, सुरक्षा मानकों की अनदेखी, अवैध निर्माण और आपातकालीन निकास की कमी के कारण होते हैं।

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