कर्नाटक में कांग्रेस द्वारा सिद्धारमैया को सम्मानजनक तरीके से मुख्यमंत्री पद से हटाकर डीके शिवकुमार को आगे बढ़ाने के बाद राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे हैं कि क्या भविष्य में कांग्रेस राजस्थान में भी ऐसा ही फार्मूला अपनाकर अशोक गहलोत की जगह सचिन पायलट को आगे कर सकती है? राजनीतिक जानकारों कहते हैं कि कर्नाटक के ताजा घटनाक्रम के बाद राजस्थान में भी इसकी चर्चा स्वाभाविक है जहां तक सवाल है कि क्या कांग्रेस भविष्य में राजस्थान में भी नेतृत्व परिवर्तन का जोखिम उठाएगी का तो फिलहाल गहलोत का संगठन और विधायकों पर मजबूत पकड़ बरकरार मानी जाती है लेकिन सचिन पायलट की लोकप्रियता और युवा छवि भी पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकती। ऐसे में आने वाले समय में राजस्थान कांग्रेस की राजनीति और दिलचस्प होने सम्भावना जरूर जताई जा सकती है। गौरतलब है कि कर्नाटक और राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में काफी समानताएं रही हैं। कर्नाटक में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच लम्बे समय से नेतृत्व को लेकर खींचतान चल रही थी तो राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच सियासी टकराव किसी से छिपा नहीं है। दोनों राज्यों में एक तरफ जनाधार वाले वरिष्ठ नेता हैं तो दूसरी ओर संगठन और युवा चेहरे के रूप में उभरते सितारे। राजस्थान में 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी तो सचिन पायलट प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर मजबूत दावेदार थे लेकिन राजनीतिक अनुभव और रणनीति के दम पर अशोक गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। पायलट को डिप्टी सीएम बनाकर संतुलन साधने की कोशिश हुई जरूर मगर यह प्रयोग ज्यादा दिन नहीं चल सका। बाद में पायलट की बगावत और मानेसर प्रकरण ने कांग्रेस को भारी संकट में डाल दिया था। हालांकि पार्टी ने बाद में पायलट को फिर से महत्व देना शुरू किया लेकिन गहलोत और पायलट खेमे की खींचतान पूरी तरह खत्म नहीं हुई। अब 2028 विधानसभा चुनाव को देखते हुए दोनों गुट अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं।

घर वापसी करेंगे बोगो सिंह?

पिछले हफ्ते राष्ट्रीय जनता दल की तेज-तर्रार और फायर ब्रांड नेता रितु जायसवाल भाजपा में शामिल हुई थीं। अब बेगूसराय जिले की मटिहानी सीट से आरजेडी विधायक नरेंद्र कुमार सिंह उर्फ बोगो सिंह अचानक जनता दल यूनाइटेड के प्रदेश कार्यालय पहुंच गए जहां उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार से काफी देर तक मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद बिहार की सियासत में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। बोगो सिंह लम्बे समय तक जेडीयू में रहे हैं लेकिन 2025 विधानसभा चुनाव से पहले टिकट की तलाश में आरजेडी में शामिल हुए थे और मटिहानी से चुनाव जीतने में सफल भी रहे। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि क्या उनका मन फिर बदल रहा है? क्या बोगो सिंह एक बार फिर जेडीयू में घर वापसी की तैयारी कर रहे हैं? हालांकि मीडिया से बातचीत में बोगो सिंह ने इन अटकलों को खारिज करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि वह पहले निशांत कुमार के कार्यालय मिलने गए थे लेकिन वहां मुलाकात नहीं हो सकी। बाद में पता चला कि वह जेडीयू कार्यालय में जनता दरबार में मौजूद हैं, इसलिए वहीं जाकर मुलाकात कर ली। बिहार की राजनीति में सिर्फ मुलाकातें ही अक्सर बड़े सियासी संकेत मानी जाती हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि चुनाव आयोग द्वारा बिहार में एमएलसी चुनाव की घोषणा के बाद प्रदेश का सियासी पारा चढ़ गया है। आरजेडी से लम्बे समय तक जुड़ी रितु जायसवाल के भाजपा में जाने के बाद एनडीए नेताओं के लगातार ऐसे बयान आ रहे हैं कि विपक्ष में जल्द बड़ी भगदड़ देखने को मिल सकती है। ऐसे में बोगो सिंह और निशांत कुमार की मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह सिर्फ एक शिष्टाचार मुलाकात थी या फिर बिहार की राजनीति में किसी बड़े बदलाव का संकेत।

बंगाल में दोहराया जाएगा ‘महाराष्ट्र माॅडल’

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जो घटनाक्रम देखने को मिल रहा है उसने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस अपने गठन के बाद सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना करती दिखाई दे रही है। पार्टी के 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी अपने राजनीतिक करियर की सबसे कड़ी चुनौती से जूझ रही हैं? क्या सत्ता ही तृणमूल को एकजुट रखने का एकमात्र जरिया थी? क्या बंगाल में भी ‘महाराष्ट्र माॅडल’ दोहराया जा रहा है, जैसे कुछ वर्ष पहले शिवसेना और एनसीपी में बड़ी संख्या में विधायकों के समर्थन के बल पर दोनों पार्टी के भीतर नई शक्ति संरचना उभरी थी। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना को दो हिस्सों में बांट दिया था तो अजित पवार के नेतृत्व में एनसीपी टूट गई थी। अब बंगाल में भी 58 विधायक बागी खेमे के साथ दिखाई दे रहे हैं जो दो-तिहाई से अधिक संख्या है। दल-बदल कानून के तहत यह आंकड़ा बेहद महत्वपूर्ण है। बताया जा रहा है कि विधानसभा अध्यक्ष ने बागी गुट को अलग विधायी दल के रूप में मान्यता देने की प्रक्रिया को स्वीकार कर लिया है और ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता भी मिल चुकी है। यह टीएमसी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि बंगाल की स्थिति महाराष्ट्र से पूरी तरह समान नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बागी विधायक अभी भी ममता बनर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए उन्हें मार्गदर्शक की भूमिका देने की बात कर रहे हैं। असल असंतोष पार्टी की वर्तमान कार्यप्रणाली और नेतृत्व संरचना को लेकर बताया जा रहा है। बढ़ते संकट को देखते हुए टीएमसी नेतृत्व ने राज्य की सभी संगठनात्मक समितियों और प्रकोष्ठों को भंग कर दिया है जिसे पार्टी पर दोबारा नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि बंगाल में महाराष्ट्र जैसा पूर्ण राजनीतिक परिवर्तन होगा या नहीं लेकिन इतना तय है कि टीएमसी की यह टूट राज्य की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत कर चुकी है। यदि बागी गुट अपनी एकजुटता बनाए रखता है तो आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति का चेहरा पूरी तरह बदल सकता है।

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