Country

एआई की बढ़ती भूख और गर्म होती धरती

दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे डेटा सेंटर अब केवल बिजली और पानी की भारी खपत के कारण ही नहीं बल्कि स्थानीय तापमान बढ़ाने के कारण भी चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के नेतृत्व में हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि एआई डेटा सेंटरों के आस-पास भूमि का तापमान औसतन 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ रहा है जबकि कुछ क्षेत्रों में यह वृद्धि 9 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने इस घटना को ‘डेटा हीट आइलैंड इफेक्ट’ नाम दिया है। अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में लगभग 34 करोड़ लोग ऐसे डेटा सेंटरों के 10 किलोमीटर दायरे में रहते हैं जहां इस अतिरिक्त गर्मी का प्रभाव महसूस किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई उद्योग के विस्फोटक विस्तार के साथ ऊर्जा, जल संसाधनों और स्थानीय जलवायु पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर वैश्विक स्तर पर नई बहस शुरू हो चुकी है

दुनिया आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की क्रांति का जश्न मना रही है। चैट जीपीटी, गेमिनी, क्लाड़े और अन्य एआई प्लेटफाॅर्म मानव जीवन, शिक्षा, चिकित्सा, प्रशासन और उद्योग के लगभग हर क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं लेकिन इस तकनीकी क्रांति के पीछे एक ऐसा पर्यावरणीय संकट तेजी से आकार ले रहा है जिस पर अब तक अपेक्षित गम्भीरता से चर्चा नहीं हुई है। अब तक एआई को लेकर मुख्य चिंताएं ऊर्जा खपत, कार्बन उत्सर्जन और पानी की खपत तक सीमित थीं लेकिन हाल में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने एक नई समस्या की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है, ‘डेटा हीट आइलैंड इफेक्ट’ अर्थात डेटा सेंटरों द्वारा पैदा किया जा रहा स्थानीय ताप द्वीप प्रभाव। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलाॅजिकल यूनिवर्सिटी तथा अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि एआई डेटा सेंटर केवल ऊर्जा उपभोक्ता नहीं हैं बल्कि वे अपने आस-पास के क्षेत्रों को गर्म भी कर रहे हैं। अध्ययन के अनुसार डेटा सेंटरों के आस-पास भूमि की सतह का तापमान औसतन 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है जबकि कुछ स्थानों पर यह वृद्धि 9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाती है। यह प्रभाव डेटा सेंटर से 10 किलोमीटर तक महसूस किया जा सकता है। यह निष्कर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज दुनिया भर में एआई आधारित डेटा सेंटरों का अभूतपूर्व विस्तार हो रहा है।
आखिर डेटा सेंटर होते क्या हैं?

जब कोई व्यक्ति  चैट जीपीटी से सवाल पूछता है, गूगल पर खोज करता है, ऑनलाइन वीडियो देखता है या क्लाउड सेवाओं का उपयोग करता है तो यह सारा काम विशाल डेटा सेंटरों के माध्यम से संचालित होता है। डेटा सेंटर मूल रूप से हजारों-लाखों कम्प्यूटर सर्वरों से भरी विशाल इमारतें होती हैं जो चैबीसों घंटे संचालित रहती हैं। एआई के लिए उपयोग किए जाने वाले सर्वर पारम्परिक सर्वरों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होते हैं क्योंकि उन्हें अरबों गणनाएं प्रति सेकंड करनी पड़ती हैं। एआई माॅडल जितने बड़े होते जा रहे हैं, उनकी ऊर्जा आवश्यकता भी उतनी ही बढ़ती जा रही है। इसी कारण एआई  डेटा सेंटर आज वैश्विक ऊर्जा खपत के सबसे तेजी से बढ़ते स्रोतों में शामिल हो चुके हैं।
बिजली की भूख : एक नया ऊर्जा संकट
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार 2024 में दुनियाभर के डेटा सेंटरों ने लगभग 415 टेरावाट-घंटा (टीडब्ल्यूएच) बिजली की खपत की। यह वैश्विक बिजली खपत का लगभग 1.5 प्रतिशत है। एजेंसी का अनुमान है कि 2030 तक यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 945 टीडब्ल्यूएच तक पहुंच जाएगा। अर्थात केवल छह वर्षों में बिजली की मांग लगभग दोगुनी हो जाएगी। तुलना के लिए देखें तो 945 टीडब्ल्यूएच बिजली की खपत लगभग पूरे जापान की वर्तमान वार्षिक बिजली खपत के बराबर है। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई इस वृद्धि का सबसे बड़ा कारण है। कुछ आकलनों के अनुसार 2025 के अंत तक डेटा सेंटरों की कुल ऊर्जा खपत का लगभग आधा हिस्सा केवल एआई प्रणालियों द्वारा उपयोग किया जा सकता है।
हाइपर स्केल डेटा सेंटर : डिजिटल युग के बिजलीघर
सबसे अधिक ऊर्जा की खपत तथाकथित ‘हाइपरस्केल डाटा सेंटर’ करते हैं। ये विशाल परिसर हजारों सर्वरों और अत्याधुनिक  एआई चिपों से लैस होते हैं। ऐसे डेटा सेंटर आमतौर पर 100 से 300 मेगावाट बिजली की लगातार मांग करते हैं। यह इतनी बिजली है जिससे लाखों लोगों वाले एक मध्यम आकार के शहर को ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकती है। आज माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन, गूगल, मेटा और ओरेकल जैसी कम्पनियां दुनियाभर में ऐसे हाइपर स्केल केंद्र स्थापित कर रही हैं। गोल्डमैन सॅक्स के अनुसार 2025 से 2030 के बीच केवल माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन, अल्फाबेट (गूगल) और मेटा एआई अवसंरचना पर लगभग 5.3 ट्रिलियन डाॅलर का पूंजीगत निवेश कर सकती हैं।
जब कम्प्यूटर पृथ्वी को गर्म करने लगे
डेटा सेंटरों में प्रयुक्त प्रोसेसर अरबों गणनाएं करते हैं। ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा अंततः ऊष्मा में बदल जाता है। यदि इस गर्मी को बाहर नहीं निकाला जाए तो सर्वर कुछ ही मिनटों में क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। यही कारण है कि डेटा सेंटरों में विशाल शीतलन प्रणालियां लगाई जाती हैं लेकिन यह गर्मी कहीं न कहीं तो जाती है। अब वैज्ञानिकों ने पाया है कि इसका बड़ा हिस्सा आसपास के वातावरण में फैलता है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अध्ययन ने नासा के उपग्रह आंकड़ों का उपयोग करते हुए 2004 से 2024 तक के तापमान रिकाॅर्ड का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं ने 11,000 से अधिक डेटा सेंटरों की भौगोलिक स्थिति और स्थानीय तापमान में हुए बदलावों का तुलनात्मक अध्ययन किया। परिणाम चौंकाने वाले थे। डेटा सेंटरों के संचालन शुरू होने के बाद आस-पास की भूमि का तापमान औसतन 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ा पाया गया। कई क्षेत्रों में यह वृद्धि 9.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंची। वैज्ञानिकों ने इस नई घटना को ‘डेटा हीट आइलैंड’ नाम दिया है।
शहरी ताप द्वीप से भी बड़ा खतरा?
अब तक वैज्ञानिक ‘अर्बन हीट आइलैंड’ अर्थात शहरी ताप द्वीप प्रभाव के बारे में जानते थे। कंक्रीट, डामर, वाहन, एयर कंडीशनर और उद्योगों के कारण शहर अपने आस-पास के ग्रामीण इलाकों से अधिक गर्म हो जाते हैं लेकिन डेटा हीट आइलैंड इससे अलग है। यह प्रभाव विशेष रूप से उन क्षेत्रों में भी देखा जा रहा है जहां जनसंख्या घनत्व कम है। इसका मतलब है कि तापमान वृद्धि का स्रोत सीधे डेटा सेंटरों से निकलने वाली ऊष्मा है, न कि केवल शहरीकरण। कुछ वैज्ञानिकों ने इसकी तुलना हजारों छोटे-छोटे अग्निकुंडों से की है जो लगातार गर्मी छोड़ रहे हैं।
34 करोड़ लोगों पर सम्भावित असर
अध्ययन का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष यह है कि दुनियाभर में 34 करोड़ से अधिक लोग ऐसे डेटा सेंटरों के 10 किलोमीटर दायरे में रहते हैं जहां यह ताप प्रभाव महसूस किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका प्रभाव कई स्तरों पर पड़ सकता है,  हीट वेव के दौरान अतिरिक्त गर्मी, बिजली की मांग में वृद्धि, एयर कंडीशनर पर निर्भरता बढ़ना, बुजुर्गों और बच्चों में स्वास्थ्य जोखिम, स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव तथा शहरी नियोजन की नई चुनौतियां। यदि जलवायु परिवर्तन के कारण पहले से गर्म होते क्षेत्रों में बड़े डेटा सेंटर स्थापित किए जाते हैं तो समस्या और गम्भीर हो सकती है।
पानी का दूसरा संकट
एआई डेटा सेंटर केवल बिजली नहीं खाते, वे भारी मात्रा में पानी भी उपयोग करते हैं। 100 मेगावाट क्षमता वाला एक बड़ा डेटा सेंटर प्रतिवर्ष लगभग 2.5 अरब लीटर पानी उपयोग कर सकता है। यह लगभग 80,000 लोगों की वार्षिक जल आवश्यकता के बराबर है। कई देशों में स्थानीय समुदाय पहले से ही इस बात को लेकर चिंतित हैं कि डेटा सेंटर उनके भूजल संसाधनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। जैसे-जैसे एआई का विस्तार होगा, पानी और ऊर्जा दोनों की मांग तेजी से बढ़ने वाली है।
अमेरिका से भारत तक फैलता डेटा सेंटर साम्राज्य
जून 2026 तक दुनिया में 11,600 से अधिक डेटा सेंटर सक्रिय बताए जा रहे हैं। सबसे अधिक डेटा सेंटर अमेरिका में हैं, जहां इनकी संख्या 4,300 से अधिक है। यूरोप दूसरा सबसे बड़ा केंद्र है। एशिया में चीन और भारत तेजी से उभर रहे हैं। भारत में 300 से अधिक डेटा सेंटर मौजूद हैं और यह संख्या आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ने की सम्भावना है। भारत में मुम्बई, चेन्नई, हैदराबाद, नोएडा और बेंगलुरु डेटा सेंटर हब के रूप में विकसित हो रहे हैं। डिजिटल इंडिया, क्लाउड सेवाओं और एआई उद्योग के विस्तार के कारण यहां बड़े पैमाने पर निवेश हो रहा है।
जलवायु परिवर्तन के समीकरण में नई कड़ी
अब तक डेटा सेंटरों के पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन मुख्य रूप से कार्बन उत्सर्जन के आधार पर किया जाता था लेकिन नया शोध संकेत देता है कि स्थानीय तापमान वृद्धि स्वयं एक अलग पर्यावरणीय चुनौती है। हाल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार अमेरिका के 403 बड़े हाइपरस्केल डेटा सेंटर अकेले 68 से 99 टीडब्ल्यूएच बिजली की खपत कर रहे हैं तथा इनके ऊर्जा स्रोतों का बड़ा हिस्सा अभी भी जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर है। इसका अर्थ है कि डेटा सेंटर एक तरफ अप्रत्यक्ष रूप से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ाते हैं और दूसरी तरफ प्रत्यक्ष रूप से स्थानीय तापमान भी बढ़ा सकते हैं।
सरकारें अब सतर्क होने लगी हैं
यूरोपीय संघ ने हाल ही में डेटा सेंटरों के लिए ऊर्जा दक्षता और जल उपयोग से जुड़े नए मानकों पर काम शुरू किया है। प्रस्तावित नियमों के तहत बड़े डेटा सेंटरों को अपने पानी, ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा उपयोग से सम्बंधित आंकड़े सार्वजनिक करने पड़ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में डेटा सेंटरों के लिए केवल कार्बन उत्सर्जन ही नहीं बल्कि स्थानीय ताप प्रभाव और जल उपयोग भी नियामकीय बहस का हिस्सा बनेंगे।
क्या एआई का भविष्य टिकाऊ हो सकता है?
एआई उद्योग का तर्क है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता चिकित्सा अनुसंधान, जलवायु माॅडलिंग, ऊर्जा दक्षता और वैज्ञानिक खोजों में क्रांतिकारी योगदान दे सकती है। यह तर्क सही भी है लेकिन अब यह स्पष्ट हो रहा है कि एआई कोई अमूर्त या केवल डिजिटल तकनीक नहीं है। इसके पीछे विशाल भौतिक अवसंरचना, बिजली संयंत्र, जल संसाधन, भूमि और पर्यावरणीय लागत जुड़ी हुई है। कैम्ब्रिज अध्ययन ने पहली बार यह प्रमाणित करने की कोशिश की है कि डेटा सेंटर केवल कार्बन उत्सर्जन की समस्या नहीं हैं बल्कि वे स्थानीय स्तर पर पृथ्वी के तापमान को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं होगा कि एआई कितना बुद्धिमान बनता है बल्कि यह भी होगा कि क्या मानवता उसकी ऊर्जा, पानी और तापीय लागत को वहन कर पाएगी। एआई की दौड़ जितनी तेज हो रही है, उतनी ही तेजी से यह बहस भी उभर रही है कि कहीं डिजिटल क्रांति पृथ्वी के लिए एक नए जलवायु संकट का कारण तो नहीं बन रही।

You may also like