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संघ की फंडिंग पर सियासी घमासान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्षों के इतिहास में उस पर तीन बार प्रतिबंध लगाए गए, उसकी विचारधारा और राजनीतिक प्रभाव को लेकर लगातार बहस होती रही लेकिन उसकी फंडिंग, कानूनी स्थिति और संगठनात्मक जवाबदेही को लेकर कभी वैसी राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा नहीं हुई जैसी आज दिखाई दे रही है। कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खड़गे द्वारा उठाए गए सवालों ने संघ और भाजपा को लेकर चल रही राजनीतिक लड़ाई को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। खड़गे ने संघ प्रमुख मोहन भागवत से पूछा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पैसा कहां से आता है, उसका कानूनी स्वरूप क्या है और यदि वह देश की राजनीति, समाज और सार्वजनिक जीवन को इतना प्रभावित करता है तो उसकी जवाबदेही किसके प्रति है। मोहन भागवत ने इसके जवाब में कहा है कि संघ कोई सरकारी अनुदान नहीं लेता, पिछले सौ वर्षों से बिना पंजीकरण के काम कर रहा है और उसे किसी विशेष रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं है। देखने में यह एक सामान्य राजनीतिक विवाद लग सकता है लेकिन वास्तव में यह विवाद कहीं अधिक गहरा है। यह केवल कांग्रेस और संघ के बीच का टकराव नहीं है। यह उस मूल प्रश्न को सामने लाता है जो लम्बे समय से भारतीय राजनीति में मौजूद तो था लेकिन कभी राष्ट्रीय बहस का विषय नहीं बन पाया कि क्या देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-वैचारिक संगठन को भी वही पारदर्शिता और जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए जो अन्य संस्थाओं से अपेक्षित है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है लेकिन इस बार विवाद किसी चुनावी रणनीति, किसी साम्प्रदायिक तनाव, किसी बयान या किसी राजनीतिक अभियान को लेकर नहीं है। इस बार सवाल संघ की कानूनी स्थिति, उसके पंजीकरण, उसके आर्थिक स्रोतों और उसकी जवाबदेही को लेकर उठाया गया है। कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खड़गे ने संघ प्रमुख मोहन भागवत से पूछा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पैसा कहां से आता है? उसका कानूनी स्वरूप क्या है? यदि वह देश की राजनीति, समाज और सार्वजनिक जीवन को इतना प्रभावित करता है तो उसकी जवाबदेही किसके प्रति है? मोहन भागवत ने इसके जवाब में कहा है कि संघ कोई सरकारी अनुदान नहीं लेता, पिछले सौ वर्षों से बिना पंजीकरण के काम कर रहा है और उसे किसी विशेष रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं है। देखने में यह एक सामान्य राजनीतिक विवाद लग सकता है लेकिन वास्तव में यह विवाद कहीं अधिक गहरा है। यह केवल कांग्रेस और संघ के बीच का टकराव नहीं है। यह उस मूल प्रश्न को सामने लाता है जो लम्बे समय से भारतीय राजनीति में मौजूद तो था लेकिन कभी राष्ट्रीय बहस का विषय नहीं बन पाया कि क्या देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-वैचारिक संगठन को भी वही पारदर्शिता और जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए जो अन्य संस्थाओं से अपेक्षित है?

इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए संघ के इतिहास को समझना आवश्यक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। संघ का घोषित उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना, अनुशासन और राष्ट्र भावना का विकास करना था। स्थापना के समय से ही संघ को लेकर दो धाराएं मौजूद रहीं। समर्थकों ने उसे राष्ट्र निर्माण का संगठन बताया जबकि आलोचकों ने उसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ऐसी परियोजना माना जो भारतीय राष्ट्रवाद की कांग्रेसवादी और बहुलतावादी अवधारणा से भिन्न थी।

संघ को लेकर सबसे पुराना और सबसे बड़ा विवाद स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका को लेकर रहा है।
आलोचक लगातार कहते रहे हैं कि संघ ने अंग्रेजों के खिलाफ चलाए गए प्रमुख आंदोलनों में प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं की। न वह ‘असहयोग आंदोलन’ में दिखाई देता है, न ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ में और न ही ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उसकी कोई उल्लेखनीय भूमिका दर्ज है। कांग्रेस, समाजवादी नेता, क्रांतिकारी संगठन और वामपंथी समूह जहां जेल जा रहे थे, वहीं संघ संगठन निर्माण में लगा हुआ था। संघ समर्थकों का तर्क है कि उनका उद्देश्य प्रत्यक्ष राजनीतिक आंदोलन नहीं बल्कि समाज का संगठन था और उन्होंने राष्ट्र निर्माण की दीर्घकालिक प्रक्रिया पर ध्यान दिया लेकिन यह तथ्य भी उतना ही सत्य है कि स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका को लेकर प्रश्न आज भी समाप्त नहीं हुए हैं। यही कारण है कि उसके आलोचक समय-समय पर इस मुद्दे को उठाते रहते हैं।

तिरंगे को लेकर भी संघ का इतिहास विवादों से मुक्त नहीं रहा है। संघ लम्बे समय तक भगवा ध्वज को अपने आदर्श और प्रेरणा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता रहा। स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक नागपुर स्थित संघ मुख्यालय पर नियमित रूप से तिरंगा नहीं फहराया गया। बाद में संघ ने सार्वजनिक रूप से तिरंगे के प्रति सम्मान व्यक्त किया और आज संघ के कार्यक्रमों में राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग सामान्य बात है लेकिन उसके राजनीतिक विरोधी आज भी इस ऐतिहासिक विवाद को संघ के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण तर्क के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

स्वतंत्र भारत में संघ का इतिहास प्रतिबंधों के इतिहास से भी जुड़ा हुआ है। 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद देशभर में आक्रोश फैल गया। नाथूराम गोडसे कभी संघ से जुड़ा रहा था या नहीं, इस पर अलग-अलग दावे किए जाते हैं लेकिन तत्कालीन सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय सरकार का मानना था कि देश में जो सांप्रदायिक वातावरण बना उसमें संघ से जुड़े तत्वों की भूमिका रही है। बाद में जांच और राजनीतिक संवाद के बाद प्रतिबंध हटा लिया गया। संघ ने संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता का आश्वासन दिया और संगठन फिर सक्रिय हो गया।

दूसरी बार संघ पर प्रतिबंध 1975 में लगा जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित किया। संघ को लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों का नहीं बल्कि राजनीतिक चुनौती का केंद्र माना गया। हजारों स्वयंसेवक गिरफ्तार किए गए, कार्यालयों पर कार्रवाई हुई और संगठन को भूमिगत होकर काम करना पड़ा। आपातकाल विरोधी आंदोलन में संघ की भूमिका को उसके समर्थक अपने इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते हैं। 1977 में जनता पार्टी सरकार बनने के बाद प्रतिबंध समाप्त हो गया।

तीसरी बार 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। केंद्र सरकार का आरोप था कि संघ परिवार से जुड़े संगठनों की गतिविधियों ने ऐसा वातावरण तैयार किया जिसने विवादित ढांचे के विध्वंस का मार्ग प्रशस्त किया। बाद में यह प्रतिबंध भी स्थायी नहीं रहा और हटा लिया गया लेकिन इन तीनों अवसरों पर संघ की विचारधारा, उसकी भूमिका और उसके प्रभाव पर प्रश्न उठे लेकिन उसकी फंडिंग और कानूनी स्थिति को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा शायद ही कभी बनाया गया।

यहीं से वर्तमान विवाद का महत्व बढ़ जाता है। आज का संघ केवल एक संगठन नहीं है। उसके आस-पास एक विशाल नेटवर्क विकसित हो चुका है जिसे आमतौर पर ‘संघ परिवार’ कहा जाता है। ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’, ‘भारतीय मजदूर संघ’, ‘विश्व हिंदू परिषद’, ‘विद्या भारती’, ‘सेवा भारती’, ‘वनवासी कल्याण आश्रम’, ‘संस्कार भारती’, ‘भारतीय किसान संघ’ और ऐसे सैकड़ों संगठन विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं। भाजपा संघ को अपना वैचारिक प्रेरणा स्रोत मानती रही है। देश के अनेक मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद और विधायक संघ की पृष्ठभूमि से आते रहे हैं। संघ प्रमुख के भाषण राष्ट्रीय समाचार बनते हैं और उसके विचारों का प्रभाव केवल सामाजिक क्षेत्र तक सीमित नहीं माना जाता।

यही कारण है कि संघ के आलोचक कहते हैं कि यदि कोई संगठन देश की राजनीति, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक विमर्श और नीति निर्माण को प्रभावित करता है तो उसकी संरचना और आर्थिक स्रोतों के बारे में अधिक जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। प्रियांक खड़गे का मूल तर्क भी यही है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में कोई भी संस्था इतनी बड़ी नहीं हो सकती कि उससे प्रश्न न पूछे जा सकें।

इस तर्क को बल देने के लिए संघ के आलोचक एक और उदाहरण देते हैं। भारत में हजारों धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं पंजीकृत ढांचे के अंतर्गत काम करती हैं। तिरुपति देवस्थानम, वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड, सिद्धिविनायक ट्रस्ट, स्वर्ण मंदिर का प्रबंधन, चर्च संस्थाएं, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, आर्ट आॅफ
लिविंग, ईशा फाउंडेशन और अनेक अन्य धार्मिक-सामाजिक संगठन दान प्राप्त करते हैं, संपत्तियां संचालित करते हैं और विभिन्न कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत काम करते हैं। इनमें से अधिकांश संस्थाओं के पास लेखा-जोखा, ऑडिट और प्रशासनिक ढांचे की व्यवस्था होती है। आलोचक पूछते हैं कि यदि अन्य धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं यह कर सकती हैं तो संघ के लिए अलग व्यवस्था क्यों होनी चाहिए। दूसरी ओर संघ और उसके समर्थकों का कहना है कि संघ कोई व्यावसायिक संस्था नहीं है, न ही वह सरकारी अनुदान पर चलता है। संघ स्वयंसेवकों के योगदान और गुरु दक्षिणा की परम्परा से संचालित होता है। उसकी शाखाएं खुले मैदानों में लगती हैं, उसके कार्यक्रम सार्वजनिक होते हैं और उसके कार्यकर्ताओं की गतिविधियां किसी से छिपी नहीं हैं। इसलिए वर्तमान विवाद को वे पारदर्शिता का प्रश्न नहीं बल्कि राजनीतिक हमला मानते हैं।

यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न खड़ा होता है। यदि संघ पर इतने गम्भीर आरोप और विवाद पहले भी रहे हैं तो उसकी फंडिंग का प्रश्न अब क्यों उठ रहा है? जवाहरलाल नेहरू संघ के आलोचक थे। सरदार पटेल और संघ के सम्बंध भी हमेशा सहज नहीं रहे। इंदिरा गांधी ने संघ पर प्रतिबंध लगाया। वामपंथी दल दशकों से संघ की विचारधारा का विरोध करते रहे हैं लेकिन इन नेताओं और दलों ने कभी संघ की फंडिंग को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया। इसका कारण यह था कि उस दौर की राजनीति में वैचारिक संघर्ष तो था मगर प्रतिद्वंद्वी के अस्तित्व को अवैध साबित करने की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम थी।

आज की राजनीति में परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भाजपा विपक्ष पर भ्रष्टाचार, परिवारवाद और राष्ट्रविरोधी राजनीति के आरोप लगाती है। विपक्ष भाजपा पर संस्थाओं के दुरुपयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाता है। परिणामस्वरूप राजनीतिक संघर्ष वैचारिक असहमति से आगे बढ़कर वैधता के संघर्ष में बदलता दिखाई देता है। हर पक्ष दूसरे को केवल गलत नहीं बल्कि नैतिक और कानूनी रूप से संदिग्ध साबित करना चाहता है। संघ पर उठे ताजा सवालों को इसी व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। फिर भी यह कहना गलत होगा कि उठाए गए सभी प्रश्न केवल राजनीति से प्रेरित हैं। लोकतंत्र में किसी भी प्रभावशाली संस्था से प्रश्न पूछना अस्वाभाविक नहीं है। जितना बड़ा प्रभाव होगा, उतनी ही अधिक जवाबदेही की मांग भी होगी। संघ यदि स्वयं को केवल सांस्कृतिक संगठन मानता है तो आलोचक पूछेंगे कि उसका राजनीतिक प्रभाव इतना व्यापक क्यों है। यदि वह राजनीतिक प्रभाव स्वीकार करता है तो फिर पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रश्न भी सामने आएंगे। यही इस बहस का मूल द्वंद्व है।

सौ वर्ष पूरे कर चुका आरएसएस आज भारतीय सार्वजनिक जीवन की सबसे प्रभावशाली संस्थाओं में से एक है। उसके समर्थक उसे राष्ट्र निर्माण की शक्ति मानते हैं, उसके विरोधी उसे भारतीय राजनीति में वैचारिक वर्चस्व स्थापित करने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं लेकिन दोनों पक्ष एक बात से इनकार नहीं कर सकते कि संघ अब भारतीय लोकतंत्र का एक स्थायी और शक्तिशाली तथ्य बन चुका है। ऐसे में उससे जुड़े प्रश्न भी समाप्त नहीं होंगे। प्रियांक खड़गे का पत्र और मोहन भागवत का जवाब उसी लम्बे विमर्श का नया अध्याय है। वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि संघ का पैसा कहां से आता है या उसे पंजीकरण कराना चाहिए या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि लोकतंत्र में प्रभाव और जवाबदेही का सम्बंध क्या होना चाहिए। क्या सौ वर्षों से सक्रिय और करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले संगठन से अतिरिक्त पारदर्शिता की अपेक्षा की जानी चाहिए या उसे उसकी ऐतिहासिक परम्पराओं के साथ काम करने दिया जाना चाहिए? आने वाले वर्षों में यह बहस और तेज होगी लेकिन इतना निश्चित है कि संघ पर उठे ये सवाल केवल संघ तक सीमित नहीं रहेंगे। वे भारत के लोकतंत्र, उसकी संस्थाओं और उसकी राजनीतिक संस्कृति के भविष्य से भी जुड़े हुए हैं बल्कि भारतीय राजनीति में बढ़ती वैचारिक ध्रुवीकरण, प्रतिशोध की राजनीति और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बदलते मानकों का भी संकेत माना जा रहा है।

बात अपनी-अपनी

आरएसएस देश का सबसे गैर जिम्मेदार और गैर कानूनी संगठन है। इस संगठन ने देश हित में आज तक कोई अच्छा काम नहीं किया है। इसकी फितरत में ही नकारात्मकता समाई हुई है। देश के आजाद होने से पूर्व और अब तक यह संगठन इसी तर्ज पर काम कर रहा है। चाहे महात्मा गांधी जी की हत्या हो, चाहे हिंदू-मुस्लिम दंगे, इन सभी में यह संगठन अग्रणी भूमिका में रहता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस संगठन के द्वारा आज तक न तो आईटीआर दाखिल की गई है और न ही इसके चंदा का कोई हिसाब-किताब है। भारतीय कानून के तहत इस संगठन का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए था लेकिन वह आज तक नहीं किया गया है। देश हित में इस पर अनिवार्य रूप से प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

राजकुमार भाटी, वरिष्ठ प्रवक्ता, समाजवादी पार्टी

संघ एक संस्था है जिसकी लाखों शाखाएं चलती हैं। ऐसे में किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन होना जरूरी है क्योंकि इससे संस्था में दान का पता भी चल जाता है। जब सरकार हर उस संस्था पर प्रतिबंध लगा देती है और कार्यवाही कर देती है जिनका रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ होता है तो संघ का भी रजिस्ट्रेशन कराना चाहिए, अगर रजिस्ट्रेशन नहीं है तो जैसे अन्य के खिलाफ जांच होती है ऐसी ही जांच सरकार को संघ की भी करा देनी चाहिए। इसकी जांच होनी इसलिए भी जरूरी है कि कहीं संस्था को कोई आतंकवादी संगठन फंड तो नहीं दे रहा है।

सुप्रिया श्रीनेत, राष्ट्रीय प्रवक्ता, कांग्रेस

कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने एक चिट्ठी संघ प्रमुख मोहन भागवत को लिखी है । यह एक सामान्य प्रक्रिया है, कोई भी किसी को चिट्ठी लिख सकता है लेकिन इस पर जिस तरह की हाय-तौबा की जा रही है वह गलत है। खड़गे क्या किसी को भी अधिकार है कि वह चिट्ठी लिख सकता है और संघ के रजिस्ट्रेशन की बाबत पूछ सकता है। मोदी जी संघ को विश्व का सबसे बड़ा संगठन मानते हैं तो स्वाभाविक है कि इस संगठन की पूरी ट्रांसपेरेंसी होनी चाहिए। संघ को भी अपनी व्यापक सोच को प्रदर्शित करना चाहिए और अपना रजिस्ट्रेशन दिखाना चाहिए, अगर रजिस्ट्रेशन नहीं है तो इस पर सवाल तो उठने जायज हैं ही। सबसे बड़ी बात यह है कि इस समय देश में संघ की सरकार भी चल रही है। ऐसे में सवाल उठेंगे ही।

विनोद अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार

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