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चंदा चोरी जांच की जद में ट्रस्ट

अयोध्या राम मंदिर की दान पेटियों से कथित चोरी के मामले में पुलिस की जांच अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों तक पहुंच गई है। जांच का फोकस केवल गिरफ्तार आरोपियों पर नहीं बल्कि पूरी नकदी प्रबंधन व्यवस्था, नियुक्तियों की प्रक्रिया और जवाबदेही की श्ृंखला पर है। प्रारम्भिक पड़ताल में सामने आई खामियों के बाद ट्रस्ट भी अपनी वित्तीय व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है

अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान की कथित चोरी और गबन का मामला अब केवल आपराधिक घटना नहीं रह गया है। जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पुलिस की नजर केवल उन लोगों पर नहीं है जिन्हें गिरफ्तार किया गया है बल्कि उस पूरी प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था पर है जिसके माध्यम से प्रतिदिन लाखों रुपए के दान का संग्रह, गिनती और बैंक में जमा करने की प्रक्रिया संचालित होती थी। यही कारण है कि अब जांच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों तक पहुंच गई है। पुलिस ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा से मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था, कर्मचारियों की नियुक्ति, दान पेटियों की निगरानी तथा नकदी प्रबंधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी जुटा रही है।

25 जून को दर्ज एफआईआर के बाद अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें अविनाश शुक्ला, लवकुश मिश्रा, अंकल्प मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय, रामाशंकर मिश्रा, टिन्नू यादव और सुभाष श्रीवास्तव शामिल हैं। सभी फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं। पुलिस का कहना है कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे और गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं। जांच एजेंसियों को संदेह है कि पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों पर लापरवाही अथवा मिलीभगत की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
पुलिस का सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले दान की सुरक्षा और लेखा-जोखा की व्यवस्था किस प्रकार संचालित की जा रही थी। जांच अधिकारी यह पता लगाने में जुटे हैं कि दान पेटियों को खोलने का अधिकार किन लोगों के पास था, नकदी की गिनती किन अधिकारियों या कर्मचारियों की मौजूदगी में होती थी, गिनती पूरी होने के बाद रकम को सुरक्षित रखने की व्यवस्था क्या थी और उसे बैंक तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किसके पास थी। इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि पूरी प्रक्रिया पर निगरानी रखने वाला अधिकारी कौन था और क्या प्रत्येक चरण का कोई लिखित रिकाॅर्ड या सत्यापन तंत्र मौजूद था।
जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू गिरफ्तार किए गए कर्मचारियों की नियुक्ति से भी जुड़ा है। पुलिस यह जानना चाहती है कि इन आठ लोगों की नियुक्ति किस आधार पर की गई थी, किसने उनकी सिफारिश की थी और क्या उनके चरित्र सत्यापन तथा पृष्ठभूमि की औपचारिक जांच की गई थी। यही कारण है कि ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों से इन नियुक्तियों की पूरी जानकारी मांगी गई है। सूत्रों के अनुसार पुलिस यह भी समझने का प्रयास कर रही है कि गिरफ्तार सभी लोग किस अधिकारी या पदाधिकारी के अधीन काम करते थे और उन्हें नकदी सम्बंधी जिम्मेदारियां किसके निर्देश पर सौंपी गई थीं।

जांच में अब तक जो तथ्य सामने आए हैं, वे मंदिर की नकदी प्रबंधन व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करते हैं। बताया जा रहा है कि बड़ी संख्या में ऐसे अनौपचारिक कर्मचारी और स्वयंसेवक मंदिर परिसर में कार्यरत थे जिन्हें लगभग पूरे परिसर तक निर्बाध पहुंच प्राप्त थी। इन्हें मासिक मानदेय दिया जाता था और इनमें से कुछ को दान पेटियों से नकदी निकालने, उसकी गिनती करने और सम्बंधित कार्यों में भी लगाया गया था। प्रारम्भिक जांच से संकेत मिले हैं कि यह पूरी व्यवस्था आधुनिक वित्तीय नियंत्रण प्रणाली की अपेक्षा आपसी विश्वास पर अधिक आधारित थी। पुलिस अब यह जांच कर रही है कि क्या इसी ढीली व्यवस्था का फायदा उठाकर कथित चोरी को अंजाम दिया गया।

जांच एजेंसियां इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि दान पेटियों से निकाली गई नकदी बैंक तक किस प्रक्रिया के तहत पहुंचती थी। जानकारी के अनुसार नकदी को भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में जमा कराया जाता था। इसके लिए बैंक की ओर से एक निजी एजेंसी को नकदी की गिनती और बैंक तक पहुंचाने का कार्य सौंपा गया था। अब पुलिस इस निजी एजेंसी की भूमिका की भी विस्तार से जांच कर रही है। एजेंसी के चयन की प्रक्रिया, उसके कर्मचारियों की जिम्मेदारियां, मंदिर प्रशासन के साथ उसका समन्वय और पूरी प्रक्रिया के दौरान अपनाए गए सुरक्षा मानकों की भी समीक्षा की जा रही है। जेल में बंद एक आरोपी से इस संबंध में विस्तृत पूछताछ की गई है और माना जा रहा है कि इस पूछताछ से कुछ नए तथ्य सामने आए हैं। अधिकारियों का संकेत है कि जांच के आधार पर जल्द ही एक और गिरफ्तारी हो सकती है। मामले ने मंदिर प्रशासन की आंतरिक व्यवस्था को लेकर भी बहस छेड़ दी है। देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में शामिल राम मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और बड़ी मात्रा में नकद दान तथा अन्य मूल्यवान वस्तुएं चढ़ाते हैं। ऐसे संस्थान में सामान्यतः बहुस्तरीय निगरानी, डिजिटल रिकॉर्डिंग, सीसीटीवी निगरानी, दोहरी या तिहरी सत्यापन प्रणाली और नियमित ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं की अपेक्षा की जाती है। यदि जांच में यह साबित होता है कि इनमें से किसी व्यवस्था का प्रभावी ढंग से पालन नहीं हो रहा था तो यह केवल कुछ कर्मचारियों की कथित चोरी का मामला नहीं रहेगा बल्कि संस्थागत जवाबदेही का भी गम्भीर प्रश्न बन जाएगा।

इस घटनाक्रम के बाद ट्रस्ट भी अपनी पूरी नकदी प्रबंधन प्रणाली की समीक्षा में जुट गया है। सूत्रों के अनुसार भविष्य में अनौपचारिक कर्मचारियों को नकदी से जुड़े सभी कार्यों से अलग किया जा सकता है। उन्हें केवल प्रसाद वितरण, रसोई, कतार प्रबंधन, जूता-चप्पल गृह और अन्य सामान्य सेवाओं तक सीमित रखने की योजना है। नकदी की गिनती नियमित कर्मचारियों अथवा किसी विशेष पेशेवर एजेंसी के माध्यम से कराने पर विचार किया जा रहा है। इसके अलावा मंदिर परिसर में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए अधिक से अधिक क्यूआर कोड लगाए जाएंगे ताकि नकद लेन-देन कम हो और प्रत्येक दान का इलेक्ट्राॅनिक रिकाॅर्ड उपलब्ध रहे। आंतरिक आॅडिट व्यवस्था को भी और मजबूत बनाने की तैयारी की जा रही है। हालांकि अभी तक पुलिस ने ट्रस्ट के किसी वरिष्ठ पदाधिकारी को आरोपी नहीं बनाया है और न ही उनके खिलाफ किसी तरह के आपराधिक आरोप लगाए गए हैं। फिलहाल उनसे प्रशासनिक व्यवस्था और जिम्मेदारियों के सम्बंध में जानकारी जुटाई जा रही है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा लेकिन यह स्पष्ट है कि जांच अब केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं है कि कथित चोरी किसने की बल्कि यह भी जानने का प्रयास किया जा रहा है कि ऐसी घटना सम्भव कैसे हुई।

राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। इसलिए इस मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच केवल कानून का विषय नहीं बल्कि जनविश्वास से भी जुड़ा प्रश्न है। जांच यदि पूरी निष्पक्षता से अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचती है और उसके आधार पर वित्तीय प्रबंधन प्रणाली को अधिक जवाबदेह बनाया जाता है तो यह भविष्य में देश के अन्य बड़े धार्मिक ट्रस्टों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। वहीं यदि प्रशासनिक स्तर पर किसी प्रकार की लापरवाही या निगरानी में गम्भीर चूक सामने आती है तो उसकी जवाबदेही तय होना भी उतना ही आवश्यक होगा क्योंकि श्रद्धालुओं का दान केवल धन नहीं बल्कि उनकी आस्था और विश्वास की अमानत होता है।

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