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स्वर्णिम सितारे का अस्त, विरासत का उदय

निशानेबाजी के आकाश का एक स्वर्णिम सितारा भले ही अस्त हो गया हो लेकिन उसकी चमक आने वाली पीढ़ियों का मार्ग हमेशा रोशन करती रहेगी। जसपाल राणा शूटिंग के ऐसे शिल्पकार थे जिन्होंने अपने कौशल, समर्पण और मार्गदर्शन से इस खेल को नई पहचान दिलाई। खिलाड़ी के रूप में उन्होंने देश को गौरवान्वित किया और कोच के रूप में अनेक प्रतिभाओं को विश्व मंच तक पहुंचाया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अनुशासन, मेहनत और लक्ष्य के प्रति अटूट समर्पण से असम्भव को भी सम्भव बनाया जा सकता है। आज उनके जाने से खेल जगत ने एक महान खिलाड़ी, कुशल प्रशिक्षक और प्रेरणादायी व्यक्तित्व को खो दिया है लेकिन उनकी विरासत जीवित है। राणा का नाम भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। उनका संघर्ष, उनकी उपलब्धियां और उनका योगदान आने वाले वर्षों तक खिलाड़ियों को अपने लक्ष्य पर अडिग रहने की प्रेरणा देता रहेगा। वास्तव में एक स्वर्णिम सितारे का अस्त हुआ है लेकिन उसकी विरासत का उदय अब और भी व्यापक रूप में दिखाई देगा

भारतीय खेल जगत के लिए 12 जून 2026 का दिन बेहद दुखद साबित हुआ जब देश के महान निशानेबाज और अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित कोच जसपाल राणा का 49 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर ने न केवल भारतीय शूटिंग समुदाय बल्कि पूरे खेल जगत को शोक में डुबो दिया। बताया जा रहा है कि उनका निधन हृदयाघात के कारण हुआ। कुछ दिन पहले ही वे म्यूनिख विश्व कप से लौटते समय अस्वस्थ हुए थे और उनका चिकित्सा उपचार भी हुआ था। जसपाल राणा केवल एक सफल खिलाड़ी नहीं थे बल्कि वे उस पीढ़ी के निर्माता थे जिसने भारत को विश्व निशानेबाजी के मानचित्र पर स्थापित किया। खिलाड़ी, प्रशिक्षक, मार्गदर्शन और प्रेरणा स्रोत के रूप में उनकी भूमिका भारतीय खेल इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी।

जसपाल राणा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि समर्पण, अनुशासन और जुनून से किसी भी क्षेत्र में असाधारण सफलता हासिल की जा सकती है। उन्होंने खिलाड़ी के रूप में भारत को गौरवान्वित किया, कोच के रूप में नई पीढ़ी तैयार की और एक मार्गदर्शक के रूप में हजारों युवाओं को प्रेरित किया। आज जब भारतीय निशानेबाजी विश्व मंच पर सफलता के नए आयाम स्थापित कर रही है तो उसमें जसपाल राणा की मेहनत, दृष्टि और योगदान की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। उनका निधन भारतीय खेल इतिहास की एक अपूरणीय क्षति है लेकिन उनकी उपलब्धियां, उनके शिष्य और उनके द्वारा बनाई गई संस्थाएं आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी। जसपाल राणा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में उनका नाम हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उनकी विरासत हर उस खिलाड़ी के माध्यम से जीवित रहेगी जो लक्ष्य पर निशाना साधते समय आत्मविश्वास, अनुशासन और उत्कृष्टता की भावना को अपनाएगा।

बचपन से ही था निशानेबाजी का जुनून
जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी में हुआ था। उनके पिता नारायण सिंह राणा भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में अधिकारी थे और स्वयं भी शूटिंग खेल के प्रति गहरी रुचि रखते थे। यही कारण था कि जसपाल को बचपन से ही निशानेबाजी का माहौल मिला और उनके पहले कोच भी उनके पिता ही बने। कम उम्र में ही उन्होंने असाधारण प्रतिभा का परिचय देना शुरू कर दिया था। उनकी एकाग्रता, मानसिक दृढ़ता और तकनीकी दक्षता ने उन्हें जल्दी ही देश के सबसे प्रतिभाशाली निशानेबाजों में शामिल कर दिया।

महज 18 वर्ष की उम्र में जीता स्वर्ण पदक
जसपाल राणा ने 1994 के हिरोशिमा एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय खेल जगत में सनसनी मचा दी थी। मात्र 18 वर्ष की आयु में हासिल की गई यह उपलब्धि उन्हें देश के सबसे बड़े युवा खेल सितारों में शामिल करने के लिए पर्याप्त थी। उस दौर में भारत में शूटिंग को उतनी लोकप्रियता नहीं मिली थी जितनी आज है। ऐसे समय में जसपाल राणा की सफलता ने इस खेल की ओर युवाओं का ध्यान आकर्षित किया और देश में निशानेबाजी के विकास की नींव मजबूत की।

राष्ट्रमंडल खेलों के सबसे सफल खिलाड़ी
जसपाल राणा को भारतीय शूटिंग का महानायक इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में अभूतपूर्व सफलता हासिल की। उन्होंने 1994, 1998, 2002 और 2006 के राष्ट्रमंडल खेलों में कुल 15 पदक जीते, जिनमें 9 स्वर्ण, 4 रजत और 2 कांस्य पदक शामिल हैं। यह उपलब्धि उन्हें लम्बे समय तक राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में भारत के सबसे सफल खिलाड़ियों में शामिल रखती रही। उनकी निरंतरता और दबाव में प्रदर्शन करने की क्षमता उन्हें अपने समकालीन खिलाड़ियों से अलग बनाती है ।

करियर का स्वर्णिम शिखर
वर्ष 2006 के दोहा एशियाई खेल जसपाल राणा के करियर के सबसे शानदार अध्यायों में से एक रहे। उन्होंने 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में विश्व रिकाॅर्ड की बराबरी करते हुए स्वर्ण पदक जीता। इसके अलावा 25 मीटर स्टैंडर्ड पिस्टल में भी स्वर्ण हासिल किया। यह प्रदर्शन साबित करता था कि एक दशक से अधिक समय तक शीर्ष स्तर पर बने रहने के बावजूद उनकी प्रतिभा और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में कोई कमी नहीं आई थी।

सम्मान और पुरस्कार
जसपाल राणा की उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें कम उम्र में ही प्रतिष्ठित सम्मान ,वर्ष 1994 में अर्जुन पुरस्कार,1997 में पद्मश्री, 2020 में द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए। अर्जुन पुरस्कार उन्हें मात्र 18 वर्ष की आयु में मिला था जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। बाद में कोचिंग के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

खिलाड़ी से गुरु बनने तक का सफर
प्रतिस्पर्धी शूटिंग से दूरी बनाने के बाद जसपाल राणा ने खुद को कोचिंग के लिए समर्पित कर दिया। लगभग 2012 से उन्होंने युवा निशानेबाजों को प्रशिक्षित करना शुरू किया और जल्द ही वे देश के सबसे प्रभावशाली शूटिंग कोच बन गए। उनका मानना था कि भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, जरूरत केवल सही प्रशिक्षण और मानसिक तैयारी की है। इसी सोच के साथ उन्होंने देहरादून में अपनी शूटिंग अकादमी स्थापित की और सैकड़ों खिलाड़ियों को प्रशिक्षित किया।

मनु भाकर की सफलता के पीछे की ताकत
जसपाल राणा का नाम सबसे अधिक जिस खिलाड़ी के साथ जुड़ा वह हैं मनु भाकर। मनु और जसपाल राणा के बीच कुछ समय के लिए मतभेद भी हुए थे लेकिन बाद में दोनों फिर साथ आए। इसके बाद मनु भाकर ने 2024 पेरिस ओलम्पिक में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए दो कांस्य पदक जीते। मनु ने स्वयं कई बार स्वीकार किया कि उनकी सफलता में जसपाल राणा का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। जसपाल राणा खिलाड़ियों को केवल तकनीक नहीं सिखाते थे बल्कि उन्हें मानसिक रूप से मजबूत भी बनाते थे। यही कारण था कि उनके शिष्य बड़े मंचों पर दबाव के बीच भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करते थे।

नई पीढ़ी के निर्माता
मनु भाकर के अलावा जसपाल राणा ने कई अन्य प्रभावशाली निशानेबाजों को तराशा। इनमें प्रमुख नाम हैं सौरभ चैधरी, अनीश भनवाला और चिंकी यादव। इन खिलाड़ियों ने जूनियर और सीनियर स्तर पर भारत के लिए अनेक अंतरराष्ट्रीय पदक जीते। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की वर्तमान शूटिंग शक्ति के पीछे जसपाल राणा की प्रशिक्षण प्रणाली की बड़ी भूमिका रही है।

भारतीय शूटिंग में क्रांति
भारत आज विश्व की प्रमुख शूटिंग शक्तियों में गिना जाता है। ओलम्पिक, विश्व चैम्पियनशिप और एशियाई प्रतियोगिताओं में भारतीय निशानेबाज लगातार पदक जीत रहे हैं। इस परिवर्तन के पीछे जिन लोगों का सबसे बड़ा योगदान रहा, उनमें जसपाल राणा का नाम अग्रणी है। उन्होंने खिलाड़ियों के लिए वैज्ञानिक प्रशिक्षण, प्रतियोगिता जैसी परिस्थितियों में अभ्यास और मानसिक मजबूती पर विशेष जोर दिया। उनके प्रशिक्षण माॅडल को आधुनिक भारतीय शूटिंग की आधारशिला माना जाता है।

अंतिम दिनों तक खेल के लिए समर्पित
जसपाल राणा अपने अंतिम दिनों तक भारतीय निशानेबाजी के विकास में सक्रिय रहे। वे भारतीय पिस्टल टीम के हाई-परफाॅर्मेंस कोच के रूप में काम कर रहे थे। इसी महीने जून 2026 में म्यूनिख विश्व कप से लौटते समय उनकी तबीयत बिगड़ी थी और उनका उपचार भी हुआ था। इसके कुछ दिनों बाद उनके निधन की खबर ने पूरे खेल जगत को स्तब्ध कर दिया। उनके जाने से भारतीय शूटिंग ने केवल एक कोच नहीं बल्कि अपना मार्गदर्शक खो दिया है।

जसपाल राणा के खाते में कुल पदक
प्रतियोगिता      स्वर्ण      रजत       कांस्य      कुल पदक
राष्ट्रमंडल खेल        9         4            2              15
एशियाई खेल          4        2            2                8
कुल पदक             13       6           4               23
विशेष उपलब्धि : निशानेबाजी के दिग्गज जसपाल राणा ने अपने शानदार करियर में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं को मिलाकर 600 से अधिक पदक जीते। वे भारत के सबसे सफल निशानेबाजों में शुमार हैं। उनकी उपलब्धियों ने भारतीय शूटिंग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जसपाल राणा को समर्पित गीत
लोकभाषा में रचित ‘बंधूकया जसपाल राणा, शिस्त साधी दे, निषाणा साधी दे, उत्तराखण्ड में बाघ लाग्यो, बाघ मारी दे’। यह लोकप्रिय गीत गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी द्वारा लिखा और गाया गया है। गीत के बोलों का अर्थ है हे बंदूकधारी जसपाल राणा, अपना सटीक निशाना साधो, उत्तराखण्ड में बाघ ने आतंक मचा रखा है, उसे मार गिराओ। यह केवल एक लोकगीत की पंक्ति नहीं है बल्कि भारतीय निशानेबाजी के महानायक जसपाल राणा के अद्वितीय कौशल और अचूक निशानेबाजी का प्रतीकात्मक वर्णन है। गीत में उनकी असाधारण प्रतिभा,
आत्मविश्वास और लक्ष्यभेदी क्षमता को बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जसपाल राणा को एक ऐसे निशानेबाज के रूप में चित्रित किया गया है जिसका निशाना कभी चूकता नहीं और जिसने अपनी प्रतिभा के दम पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का गौरव बढ़ाया।

गीत की यह पंक्ति उनके जीवन के संघर्ष, साहस, समर्पण और उपलब्धियों का भी प्रतीक बन जाती है। लोकभाषा की सहजता और भावनात्मक अभिव्यक्ति इस गीत को विशेष बनाती है। यही कारण है कि यह गीत केवल उनके खेल जीवन का गुणगान नहीं करता बल्कि उनके व्यक्तित्व, जज्बे और प्रेरणादायक जीवन यात्रा को भी सामने लाता है। आज भी यह गीत उत्तराखण्ड और देशभर के खेल प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है। यह गीत जसपाल राणा के प्रति सम्मान, प्रेम और गर्व की भावना को व्यक्त करता है। उनके जीवन का संदेश, संघर्ष, अनुशासन और जुनून इस गीत के माध्यम से सदैव जीवित रहेगा तथा आने वाली पीढ़ियों को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता रहेगा।

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