निहंग सिख विवाद, टिहरी में दलित युवक केतन लाल की हत्या, सांसद चंद्रशेखर आजाद की सक्रियता और निर्दलीय विधायक उमेश कुमार की मौजूदगी ने उत्तराखण्ड की राजनीति को नए मोड़ पर ला दिया है। विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक ध्रुवीकरण, जातीय अस्मिता और कानून-व्यवस्था के सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक दल भले इसे अलग-अलग घटनाएं बता रहे हों लेकिन इन घटनाओं ने चुनावी रणनीतियों पर असर डालना शुरू कर दिया है
उत्तराखण्ड की राजनीति को लम्बे समय तक अपेक्षाकृत शांत और विकास केंद्रित राजनीति के लिए जाना जाता रहा है। यहां चुनावी बहसों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन, रोजगार, सैन्य परम्परा और पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याएं प्रमुख मुद्दे रहे हैं। सामाजिक और जातीय ध्रुवीकरण का प्रभाव अन्य राज्यों की तुलना में अपेक्षाकृत कम दिखाई देता रहा लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति के बदलते स्वरूप का असर उत्तराखण्ड पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। धार्मिक पहचान, समान नागरिक संहिता, धर्मांतरण विरोधी कानून और अतिक्रमण विरोधी अभियान जैसे मुद्दों के बाद अब सामाजिक न्याय और दलित अस्मिता भी चुनावी विमर्श में जगह बनाने लगी है। हाल के दो घटनाक्रमों ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है।
निहंग विवाद ने बढ़ाया सियासी पारा
कर्णप्रयाग में निहंग सिखों और स्थानीय लोगों के बीच हुए विवाद को शुरू में सामान्य कानून-व्यवस्था का मामला माना गया था लेकिन कुछ ही समय में यह राष्ट्रीय स्तर का विषय बन गया। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने के बाद पंजाब और हरियाणा के विभिन्न निहंग संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। बड़ी संख्या में उत्तराखण्ड कूच की घोषणाएं हुईं और राज्य की सीमाओं पर पुलिस को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ी। सरकार के सामने चुनौती केवल भीड़ को नियंत्रित करने की नहीं थी बल्कि धार्मिक भावनाओं और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की भी थी। प्रशासन ने कई स्थानों पर निहंग जत्थों को रोका और शांति बनाए रखने की अपील की। हालांकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि यदि शुरुआती स्तर पर संवाद स्थापित किया जाता तो मामला इतना नहीं बढ़ता। राजनीतिक दृष्टि से यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इसने यह संदेश दिया कि उत्तराखण्ड में होने वाली स्थानीय घटनाएं अब कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकती हैं। चुनावी वर्ष में ऐसी घटनाओं का असर स्वाभाविक रूप से राजनीतिक दलों की रणनीति पर पड़ता है।
केतन हत्याकांड से बदला राजनीतिक विमर्श
निहंग विवाद की चर्चा जारी थी कि टिहरी जिले में दलित युवक केतन लाल की हत्या ने पूरे राज्य को झकझोर दिया। घटना के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए और दलित संगठनों ने इसे केवल हत्या नहीं बल्कि सामाजिक भेदभाव और जातीय हिंसा से जोड़कर देखना शुरू किया। सरकार ने मामले में त्वरित कार्रवाई का दावा किया लेकिन विपक्ष ने सवाल उठाया कि यदि कानून-व्यवस्था मजबूत होती तो ऐसी घटनाएं क्यों होतीं। पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग के साथ यह मामला जल्द ही राजनीतिक रंग लेने लगा। उत्तराखण्ड की
राजनीति में लम्बे समय बाद कोई दलित मुद्दा इतनी प्रमुखता से चर्चा में आया। इससे पहले भी ऐसी घटनाएं होती रही हैं लेकिन शायद पहली बार किसी घटना ने राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का ध्यान इतनी तेजी से आकर्षित किया।
चंद्रशेखर आजाद की सक्रियता के संकेत
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा सांसद चंद्रशेखर आजाद के उत्तराखण्ड दौरे की रही। दलित समाज के मुद्दों पर लगातार मुखर रहने वाले चंद्रशेखर ने पीड़ित परिवार से मिलने का फैसला किया। हालांकि प्रशासन ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया, जिसके बाद मामला और अधिक राजनीतिक हो गया। चंद्रशेखर आजाद ने सरकार पर आरोप लगाया कि विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। दूसरी ओर सरकार का कहना था कि कानून- व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह निर्णय आवश्यक था।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने के बाद चंद्रशेखर आजाद अब पड़ोसी राज्यों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। उत्तराखण्ड का तराई क्षेत्र सामाजिक संरचना के लिहाज से पश्चिमी उत्तर प्रदेश से काफी मिलता-जुलता है। ऐसे में यहां दलित राजनीति की सम्भावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
उमेश कुमार की भूमिका पर बढ़ी चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम में खानपुर के निर्दलीय विधायक उमेश कुमार की मौजूदगी भी कम महत्वपूर्ण नहीं रही। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने स्वयं को सरकार के मुखर आलोचक के रूप में स्थापित किया है। विभिन्न जनसरोकारों के मुद्दों पर सक्रिय रहने वाले उमेश कुमार अब सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर भी खुलकर सामने आए हैं।
चंद्रशेखर आजाद के साथ उनका दिखाई देना राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं का कारण बना। सवाल है कि क्या यह केवल एक मानवीय संवेदना थी या भविष्य के किसी व्यापक राजनीतिक सहयोग का संकेत? इस सवाल का जवाब भविष्य देगा लेकिन इतना स्पष्ट है कि उमेश कुमार अब खुद को केवल एक निर्दलीय विधायक की भूमिका तक सीमित नहीं रखना चाहते। उत्तराखण्ड में लम्बे समय से तीसरे राजनीतिक विकल्प की चर्चा होती रही है लेकिन कोई भी प्रयास स्थायी रूप नहीं ले सका। ऐसे में यदि सामाजिक आंदोलनों और स्थानीय नेतृत्व का कोई नया मेल बनता है तो भविष्य में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
भाजपा के सामने नई राजनीतिक चुनौती
इन घटनाओं ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। पिछले चार वर्षों में भाजपा ने अपनी राजनीति का केंद्र विकास, निवेश, समान नागरिक संहिता, चारधाम परियोजना, धार्मिक पर्यटन और मजबूत कानून -व्यवस्था को बनाया है। सरकार का दावा है कि उत्तराखण्ड तेजी से विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है और निवेश के नए अवसर पैदा हुए हैं लेकिन विपक्ष का तर्क है कि विकास के दावों के बीच सामाजिक तनाव, बेरोजगारी, पलायन और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे लगातार सामने आ रहे हैं।
भाजपा के रणनीतिकार अच्छी तरह जानते हैं कि चुनाव नजदीक आते ही ऐसी घटनाओं को विपक्ष बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदलने की कोशिश करेगा। इसलिए सरकार का प्रयास रहेगा कि किसी भी विवाद को लम्बा न खिंचने दिया जाए और प्रशासनिक स्तर पर त्वरित कार्रवाई कर यह संदेश दिया जाए कि कानून सबके लिए बराबर है। भाजपा यह भी कोशिश करेगी कि चुनावी बहस फिर से विकास, राष्ट्रवाद और डबल इंजन सरकार की उपलब्धियों की ओर लौट आए।
कांग्रेस को मिला नया हमला बोलने का मौका
कांग्रेस पिछले कुछ समय से राज्य में ऐसे मुद्दों की तलाश में थी जिनके सहारे वह भाजपा सरकार को घेर सके।
बेरोजगारी, महंगाई और पलायन जैसे मुद्दे लगातार उठाए जा रहे थे लेकिन वे व्यापक जन आंदोलन का रूप नहीं ले सके। निहंग विवाद और केतन लाल हत्याकांड ने कांग्रेस को सरकार की कार्यशैली और कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाने का अवसर दे दिया। कांग्रेस का प्रयास रहेगा कि इन घटनाओं को सरकार की संवेदनहीनता और प्रशासनिक विफलता के रूप में जनता के सामने रखा जाए। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती भी कम नहीं है। यदि दलित समाज के बीच चंद्रशेखर आजाद जैसी नई राजनीतिक ताकत प्रभाव बढ़ाती है तो उसका असर कांग्रेस के पारम्परिक वोट बैंक पर भी पड़ सकता है। इसलिए कांग्रेस को सरकार पर हमला बोलने के साथ-साथ अपने सामाजिक आधार को भी मजबूत बनाए रखना होगा।
क्या उत्तराखण्ड में बनेगी दलित राजनीति की नई जमीन?
उत्तराखण्ड की राजनीति में दलित समाज हमेशा महत्वपूर्ण रहा है लेकिन राज्य में उत्तर प्रदेश जैसी बहुजन राजनीति कभी मजबूत नहीं हो सकी। अनुसूचित जाति के मतदाता विभिन्न क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं लेकिन उनका समर्थन अलग-अलग चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच बंटता रहा है। बहुजन समाज पार्टी ने कई बार प्रभाव बनाने की कोशिश की लेकिन वह स्थायी राजनीतिक आधार तैयार नहीं कर सकी।
अब सवाल यह है कि क्या चंद्रशेखर आजाद इस खाली जगह को भरने की कोशिश करेंगे? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि वह केवल घटनाओं के समय उत्तराखण्ड आते हैं तो इसका प्रभाव सीमित रहेगा लेकिन यदि उनकी पार्टी संगठन तैयार करती है, स्थानीय नेतृत्व विकसित करती है और लगातार जनसम्पर्क अभियान चलाती है तो आने वाले वर्षों में कुछ सीटों पर असर दिखाई दे सकता है। हालांकि उत्तराखण्ड की सामाजिक संरचना उत्तर प्रदेश से अलग है। यहां जातीय पहचान के साथ-साथ क्षेत्रीय पहचान, सैन्य परम्परा, पलायन, पर्वतीय समस्याएं और स्थानीय नेतृत्व भी मतदान को प्रभावित करते हैं। इसलिए किसी भी नई राजनीतिक ताकत के लिए यहां जमीन तैयार करना आसान नहीं होगा।
उमेश कुमार क्या साध रहे हैं?
निर्दलीय विधायक उमेश कुमार पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रदेशव्यापी मुद्दों पर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। पत्रकारिता से राजनीति में आए उमेश कुमार ने खुद को केवल अपने विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं और जनसमस्याओं को लगातार उठाया है। यही वजह है कि उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर अब पूरे प्रदेश की नजर रहती है।
केतन लाल हत्याकांड में चंद्रशेखर आजाद के साथ उनकी मौजूदगी को कई लोग भविष्य की राजनीति के संकेत के रूप में देख रहे हैं। हालांकि दोनों नेताओं ने किसी राजनीतिक गठबंधन की बात नहीं कही है लेकिन यह स्पष्ट है कि विपक्षी राजनीति में नए समीकरण बनने की सम्भावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। यदि भविष्य में सामाजिक आंदोलनों, निर्दलीय नेताओं और छोटे राजनीतिक दलों के बीच किसी प्रकार का तालमेल बनता है तो उसका प्रभाव कुछ सीटों पर अवश्य पड़ सकता है। हालांकि उत्तराखण्ड में भाजपा और कांग्रेस की मजबूत संगठनात्मक संरचना के सामने किसी तीसरे विकल्प के लिए चुनौती आसान नहीं होगी।
पहाड़ और मैदान की अलग-अलग राजनीति
इन घटनाओं का असर पूरे राज्य में समान रूप से दिखाई देगा, ऐसा मान लेना भी सही नहीं होगा। उत्तराखण्ड की राजनीति हमेशा दो अलग सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में बंटी रही है। पर्वतीय जिलों के मुद्दे अलग हैं और मैदानी जिलों की प्राथमिकताएं अलग। हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून जैसे मैदानी क्षेत्रों में सामाजिक समीकरण, जातीय संरचना और धार्मिक विविधता चुनावी राजनीति को अधिक प्रभावित करती हैं। वहीं गढ़वाल और कुमाऊं के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, सड़क और रोजगार आज भी सबसे बड़े मुद्दे बने हुए हैं। यही कारण है कि राजनीतिक दल इन घटनाओं को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से प्रस्तुत करने की रणनीति बनाएंगे। जहां एक ओर सामाजिक न्याय का मुद्दा उठेगा, वहीं दूसरी तरफ विकास और स्थिर सरकार की बात भी उतनी ही मजबूती से रखी जाएगी।
सोशल मीडिया ने बदली राजनीति की रफ्तार
इन दोनों घटनाओं ने एक और बदलाव स्पष्ट किया है। अब उत्तराखण्ड की कोई भी घटना केवल स्थानीय नहीं रहती। कुछ मिनटों में वीडियो और तस्वीरें पूरे देश में फैल जाती हैं। राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और विभिन्न समूह तुरंत अपनी प्रतिक्रिया देने लगते हैं। इससे प्रशासन पर दबाव बढ़ता है और राजनीतिक दलों को भी तत्काल अपनी रणनीति तय करनी पड़ती है। सोशल मीडिया ने चुनावी राजनीति को भी बदल दिया है। पहले जो मुद्दे स्थानीय अखबारों तक सीमित रहते थे, अब वे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन जाते हैं। निहंग विवाद और केतन हत्याकांड इसका ताजा उदाहरण हैं।
2027 की लड़ाई का शुरुआती संकेत
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल विकास के मुद्दे पर नहीं लड़ा जाएगा। भाजपा अपनी उपलब्धियों और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व को सामने रखेगी तो कांग्रेस सरकार की जवाबदेही, बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था को प्रमुख मुद्दा बनाएगी। वहीं चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता सामाजिक न्याय और दलित अधिकारों के सवालों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश करेंगे। निर्दलीय विधायक उमेश कुमार भी राज्यव्यापी मुद्दों के सहारे अपनी राजनीतिक भूमिका को और व्यापक बनाने का प्रयास करेंगे। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इन घटनाओं से चुनावी नतीजे किस हद तक प्रभावित होंगे। उत्तराखण्ड का मतदाता अक्सर अंतिम समय में स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार की छवि और सरकार के कामकाज को ध्यान में रखकर फैसला करता है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि चुनावी एजेंडा तय करने में ऐसी घटनाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उत्तराखण्ड की राजनीति एक संक्रमण काल से गुजरती दिखाई दे रही है। पारम्परिक विकास के मुद्दों के साथ अब सामाजिक न्याय, पहचान की राजनीति, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्न भी मजबूती से उभर रहे हैं। निहंग सिख विवाद और केतन लाल हत्याकांड ने यह संकेत दे दिया है कि राज्य की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। राष्ट्रीय राजनीति के प्रभाव, सोशल मीडिया की ताकत और नए राजनीतिक चेहरों की सक्रियता ने चुनावी माहौल को अधिक जटिल बना दिया है।
फिलहाल चुनाव में अभी समय है लेकिन इतना स्पष्ट है कि राजनीतिक दलों ने अपनी- अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। आने वाले महीनों में यदि ऐसे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे लगातार सामने आते रहे तो उत्तराखण्ड का चुनावी विमर्श पूरी तरह बदल सकता है। विकास और सुशासन के साथ-साथ सामाजिक न्याय, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी मतदाताओं के सामने बड़े सवाल के रूप में मौजूद होंगे। यही वजह है कि हाल की घटनाओं को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से नहीं बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि के रूप में भी देखा जा रहा है।
बात अपनी-अपनी
प्रदेश में चाहे निहंगों का मामला हो या केतन लाल का सभी जगह लोग असुरक्षित हैं। निहंग सरेआम तलवारबाजी करते हैं, हथियार लहराते हैं और जबरन प्रदेश की सीमा में घुस जाते हैं लेकिन लाचार सरकार कुछ नहीं कर पा रही है। कांग्रेस कभी भी जातिवाद की राजनीति नहीं करती है। हम केतन लाल हत्याकांड में सरकार से उचित न्याय की उम्मीद करते हैं लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है। मैं जब इसस परिवार से मिला तो उन्होंने बताया कि उन्हें आरोपियों की तरफ से जान से मारेन की धमकी मिल रही है। प्रदेश में दिनोंदिन उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ रही हैं। बलात्कार, हत्या तो आए दिन की बात हो गई है। शांतिप्रिय प्रदेश अशांति के दौर से गुजर रहा है। भाजपा के राज में जनता भयभीत है लेकिन पार्टी के नेता आधुनिक भारत की बात कर मामले को घुमा रहे हैं। आज भाजपा का चेहरा ही नहीं बदला बल्कि चाल और चरित्र भी बदल चुका है।
यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष
केतन लाल हत्याकांड बर्बरता की सारी हदें पार करने वाली घटना है। एक परिवार आज अपने बेटे की मौत पर न्याय मांग रहा है लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है बल्कि पीड़ित परिवार को भी जान से मारने की धमकी मिल रही है। दोषियों के खिलाफ अभी तक उचित कार्रवाई न होना सिद्ध करता है कि सरकार आरोपियों को बचा रही है। हम इस मामले को सड़क से लेकर सदन तक लड़ेंगे। उत्तराखण्ड में केतन लाल के साथ ही अन्य कई दलितों के साथ ऐसी बर्बरतापूर्ण घटनाएं घट चुकी हैं जिन्हें हम लोकसभाा में उठाएंगे। हमें तीन दिन में पीड़ित परिवार से मिलवाया गया। उसके लिए हमने पुलिस और प्रशासन के साथ बहुत मशक्कत की। हमारी मांग है कि पीड़ित परिवार को पूर्ण सुरक्षा दी जाए, उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और एक कृषि भूमि का पट्टा दिलाया जाए। हम इस मामले में चाहते हैं कि सीबीआई जांच करे और केतन लाल की हत्या का मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जाए।
चंद्रशेखर आजाद, सांसद नगीना
प्रदेश में निर्बल और बेसहारा लोगों के साथ अन्याय के खिलाफ हमारी लड़ाई जारी रहेगी। जब तक निचले तबके को न्याय नहीं मिलेगा, हम चैन से नहीं बैठेंगे। जिस परिवार का बेटा चला गया आज वह परिवार भी असुरक्षित है। ऐसे में सरकार को पीड़ित परिवार को सुरक्षा देनी चाहिए। साथ ही मामले की जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए। हमने सरकार से यह भी मांग की है कि पीड़ित परिवार को एक जमीन का पट्टा और सरकारी नौकरी भी मिलनी चाहिए।
उमेश कुमार, विधायक, खानपुर