उत्तराखण्ड एक आध्यात्मिक खोज-5

  •           श्वेता मासीवाल
    सामाजिक कार्यकर्ता
 
तीस वर्ष पूर्व जब मैं पहली बार बाबा केदार के दर्शन के लिए गई थी, वो आज के केदारनाथ जी से काफी अलग था। पहले सुविधाओं का बहुत अभाव था। यात्रा आज की बनिस्पत दुर्गम थी लेकिन बहुत कुछ ऐसा था उस काल में जो अब शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। केदारनाथ में बाबा के दर्शन के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ में हम ज्योतिर्लिंग के दर्शन तो कर लेते हैं लेकिन अक्सर बहुत-सी शक्तियां नहीं देख पाते जो सहज उस मंडल में विचरती हैं। मंदिर परिसर के बाहर पर्यटकों की जमात से अलग विभूति धारण किए साधकों का एक कुम्भ दिखता है जो अस्तित्व की विराटता और विभिन्नता को बयान करता है और आपको ये याद दिलाता है कि चिंतन के साथ-साथ सोच की हदों से परे शिव विचरते हैं

हिमालय श्रृंखला अपने आप में युगों-युगों का इतिहास समेटे हुए है। जितना गहरा आप इसका अध्ययन करते जाते हैं इसके रहस्य उतने ही गहराते  और अध्येता को विस्मृत करते जाते हैं।

‘उत्तराखण्ड एक आध्यात्मिक खोज’ के इस पड़ाव में चर्चा का विषय है द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक प्रमुख ज्योतिर्लिंग केदारनाथ धाम। तीस वर्ष पूर्व जब मैं पहली बार बाबा केदार के दर्शन के लिए गई थी, वो आज के केदारनाथ जी से काफी अलग था। पहले सुविधाओं का बहुत अभाव था। यात्रा आज की बनिस्पत दुर्गम थी लेकिन बहुत कुछ ऐसा था उस काल में जो अब शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। आज के केदारनाथ को लोग दो खंड में विभाजित कर सकते हैं। 2013 से पहले का केदारनाथ और उसके बाद का केदारनाथ। लेकिन पहले चर्चा स्थापित मान्यताओं की।

केदारनाथ बाबा की महिमा समझने से पहले शिव को समझना होगा। सनातन संस्कृति को समझने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था ‘Back to Vedas’। वेद का अध्ययन और मनन करने से बहुत हद तक ये स्पष्ट हो जाता है कि अपने मूल स्वरूप में सनातन संस्कृति आज के प्रचार वाली सनातन संस्कृति से बहुत भिन्न है। वेदों में शिवजी का वर्णन रुद्र नाम से मिलता है। उनकी महिमा के विस्तार को समझाने हेतु रुद्र नाम का ही प्रयोग हुआ है।

सनातन संस्कृति में त्रिदेव की महिमा का वर्णन यह स्पष्ट करता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी त्रिदेव एक दूसरे के पूरक हैं। शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए युद्धरत् हो गए। सृष्टि के रचियता ब्रह्माा और पालनहार विष्णु के मध्य युद्ध से आक्रांत देतवओं ने भगवान शिव  की शरण ली। तब दोनों देवों के मध्य शिव एक स्तंभ रूप में आकर स्थापित हो गए। यकायक एक स्तंभ को अपने मध्य देख विष्णु इस स्तंभ का रहस्य जानते शुक्र का रूप धारण कर इसके नीचे चले गए तथा ब्रह्मा हंस का रूप धारण कर ऊपर की ओर चले गये। पर दोनों ही इसका रहस्य नहीं भेद पाए। हजारों सालों तक खोजने के बाद भी जब सृष्टि के रचियता और पालनहार असफल रहे तब थक हारकर वे उसी स्थान पर पहुंचे जहां उन्होंने उस लिंग को देखा था। वहां उनको  ऊं की ध्वनि सुनाई देने लगी। ऊं के स्वर को सुनकर दोनों देव समझ गए कि इस लिंग के पीछे जरूर ही कोई अलौकिक शक्ति है। तब वे दोनों ही वहां गूंज रहे स्वर की आराधना करने लगे।

भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु की आराधना से प्रसन्न होकर उस स्तंभ में से शिव प्रकट हुए और कहा कि आप दोनों ही देव एक समान हैं इसलिए व्यर्थ में विवाद न करें। इस प्रकार दोनों को सद्बुद्धि का वरदान देकर शिव अंतर्धान हो गए। शिवपुराण के अनुसार निराकार भगवान शिव का पूजन देवगण इस घटना बाद साकार रूप में भी करने लगे। यहां इस कथा का प्रसंग इसलिए क्योंकि शिवलिंग को लेकर कई भ्रांतियां हैं लेकिन इसके गूढ़ रहस्य को समझने के लिए शिव और स्कंद पुराण का पठन करने पर ये भेद स्पष्ट हो जाता है कि दरअसल शिव लिंग निराकार के साकार होने का प्रतीक है और ये कोई लिंग भेद करता हुआ पुरुष लिंग ना होते हुए चिन्ह स्वरूप है। शिव पुराण में आगे ये भी व्याख्यान है कि सबसे पहला प्रणवलिंग है। ये स्थूल और सूक्ष्म दोनों है तथा इसे ही पंचाक्षर कहा गया है। इसके बाद पांच लिंग आते हैंः

स्वयंलिंग: देवताओं और ऋषियों के फलस्वरूप पृथ्वी में स्वयं प्रगट होने वाला स्वयं लिंग कहलाता है।
बिंदुलिंग:  पृथ्वी आदि की वेदिका पर प्रणव मंत्र से लिखा जाने वाला।
प्रतिष्ठितलिंग:
 एक पात्र में रखकर घर में स्थापित किया गया लिंग।
चरलिंग: प्रत्येक पूजा काल में बनाया गया और फिर विसर्जित किया जाने वाला लिंग।
गुरूलिंग: गुरु द्वारा स्थापित किया गया शिव रूप लिंग।ज्योतिर्लिंग स्वयंलिंग की श्रेणी में आता है। मान्यता है कि धरती पर जिन-जिन स्थानों पर स्वयं भगवान शंकर प्रगट हुए उन सभी स्थानों पर आज ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं। कहते हैं पहले इनकी संख्या 108 थी लेकिन आज ये 12 हैं और इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग के तौर पर मान्यता प्राप्त है।शिव पुराण में केदारनाथ के विषय में ये इंगित किया गया है कि बद्रीका गांव में जब नर नारायण पार्थिव पूजन करने लगे तो शिवजी वहां प्रकट हुए और उनके पूजन से प्रसन्न शिव ने उनसे वर मांगने के लिए कहा। नर नारायण ने लोक कल्याण की भावना से उनसे स्वयं अपने रूप में वहां सदैव विराजमान होने की प्रार्थना करी। दोनों की इस प्रार्थना को स्वीकारते हुए हिमाश्रित केदार नामक स्थान में साक्षात् महेश्वर ज्योति रूप में स्थित हो गए और यहां का नाम केदारेश्वर पड़ा।दूसरी किवदंति ये है कि महाभारत काल में युद्ध में विजय बाद युधिष्ठिर जब हस्तिनापुर पर चार दशक शासन कर चुके तब वो अपने भाई बंधु और कुल वध के पाप भागी बनने के कारण पश्चाताप के संताप में जलने लगे। ऐसे में वो भगवान श्री कृष्ण की शरण में गए। श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि उनके पापों की मुक्ति तो भगवान श्री शिव के ही हाथ है।

परीक्षित को राजपाट सौंपने के बाद द्रौपदी समेत  पांडव महादेव के दर्शन के लिए काशी गए लेकिन महादेव उनके किए गए गोत्र हत्या और ब्राह्माण हत्या के पाप से बेहद क्रोधित थे। इसलिए वो पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए काशी से आगे हिमालय चले जाते हैं। पांडव उन्हें ढूंढ़ते-ढूंढ़ते हिमालय पहुंचते हैं। कहते हैं जहां शिव पांडवों से छिप कर विराजे थे वही स्थान आज का गुप्तकाशी है। कथा के अनुसार भगवान शिव ने यहां एक बैल का रूप धारण किया और पांडवों से छिपने के लिए उसे पास में चर रहे अन्य मवेशियों के साथ मिला दिया। लेकिन भीम (पांडवों में से एक) ने उन्हें पहचान लिया और उनके कूबड़ को पकड़ लिया, लेकिन शिव माने नहीं और धरती में समा गए। पांडवों ने तत्पश्चात भगवान शिव की पूजा की और उनसे क्षमा चाही। भगवान शिव उनकी प्रार्थना और उनके अपराध बोध से प्रसन्न हो पांच अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए, जो अब पंचकेदार के रूप में स्थापित हैं। पांडवों ने सभी पांच स्थानों के आस-पास मंदिर बनवाए। इन पांच स्थानों को सामूहिक रूप से पंच केदार के रूप में जाना जाता है। इसमें से बैल का ऊपरी कूबड़ श्री केदारनाथ धाम में नाभि का हिस्सा मधमहेश्वर में भुजाआंे का हिस्सा तुंगनाथ में मुख का हिस्सा रुद्रनाथ में बालों का हिस्सा कल्पेश्वर में स्थापित हुआ। आज भी अगर गौर से अवलोकन किया जाए तो इन पांच शिवलिंग में कूबड़ भुजा नाभि मुख और बाल आकार के दर्शन होते हैं। कहते हैं पांडवों के वंशजों ने ही इन प्राचीन मंदिरों का निर्माण करवाया था।

एक तीसरी कथा अनुसार आदिगुरु शंकरांचार्य ने केदारनाथ मंदिर के वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया और वो आखिरी बार केदारनाथ मंदिर के पार्श्व में दिखाई दिए और वहीं से निर्वाण प्राप्त कर अदृश्य हो गए।

पौराणिक गाथाओं से परे वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि 1300 से 1700 ई. तक जो हिमयुग का दौर आया था, उस दौरान हिमालय का क्षेत्र बर्फ में ढक गया था और उस काल में केदारनाथ मंदिर 400 साल तक बर्फ से ढ़का रहा। फिर भी इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ। अंतर्ग्रथन (Interlocking) तकनीक से बने इस मंदिर के बारे में एक  मान्यता ये भी है कि इसका निर्माण विक्रम संवत 1076 से 1099 तक राज करने वाले मालवा के राजा भोज ने करवाया था। इसकी दीवारें 50 फीट ऊंची, 187 फीट लम्बी, 80 फीट चौड़ी और 12 फीट मोटी हैं। यह मंदिर बेहद मजबूत चट्टानों से बनाया गया है। मंदिर को 6 फीट नीचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है और इन्हीं पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है जिसके चलते यह मंदिर संवेदनशील जगह पर भी मजबूती से खड़े रहने में कामयाब है।

भोगौलिक दृष्टि से देखें तो केदारनाथ मंदिर तीनों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है। एक तरफ 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ तो दूसरी ओर 21,600 फीट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ  22,750 फीट ऊंचा भरतकुंड पहाड़ है। यह न सिर्फ पहाड़ों से घिरा हुआ है, बल्कि यहां पांच नदियों का संगम भी है। मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी का संगम होता है। अलौकिक इस स्थान में पहुंच कर कुछ अनुभूतियां ऐसी भी होती हैं जिनका बखान शब्दों में सम्भव नहीं है, फिर भी मैं अपने अनुभवों को शब्दों में ढालने का प्रयास करूंगी।

मैं जब केदारनाथ पहली बार गई थी तो एक बहुत सुंदर हिम आच्छादित चोटी ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। मुझे ये बताया गया था कि बहुत पहले बद्रीनाथ और केदारनाथ के पंडित एक ही थे और एक ही दिवस में पैदल मार्ग से दोनों धाम पहुंच जाते थे पर फिर ये चोटी बीच में आ गई। गौरतलब है कि मोटर मार्ग से केदारनाथ और बद्रीनाथ की दूरी 214 किलोमीटर की है और ऐरियल दूरी मात्र 80 किलोमीटर की।

सही कहूं तो उस समय ये मुझे कोरी गप्प लगी थी। मेरी पहली यात्रा से दूसरी के मध्य दो दशक का अंतर था। ये मेरे अध्ययन वाले दशक थे जब मैंने इन मान्यताओं से परे सच ढूंढ़ने का प्रयास किया। इस चोटी का नाम नीलकंठ है और वाकई ये बाद में उत्पन्न हुई एक चोटी है। मान्यता ये थी ये वो स्थान है जहां भगवान शिव ने विष पीने के बाद ध्यान लगाया था जहां नारद ऋषि ने उनके ध्यान में खलल डाला और शिव जी ने उन्हें श्राप दिया जिसके फलस्वरूप इस शिखर का निर्माण हुआ। सोचती हूं कितना अद्भुत होगा सतयुग का दौर जब एक ही पुजारी दोनों स्थानों पर पूजन करते होंगे।

समय के साथ-साथ ऐसे कई भौगोलिक बदलाव दिव्य हिमालय में होते रहे हैं। 2013 की त्रासदी के समय भीमशीला का यहां आना भी उसमें से एक है और हर बदलाव के पीछे कोई ना कोई दिव्य कथा अवश्य है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि हिमालय में कोई भी बदलाव बगैर परमसत्ता की रजा से नहीं होता।

भीमशिला और बाकी बदलाव के विषय में मैं विस्तार से आगे बात करूंगी लेकिन चूंकि यहां दिव्यताओं से भरपूर केदारनाथ के पौराणिक इतिहास की हो रही है एक छोटा-सा संस्मरण है जिसे मैं साझा करना चाहूंगी।

साम्ब सदाशिव!
क्रमशः
(लेखिका रेडियों प्रजे़न्टर, एड फिल्म मेकर तथा
 वत्सल सुदीप फाउंडेशन की सचिव हैं)

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