Uttarakhand

दून अस्पताल उपलब्धियों के दावे, विवादों का साया

उत्तराखण्ड की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का सबसे बड़ा केंद्र माने जाने वाले दून अस्पताल और राजकीय दून मेडिकल काॅलेज में पिछले दो वर्षों के दौरान चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ अनेक विवाद भी सामने आए हैं। कैंसर की दवा में गड़बड़ी से लेकर आयुष्मान योजना में अनियमितताओं, मेस घोटाले, फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र, सुरक्षा व्यवस्था में खामियां, रैगिंग और अग्नि सुरक्षा जैसे मामले अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गम्भीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की उपलब्धियों और विवादों का यह मिश्रित चित्र उत्तराखण्ड की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों को भी उजागर करता है

उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून स्थित राजकीय दून मेडिकल काॅलेज और उससे सम्बद्ध दून अस्पताल राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। पर्वतीय जिलों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक के हजारों मरीज प्रतिदिन यहां उपचार के लिए पहुंचते हैं। राज्य के अधिकांश जिलों में सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं की कमी और विशेषज्ञ चिकित्सकों के रिक्त पदों के चलते गम्भीर रोगियों का दबाव लगातार दून अस्पताल पर बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि इस अस्पताल में होने वाली प्रत्येक उपलब्धि और प्रत्येक विवाद पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा विषय बन जाता है।

सुविधाओं के विस्तार का दावा
अस्पताल प्रशासन का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार किया गया है। आईसीयू बेड बढ़ाए गए हैं, डायलिसिस सेवाओं का दायरा बढ़ाया गया है और मरीजों के पंजीकरण की व्यवस्था को सरल बनाने के प्रयास किए गए हैं। अस्पताल में प्रतिदिन हजारों मरीज ओपीडी सेवाओं का लाभ लेते हैं जबकि सैकड़ों मरीज भर्ती रहकर उपचार प्राप्त करते हैं। राजधानी में स्थित होने के कारण दूरस्थ जिलों से रेफर किए गए मरीजों का सबसे बड़ा भार भी दून अस्पताल ही उठाता है।
कैंसर की दवा में गड़बड़ी का मामला
दून अस्पताल का सबसे चर्चित विवाद कैंसर रोगियों को दी जाने वाली दवा की गुणवत्ता को लेकर सामने आया। अस्पताल में आपूर्ति की गई कैंसर की दवा में कथित रूप से क्रिस्टल जैसे कण पाए गए थे। यह मामला सामने आने के बाद मरीजों की सुरक्षा को लेकर गम्भीर सवाल खड़े हुए। विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर जैसी गम्भीर बीमारी में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता मरीजों के जीवन के लिए खतरा बन सकता है। इस घटना ने सरकारी अस्पतालों में दवा खरीद और गुणवत्ता परीक्षण की प्रक्रिया पर बहस छेड़ दी।
फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र का खेल
दून अस्पताल में फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र जारी किए जाने के मामले भी सामने आए। जांच के दौरान ऐसे आरोप लगे कि नियमों को दरकिनार कर मेडिकल प्रमाणपत्र तैयार किए जा रहे थे। सरकारी अस्पतालों द्वारा जारी मेडिकल प्रमाणपत्र न्यायिक, प्रशासनिक और सेवा सम्बंधी मामलों में महत्वपूर्ण दस्तावेज माने जाते हैं। ऐसे में इस प्रकार की घटनाओं ने अस्पताल की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
आयुष्मान योजना में अनियमितताओं के आरोप
आयुष्मान भारत योजना के तहत भी कई सवाल उठे। आरोप लगे कि कुछ मामलों में केवल जांच के लिए मरीजों को भर्ती दिखाया गया जबकि योजना का उद्देश्य गम्भीर उपचार और अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता वाले मरीजों को लाभ देना है। इसके अतिरिक्त दूसरे व्यक्ति के नाम पर उपचार किए जाने जैसी शिकायतें भी समय-समय पर चर्चा में रहीं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आयुष्मान जैसी महत्वाकांक्षी योजना में अनियमितताएं होती हैं तो उसका सीधा नुकसान वास्तविक लाभार्थियों को उठाना पड़ता है।
अल्ट्रासाउंड और रेडियोथेरेपी की चुनौती
दून अस्पताल में मरीजों की बढ़ती संख्या के कारण अल्ट्रासाउंड के लिए लम्बा इंतजार भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है तो कैंसर मरीजों के लिए रेडियोथेरेपी जैसी महत्वपूर्ण सुविधा लम्बे समय तक उपलब्ध नहीं होने के कारण कई मरीजों को अन्य संस्थानों का रुख करना पड़ रहा है। राज्य की राजधानी में स्थित सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में ऐसी सुविधाओं का अभाव स्वास्थ्य सेवाओं की सीमाओं को उजागर करता है।
सुरक्षा व्यवस्था पर गम्भीर सवाल
अस्पताल परिसर की सुरक्षा व्यवस्था भी विवादों में रही। एक फर्जी महिला सुरक्षा कर्मी का अस्पताल के वार्ड तक पहुंच जाना और अस्पताल परिसर से उपकरणों की चोरी की घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। अस्पताल से कई एयर कंप्रेशरों की चोरी की घटना ने यह सवाल खड़ा किया कि आखिर राज्य के सबसे बड़े अस्पताल की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों में सुरक्षा केवल सम्पत्ति बचाने का विषय नहीं बल्कि मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा है।
मेडिकल कॉलेज में रैगिंग की घटनाएं
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में रैगिंग की घटनाएं भी लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद रैगिंग के मामले सामने आते रहे हैं। हाल के वर्षों में कई छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई, जुर्माना लगाया गया और निष्कासन तक की कार्रवाई हुई। इसके बावजूद रैगिंग की घटनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी हैं।
80 लाख रुपए का मेस घोटाला
मेडिकल काॅलेज का सबसे चर्चित विवाद छात्रावास मेस से जुड़ा रहा। आरोप लगे कि छात्रों से वसूली गई लगभग 80 लाख रुपए की राशि को लेकर अनियमितताएं हुईं और मेस संचालक फरार हो गया। इस घटना ने काॅलेज प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गम्भीर सवाल खड़े किए। छात्रों और अभिभावकों के बीच यह मुद्दा लम्बे समय तक चर्चा का विषय बना रहा। मामले में जांच बैठाई गई और कुछ कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की गई।
दवा कम्पनियों का करोड़ों रुपए बकाया
दून अस्पताल पर दवा आपूर्तिकर्ताओं का लगभग 11 करोड़ रुपए का भुगतान लम्बित रहने का मामला भी सामने आया। यह घटना बताती है कि बढ़ती स्वास्थ्य सेवाओं और मरीजों के दबाव के बीच वित्तीय संसाधनों का प्रबंधन अस्पताल प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। यदि समय पर भुगतान नहीं होता तो दवा आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा भी बना रहता है, जिसका असर अंततः मरीजों पर पड़ सकता है।
अग्नि सुरक्षा पर उठे प्रश्न

देश के विभिन्न अस्पतालों में आग लगने की घटनाओं के बाद दून अस्पताल की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था भी जांच के दायरे में आई। अस्पताल की विभिन्न इमारतों में फायर एनओसी और सुरक्षा मानकों को लेकर सवाल उठे। जानकारों का कहना है कि अस्पतालों में अग्नि सुरक्षा केवल नियमों का पालन भर नहीं बल्कि जीवन रक्षा का विषय है। किसी भी प्रकार की लापरवाही बड़े हादसे का कारण बन सकती है।

उत्तराखण्ड की स्वास्थ्य व्यवस्था की बड़ी तस्वीर
दून अस्पताल के सामने मौजूद चुनौतियां केवल एक संस्थान की समस्याएं नहीं हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल और विभिन्न सरकारी आंकड़ों के अनुसार पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के अनेक पद लम्बे समय से रिक्त हैं। राज्य के कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी डाॅक्टरों तथा पैरामेडिकल स्टाफ की कमी बनी हुई है। परिणामस्वरूप गम्भीर और जटिल मामलों का दबाव देहरादून, ऋषिकेश और हल्द्वानी जैसे बड़े चिकित्सा केंद्रों पर लगातार बढ़ता जा रहा है।
यही वजह है कि दून अस्पताल की स्थिति पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार बन जाती है। एक ओर अस्पताल में नई सुविधाएं शुरू करने और चिकित्सा सेवाओं के विस्तार के प्रयास दिखाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ बार-बार सामने आने वाले विवाद यह संकेत भी देते हैं कि प्रशासनिक पारदर्शिता, वित्तीय जवाबदेही, सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी तंत्र को अभी और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है।
उत्तराखण्ड के लाखों लोगों की उम्मीदें आज भी दून अस्पताल से जुड़ी हुई हैं लेकिन राज्य की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संस्था होने के नाते यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि उपलब्धियों के साथ-साथ उन कमियों और विवादों का भी समाधान हो, जो समय-समय पर इसकी साख को प्रभावित करते रहे हैं।

‘हमारे खाते में बड़ी उपलब्धियां हैं’
दून मेडिकल काॅलेज की वरिष्ठ प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. गीता जैन के कार्यकाल में आईसीयू बेड बढ़ाने, डायलिसिस सेवाओं का विस्तार, मरीज पंजीकरण व्यवस्था को सरल बनाने और नई चिकित्सा सुविधाएं शुरू करने के प्रयास हुए तो वहीं कैंसर की दवा में गड़बड़ी, फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र, आयुष्मान योजना में कथित अनियमितताएं, सुरक्षा व्यवस्था की खामियां, रैगिंग और मेस घोटाले जैसे मामलों ने अस्पताल प्रशासन को सवालों के घेरे में भी खड़ा किया है। इन सभी मुद्दों पर ‘दि संडे पोस्ट’ ने उनसे बातचीत की

दून मेडिकल काॅलेज और दून अस्पताल में लगातार विवाद सामने आ रहे हैं। आपके कार्यकाल में सबसे अधिक विवादों की चर्चा हुई है। क्या आपको लगता है कि व्यवस्थागत कमियां बढ़ी हैं?
मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि दून अस्पताल में अव्यवस्था है। यह प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है और यहां सबसे अधिक मरीज आते हैं। किसी भी बड़ी संस्था में चुनौतियां होती हैं लेकिन हमारा प्रयास समस्याओं का तत्काल समाधान करना है। मेरे कार्यकाल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। प्रतिदिन कई सिजेरियन आॅपरेशन किए जा रहे हैं। इमरजेंसी सेवाओं को मजबूत किया गया है और पिछले वर्ष बड़ी संख्या में आॅपरेशन किए गए हैं। डायलिसिस सेवाओं को दो शिफ्टों में संचालित किया जा रहा है। मरीजों की सुविधा के लिए प्रत्येक फ्लोर पर पंजीकरण की व्यवस्था की गई है। आभा आईडी के साथ-साथ ऑनलाइन पंजीकरण भी शुरू किया गया है। आईसीयू बेड बढ़ाए गए हैं, अतिरिक्त स्टाफ नर्सों की नियुक्ति हुई है और अस्पताल में विभिन्न श्रेणियों के कर्मचारियों की उपलब्धता भी बढ़ी है।

कैंसर रोगियों की दवा में क्रिस्टल जैसे कण मिलने का मामला सामने आया था। क्या यह गम्भीर लापरवाही नहीं थी?
यह मामला सामने आया था और हमने इसे पूरी गम्भीरता से लिया। जैसे ही शिकायत मिली, सम्बंधित कम्पनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। दवा का पूरा स्टॉक निरस्त किया गया और नया स्टॉक मंगवाया गया। हमारी प्राथमिकता मरीजों की सुरक्षा है और इस मामले में त्वरित कार्रवाई की गई।
दून अस्पताल में फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र बनाए जाने के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। मेडिकल कॉलेज बनने के बाद भी इस पर रोक क्यों नहीं लग पाई?
यह मामला हमारे संज्ञान में आया था। जांच के दौरान एक चिकित्सक की भूमिका सामने आई, जिसके बाद आवश्यक कार्रवाई की गई। हमने मेडिकल प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को और अधिक नियंत्रित बनाया है ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
मरीजों की शिकायत है कि अल्ट्रासाउंड के लिए लम्बा इंतजार करना पड़ता है। दूसरी ओर कैंसर मरीजों के लिए रेडियोथेरेपी सुविधा भी उपलब्ध नहीं है?
अस्पताल में अल्ट्रासाउंड सेवा पीपीपी मोड पर संचालित की जा रही है। सुबह से रात तक मरीजों को यह सुविधा दी जा रही है। सरकारी दरों पर जांच उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे मरीजों को निजी अस्पतालों की तुलना में काफी कम खर्च करना पड़ता है। जहां तक रेडियोथेरेपी का प्रश्न है, कुछ तकनीकी और आपूर्ति सम्बंधी चुनौतियां रही हैं। आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं ताकि मरीजों को बेहतर सुविधा मिल सके।
अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। फर्जी महिला सुरक्षाकर्मी का वार्ड तक पहुंच जाना और उपकरणों की चोरी जैसी घटनाएं क्या सुरक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं हैं?
सुरक्षाकर्मियों की संख्या हमारी आवश्यकता के अनुरूप नहीं है। अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की नियुक्ति के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की गई थी लेकिन उसमें तकनीकी बाधाएं आईं। अब नई प्रक्रिया चल रही है। हमारा प्रयास है कि सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जाए ताकि इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
आयुष्मान योजना में कथित फर्जीवाड़े की शिकायतें लम्बे समय से सामने आती रही हैं। केवल जांच के लिए मरीजों को भर्ती किए जाने के आरोप भी लगे हैं?
जब मैंने कार्यभार सम्भाला तब इस प्रकार की शिकायतें सामने आई थीं। इसके बाद भर्ती प्रक्रिया में बदलाव किया गया। अब केवल उन्हीं मरीजों को भर्ती किया जाता है जिनके उपचार या ऑपरेशन की स्पष्ट
चिकित्सकीय आवश्यकता होती है। केवल जांच के उद्देश्य से भर्ती करने की व्यवस्था समाप्त कर दी गई है।
मेडिकल कॉलेज में रैगिंग के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। आखिर रोक के बावजूद ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं?
रैगिंग रोकने के लिए लगातार जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं। एंटी रैगिंग स्क्वॉड सक्रिय है। शिकायत मिलने पर जांच की जाती है और दोषी पाए जाने वाले छात्रों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाती है। जुर्माना, निष्कासन और अन्य दंडात्मक कदम उठाए गए हैं। रैगिंग को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
मेडिकल कॉलेज में हुए चर्चित मेस घोटाले में लगभग 80 लाख रुपए की राशि को लेकर विवाद हुआ। इस मामले में प्रशासन की जिम्मेदारी क्या है?
छात्रों द्वारा जमा की जाने वाली राशि काॅलेज के खाते में जमा होनी चाहिए थी। जानकारी मिली कि कुछ छात्रों ने मेस संचालक के निजी खाते में भुगतान किया। मामले की जांच कराई गई है। प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई की गई है और सम्बंधित कर्मचारियों के खिलाफ कदम उठाए गए हैं। जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
दून अस्पताल पर दवा आपूर्तिकर्ताओं का लगभग 11 करोड़ रुपए का भुगतान बकाया होने की बात सामने आई थी। क्या अस्पताल वित्तीय संकट से जूझ रहा है?
भुगतान लम्बित रहने का प्रमुख कारण बजट संबंधी समस्या रही। पिछले वित्तीय वर्ष में अपेक्षित बजट उपलब्ध नहीं हो पाया था। अब नए वित्तीय वर्ष में बजट प्राप्त हो चुका है और भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
अस्पताल की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं। क्या दून अस्पताल के पास आवश्यक फायर एनओसी उपलब्ध है?
अग्नि सुरक्षा को लेकर जो बातें कही गईं, उनमें कई तथ्यात्मक त्रुटियां थीं। अस्पताल की इमरजेंसी बिल्डिंग के आईसीयू को फायर एनओसी प्राप्त हो चुकी है। अन्य इकाइयों के सम्बंध में भी प्रक्रिया चल रही है। अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन हमारी प्राथमिकताओं में शामिल है।
आप अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानती हैं?
मेरा मानना है कि सबसे बड़ी उपलब्धि व्यवस्थाओं को अधिक सुगम और मरीज-केंद्रित बनाना है। मरीजों को बेहतर सुविधा मिले, उपचार में देरी न हो और अस्पताल की सेवाएं लगातार बेहतर हों, इसी दिशा में हमने काम किया है। चुनौतियां हमेशा रहेंगी लेकिन उन्हें दूर करने के लिए निरंतर प्रयास करना ही प्रशासन की जिम्मेदारी है।

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