उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं वैसे-वैसे राजनीतिक दलों के बीच आरोप- प्रत्यारोप और सियासी नैरेटिव की लड़ाई भी तेज होती जा रही है। भाजपा और उसका गठबंधन ‘एनडीए’ जहां अपनी संगठनात्मक ताकत और विकास के मुद्दों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी को ‘फूट और टूट’ के नैरेटिव के जरिए घेरने की रणनीति भी दिखाई दे रही है। प्रदेश के राजनीतिक रण में नए-नए नैरेटिव के तीर चलने लगे हैं। एनडीए के नेताओं द्वारा समाजवादी पार्टी में सम्भावित टूट और असंतोष के दावे किए जा रहे हैं, जिससे प्रदेश का राजनीतिक पारा चढ़ गया है। पिछले कुछ महीनों में समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं के बयानों, स्थानीय स्तर पर नाराजगी और संगठन के भीतर मतभेदों की खबरों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हुई हैं। भाजपा और उसके सहयोगी दल लगातार यह दावा कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है और पार्टी के कई नेता नेतृत्व शैली तथा टिकट वितरण को लेकर असंतुष्ट हैं।
योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने सपा के कई सांसदों के अलग होने का दावा किया है। इसके बाद उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी इसी प्रकार के संकेत दिए, वहीं निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने भी कहा है कि समाजवादी पार्टी के कई सांसद एनडीए के सम्पर्क में हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाजवादी पार्टी को लेकर ये बयान पूर्वांचल के तीन प्रमुख ओबीसी नेताओं की ओर से आए हैं। पूर्वांचल वही क्षेत्र है जहां पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को उल्लेखनीय सफलता मिली थी। ऐसे में इन बयानों को केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक व्यापक चुनावी रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि समाजवादी पार्टी इन दावों को पूरी तरह खारिज कर रही है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि भाजपा और उसके सहयोगी दल चुनावी लाभ के लिए भ्रम का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। सपा नेताओं का दावा है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और आगामी चुनावों की तैयारी में जुटी हुई है। ऐसे में सवाल है कि पंजाब, बंगाल और महाराष्ट्र के बाद क्या अब यूपी की बारी है? यह फूट की चर्चा है या चुनावी रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में केवल संगठनात्मक मजबूती ही पर्याप्त नहीं होती बल्कि जनधारणा और राजनीतिक संदेश भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि किसी दल के बारे में लगातार यह संदेश दिया जाए कि उसके भीतर मतभेद हैं या नेतृत्व को लेकर असंतोष है तो इसका असर कार्यकर्ताओं और समर्थकों के मनोबल पर पड़ सकता है। पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में राजनीतिक दलों के भीतर टूट और बगावत देखने को मिली है। महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और अन्य राज्यों में दल-बदल की घटनाओं ने इस प्रकार की राजनीतिक चर्चाओं को और बल दिया है। इसी पृष्ठभूमि में उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी ऐसे दावे अधिक चर्चा का विषय बन रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है कि एनडीए अपने सबसे मजबूत विपक्षी दल समाजवादी पार्टी की घेरेबंदी करने की कोशिश कर रहा है। इसके जरिए सपा के जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित करने की रणनीति भी देखी जा रही है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ‘पीडीए’’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने में जुटी है। अखिलेश यादव लगातार ‘पीडीए’ के मुद्दे को आगे बढ़ा रहे हैं और सामाजिक न्याय की राजनीति को अपनी मुख्य रणनीति बना रहे हैं। इसके जवाब में भाजपा भी अपने सहयोगी दलों के जरिए ओबीसी राजनीति को साधने की कोशिश कर रही है। सुभासपा, निषाद पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और अपना दल (एस) जैसे सहयोगी दलों के माध्यम से भाजपा सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में लगी है। पार्टी ने संगठन और सरकार दोनों में ओबीसी नेतृत्व को विशेष महत्व दिया है।
राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है कि एनडीए अपने सबसे मजबूत विपक्षी दल समाजवादी पार्टी की घेरेबंदी करने की कोशिश कर रहा है। इसके जरिए सपा के जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित करने की रणनीति भी देखी जा रही है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ‘पीडीए’’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने में जुटी है। अखिलेश यादव लगातार ‘पीडीए’ के मुद्दे को आगे बढ़ा रहे हैं और सामाजिक न्याय की राजनीति को अपनी मुख्य रणनीति बना रहे हैं। इसके जवाब में भाजपा भी अपने सहयोगी दलों के जरिए ओबीसी राजनीति को साधने की कोशिश कर रही है। सुभासपा, निषाद पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और अपना दल (एस) जैसे सहयोगी दलों के माध्यम से भाजपा सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में लगी है। पार्टी ने संगठन और सरकार दोनों में ओबीसी नेतृत्व को विशेष महत्व दिया है।
भाजपा के प्रमुख ओबीसी चेहरे केशव प्रसाद मौर्य लगातार अखिलेश यादव पर राजनीतिक हमले कर रहे हैं। वहीं ओमप्रकाश राजभर और संजय निषाद भी सपा को निशाने पर रखते हुए नए राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि चुनावी राजनीति में अंतिम फैसला जनता करती है। केवल आरोप-प्रत्यारोप, राजनीतिक नैरेटिव या सम्भावित टूट की चर्चाएं चुनावी परिणाम तय नहीं करतीं। संगठन की मजबूती, उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय मुद्दे, सामाजिक समीकरण और जनता का विश्वास अंततः निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ‘एनडीए’ समाजवादी पार्टी को ‘फूट और टूट’ के मुद्दे पर घेरने की कोशिश कर रहा है जबकि समाजवादी पार्टी इसे राजनीतिक दुष्प्रचार बताते हुए अपनी एकजुटता का संदेश देने में जुटी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह सियासी नैरेटिव चुनावी मैदान में कितना असर डालता है और क्या वास्तव में इसका राजनीतिक लाभ किसी दल को मिलता है या नहीं। इतना तय है कि उत्तर प्रदेश में आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक संदेशों की यह जंग आने वाले दिनों में और तेज होने वाली है।