- अमित कुमार
स्वतंत्रता के बाद के भारत में जब देश समाजवाद, समानता और सामाजिक न्याय के सपनों के साथ आगे बढ़ रहा था, तब राज कपूर ने अपने सिनेमा के जरिए इन सपनों को पर्दे पर जीवंत कर दिया। उनकी फिल्मों का आम आदमी केवल एक किरदार नहीं था बल्कि नेहरू युग के भारत की आकांक्षाओं, संघर्षों और उम्मीदों का प्रतीक था
भारतीय सिनेमा के इतिहास में यदि किसी फिल्मकार को स्वतंत्र भारत की आत्मा का सबसे बड़ा कथाकार कहा जाए तो वह राज कपूर हैं। उन्हें अक्सर ‘द ग्रेटेस्ट शोमैन’ कहा जाता है लेकिन यह परिचय उनके योगदान का केवल एक हिस्सा भर है। वास्तव में राज कपूर उस दौर के भारत के सिनेमाई दार्शनिक थे, जब देश आजादी के बाद अपनी नई पहचान गढ़ रहा था। उनकी फिल्मों में प्रेम था, संगीत था, मनोरंजन था मगर सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनके सिनेमा का केंद्र सत्ता, महल और अमीरी नहीं बल्कि आम आदमी था। यही कारण है कि राज कपूर को भारतीय समाजवाद का सबसे प्रभावशाली सिनेमाई चेहरा कहा जाता है।
वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्र निर्माण की थी। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता से जूझते देश को एक नई दिशा देनी थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने लोकतांत्रिक समाजवाद का रास्ता चुना। यह वह दौर था जब राज्य की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता था, सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हो रहा था और समान अवसरों पर जोर दिया जा रहा था। राजनीति में जो विचारधारा आकार ले रही थी, वही संस्कृति और कला में भी दिखाई देने लगी। राज कपूर का सिनेमा इसी युग की उपज था।
राज कपूर ने बहुत कम उम्र में आर.के. स्टूडियो की स्थापना की और अपनी फिल्मों के माध्यम से एक नए भारत की कहानी कहनी शुरू की। उनकी पहली बड़ी सफल फिल्मों में से एक ‘बरसात’ थी लेकिन सामाजिक दृष्टि से उनका असली महत्व ‘आवारा’ से शुरू होता है। 1951 में रिलीज हुई ‘आवारा’ भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिनी जाती है। यह केवल एक प्रेम कहानी नहीं थी बल्कि सामाजिक न्याय और वर्ग संघर्ष की कहानी थी।
फिल्म का केंद्रीय प्रश्न था कि क्या व्यक्ति जन्म से अपराधी होता है या समाज उसे अपराधी बनाता है? राजू नाम का गरीब युवक परिस्थितियों के कारण अपराध की दुनिया में पहुंच जाता है। फिल्म न्यायपालिका, वर्ग व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव पर सवाल उठाती है। यह विचार उस समय के समाजवादी विमर्श के बिल्कुल केंद्र में था। राज कपूर ने पहली बार इतनी लोकप्रिय शैली में यह संदेश दिया कि गरीबी कोई व्यक्तिगत असफलता नहीं बल्कि सामाजिक व्यवस्था की समस्या है।
‘आवारा’ की सफलता केवल भारत तक सीमित नहीं रही। सोवियत संघ, चीन, तुर्की, मिस्र और पूर्वी यूरोप के देशों में इस फिल्म ने अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की। सोवियत संघ में राज कपूर का नाम किसी राजनीतिक नेता या अंतरराष्ट्रीय सितारे से कम नहीं था। वहां के दर्शकों ने उनके पात्रों में मेहनतकश और संघर्षशील आम आदमी की छवि देखी। यह संयोग नहीं था कि समाजवादी देशों में राज कपूर को इतना सम्मान मिला। उनके सिनेमा की भाषा मानवता, समानता और सामाजिक न्याय की भाषा थी।
यदि ‘आवारा’ ने समाजवादी विचारधारा को लोकप्रिय बनाया तो ‘श्री 420’ ने उसे और अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा। 1955 में आई यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म में राज नाम का युवक गांव से मुम्बई आता है। उसके पास सपने हैं लेकिन जेब खाली है। महानगर की चमक-दमक उसे आकर्षित करती है लेकिन जल्द ही वह समझ जाता है कि इस चमक के पीछे छल, भ्रष्टाचार और लालच की दुनिया छिपी हुई है।
‘श्री 420’ को देखने पर ऐसा लगता है जैसे राज कपूर ने नेहरू युग की पूरी सामाजिक बहस को पर्दे पर उतार दिया हो। फिल्म में एक ओर ईमानदार और संघर्षशील गरीब जनता है। दूसरी तीफ धन और सत्ता के बल पर सब कुछ खरीद लेने वाला वर्ग। यह संघर्ष दरअसल समाजवाद और अनियंत्रित पूंजीवाद के बीच का संघर्ष था। फिल्म का संदेश स्पष्ट था कि विकास केवल अमीरों के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।
फिल्म का प्रसिद्ध गीत ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ उस दौर के भारत की वैश्विक दृष्टि और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का प्रतीक था। इस गीत में एक तरफ दुनिया से सीखने की भावना है तो दूसरी तरफ अपनी राष्ट्रीय पहचान पर गर्व भी। यह वही भारत था जिसकी कल्पना नेहरू कर रहे थे।
राज कपूर की फिल्मों का नायक हमेशा आम आदमी होता था। वह गरीब हो सकता था, बेघर हो सकता था, संघर्ष कर सकता था लेकिन उसके भीतर मानवीय संवेदनाएं जीवित रहती थीं। यह दृष्टिकोण चार्ली चैपलिन के प्रसिद्ध ‘ट्रैम्प’ चरित्र से प्रभावित था। चैपलिन की तरह राज कपूर ने भी हास्य और भावुकता के माध्यम से समाज की बड़ी समस्याओं को प्रस्तुत किया। फर्क सिर्फ इतना था कि उन्होंने इसे भारतीय परिस्थितियों और भारतीय संवेदनाओं के अनुरूप ढाल दिया।
‘बूट पाॅलिश’ को देखें तो वहां सड़कों पर रहने वाले बच्चों की त्रासदी दिखाई देती है। ‘जागते रहो’ में एक प्यासा व्यक्ति पूरी रात महानगर में भटकता है और समाज के पाखंड को उजागर करता है। ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में डाकुओं के पुनर्वास और सामाजिक सुधार का संदेश दिया गया है। इन फिल्मों का मूल उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक चेतना जगाना था।
राज कपूर की फिल्मों में स्त्रियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। नरगिस द्वारा निभाए गए पात्र केवल प्रेमिका नहीं थे बल्कि नैतिकता, संवेदना और सामाजिक मूल्यों के प्रतीक थे। ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ में नरगिस के पात्र उस मानवीय चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं जो नायक को सही रास्ते पर वापस लाती है। यह भी उस समय के समाजवादी आदर्शों का हिस्सा था, जिसमें स्त्रियों को सामाजिक परिवर्तन की सहभागी शक्ति के रूप में देखा जाता था।
राज कपूर के सिनेमा की एक और विशेषता यह थी कि उन्होंने समाजवाद को कभी भाषण की तरह प्रस्तुत नहीं किया। उनकी फिल्मों में कोई वैचारिक उपदेश नहीं होता था। वे कहानी, संगीत और भावनाओं के माध्यम से अपनी बात कहते थे। यही कारण है कि उनके विचार आम जनता तक सहजता से पहुंचते थे। करोड़ों लोग उनकी फिल्मों को देखते थे और अनजाने में सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय मूल्यों का संदेश भी ग्रहण करते थे।
1960 के दशक के बाद भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था में बदलाव आने लगे। राज कपूर का सिनेमा भी बदला। ‘संगम’, ‘बाॅबी’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी फिल्मों में व्यक्तिगत संबंधों, प्रेम और सामाजिक बदलावों के नए आयाम दिखाई दिए। फिर भी उनकी मूल संवेदना आम आदमी और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रही।
आज जब भारतीय सिनेमा बड़े बजट, भव्य तकनीक और वैश्विक बाजार के दबाव में काम कर रहा है, तब राज कपूर की फिल्में एक अलग महत्व रखती हैं। वे याद दिलाती हैं कि सिनेमा केवल मनोरंजन उद्योग नहीं बल्कि समाज की आत्मा को अभिव्यक्त करने वाला माध्यम भी हो सकता है। आज की कई फिल्मों में आम आदमी की जगह सुपरहीरो, एजेंट या असाधारण पात्रों ने ले ली है लेकिन राज कपूर का नायक आज भी फुटपाथ पर चलता हुआ, संघर्ष करता हुआ और बेहतर भविष्य का सपना देखता हुआ दिखाई देता है।
यही कारण है कि राज कपूर केवल एक अभिनेता, निर्देशक या शोमैन नहीं थे। वे स्वतंत्र भारत के समाजवादी स्वप्न के सबसे प्रभावशाली सिनेमाई दूत थे। उनकी फिल्मों ने उस पीढ़ी को आवाज दी जो गरीबी से लड़ रही थी, समानता का सपना देख रही थी और लोकतंत्र की ताकत पर विश्वास करती थी। ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ जैसी फिल्में आज भी केवल सिनेमाई उपलब्धियां नहीं हैं बल्कि वे उस भारत की जीवित स्मृतियां हैं जिसने सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा पर आधारित राष्ट्र का सपना देखा था। राज कपूर का सिनेमा उस सपने का सबसे खूबसूरत और सबसे लोकप्रिय सिनेमाई दस्तावेज है।