- दिव्या भारती
उत्तराखण्ड में चीड़ को लेकर नकारात्मक माहौल देखने को मिलता है जबकि चीड़ कार्बन डाइआॅक्साइड का अवशोषण करता है और आॅक्सीजन प्रदान करता है। इसके कई कारक हैं जिनसे यह सामने आ रहा है कि चीड़ पहाड़ का सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है बल्कि पहाड़ की आर्थिकी में भी उसका योगदान है। ऐसे में सवाल खड़े हो रहे हैं कि पहाड़ों में हरित आवरण बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाने वाले चीड़ को दोषी ठहराना क्या उचित है?
विश्व पर्यावरण दिवस पर जब देशभर में पौधारोपण, जल संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर चर्चाएं हो रही थीं, तब उत्तराखण्ड के जंगलों को लेकर एक पुरानी लेकिन महत्वपूर्ण बहस फिर चर्चा में आ गई। यह बहस चीड़ के जंगलों को लेकर है। दशकों से चीड़ को वनाग्नि, जल स्रोतों के सूखने और जैव विविधता में गिरावट के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। पहाड़ के कई सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों का एक वर्ग इसे उत्तराखण्ड की पर्यावरणीय समस्याओं का प्रमुख कारण मानता है। दूसरी ओर अब ऐसे स्वर भी सामने आने लगे हैं जो इस पूरे मुद्दे को अधिक संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टि से देखने की मांग कर रहे हैं।
अल्मोड़ा के स्याहीदेवी-शीतलाखेत क्षेत्र के पर्यावरण कार्यकर्ता गजेंद्र कुमार पाठक द्वारा हाल ही में उठाए गए सवालों ने इस बहस को नई दिशा दी है। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में जंगलों को प्रजातियों के आधार पर बांटने के बजाय उनके संरक्षण पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि चीड़ भी अन्य वृक्षों की तरह कार्बन डाइआॅक्साइड का अवशोषण करता है, आॅक्सीजन प्रदान करता है और पहाड़ों में हरित आवरण बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाता है। ऐसे में किसी एक वृक्ष प्रजाति को पूरी तरह दोषी ठहराना क्या उचित है, यह सवाल अब चर्चा के केंद्र में है।
दरअसल पूरी दुनिया इस समय जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना कर रही है। बढ़ता वैश्विक तापमान, अनियमित वर्षा, सूखते जल स्रोत, ग्लेशियरों का पिघलना और बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं इसके स्पष्ट संकेत हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस संकट से निपटने में जंगल सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या किसी भी प्रकार के जंगल का क्षरण अंततः पर्यावरण के लिए नुकसान नहीं है।
वनाग्नि और चीड़: क्या पूरा सच इतना ही है?
वनाग्नि और चीड़: क्या पूरा सच इतना ही है?
उत्तराखण्ड में चीड़ के प्रति नकारात्मक धारणा का सबसे बड़ा कारण वनाग्नि है। हर वर्ष गर्मियों के मौसम में जंगलों में आग की घटनाएं सामने आती हैं और आमतौर पर इसका प्रमुख कारण चीड़ से गिरने वाले पिरुल को माना जाता है। यह तथ्य भी है कि पिरुल अत्यधिक ज्वलनशील होता है और आग को तेजी से फैलाने में भूमिका निभाता है लेकिन बहस का दूसरा पक्ष कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाता है। यदि चीड़ ही जंगलों में आग लगने का मुख्य कारण है तो फिर फूलों की घाटी जैसे क्षेत्रों में आग कैसे लगती है जहां चीड़ मौजूद नहीं है?
पंचाचूली और पिंडारी ग्लेशियर की तलहटी के जंगलों में लगने वाली आग का कारण क्या है? झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश के अन्य राज्यों के जंगलों में भी हर साल आग लगती है जबकि वहां चीड़ के जंगल नहीं हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि वनाग्नि की समस्या केवल किसी एक वृक्ष प्रजाति से नहीं जुड़ी बल्कि इसके पीछे मानवीय लापरवाही, बदलती जलवायु परिस्थितियां, वन प्रबंधन की कमियां और अन्य कारण भी जिम्मेदार हैं।
चैत संस्था और इसरो का सर्वे: जमीनी तस्वीर क्या कहती है?
चैत संस्था और इसरो का सर्वे: जमीनी तस्वीर क्या कहती है?
उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में चीड़ के वनों की स्थिति, उनके दोहन और पर्यावरणीय प्रभावों को समझने के लिए ‘सेंटर फाॅर हायर एजुकेशन एंड ट्रेनिंग’ (चैत संस्था) तथा ‘इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ साइंटिफिक रिसर्च’ (इसरो) द्वारा किया गया संयुक्त जमीनी सर्वे एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। शीतकाल और ग्रीष्मकाल दोनों ऋतुओं में प्रदेश के 366 गांवों में किए गए इस उपभोग आधारित सर्वे के निष्कर्ष कई स्थापित धारणाओं को चुनौती देते हैं।
सर्वे के अनुसार स्थानीय स्तर पर ईंधन की जरूरत, इमारती लकड़ी, अवैध कटान और पारम्परिक लीसा दोहन के संयुक्त प्रभाव के कारण उत्तराखण्ड में प्रतिवर्ष औसतन 41.17 लाख पेड़ प्रभावित या नष्ट हो रहे हैं। सबसे अधिक प्रभाव अल्मोड़ा जिले में दर्ज किया गया, जहां लगभग 10.32 लाख पेड़ों पर सालाना दबाव बताया गया है। इसके बाद पौड़ी में 7.68 लाख, बागेश्वर में 6.28 लाख, टिहरी में 4.63 लाख और पिथौरागढ़ में 4.05 लाख पेड़ों के प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी घास के ढेर लगाने, खेतों की बाड़ बनाने, लौकी, कद्दू और ककड़ी जैसी बेलों को सहारा देने तथा अन्य घरेलू उपयोगों के लिए बड़ी संख्या में युवा चीड़ के पेड़ों का इस्तेमाल होता है। इसके अतिरिक्त पारम्परिक लीसा दोहन भी वनों पर दबाव बढ़ाने वाला कारक रहा है।
सर्वे का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि वन विभाग और भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) के आधिकारिक आंकड़े मुख्यतः वैध परमिट वाले कटान अथवा पकड़ी गई वन तस्करी को ही दर्ज करते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले छोटे लेकिन निरंतर दोहन तथा वनाग्नि से होने वाले वास्तविक नुकसान का पूरा आकलन अक्सर सरकारी आंकड़ों में नहीं दिखता।
सर्वे का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि वन विभाग और भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) के आधिकारिक आंकड़े मुख्यतः वैध परमिट वाले कटान अथवा पकड़ी गई वन तस्करी को ही दर्ज करते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले छोटे लेकिन निरंतर दोहन तथा वनाग्नि से होने वाले वास्तविक नुकसान का पूरा आकलन अक्सर सरकारी आंकड़ों में नहीं दिखता।
बदलता वैज्ञानिक दृष्टिकोण : चीड़ अब शोध का नया विषय
हाल के वर्षों में चीड़ के जंगलों को लेकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण में भी बड़ा बदलाव आया है। जहां पहले शोध मुख्य रूप से वृक्षों की संख्या, कटान और राजस्व तक सीमित थे, वहीं अब अध्ययन इसके व्यापक पारिस्थितिक प्रभावों पर केंद्रित हो रहे हैं। वर्ष 2024 से 2026 के बीच प्रकाशित विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोधों ने संकेत दिया है कि चीड़ को केवल एक आर्थिक संसाधन या वनाग्नि के कारक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।
पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार चीड़ की सबसे बड़ी विशेषता उसकी तेजी से फैलने की क्षमता है। इसके बीज हवा के साथ लम्बी दूरी तक पहुंच जाते हैं, जिसके कारण कई क्षेत्रों में चीड़ का विस्तार उन स्थानों तक भी हो रहा है जहां परम्परागत रूप से बांज जैसे चैड़ी पत्ती वाले वृक्षों का प्रभुत्व था। कुछ अध्ययनों में यह आशंका व्यक्त की गई है कि यदि इस विस्तार का वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं किया गया तो जल संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले बांज के जंगलों पर दबाव बढ़ सकता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि बांज और अन्य चैड़ी पत्ती वाले वृक्ष वर्षाजल को भूमि में संरक्षित करने, भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक जल स्रोतों को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके विपरीत चीड़ से गिरने वाला पिरुल कई स्थानों पर भूमि की सतह पर मोटी परत बना देता है। कुछ अध्ययनों के अनुसार इससे मिट्टी की जल सोखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, हालांकि इस विषय पर अभी और विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता बताई जा रही है।
पिरुल, आग और जलवायु परिवर्तन का सम्बंध
उत्तराखण्ड में हर वर्ष जंगलों में आग लगने की घटनाएं सामने आती हैं और पिरुल को इसका प्रमुख कारण माना जाता है। वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि सूखे मौसम में पिरुल आग को तेजी से फैलाने का माध्यम बनता है। यही कारण है कि वन विभाग लम्बे समय से पिरुल प्रबंधन को वनाग्नि नियंत्रण रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता रहा है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि पिरुल स्वयं जंगल में आग नहीं लगाता। अधिकांश मामलों में आग मानवीय गतिविधियों, लापरवाही, जान-बूझकर लगाई गई या अत्यधिक शुष्क मौसम के कारण फैलती है। बदलती जलवायु परिस्थितियों ने भी इस चुनौती को और गम्भीर बनाया है। पिछले कुछ वर्षों में तापमान में वृद्धि और वर्षा चक्र में बदलाव के कारण जंगल अधिक संवेदनशील हुए हैं।
अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रों में यह भी उल्लेख किया गया है कि पारम्परिक लीसा दोहन की पुरानी पद्धतियां कई बार पेड़ों को कमजोर कर देती थीं। पुराने समय में अपनाई जाने वाली ‘कप एंड लिप’ तकनीक में तनों पर गहरे कट लगाए जाते थे जिससे वृक्षों की संरचना प्रभावित होती थी। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे वृक्ष आग और तेज हवाओं के दौरान अधिक नुकसान झेलते हैं। कई मामलों में वे अंदर से कमजोर होकर गिर जाते हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘विंडफाॅल’ कहा जाता है।
अर्थव्यवस्था में चीड़ का योगदान
पर्यावरणीय बहसों के बीच यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि चीड़ उत्तराखण्ड की ग्रामीण और वन अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। लीसा उत्पादन, वन आधारित उद्योगों और अन्य उपयोगों के माध्यम से राज्य को वर्षों से राजस्व प्राप्त होता रहा है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार अकेले अल्मोड़ा जिले से करोड़ों रुपए का राजस्व प्राप्त होता है जबकि पूरे राज्य में यह आंकड़ा लगभग 50 करोड़ रुपए वार्षिक तक पहुंचता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी चीड़ का उपयोग केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहा है। घरों, खेतों और कृषि कार्यों में लम्बे समय से इसका प्रयोग होता आया है। यही कारण है कि चीड़ को लेकर होने वाली बहस केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है बल्कि इसका सीधा सम्बंध स्थानीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन से भी जुड़ा हुआ है।
समाधान की दिशा : समस्या नहीं, संसाधन के रूप में पिरुल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पिरुल को केवल वनाग्नि का कारण मानने के बजाय संसाधन के रूप में देखा जाए तो इससे कई समस्याओं का समाधान सम्भव है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखण्ड के कई क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय संगठनों द्वारा पिरुल एकत्र कर उससे बायो-पेलेट, ब्रिकेट और अन्य ईंधन उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
इन प्रयासों का दोहरा लाभ सामने आ रहा है। एक ओर जंगलों में जमा होने वाले पिरुल की मात्रा कम होती है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीणों को अतिरिक्त आय का स्रोत भी मिलता है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इस माॅडल को बड़े स्तर पर लागू किया जाए तो वनाग्नि की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।
वैज्ञानिक प्रबंधन ही भविष्य का रास्ता
वन विभाग भी अब पारम्परिक तरीकों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक प्रबंधन की दिशा में काम कर रहा है। लीसा निकासी के लिए पुरानी पद्धतियों के स्थान पर ‘बोरहोल तकनीक’ को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस तकनीक में वृक्ष को न्यूनतम क्षति पहुंचाते हुए लीसा निकाला जाता है, जिससे उसकी आयु और गुणवत्ता दोनों सुरक्षित रहती हैं।
चीड़ बनाम बांज नहीं, संतुलित वन नीति की जरूरत
उत्तराखण्ड के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती किसी एक वृक्ष प्रजाति को दोषी ठहराने की नहीं बल्कि पूरे वन तंत्र को सुरक्षित रखने की है। यह सच है कि बांज, बुरांश और काफल जैसे चैड़ी पत्ती वाले वृक्ष जल संरक्षण और जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह भी सच है कि चीड़ के अत्यधिक विस्तार, पिरुल और वनाग्नि जैसी चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि चीड़ आज उत्तराखण्ड के विशाल भूभाग का हिस्सा है और पर्यावरणीय तथा आर्थिक दोनों दृष्टियों से उसकी अपनी भूमिका है। इसलिए भविष्य का रास्ता चीड़ और बांज के बीच संघर्ष खड़ा करने में नहीं बल्कि मिश्रित वन नीति अपनाने में है। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां आवश्यक हो वहां बांज, बुरांश और काफल जैसे स्थानीय वृक्षों का पुनरोपण किया जाए, वहीं मौजूदा चीड़ वनों का भी वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित किया जाए।
बात अपनी-अपनी
जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापवृद्धि के इस दौर में एक-एक पेड़ का महत्व है। अदूरदर्शी नीतियों, ग्रामीणों की जंगलों पर निर्भरता, वनाग्नि के कारण उत्तराखण्ड में मिश्रित जंगल पहले ही सिकुड़ गए हैं ऐसे में चीड़ के युवा पेड़ों का भारी मात्रा में कटान बेहद चिंताजनक है। ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ चल रहे अभियान में चीड़ के जंगल वायुमंडलीय कार्बन डाई आॅक्साइड का अवशोषण कर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, कूरी खरपतवार के प्रसार में रोक लगाने में भी चीड़ की महत्वपूर्ण भूमिका है। ग्रामीणों को उचित विकल्प देकर चीड़ के जंगलों की रक्षा की जानी चाहिए।
गजेन्द्र कुमार पाठक, संयोजक, जंगल के दोस्त