विंबलडन में भारत की यात्रा संघर्ष और गौरव की कहानी रही है। रामनाथन कृष्णन ने इसकी मजबूत नींव रखी जबकि लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्जा ने डबल्स में भारत को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। अब अर्णव पापरकर जैसे युवा खिलाड़ियों ने भविष्य में एकल वर्ग में भी इतिहास रचने की नई उम्मीद जगा दी है

इंग्लैंड में खेला गया ग्रैंड स्लैम विंबलडन 2026 के सीनियर मुकाबलों मेें पुरुष एकल के फाइनल में इटली के यानिक सिनर ने लगातार दूसरा खिताब जीता तो महिला एकल में चेक गणराज्य की महज 21 वर्षीय लिंडा नोस्कोवा ने अपने करियर का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब जीता, वहीं दूसरी तरफ जूनियर मुकाबलों में पुरुष एकल में अमेरिका के जाॅर्डन केली ने खिताब जीता तो महिला एकल में रूस की अन्ना पुष्कारेवा ने विंबलडन खिताब जीता। दूसरी तरफ भारत की बात करें तो युवा टेनिस खिलाड़ी अर्णव पापरकर ने शानदार प्रदर्शन करते हुए इतिहास रच दिया। पुणे के 18 वर्षीय खिलाड़ी ने लड़कों के एकल वर्ग के क्वार्टर फाइनल में पहुंचकर 36 वर्षों बाद यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बनने का गौरव प्राप्त किया। हालांकि क्वार्टर फाइनल में उन्हें अमेरिका के जाॅर्डन ली के खिलाफ 2-6, 5-7 से हार का सामना करना पड़ा लेकिन उनका प्रदर्शन भारतीय टेनिस के भविष्य के लिए बेहद उत्साहजनक माना जा रहा है। अर्णव ने इस ऐतिहासिक सफर के दौरान दूसरे दौर में अमेरिका के जूनियर विश्व नम्बर-3 कीटन हैंस को 6-2, 6-3 से हराकर बड़ा उलटफेर किया था। इसके बाद उन्होंने जापान के रियो तबाता को सीधे सेटों में हराकर अंतिम आठ में जगह बनाई। तबाता के खिलाफ जीत के बाद अर्णव ने कहा, ‘‘मैं रियो तबाता के खिलाफ इस जीत से सच में बहुत खुश हूं। मैं उनसे पहले दो बार हार चुका था इसलिए आखिरकार जीत हासिल करना बहुत अच्छा लग रहा है। यह मेरा पहला ग्रैंड स्लैम क्वार्टर फाइनल भी है और विंबलडन में इसे हासिल करना इसे और भी खास बनाता है। मैं आगे के राउंड के लिए सच में बहुत उत्साहित हूं।’’ उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि स्कोर लाइन आसान दिखने के
बावजूद मुकाबला मानसिक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण था। इस टूर्नामेंट में अब तक का मेरा सबसे मुश्किल मैच था।

अर्णव के इस प्रदर्शन को लेकर खेल विश्लेषकों का कहना है कि विंबलडन के इतिहास में भारत की यात्रा संघर्ष, धैर्य और उपलब्धियों की प्रेरक कहानी है। रामनाथन कृष्णन ने जहां भारतीय टेनिस की मजबूत नींव रखी वहीं लिएंडर पेस और महेश भूपति ने डबल्स में भारत को विश्व की महाशक्ति बनाया। सानिया मिर्जा ने महिला टेनिस में नया अध्याय लिखा और अब अर्णव पापरकर जैसे युवा खिलाड़ी यह उम्मीद जगा रहे हैं कि आने वाले वर्षों में भारत एकल वर्ग में भी नई ऊंचाइयों को छू सकता है। भले ही भारत अब तक विंबलडन के पुरुष या महिला एकल का खिताब नहीं जीत पाया हो लेकिन भारतीय खिलाड़ियों की उपलब्धियां इस प्रतिष्ठित ग्रैंड स्लैम के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हैं। यदि देश में विश्वस्तरीय प्रशिक्षण, बेहतर ग्रास कोर्ट सुविधाएं और दीर्घकालिक योजना पर काम जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब कोई भारतीय खिलाड़ी विंबलडन की एकल ट्राॅफी भी अपने नाम करेगा।
दूसरी तरफ भारत के पूर्व दिग्गज टेनिस खिलाड़ी आनंद अमृतराज ने खुलकर सराहना करते हुए कहा कि अर्णव के खेल में विविधता है। वह नेट पर आक्रामक खेल सकते हैं, बेसलाइन से लम्बी रैलियां खेल सकते हैं और परिस्थितियों के अनुसार अपने खेल में बदलाव भी कर लेते हैं। उनकी सर्विस मजबूत है, मूवमेंट शानदार है और शाॅट चयन बेहद परिपक्व है। यही गुण उन्हें भविष्य का सम्पूर्ण खिलाड़ी बनाते हैं।
कौन हैं अर्णव पापरकर?
पुणे के रहने वाले अर्णव पापरकर भारतीय टेनिस के उभरते सितारों में शामिल हैं। आईटीएफ जूनियर रैंकिंग में वह विश्व के शीर्ष खिलाड़ियों में स्थान बना चुके हैं। छह फीट से अधिक लम्बे अर्णव हेमंत बेंद्रे टेनिस अकादमी में कोच प्रसेनजीत पाॅल के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लेते हैं। इसके अलावा वह स्पेन की सोटो टेनिस अकादमी में कोच निजेल बीवर्स के साथ अभ्यास करते हैं। वर्ष 2023 में उन्होंने मेलबर्न में ऑस्ट्रेलिया ओपन अंडर-14 एशिया-प्रशांत इलीट ट्रॉफी जीतकर पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया था।
अर्णव की उपलब्धियां
अर्णव ने 2023 में वाइल्ड कार्ड के जरिए राष्ट्रीय अंडर-16 चैम्पियनशिप का खिताब जीता। 2024 में उन्होंने अपने 16वें जन्मदिन पर एटीपी चैलेंजर स्तर पर पदार्पण किया। वर्ष 2025 में बहरीन के आईटीएफ जे-60 मनामा और मलेशिया के जे-200 कुआलालंपुर टूर्नामेंट जीतकर अंतरराष्ट्रीय जूनियर टेनिस में अपनी मजबूत पहचान बनाई। 2026 की शुरुआत में वह एआईटीए अंडर-18 राष्ट्रीय रैंकिंग में नम्बर एक बने और लगातार 21 सप्ताह तक शीर्ष स्थान पर रहे। इसी वर्ष फ्रेंच ओपन जूनियर प्रतियोगिता के तीसरे दौर और विंबलडन जूनियर के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचकर उन्होंने भारतीय टेनिस की नई उम्मीदों को मजबूत किया।
ग्रैंड स्लैम विंबलडन के इतिहास में भारत का प्रदर्शन
टेनिस की दुनिया में यदि किसी एक टूर्नामेंट को सबसे प्रतिष्ठित और परम्पराओं से भरपूर माना जाता है तो वह है विंबलडन ग्रैंड स्लैम। लंदन स्थित आॅल इंग्लैंड लाॅन टेनिस एंड क्रोकेट क्लब में आयोजित होने वाला यह टूर्नामेंट वर्ष 1877 से लगातार खेला जा रहा है और इसे विश्व का सबसे पुराना तथा सबसे प्रतिष्ठित ग्रैंड स्लैम माना जाता है। घास (ग्रास कोर्ट) पर खेले जाने वाले इस टूर्नामेंट में खिताब जीतना हर टेनिस खिलाड़ी का सपना होता है। भारत का विंबलडन से रिश्ता भी लगभग सात दशक पुराना है लेकिन भारत अभी तक पुरुष या महिला एकल वर्ग में कोई विंबलडन चैम्पियन नहीं दे पाया है मगर डबल्स और मिक्स्ड डबल्स में भारतीय खिलाड़ियों ने विश्व टेनिस में अपनी ऐसी पहचान बनाई, जिसे आज भी सम्मान के साथ याद किया जाता है। रामनाथन कृष्णन से लेकर लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्जा तक भारतीय टेनिस की कई पीढ़ियों ने विंबलडन के इतिहास में अपने नाम दर्ज कराए हैं।

रामनाथन कृष्णन ने रखी भारतीय टेनिस की मजबूत नींव
भारत के लिए विंबलडन में पहली बड़ी सफलता का श्रेय रामनाथन कृष्णन को जाता है। उस दौर में जब भारतीय खिलाड़ियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संसाधनों की भारी कमी थी, तब कृष्णन ने अपनी शानदार तकनीक और संयमित खेल के दम पर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने 1960 और 1961 में लगातार दो बार विंबलडन पुरुष एकल के सेमीफाइनल में पहुंचकर इतिहास रचा था। आज भी वह विंबलडन के पुरुष एकल में
सेमीफाइनल तक पहुंचने वाले भारत के एकमात्र खिलाड़ी हैं। उनकी उपलब्धि इसलिए भी विशेष मानी जाती है क्योंकि उस समय यूरोपीय और ऑस्ट्रेलिया खिलाड़ियों का टेनिस पर लगभग एकाधिकार था। रामनाथन ने यह साबित किया कि भारतीय खिलाड़ी भी तकनीकी कौशल और मानसिक मजबूती के दम पर विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को चुनौती दे सकते हैं।
विजय अमृतराज ने बढ़ाया भारतीय टेनिस का सम्मान
वर्ष 1970 और 1980 के दशक में विजय अमृतराज भारतीय टेनिस का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे। उनकी तेज सर्विस, नेट पर शानदार खेल और आक्रामक शैली ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया। उन्होंने 1973 और 1981 में विंबलडन के क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय किया। हालांकि वह सेमीफाइनल तक नहीं पहुंच सके लेकिन उस दौर में लगातार शीर्ष खिलाड़ियों को चुनौती देकर उन्होंने भारतीय टेनिस की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाई दी। विजय अमृतराज केवल खिलाड़ी ही नहीं बल्कि भारतीय टेनिस के वैश्विक ब्रांड एम्बेसडर भी बने। उनकी लोकप्रियता के कारण दुनिया भर में भारतीय टेनिस को नई पहचान मिली।
रमेश कृष्णन ने कायम रखी परम्परा
रामनाथन कृष्णन के पुत्र रमेश कृष्णन ने भी अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। उन्होंने 1986 में विंबलडन के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। रमेश का खेल शक्ति से अधिक तकनीक और सटीक प्लेसमेंट पर आधारित था। हालांकि वह अपने पिता की तरह सेमीफाइनल तक नहीं पहुंच सके लेकिन उन्होंने यह साबित किया कि भारत तकनीकी रूप से मजबूत खिलाड़ियों की भूमि रहा है।
डबल्स में भारत बना विश्व शक्ति
यदि विंबलडन में भारत की सबसे बड़ी पहचान किसी क्षेत्र में बनी है तो वह पुरुष युगल और मिश्रित युगल प्रतियोगिता है। 1990 के दशक के अंत में लिएंडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी ने विश्व टेनिस में ऐसा इतिहास बनाया जिसकी चर्चा आज भी होती है। दोनों खिलाड़ियों ने अपनी बेहतरीन समझ, शानदार तालमेल और आक्रामक खेल के दम पर दुनिया की सबसे मजबूत जोड़ियों को हराया।
भारतीय टेनिस का स्वर्णिम वर्ष
वर्ष 1999 भारतीय टेनिस के इतिहास का सबसे यादगार साल माना जाता है। लिएंडर पेस और महेश भूपति ने विंबलडन पुरुष युगल का खिताब जीतकर इतिहास रचा। यह पहली बार था जब किसी भारतीय जोड़ी ने विंबलडन पुरुष युगल ट्राॅफी अपने नाम की। यह जीत केवल एक ग्रैंड स्लैम खिताब नहीं थी बल्कि भारतीय टेनिस की वैश्विक पहचान का प्रतीक बन गई। इसी वर्ष लिएंडर पेस ने मिश्रित युगल का खिताब भी जीतकर अपने शानदार प्रदर्शन को और यादगार बना दिया।
एकल वर्ग में क्यों नहीं मिली बड़ी सफलता?
भारत की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा एकल वर्ग रहा है। इसके पीछे विश्वस्तरीय ग्रास कोर्ट सुविधाओं की कमी, लम्बी अवधि की वैज्ञानिक ट्रेनिंग का अभाव, यूरोप और अमेरिका की तुलना में सीमित प्रतियोगिताएं, फिटनेस और शारीरिक क्षमता में अंतर और कम उम्र से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा का सीमित अनुभव सहित कई कारण रहे हैं। यही वजह है कि भारत के अधिकांश प्रतिभाशाली खिलाड़ी एकल वर्ग में सफलता हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
विंबलडन के सबसे सफल भारतीय
लिएंडर पेस विंबलडन में सबसे सफल भारतीय टेनिस खिलाड़ी हैं। उन्होंने 1 पुरुष युगल, 4 मिश्रित युगल खिताब जीतकर कुल 5 विंबलडन खिताब अपने नाम किए हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत नेट पर तेज प्रतिक्रिया, शानदार वाॅली और दबाव में बेहतरीन प्रदर्शन था। पेस ने कई अलग-अलग विदेशी साथियों के साथ भी खिताब जीतकर यह साबित किया कि वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डबल्स खिलाड़ियों में शामिल हैं।
महेश भूपति का शानदार योगदान
महेश भूपति भारतीय टेनिस के पहले ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने ग्रैंड स्लैम खिताब जीतकर विश्व स्तर पर पहचान बनाई। उन्होंने विंबलडन 1999 में पुरुष युगल, 2002 मिश्रित युगल, 2005 मिश्रित युगल का खिताब जीता। उनकी मजबूत सर्विस और बेसलाइन खेल ने उन्हें डबल्स का बेहतरीन खिलाड़ी बनाया। पेस और भूपति की जोड़ी को आज भी टेनिस इतिहास की सबसे सफल जोड़ियों में गिना जाता है।
सानिया मिर्जा ने रचा नया इतिहास
भारतीय महिला टेनिस की बात करें तो सानिया मिर्जा का नाम न आए ऐसा सम्भव नहीं। 2015 में उन्होंने स्विट्जरलैंड की मार्टिना हिंगिस के साथ मिलकर विंबलडन महिला युगल का खिताब जीता। सानिया यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उनकी इस सफलता ने भारत में महिला टेनिस को नई ऊर्जा दी और हजारों युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया। सानिया ने यह साबित किया कि भारतीय महिला खिलाड़ी भी विश्व टेनिस में सर्वोच्च स्तर तक पहुंच सकती हैं।
जूनियर वर्ग में भारत की पहचान
भारत ने जूनियर विंबलडन में भी अपनी छाप छोड़ी है। लिएंडर पेस ने 1990 में विंबलडन जूनियर बाॅयज सिंगल्स का खिताब जीतकर भविष्य की बड़ी उपलब्धियों का संकेत दे दिया था। हाल के वर्षों में भारतीय जूनियर खिलाड़ियों ने भी बेहतर प्रदर्शन किया है। 2026 में अर्णव पापरकर का जूनियर एकल के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचना इस दिशा में सकारात्मक संकेत है।
भारतीय टेनिस के लिए विंबलडन का महत्व
विंबलडन केवल एक टूर्नामेंट नहीं बल्कि भारतीय टेनिस के विकास का प्रेरणास्रोत रहा है। वर्ष1999 की जीत के बाद देश में टेनिस की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। अनेक निजी अकादमियां खुलीं, अंतरराष्ट्रीय कोच भारत आने लगे और युवा खिलाड़ियों का रुझान टेनिस की ओर बढ़ा। सानिया मिर्जा की सफलता ने महिला खिलाड़ियों के लिए भी नए अवसर खोले। उनके बाद कई युवा लड़कियों ने अंतरराष्ट्रीय टेनिस को करियर के रूप में अपनाया।

भविष्य की उम्मीदें
वर्तमान समय में भारत के कई युवा खिलाड़ी एटीपी और डब्ल्यूटीए सर्किट पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। डबल्स में भारत की परम्परा आज भी मजबूत है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती एकल वर्ग में विश्व स्तर का खिलाड़ी तैयार करना है। यदि देश में बेहतर ग्रास कोर्ट सुविधाएं, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का अनुभव और दीर्घकालिक योजना पर काम किया जाए तो आने वाले वर्षों में कोई भारतीय खिलाड़ी विंबलडन के एकल वर्ग में भी इतिहास रच सकता है।

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