आक्रामक राष्ट्रवाद, युद्ध और प्रतिशोध की कहानियों से भरे मौजूदा हिंदी सिनेमा के बीच फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ विभाजन की त्रासदी को नफरत नहीं बल्कि स्मृति, प्रेम और करुणा की दृष्ट से देखती है। यह फिल्म बताती है कि इतिहास की सबसे बड़ी कीमत सीमाएं नहीं, इंसान चुकाते हैं और कई बार अधूरा प्रेम किसी भी राजनीतिक आख्यान से अधिक सच्चा होता है। इसलिए यह सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि हमारे समय में मनुष्यता के पक्ष में दर्ज एक संवेदनशील सिनेमाई हस्तक्षेप है
बारह जून 2026 को जब इम्तियाज अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ सिनेमाघरों में पहुंची, तब यह महज एक नई फिल्म की रिलीज नहीं थी। यह ऐसे समय में आई जब हिंदी सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा इतिहास की व्याख्या आक्रामक राष्ट्रवाद, सैन्य पराक्रम और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के चश्मे से कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बाॅक्स ऑफिस पर ऐसी फिल्मों का दबदबा रहा है जिनमें इतिहास का उपयोग दर्शकों के भीतर करुणा से अधिक आक्रोश पैदा करने के लिए किया गया। विभाजन, कश्मीर, आतंकवाद और भारत-पाकिस्तान सम्बंधों जैसी जटिल ऐतिहासिक घटनाएं कई बार एकरेखीय राजनीतिक आख्यान में बदलती चली गईं।
ऐसे दौर में ‘मैं वापस आऊंगा’ एक अलग रास्ता चुनती है। यह न तो इतिहास का महिमामंडन करती है, न राष्ट्रवाद का उपहास उड़ाती है और न ही किसी समुदाय को सामूहिक अपराधी घोषित करती है। इसके बजाय यह कैमरे को एक ऐसे बूढ़े आदमी के चेहरे पर टिकाती है जिसकी स्मृति में आज भी सरगोधा बसा हुआ है, जिसकी पहली मोहब्बत आज भी जीवित है और जिसके लिए 1947 कभी खत्म ही नहीं हुआ।
पंचानवे साल का एक सिख बुजुर्ग मृत्यु-शैया पर है। वह डिमेंशिया का मरीज है। वर्तमान उसके हाथों से फिसल चुका है लेकिन अतीत उसकी स्मृतियों में पूरी जीवंतता के साथ सांस ले रहा है। किशोर उम्र की मासूम मोहब्बत, लौटकर आने का अधूरा वादा, अपना गांव, अपनी मिट्टी और सरगोधा की गलियां, सब कुछ आज भी उसके भीतर जस का तस हैं।
विभाजन ने उसे उजाड़ दिया था। वह पाकिस्तान से भारत आ गया। उसने नया घर बनाया, परिवार बसाया, संघर्ष किया, सफलता पाई लेकिन मनुष्य केवल ईंट-पत्थर का घर नहीं बसाता, वह यादों का भी घर बसाता है। वह घर कभी नहीं बस पाया। उसकी आत्मा वहीं अटकी रही जहां वह जिया को छोड़ आया था।
अब उसकी अंतिम इच्छा केवल इतनी है कि वह एक बार जिया से मिल ले। उससे बात कर ले। नियति उसे सरगोधा तक पहुंचा देती है। वह उसी पुराने घर में जाता है और जिया की तस्वीर से बातें करता है। उसे मालूम नहीं कि जिया तो वर्षों पहले उसका इंतजार करते-करते इस दुनिया से जा चुकी है। उसके लिए तस्वीर ही जीवित जिया है, वही सत्रह-अठारह बरस की लड़की, जिसके साथ उसने लौट आने का वादा किया था। बातचीत पूरी होते ही उसकी बेचैनी समाप्त हो जाती है। मानो जीवन भर अटकी हुई सांस को आखिरकार रास्ता मिल गया हो। यही वह क्षण है जहां यह फिल्म विभाजन की कहानी से आगे निकलकर स्मृति, प्रेम और मनुष्य की कहानी बन जाती है। फिल्म का सबसे बड़ा रूपक डिमेंशिया है। यह बीमारी यहां केवल चिकित्सकीय स्थिति नहीं बल्कि इतिहास की सबसे मार्मिक व्याख्या बन जाती है। बूढ़े को बंटवारा याद नहीं, सरहद याद नहीं, वीजा और पासपोर्ट का कोई अर्थ नहीं। उसे केवल इतना याद है कि लाहौर तो दो घंटे की दूरी पर हुआ करता था। वह अपने ड्राइवर को लेकर सीमा तक पहुंच जाता है। सैनिक उसे रोक लेते हैं लेकिन उसके लिए सरहद जैसी कोई चीज है ही नहीं।
कितनी विचित्र विडम्बना है कि जिसे दुनिया भूलने की बीमारी कहती है, वही बीमारी राजनीति द्वारा बनाई गई सबसे बड़ी दीवार को भूल जाती है। शायद स्मृति कभी-कभी राष्ट्र-राज्य से भी अधिक ईमानदार होती है। यहीं से फिल्म असाधारण बन जाती है।
पिछले एक दशक में हिंदी सिनेमा में राष्ट्रवाद एक सफल व्यावसायिक फाॅर्मूला बन गया है। सीमा पार का दुश्मन, गरजते संवाद, राष्ट्रध्वज, युद्ध और विजय, इन तत्वों ने अनेक सफल फिल्मों को जन्म दिया। इसमें कोई
आपत्ति नहीं कि सैनिकों के साहस, राष्ट्रीय सुरक्षा या आतंकवाद पर फिल्में बनें। समस्या तब शुरू होती है जब इतिहास की जटिलता गायब हो जाती है और हर कथा एकराजनीतिक निष्कर्ष तक पहुंचने का माध्यम बन जाती है। इसी संदर्भ में उरी: ‘दि सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘दि कश्मीर फाइल्स’, ‘दि केरल स्टोरी’ और ‘आर्टिकल 370’ जैसी फिल्मों का उल्लेख स्वाभाविक है। इन सबकी अपनी वैचारिक दृष्टि है और अपने समर्थक भी लेकिन इन फिल्मों की संरचना प्रायः दर्शकों को एक निश्चित भाव, क्रोध, प्रतिशोध या विजयी राष्ट्रवाद की ओर ले जाती है। ‘मैं वापस आऊंगा’ ठीक इसके उलट खड़ी होती है। यह किसी से घृणा करना नहीं सिखाती। यह किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा नहीं करती। इसका सबसे बड़ा विरोधी पात्र कोई धर्म, कोई देश या कोई व्यक्ति नहीं बल्कि वह राजनीति है जिसने पड़ोसियों को दुश्मन और प्रेमियों को अजनबी बना दिया। यह फिल्म एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछती है कि क्या देशभक्ति का अर्थ दूसरे देश से नफरत करना है? क्या राष्ट्रवाद तभी सिद्ध होगा जब हम इतिहास को केवल अपने घावों की कहानी बना दें? क्या विभाजन की त्रासदी केवल एक समुदाय की थी?
आपत्ति नहीं कि सैनिकों के साहस, राष्ट्रीय सुरक्षा या आतंकवाद पर फिल्में बनें। समस्या तब शुरू होती है जब इतिहास की जटिलता गायब हो जाती है और हर कथा एकराजनीतिक निष्कर्ष तक पहुंचने का माध्यम बन जाती है। इसी संदर्भ में उरी: ‘दि सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘दि कश्मीर फाइल्स’, ‘दि केरल स्टोरी’ और ‘आर्टिकल 370’ जैसी फिल्मों का उल्लेख स्वाभाविक है। इन सबकी अपनी वैचारिक दृष्टि है और अपने समर्थक भी लेकिन इन फिल्मों की संरचना प्रायः दर्शकों को एक निश्चित भाव, क्रोध, प्रतिशोध या विजयी राष्ट्रवाद की ओर ले जाती है। ‘मैं वापस आऊंगा’ ठीक इसके उलट खड़ी होती है। यह किसी से घृणा करना नहीं सिखाती। यह किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा नहीं करती। इसका सबसे बड़ा विरोधी पात्र कोई धर्म, कोई देश या कोई व्यक्ति नहीं बल्कि वह राजनीति है जिसने पड़ोसियों को दुश्मन और प्रेमियों को अजनबी बना दिया। यह फिल्म एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछती है कि क्या देशभक्ति का अर्थ दूसरे देश से नफरत करना है? क्या राष्ट्रवाद तभी सिद्ध होगा जब हम इतिहास को केवल अपने घावों की कहानी बना दें? क्या विभाजन की त्रासदी केवल एक समुदाय की थी?
निर्देशक इन प्रश्नों का उत्तर भाषण देकर नहीं देता। वह केवल एक बूढ़े आदमी की आंखों में झांकने के लिए कहता है। वहां न पाकिस्तान के लिए घृणा है, न मुसलमानों के लिए नफरत। वहां केवल एक अधूरा प्रेम है जो समय और राजनीति दोनों से बड़ा साबित होता है। फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका संतुलन है। विभाजन की हिंसा दिखाई गई है लेकिन किसी समुदाय को राक्षस बनाकर नहीं। भीड़ की हिंसा दिखाई गई है, मनुष्य के भीतर का अंधकार दिखाया गया है। एक जगह मुसलमान मुसलमानों पर हमला करते हैं, दूसरी जगह सिखों की त्रासदी दिखाई देती है। निर्देशक बार-बार संकेत देता है कि विभाजन का सबसे बड़ा अपराधी कोई धर्म नहीं था बल्कि वह सामूहिक उन्माद था जिसे राजनीति ने हवा दी। यही कारण है कि यह फिल्म आज के ध्रुवीकृत समय में कहीं अधिक प्रासंगिक लगती है।
नसीरुद्दीन शाह इस फिल्म की आत्मा हैं। उन्होंने अभिनय नहीं किया बल्कि एक पूरी पीढ़ी की स्मृति को अपने चेहरे पर उतार दिया है। उनका हर भाव, हर विराम, हर चुप्पी संवाद बन जाती है। कई दृश्य ऐसे हैं जहां वे बिना कुछ बोले दर्शक को रुला देते हैं। आज जब अभिनय अक्सर शोर और प्रदर्शन में बदलता जा रहा है, नसीरुद्दीन शाह याद दिलाते हैं कि महान अभिनय की सबसे बड़ी शक्ति मौन होती है। यदि व्यक्तिगत राय रखने की अनुमति हो तो कहना होगा कि वे आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे विलक्षण अभिनेताओं में हैं। उनके सामने किरदार छोटा नहीं पड़ता बल्कि और बड़ा हो जाता है।
जिया और उसके किशोर प्रेमी की प्रेमकथा भी बेहद सहजता से कही गई है। यहां प्रेम प्रदर्शन नहीं, प्रतीक्षा है। अधिकार नहीं, भरोसा है। एक वादा पूरी फिल्म का भावनात्मक केंद्र बन जाता है, ‘मैं वापस आऊंगा।’ यही वाक्य अंत तक दर्शक का पीछा करता रहता है।
संगीत और छायांकन भी कहानी की संवेदना को विस्तार देते हैं। कैमरा सरगोधा की गलियों, पुराने घरों और खेतों को इस तरह चित्रित करता है जैसे वह वर्तमान नहीं, किसी बूढ़े की स्मृति को फिल्मा रहा हो। कई जगह मौन ही सबसे प्रभावशाली संगीत बन जाता है।
हां, फिल्म पूरी तरह निर्दोष नहीं है। कहीं-कहीं इसकी गति धीमी पड़ती है। कुछ सहायक पात्रों को और विस्तार दिया जा सकता था लेकिन ये कमियां फिल्म के भावनात्मक प्रभाव को कम नहीं करतीं।
विभाजन पर बनी महान कृतियों की चर्चा होगी तो ‘तमस’, ‘गरम हवा’ और ‘पिंजर’ जैसे नाम हमेशा लिए जाएंगे। ‘मैं वापस आऊंगा’ शायद उन कृतियों की जगह लेने का दावा नहीं करती लेकिन वह उसी मानवीय परम्परा की एक सशक्त और ईमानदार कड़ी अवश्य बनती है। यह फिल्म बताती है कि इतिहास केवल नक्शे नहीं बदलता, वह इंसानों के भीतर का भूगोल भी बदल देता है। कुछ लोग अपना घर खो देते हैं, कुछ अपना देश और कुछ पूरी उम्र अपने भीतर लौटने का रास्ता खोजते रहते हैं।
फिल्म समाप्त हो जाती है लेकिन एक प्रश्न दर्शक के भीतर देर तक गूंजता रहता है कि क्या सचमुच कोई अपने घर वापस लौट पाता है? शायद नहीं। शायद मनुष्य केवल अपनी स्मृतियों में लौटता है। जब स्मृतियां भी साथ छोड़ने लगती हैं, तब अंतिम इच्छा केवल इतनी रह जाती है कि किसी अधूरे वादे को पूरा कर लिया जाए।
यही कारण है कि ‘मैं वापस आऊंगा’ केवल विभाजन पर बनी एक और फिल्म नहीं है। यह हमारे समय में मनुष्यता के पक्ष में दिया गया एक शांत, संवेदनशील और बेहद जरूरी सिनेमाई बयान है। जब नफरत सबसे आसान राजनीतिक भाषा बनती जा रही हो, तब यह फिल्म याद दिलाती है कि करुणा भी एक वैचारिक शक्ति है। शायद सबसे बड़ी शक्ति।
यही कारण है कि ‘मैं वापस आऊंगा’ केवल विभाजन पर बनी एक और फिल्म नहीं है। यह हमारे समय में मनुष्यता के पक्ष में दिया गया एक शांत, संवेदनशील और बेहद जरूरी सिनेमाई बयान है। जब नफरत सबसे आसान राजनीतिक भाषा बनती जा रही हो, तब यह फिल्म याद दिलाती है कि करुणा भी एक वैचारिक शक्ति है। शायद सबसे बड़ी शक्ति।