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हिंदी सिनेमा में मुस्लिम किरदारों की यात्रा दोस्त, शायर, देशभक्त से ‘संदेह’ तक

कभी हिंदी फिल्मों में मुस्लिम किरदार तहजीब, दोस्ती, शायरी और गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रतीक हुआ करते थे लेकिन पिछले एक दशक में उनकी सिनेमाई छवि तेजी से बदली है। अब पर्दे पर मुस्लिम पहचान अक्सर आतंकवाद, कट्टरता, राष्ट्रभक्ति की परीक्षा या ‘दूसरे’ के रूप में दिखाई देने लगी है। सवाल यह है कि क्या सिनेमा समाज का आईना है या वह समाज की नई धारणाएं भी गढ़ रहा है?

हिंदी सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, उसने हमेशा भारतीय सोसाइटी की सामूहिक स्मृति, राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक रिश्तों को आकार देने का काम भी किया है। यही कारण है कि फिल्मों में किसी समुदाय की प्रस्तुति महज कलात्मक निर्णय नहीं होती, वह समय की मानसिकता का संकेत भी बन जाती है। हिंदी फिल्मों में मुस्लिम किरदारों की बदलती छवि इसी बड़े बदलाव की कहानी कहती है।

एक दौर था जब फिल्मों में मुस्लिम पात्रों की पहचान उनके मजहब से ज्यादा उनकी इंसानियत, तहजीब और
संवेदनशीलता से होती थी। 1950 से 1980 के दशक तक के हिंदी सिनेमा में मुस्लिम किरदार अक्सर कव्वाली, उर्दू अदब, दोस्ती और मोहब्बत के प्रतीक के रूप में दिखाई देते थे। ‘मुगल-ए-आजम’ में सलीम और अनारकली की प्रेमकथा हो या ‘चैदवीं का चांद’ में नवाबी लखनऊ की तहजीब, इन फिल्मों ने मुस्लिम समाज को भारतीय
सांस्कृतिक धारा के अभिन्न हिस्से की तरह प्रस्तुत किया। ‘मेरे मेहबूब’ में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पृष्ठभूमि और उर्दू संस्कृति को बेहद सम्मानजनक ढंग से दिखाया गया था।
1970 और 80 के दशक में भी मुस्लिम किरदारों की मौजूदगी सकारात्मक और मानवीय बनी रही। फिल्मों में ‘अब्दुल चाचा’, ‘रहीम चाचा’ या वफादार दोस्त जैसे पात्र आम थे। ‘शोले’ में ए.के. हंगल द्वारा निभाया गया रहीम चाचा का किरदार आज भी साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। ‘अमर अकबर एन्थोनी’ में अकबर इलाहाबादी बने ऋषि कपूर का किरदार धार्मिक विविधता के बीच भारतीय एकता का संदेश देता दिखाई देता है। इसी दौर में ‘कुली’ में इकबाल अंसारी बने अमिताभ बच्चन का किरदार मेहनतकश, ईमानदार और जनसाधारण के नायक के रूप में सामने आता है।
वर्ष 1990 के दशक के बाद देश की राजनीति और वैश्विक घटनाओं ने सिनेमा की भाषा बदलनी शुरू की। बाबरी मस्जिद विध्वंस, मुम्बई बम धमाके और फिर नौ / ग्यारह के बाद फिल्मों में मुस्लिम किरदारों की प्रस्तुति धीरे-धीरे सुरक्षा और आतंकवाद की बहसों से जुड़ने लगी। ‘रोजा’ और ‘मिशन कश्मीर’ जैसी फिल्मों में आतंकवाद और कश्मीर संघर्ष के साथ मुस्लिम पहचान को जोड़ा गया। बाद के वर्षों में ‘फना’ में आमिर खान का रेहान, प्रेमी होने के साथ एक आतंकी संगठन से जुड़ा व्यक्ति निकलता है जबकि न्यू योर्क में नौ / ग्यारह के बाद मुस्लिम युवाओं के प्रति संदेह और उत्पीड़न को दिखाया गया।
हाल के वर्षों में यह बदलाव और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। अब फिल्मों में मुस्लिम पात्र या तो संदिग्ध नजर आते हैं या फिर उन्हें अपनी देशभक्ति बार-बार साबित करनी पड़ती है। ‘बेबी’, ‘फैंटम’ और ‘दि कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्मों में आतंकवाद और राष्ट्रवाद का विमर्श प्रमुख रूप से सामने आता है। कई फिल्मों में ‘अच्छा
मुसलमान’ वही दिखाया जाता है जो राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा को सार्वजनिक रूप से सिद्ध करे। हालांकि यह पूरी तस्वीर नहीं है। समानांतर रूप से कुछ फिल्में ऐसी भी बनी हैं जिन्होंने मुस्लिम समाज को जटिल, मानवीय और बहुआयामी तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश की। ‘माय नेम इज खान’ में रिजवान खान बना शाहरुख खान दुनिया से कहता है- ‘‘माय नेम इज खान एंड आई एम नाॅट अ टेररिस्ट।’’ यह संवाद केवल फिल्म का हिस्सा नहीं बल्कि उस दौर की वैश्विक मानसिकता पर टिप्पणी बन गया। ‘मुल्क’ में मुराद अली मोहम्मद बने ऋषि कपूर अपने ही देश में वफादारी साबित करने को मजबूर दिखाई देते हैं। वहीं ‘गुली बाॅय’ में मुराद का किरदार मुस्लिम युवा को संघर्ष, सपनों और रचनात्मक ऊर्जा के साथ प्रस्तुत करता है जहां उसकी पहचान केवल धर्म तक सीमित नहीं रह जाती।
फिल्म उद्योग के भीतर भी इस बदलाव को लेकर चर्चा तेज हुई है। कई पटकथा लेखक और फिल्म समीक्षक मानते हैं कि आज का सिनेमा राजनीतिक माहौल से पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावित दिखाई देता है। सोशल मीडिया के दौर में फिल्मों पर वैचारिक दबाव, ट्रोल अभियान और बॉयकॉट संस्कृति ने भी फिल्मकारों को अधिक सतर्क बना दिया है। यही कारण है कि कई निर्माता विवाद से बचने के लिए लोकप्रिय राजनीतिक नैरेटिव के अनुरूप विषय चुनते दिखाई देते हैं। यह भी दिलचस्प है कि हिंदी फिल्म उद्योग स्वयं लम्बे समय तक मुस्लिम कलाकारों, लेखकों, संगीतकारों और अभिनेताओं की मजबूत भागीदारी से बना रहा। दिलीप कुमार से लेकर शाहरुख खान और सलमान खान तक, मुस्लिम सितारे दशकों तक भारतीय लोकप्रिय संस्कृति के सबसे बड़े चेहरे रहे। इसके बावजूद पर्दे पर मुस्लिम आम आदमी की छवि में आया परिवर्तन अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक संकेत माना जा रहा है।
सिनेमा समाज से अलग नहीं होता। वह समाज के डर, इच्छाओं, राजनीति और कल्पनाओं को अपने भीतर समेटता है लेकिन सिनेमा केवल प्रतिबिम्ब ही नहीं, प्रभाव भी पैदा करता है। इसलिए फिल्मों में किसी समुदाय की प्रस्तुति केवल मनोरंजन का प्रश्न नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का विषय भी बन जाती है। हिंदी सिनेमा में मुस्लिम किरदारों की बदलती छवि इसी बहस के केंद्र में खड़ी दिखाई देती है यहां सवाल केवल फिल्मों का नहीं बल्कि बदलते भारत की सांस्कृतिक दिशा का भी है।

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