नौ जुलाई की एक राजनीतिक खबर ने मुझे देर तक सोचने के लिए मजबूर कर दिया। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के तीन पूर्व राज्यसभा सांसद, सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक, भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। इसके साथ ही भाजपा ने उन्हें पश्चिम बंगाल से राज्यसभा के लिए अपना उम्मीदवार भी बना दिया। राजनीति में दल बदल कोई नई घटना नहीं है। सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं, नेताओं के मतभेद होते हैं और कई बार किसी दल के भीतर काम करना असम्भव भी हो जाता है लेकिन यहां प्रश्न केवल दल बदलने का नहीं था। प्रश्न उस वैचारिक दूरी का था जिसे इन नेताओं ने एक छलांग में पार कर लिया।
ये तीनों उस तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा थे जो पिछले डेढ़ दशक से पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक और वैचारिक प्रतिद्वंद्वी बताती रही है। तृणमूल कांग्रेस के मंचों से भाजपा को सांप्रदायिक कहा गया, उसकी राजनीति को बंगाल की संस्कृति के विरुद्ध बताया गया और उसे संविधान तथा संघीय ढांचे के लिए खतरा तक घोषित किया गया। सुखेंदु शेखर राॅय राज्यसभा में लम्बे समय तक तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख आवाज रहे। उन्होंने अनेक अवसरों पर भाजपा सरकार की नीतियों का तीखा विरोध किया। सुष्मिता देव का राजनीतिक जीवन कांग्रेस से शुरू हुआ। वे कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता रहीं, महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं और वर्षों तक भाजपा तथा उसकी राजनीति की मुखर आलोचक रहीं। वर्ष 2021 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और तृणमूल कांग्रेस में चली गईं। अब वे भाजपा में हैं। प्रकाश चिक बराइक को तृणमूल कांग्रेस ने आदिवासी समाज के प्रतिनिधि के रूप में आगे बढ़ाया और राज्यसभा भेजा। अब वे भी उसी भाजपा के साथ खड़े हैं जिसके विरुद्ध कल तक उनकी पार्टी राजनीतिक संघर्ष कर रही थी।
सम्भव है कि तीनों नेताओं के पास अपने निर्णय के पक्ष में अनेक तर्क हों। वे कह सकते हैं कि परिस्थितियां बदल गई हैं, तृणमूल कांग्रेस बदल गई है, देश बदल गया है या अब उन्हें भारतीय जनता पार्टी में विकास और राष्ट्र निर्माण की सम्भावना दिखाई देती है। राजनीति में हर व्यक्ति को अपना दल चुनने का अधिकार है लेकिन क्या केवल इतना कह देने से वे सारे भाषण अप्रासंगिक हो जाते हैं जो वर्षों तक दिए गए? क्या विचारधारा कोई ऐसा वस्त्र है जिसे सत्ता का मौसम बदलते ही उतारकर दूसरा पहन लिया जाए? क्या कल तक जिस राजनीति को देश के लिए खतरा बताया जा रहा था, वह एक रात में देश के विकास का सबसे बड़ा माध्यम बन सकती है?
इन्हीं प्रश्नों के बीच मेरे मन में एक और प्रश्न उठा, क्या इन राजनेताओं की अंतरात्मा मर चुकी है? यह प्रश्न केवल सुखेंदु शेखर राॅय, सुष्मिता देव या प्रकाश चिक बराइक से नहीं है। यह उस पूरी राजनीतिक संस्कृति से है जिसमें सत्ता अब साधन नहीं, स्वयं विचारधारा बन चुकी है। नेता दल नहीं बदलते, वे अपने पुराने भाषणों का अर्थ बदल देते हैं। वे अपने पुराने आरोपों को भूल जाते हैं। वे उन कार्यकर्ताओं की आंखों में देखने से भी नहीं हिचकते जिन्होंने उनके कहने पर वर्षों तक उस पार्टी के विरुद्ध संघर्ष किया होता है जिसमें वे अचानक शामिल हो जाते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में राजनीति का अर्थ सत्ता प्राप्त करना नहीं था। राजनीति त्याग, संघर्ष और सार्वजनिक सेवा का माध्यम थी। गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बीच गहरे वैचारिक मतभेद थे लेकिन उन मतभेदों में एक ईमानदारी थी। वे जानते थे कि वे किस विचार के साथ खड़े हैं और क्यों खड़े हैं।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जवाहरलाल नेहरू की सरकार से इस्तीफा दिया क्योंकि वे सरकार की नीतियों से सहमत नहीं थे। उन्होंने सत्ता छोड़कर अपनी राजनीतिक राह बनाई। डाॅ. राममनोहर लोहिया कांग्रेस के सबसे प्रखर आलोचकों में थे लेकिन उन्होंने सत्ता पाने के लिए अपने विचारों को नहीं बदला। जयप्रकाश नारायण सत्ता के शीर्ष पर पहुंच सकते थे लेकिन उन्होंने पद के बजाय आंदोलन चुना। उस पीढ़ी के लिए विचारधारा राजनीतिक जीवन की आत्मा थी। आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में भी राजनीतिक मतभेद थे, दल टूटते थे और नए दल बनते थे लेकिन अनेक बार उनके पीछे वैचारिक कारण होते थे। समाजवादी आंदोलन के भीतर मतभेद हुए, कांग्रेस से अलग होकर नए राजनीतिक संगठन बने और जनसंघ ने अपनी अलग वैचारिक पहचान तैयार की लेकिन धीरे-धीरे राजनीति बदलने लगी। सत्ता की अस्थिरता ने अवसरवाद को जन्म दिया और दल बदल सरकार बनाने तथा गिराने का माध्यम बन गया।
वर्ष 1967 भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था। चौथे आम चुनाव में कांग्रेस को कई राज्यों में झटका लगा और गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। इसी दौर में हरियाणा के हसनपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक गया लाल भारतीय राजनीति के एक ऐसे प्रतीक बन गए जिनका नाम आज छह दशक बाद भी दल बदल के साथ लिया जाता है। गया लाल निर्दलीय विधायक चुने गए थे। वर्ष 1967 में उन्होंने बहुत कम समय में बार-बार अपना राजनीतिक दल बदला। कभी कांग्रेस में गए, फिर कांग्रेस छोड़कर संयुक्त मोर्चे में लौटे और कुछ ही घंटों बाद दोबारा कांग्रेस में शामिल हो गए।
जब कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह गया लाल को लेकर पत्रकारों के सामने आए तो उन्होंने कहा कि ‘गया राम अब आया राम है।’ यही वाक्य बाद में बदलकर ‘आया राम, गया राम’ के रूप में भारतीय राजनीति की शब्दावली का स्थायी हिस्सा बन गया। यह केवल एक विधायक के बार-बार दल बदलने की कहानी नहीं थी। यह भारतीय राजनीति में उस नए दौर की शुरुआत थी जिसमें जनादेश, विचारधारा और राजनीतिक निष्ठा से अधिक महत्व सत्ता के समीकरण को मिलने लगा।
गया लाल ने दल बदला था लेकिन आने वाले दशकों में भारतीय राजनीति ने इससे कहीं बड़े और अधिक संगठित दल बदल देखे। वर्ष 1980 में हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल ने राजनीतिक अवसरवाद का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जिसकी चर्चा आज भी होती है। वे जनता पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री थे। केंद्र में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई तो भजनलाल अपने मंत्रियों और विधायकों के बड़े समूह के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए। सरकार नहीं बदली, मुख्यमंत्री नहीं बदला, केवल सत्तारूढ़ दल बदल गया। जनता पार्टी की सरकार लगभग रातोंरात कांग्रेस सरकार बन गई।
इस घटना ने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा किया कि यदि पूरी सरकार चुनाव के बाद अपना दल बदल सकती है तो मतदाता के जनादेश का अर्थ क्या रह जाता है? जनता ने जिस दल को सत्ता सौंपी थी, वह बिना चुनाव के किसी दूसरे दल की सरकार कैसे बन सकता था? भजनलाल ने अपनी सत्ता बचा ली लेकिन राजनीति में निष्ठा और जनादेश की अवधारणा को गहरी चोट पहुंची।
1967 से 1971 के बीच देश में हजारों दल बदल हुए। सैकड़ों विधायकों ने पार्टियां बदलीं और अनेक राज्य सरकारें गिरीं। कई नेताओं को दल बदलने के पुरस्कार के रूप में मंत्री पद मिले।
राजनीति में यह धारणा मजबूत होती गई कि चुनाव जीतना जनता के प्रति जिम्मेदारी नहीं बल्कि सत्ता के बाजार में प्रवेश का टिकट है। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए वर्ष 1985 में राजीव गांधी सरकार ने संविधान में 52वां संशोधन कर दसवीं अनुसूची जोड़ी और दल- बदल विरोधी कानून बनाया। उम्मीद थी कि अब निर्वाचित प्रतिनिधि निजी लाभ के लिए दल नहीं बदल पाएंगे लेकिन राजनीति ने कानून से बचने के रास्ते खोज लिए। कानून ने व्यक्तिगत दल बदल को कठिन बनाया लेकिन पहले एक-तिहाई सदस्यों के अलग होने को विभाजन और दो-तिहाई सदस्यों के साथ जाने को विलय की छूट दी गई। बाद में एक-तिहाई वाली छूट समाप्त कर दी गई लेकिन दो-तिहाई सदस्यों के विलय का प्रावधान बना रहा।
अब विधायक और सांसद खुले तौर पर दल बदलने के बजाय समूह बनाते हैं। कई बार वे पहले अपने पद से इस्तीफा देते हैं, फिर दूसरे दल में शामिल होते हैं और दोबारा चुनाव लड़ते हैं। कई मामलों में दल बदलने के तुरंत बाद मंत्री पद, राज्यसभा का टिकट या संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल जाती है। कानून बच जाता है लेकिन लोकतंत्र की भावना हार जाती है। भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है।
असम के वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे कभी कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में थे। असम में तरुण गोगोई सरकार के शक्तिशाली मंत्री रहे। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के समर्थक रहे और भाजपा की नीतियों के आलोचक रहे। वर्ष 2015 में वे कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए। इसके बाद उनका राजनीतिक व्यक्तित्व तेजी से बदलता गया। जो नेता कभी कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राजनीति का प्रतिनिधि था, वह भाजपा की आक्रामक हिंदुत्व राजनीति के सबसे मुखर चेहरों में शामिल हो गया। आज उनके भाषणों में वह भाषा सुनाई देती है जिसकी कल्पना शायद उनके पुराने कांग्रेसी सहयोगियों ने भी नहीं की होगी।
यह परिवर्तन केवल दल का परिवर्तन नहीं था। यह विचार, भाषा और राजनीतिक पहचान का सम्पूर्ण परिवर्तन था। प्रश्न यह नहीं है कि हिमंत बिस्वा सरमा को कांग्रेस छोड़ने का अधिकार था या नहीं। निश्चित रूप से था। प्रश्न यह है कि क्या किसी व्यक्ति की मूल राजनीतिक मान्यताएं इतनी तेजी से बदल सकती हैं? यदि बदल सकती हैं तो क्या पहले की मान्यताएं वास्तविक थीं? यदि पहले की मान्यताएं वास्तविक थीं तो आज की राजनीति कितनी वास्तविक है? ज्योतिरादित्य सिंधिया भी वर्षों तक कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में रहे। उनका परिवार कांग्रेस की राजनीति से जुड़ा था। वे मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे। उन्होंने भाजपा की नीतियों का विरोध किया और स्वयं को कांग्रेस की उदार तथा धर्मनिरपेक्ष परम्परा का प्रतिनिधि बताया। वर्ष 2020 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। उनके साथ कांग्रेस के कई विधायक भाजपा में चले गए और मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार गिर गई। कुछ समय बाद सिंधिया केंद्र सरकार में मंत्री बन गए। यहां भी प्रश्न वही था कि क्या विचारधारा बदल गई थी या सत्ता का समीकरण?
पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी वर्षों तक ममता बनर्जी के सबसे विश्वसनीय नेताओं में रहे। वे तृणमूल सरकार में मंत्री थे और भाजपा के कट्टर आलोचक थे। वर्ष 2020 में वे भाजपा में शामिल हुए और कुछ ही महीनों बाद ममता बनर्जी के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन गए। जो व्यक्ति वर्षों तक तृणमूल सरकार की उपलब्धियों का हिस्सा था, वह अचानक उसी सरकार की हर समस्या का सबसे बड़ा आलोचक बन गया।
9 जुलाई की घटना को कुछ दिनों बाद केवल पश्चिम बंगाल की एक राजनीतिक खबर मानकर भुला दिया जाएगा। भाजपा इसे अपनी राजनीतिक सफलता बताएगी और तृणमूल कांग्रेस इसे विश्वासघात कहेगी। कुछ दिनों बाद कोई दूसरी राजनीतिक घटना सुर्खियों में होगी लेकिन एक प्रश्न हमारे सामने बना रहेगा।
जब कोई नेता वर्षों तक जिस विचारधारा का विरोध करता रहा हो, अचानक उसी विचारधारा का झंडा उठा लेता है तो उसके पुराने शब्दों का क्या होता है? उन कार्यकर्ताओं का क्या होता है जिन्होंने उसके भाषणों पर विश्वास किया था? उन मतदाताओं का क्या होता है जिन्होंने उसकी वैचारिक पहचान को देखकर उसे समर्थन दिया था? सबसे बड़ा प्रश्न यह कि क्या भारतीय राजनीति में अब अंतरात्मा केवल तभी बोलती है, जब दूसरी ओर सत्ता, पद या राज्यसभा की एक सीट दिखाई देती है?