Editorial

विफल प्रधानमंत्री रहे वी.पी. सिंह

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-124

बतौर प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का अधिकांश समय जनता दल के आंतरिक झगडों को निपटाने और अपनी कुर्सी बचाए रखने की जद्दोजहद में बर्वाद होता था। वे मात्र 11 माह प्रधानमंत्री रहे। इस अल्पकाल में ऐसे अनेक अवसर आए, जिनमें उनकी निर्णय लेने की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा। वे कई मसलों में बेहद कमजोर प्रधानमंत्री साबित हुए। वे इस कदर लाचार प्रधानमंत्री थे कि स्वयं उनके मंत्री उनके निर्देशों को हवा में उड़ा देते थे। जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया जाना इसका सटीक उदाहरण है। जगमोहन पूर्व में 1984 से 1989 तक जम्मू- कश्मीर के राज्यपाल रहे थे। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार के निर्देश पर फारूख अब्दुल्लाह सरकार को अपदस्थ कर दिया था। बाद में 1987 में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने आपस में समझौता कर चुनाव लड़ा और जीता, जिसके फलस्वरूप फारूख दोबारा राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। वी.पी. सिंह सरकार ने सत्ता सम्भालने के तुरंत बाद ही राजीव सरकार द्वारा नियुक्त कई प्रदेशों के राज्यपालों को हटाकर नए राज्यपाल नियुक्त किए थे। जम्मू-कश्मीर में राजीव सरकार ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल के.वी. कृष्णा राव को जुलाई, 1989 में जगमोहन के स्थान पर राज्यपाल नियुक्त किया था। वी.पी. सिंह सरकार में गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जनरल कृष्णा राव को हटाकर जगमोहन को दोबारा से राज्यपाल बनाए जाने की संस्तुति प्रधानमंत्री से की थी, लेकिन वी.पी. सिंह ऐसा नहीं चाहते थे, क्योंकि फारूख के मित्र चंद्रशेखर जगमोहन को जम्मू-कश्मीर भेजे जाने के सख्त खिलाफ थे। मुफ्ती मोहम्मद सईद ने वी.पी. सिंह की सलाह को दरकिनार करते हुए जगमोहन को नया राज्यपाल बनाने की घोषणा कर दी। बकौल वी.पी. सिंह- ‘चंद्रशेखर मुझसे मिलने आए और कहा- ‘जगमोहन को कश्मीर मत भेजिए, इससे वहां के हालात ज्यादा बिगडे़ंगे।’ मैंने मुफ्ती साहब से बात की और कहा- ‘वहां किसी और को भेज देते हैं।’ उन्होंने सहमति दे दी। मैं अन्य कार्यों में व्यस्त हो गया और यकायक ही 17 जनवरी को मुफ्ती साहब ने जगमोहन का नाम बतौर राज्यपाल घोषित कर दिया। एक नई सरकार का मुखिया होने के नाते मैं अपने ही गृहमंत्री की अवज्ञा कर पाने की स्थिति में नहीं था।’

जगमोहन की नियुक्ति का ऐलान होते ही नाराज फारूख अब्दुल्लाह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। जगमोहन 19 जनवरी, 1990 को जब कश्मीर पहुंचे तो वहां का माहौल बेहद गर्म था। श्रीनगर पुलिस शहर के छोटा बाजार नामक इलाके में घर-घर तालाशी अभियान शुरू कर चुकी थी, जिसका नतीजा भीड़ द्वारा पुलिस बल पर हमला और पुलिस की जवाबी कार्यवाही में 53 लोगों की मौत का होना रहा। इस तरह जगमोहन का बतौर राज्यपाल दूसरा कार्यकाल खूनी खेल से शुरू हुआ था जो आगे चलकर विकराल होता चला गया। 21 मई, 1990 के दिन श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद के शाही इमाम मीरावाइज मौलवी फारूख की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी, लेकिन घाटी में संदेश यह गया कि इस हत्या के पीछे भारतीय खुफिया एजेंसियों का हाथ है। अगले दिन मौलाना को सुपुर्द-ए-खाक किए जाने के बाद उनके समर्थकों और पुलिस के मध्य झड़प हो गई। हालात इस कदर बिगड़े कि उग्र भीड़ को काबू में करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिसमें 24 की मौत हो गई, इसके बाद जगमोहन को भले ही हटा दिया गया, लेकिन घाटी के हालात वी.पी. सिंह सरकार के काबू से बाहर होते चले गए। उनके 11 महीनों के संक्षिप्त कार्यकाल में सबसे बड़ा नुकसान कश्मीरी पंडितों को उठाना पड़ा था, जिन्हें अपनी जान-माल की रक्षा के लिए घाटी से पलायन करना पड़ा था।

भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में स्थित जम्मू-कश्मीर के उत्तर-पूर्व की सीमा चीन से, पूर्वी सीमा तिब्बत (चीन) और पश्चिमी सीमा पाकिस्तान तो दक्षिणी सीमा हिमाचल प्रदेश और पंजाब से लगती है। 1346 तक इस इलाके में हिंदू राजाओं का शासन था। 14वीं और 15वीं शताब्दी में यहां पूरी तरह से मुसलमान शासकों का कब्जा हो गया जो पांच शताब्दियों तक बना रहा था। 1586 से 1751 तक यह इलाका मुगल सल्तनत के अधीन रहा। 1747 से 1819 तक अफगानों ने यहां अपना राज स्थापित किया। मुगल बादशाह अकबर और उसके बाद उनके वारिसों जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल के दौरान कश्मीर में आम तौर पर स्थिति सामान्य और जनकल्याणकारी शासन देखने को मिलता है। 1707 में मुगल सल्तनत की समाप्ति के बाद अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली ने कश्मीर पर अपनी हुकूमत स्थापित कर लूटमार का दौर शुरू कर दिया। अब्दाली द्वारा यहां भेजे गए प्रशासकों (गवर्नर) के लिए कहा जाता है- ‘सर बुरीदान पेश ईन संगीत दिबान गुल चिदान अस्त’ (इन संगदिल शासकों के लिए सिर काटना किसी फल को तोड़ने समान था)।’

अफगानी प्रशासकों ने अपने शासनकाल के दौरान शिया मुसलमानों और कश्मीरी पंडितों पर विशेष रूप से जुल्म किए। लेखक और इतिहासकार सर वाल्टर रूपर लॉरेंस के अनुसार- ‘इन शैतानों के निशाने पर पंडित, शिया और झेलम घाटी के बमबास थे। उत्पीड़कों की सूची में पहला नाम असद खान का आता है, जो क्रूर अफगानी शासक नादिरशाह को अपना आदर्श बताता था। पंडितों को घास की बोरियों में बांधकर डल झील में डुबो देना इनके लिए रोजमर्रा का खेल था। मनोरंजन के लिए ये लोग पंडितों के सिर में गंदगी से लबालब भरा घड़ा रख देते थे और मुसलमान उस घडे़ पर तब तक पत्थर मारते, जब तक वह टूट न जाए और हिंदू उस गंदगी में नहा ना ले।’

ऐसे क्रूर शासकों से खुद को बचाने के लिए कश्मीरी पंडितों ने उनकी जी-हुजूरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, क्योंकि मुसलमानों के बनिस्पत कश्मीरी पंडित ज्यादा शिक्षित थे, इसलिए अफगान शासन के दौरान उन्होंने खासी तरक्की भी की और अफगानी शासकों के करीबी बन गए। ऐसे कश्मीरी पंडितों में महानंद घर और पंडित नंदराम टिक्कू शामिल थे। महानंद घर अफगानी गवर्नर नूरुद्दीन खान के सलाहकार और राजस्व विभाग के प्रमुख थे। नंदराम टिक्कू तो काबुल के प्रधानमंत्री तक बने। तब उनके नाम के सिक्के चला करते थे। इन प्रभावशाली पंडितों ने आम कश्मीरी अवाम पर खासे जुल्म किए, ताकि अफगानी शासक की उन पर कृपा-दृष्टि बनी रहे, लेकिन इन प्रभावशाली पंडितों को छोड़कर आम कश्मीरी पंडितों की अफगान शासन के दौरान स्थिति बद से बदतर होती चली गई थी। नतीजा कश्मीर की अवाम ने पंजाब प्रांत के राजा रंजीत सिंह से मदद की गुहार लगाई। सिख राजा रंजीत सिंह ने कश्मीरी जनता की गुहार को स्वीकारते हुए 1819 में यहां अपनी सत्ता स्थापित कर डाली, लेकिन सिख शासन भी अफगानी शासकों की भांति कश्मीर के लिए बड़ा दुस्वप्न साबित हुआ। जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव रह चुके आई.ए.एस. अधिकारी और लेखक मूसा रजा के अनुसार- ‘नए सिख शासकों ने सबसे पहला कदम महत्वपूर्ण मुसलमानों की मुगल और अफगानकाल के दौरान मिली जागीरों को जब्त करने का उठाया। जामा मस्जिद में नमाज पर पाबंदी और गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गौहत्या के आरोपी असंख्य मुसलमानों को मार दिया गया अथवा जिंदा जला दिया गया और उनकी सम्पत्ति को जब्त कर लिया गया। सरकारी पदों से मुसलमानों को बर्खास्त कर उनके स्थान पर पंडितों को तैनात कर दिया गया। जिंदगी के हर पहलू, जिसमें विवाह भी शामिल था, पर कर लगा दिया गया था। महाराजा के खजाने को भरने के लिए लगाए गए करों के अतिरिक्त पटवारियों ने खुद के लिए एक टैक्स ‘रस्म-ए-पटवारी’ लागू कर दिया। मस्जिदों में ताले डाल दिए गए और उन्हें अस्तबलों और अनाज के गोदामों में तब्दील कर दिया गया। ‘अजान’ तक पर पाबंदी लगा दी गई थी। कश्मीरी मुसलमान उनके संग की गई इन ज्यादतियों को भूले नहीं। उन्हें हमेशा याद रहा कि कैसे उनके पूर्वजों को 1877 में पडे़ भीषण अकाल के दौरान कश्मीर छोड़कर पंजाब जाने से रोक घाटी में ही मरने के लिए छोड़ दिया गया था। सिख और उसके बाद डोगरा राजाओं के काल में कश्मीरी पंडितों ने राजा के संग वफादारी करते हुए मुसलमानों पर भारी अत्याचार किए थे, जिनसे पैदा हुए आक्रोश का असर 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार के रूप में सामने आता है।’

1988 से ही जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने पाकिस्तान की मदद से कश्मीर में अलगाववाद की भावना को तेज करना शुरू कर दिया था। उनके निशाने पर घाटी में रह रहे हिंदू आने लगे थे। 14 सितम्बर, 1989 को भाजपा के नेता टीकालाल टिक्कू की हत्या कर आतंकियों ने हिंदुओं को भारी दहशत में लाने का काम किया। इसके बाद तो घाटी में खून की होली का दौर इन दहशतगर्दों ने शुरू कर दिया। 4 नवम्बर, 1989 को जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश नीलकंठ गंजू को दिन-दहाड़े श्रीनगर हाईकोर्ट के निकट गोली मार दी गई। गंजू ने बतौर सेशन कोर्ट जज 1968 में कश्मीरी आतंकवादी मकबूल भट्ट को फांसी की सजा सुनाई थी, जिसका बदला दो दशक बाद उनकी निर्मम हत्या कर ले लिया गया।

दिसम्बर में केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी के अपहरण और उसके एवज में अपने पांच साथियों की रिहाई के बाद इन अलगावादियों के हौसले अपने चरम पर पहुंच गए थे। अब सुनियोजित रणनीति बनाकर कश्मीरी पंडितों को निशाने पर लिए जाने का खेल शुरू हुआ, जिसका नतीजा भारी तादाद में कश्मीरी पंडितों की ‘जलावतनी’ के तौर पर सामने आता है।
वी.पी. सिंह के प्रधानमंत्रित्वकाल में कश्मीर रक्त-रंजित हो चला था। हालात इस कदर भारत-विरोधी बने कि श्रीनगर से प्रकाशित अखबारों ने खुलेआम हिंदुओं को घाटी छोड़ने के अल्टीमेटम प्रकाशित करने शुरू कर दिए थे। 4 जनवरी, 1990 को दैनिक ‘अफताब’ ने ‘हिजबुल मुजाहिद्दीन’ नामक आतंकी संगठन की तरफ से ऐसा संदेश प्रकाशित कर पंडितों को पलायन करने के लिए मजबूर करने का काम किया था। 19 जनवरी को जगमोहन के राज्यपाल पद सम्भालने का विरोध आतंकी संगठनों ने पूरी घाटी में बिजली की आपूर्ति को काटने और केवल मस्जिदों में रोशनी कर किया। 21 जनवरी का दिन भारी खून-खराबे के नाम रहा। इस दिन जगमोहन की नियुक्ति का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के एक विशाल समूह पर गावकदल पुल के निकट केंद्रीय रिजर्व पुलिस दल ने अंधाधुंध गोलियां चला दीं, जिसमें 50 के करीब प्रदर्शनकारी मारे गए। इसे कश्मीर में ‘गावकदल नरसंहार’ कहकर पुकारा जाता है। जगमोहन कश्मीर संकट को कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के अभ्यस्त थे, जिसके चलते उनकी नियुक्ति के बाद हालात तेजी से बिगड़ते चले गए। 25 जनवरी को भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना और उनके तीन साथियों की आतंकियों ने रावलपोरा बस स्टैंड के समीप गोली मारकर हत्या कर कश्मीरी पंडितों को यह जताने का काम किया कि भारतीय सेना भी उनकी रक्षा नहीं कर सकती है और यदि जिंदा रहना है तो घाटी छोड़ दो। घाटी में लाउड स्पीकरों के जरिए नारे गूंजने लगे थे कि- ‘कश्मीर में अगर रहना है, अल्लाहु-अकबर कहना है’, ‘यहां क्या चलेगा, निजाम-ए-मुस्तफा-निजाम-ए-मुस्तफा’, ‘ऐसी गच्छ पाकिस्तान, बताओ रोयल ते बटनेज सन’ (हमें पाकिस्तान के साथ-साथ हिंदू औरतें बगैर उनके मर्दों के चाहिए)।’

क्रमशः

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