Uttarakhand

द्वाराहाट में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार

आगामी विधानसभा चुनाव से पहले द्वाराहाट में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस में मौजूदा विधायक मदन सिंह बिष्ट सबसे मजबूत और लगभग निर्विवाद दावेदार माने जा रहे हैं जबकि भविष्य के विकल्प के रूप में दीपक किरौला की सक्रियता भी चर्चा में है। दूसरी ओर भाजपा में महेश नेगी, अनिल शाही और नए दावेदार आशुतोष शाही के बीच टिकट की प्रतिस्पर्धा सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है तो वहीं उत्तराखण्ड क्रांति दल अपने परम्परागत वोट बैंक और पुष्पेश त्रिपाठी के सहारे मुकाबले को एक बार फिर त्रिकोणीय बनाने की तैयारी में है

अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट विधानसभा सीट उत्तराखण्ड की उन चुनिंदा सीटों में है जहां पारम्परिक रूप से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के मुकाबले के बीच उत्तराखण्ड क्रांति दल हमेशा एक मजबूत तीसरी ताकत के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता आया है। उत्तराखण्ड के अन्य हिस्सों में कमजोर होने के बावजूद द्वाराहाट के दिग्गज नेता स्वर्गीय विपिन चंद्र त्रिपाठी की कर्मभूमि होने के कारण उत्तराखण्ड क्रांति दल का ये एक मजबूत गढ़ रहा है। आज जो द्वाराहाट में विकास के पैमाने लिखे गए हैं और जो यहां पर अच्छे शैक्षणिक संस्थान हैं उसका श्रेय एक हद तक स्वर्गीय विपिन चंद्र त्रिपाठी को जाता है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद द्वाराहाट विधानसभा ने हमेशा राज्य की राजनीति को अलग संदेश दिया है जहां प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटता गया, वहीं द्वाराहाट ने लम्बे समय तक क्षेत्रीय दल उत्तराखण्ड क्रांति दल (यूकेडी) को मजबूत जनादेश देकर यह साबित किया कि यहां मतदाता व्यक्ति, विचार और स्थानीय मुद्दों को दलगत लहर से अधिक महत्व देता है। 2002 से 2022 तक के चुनावी परिणाम इस बात की तस्दीक भी करते हैं।

अब जब 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट नजदीक सुनाई दे रही है, यहां पर भी राजनीतिक दलों के दावेदारों के बीच बेचैनी शुरू हो गई है। इस विधानसभा सीट पर 2002 से 2022 के बीच 2002 और 2007 में उत्तराखण्ड क्रांति दल, 2012 और 2022 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने कब्जा किया है। 2012, 2017 और 2022 की हार के बाद भी उत्तराखण्ड क्रांति दल ने यहां मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और अपना कैडर वोट सुरक्षित रखा है।
2002 के विधानसभा चुनाव जो उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के बाद पहला विधानसभा चुनाव था, तब यहां से उत्तराखण्ड क्रांति दल के दिग्गज विपिन चंद्र त्रिपाठी ने जीत हासिल की थी। 2004 में विपिन त्रिपाठी के
आकस्मिक निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके पुत्र पुष्पेश त्रिपाठी ने यह सीट फिर उत्तराखण्ड क्रांति दल की झोली में डाल दी थी। 2007 का विधानसभा चुनाव भी पुष्पेश त्रिपाठी के नाम रहा। 2007 में यहां से भारतीय जनता पार्टी के सदानंद पाण्डे, कांग्रेस के महेश नेगी और मदन सिंह बिष्ट निर्दलीय चुनाव लड़े थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखण्ड क्रांति दल को यहां पर अपने ही घर में हार का सामना करना पड़ा। पुष्पेश त्रिपाठी ने अपना कैडर वोट तो मजबूत रखा, उन्हें 11,472 वोट मिले लेकिन वो कांग्रेस के मदन सिंह बिष्ट के मुकाबले चुनाव हार गए। मदन सिंह बिष्ट को 14,790 वोट मिले जबकि भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र सिंह बिष्ट तीसरे स्थान पर रहे। उन्हें 11,096 वोट मिले। 2017 का विधानसभा चुनाव मोदी लहर का चुनाव था। 2017 के चुनाव में उत्तराखण्ड क्रांति दल का वोट घटा, उस वक्त पुष्पेश त्रिपाठी को 6,581 वोट मिले थे। इस बार कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए महेश नेगी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर मैदान में थे जबकि मदन सिंह बिष्ट कांग्रेस के टिकट पर मैदान में थे। इस चुनाव में भाजपा को मिला मत प्रतिशत पिछले विधानसभा चुनावों के मुकाबले दुगना 43 प्रतिशत हो गया। महेश नेगी 20,221 वोट पाकर विधानसभा पहुंचे जबकि कांग्रेस प्रत्याशी 13628 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। 2022 का चुनाव फिर उत्तराखण्ड क्रांति दल के लिए बहुत अच्छी खबर नहीं लाया। उत्तराखण्ड क्रांति दल ने अपना कुछ वोट वापस जरूर हासिल किया लेकिन वह इतना नहीं था कि पुष्पेश त्रिपाठी को जीत दिला सकता। 2022 में कुछ विवादों के चलते भारतीय जनता पार्टी ने महेश नेगी की जगह अपने युवा नेता अनिल शाही को टिकट दिया, कांग्रेस की ओर से मदन सिंह बिष्ट फिर से यहां से उम्मीदवार थे। करीबी मुकाबले में महज 182 वोटांे से जीत पाए। अनिल शाही ने उन्हें कड़ी टक्कर दी और उनको 17,584 वोट जबकि मदन सिंह बिष्ट को 17, 766 वोट मिले। इस प्रकार देखें तो पुष्पेश त्रिपाठी को छोड़कर कोई भी इस विधानसभा से लगातार दो बार जीत कर विधानसभा नहीं पहुंचा और यहां की जनता ने एक दल पर ही भरोसा नहीं किया और यहां पर मुकाबला हमेशा त्रिकोणीय ही नजर आया है।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव के नजदीक आने के साथ सभी दलों के अंदर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। दावेदारों ने अपने- अपने स्तर पर अपनी दावेदारी की तैयारी भी शुरू कर दी है। कांग्रेस की बात करें तो वर्तमान विधायक मदन सिंह बिष्ट इस बार भी यहां से कांग्रेस के एकमात्र मजबूत दावेदार नजर आते हैं।
सिटिंग विधायक होने के नाते वह टिकट के स्वाभाविक और मजबूत दावेदार हैं। क्षेत्र में उनकी पकड़ मजबूत है। हालांकि एंटी इनकंबेंसी और पिछले चुनाव में बेहद कम अंतर से हुई जीत के कारण कांग्रेस में नए दावेदार के लिए मजबूत समीकरण बन सकते थे लेकिन अभी कांग्रेस के पास उनके मुकाबले कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो उनको कांग्रेस में अंदर से चुनौती दे सके। कुछ युवा नेतृत्व यहां पर अपनी उपस्थिति दर्ज जरूर कर रहा है लेकिन जो हालात हैं उससे लगता है कि कांग्रेस के अंदर से फिलहाल मदन सिंह बिष्ट को कोई खास चुनौती नहीं है। द्वाराहाट के पूर्व ब्लाक प्रमुख रहे दीपक किरौला जो अभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की रानीखेत जिला इकाई के जिला अध्यक्ष हैं, वो भविष्य के एक अच्छे उम्मीदवार के रूप में सामने आ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के लिए द्वाराहाट उन चुनौतीपूर्ण सीटों में शामिल है जिसे वह हर हाल में वापस जीतना चाहती है। यहां पर भाजपा का मजबूत जनाधार कभी नहीं रहा बावजूद इसके कि नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से सांसद अजय भट्ट का ये गृहक्षेत्र है। भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व टिकट के लिए गुप्त सर्वे और ग्राउंड रिपोर्ट फार्मूले पर काम जरुर कर रहा है लेकिन पिछले पांच चुनावों की स्थिति देखें तो 2017 को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी यहां बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने नहीं आ पाई है। 2002 में उसने बलवंत सिंह नेगी को टिकट दिया तो विपिन त्रिपाठी की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में मोहन सिंह अधिकारी को अपना उम्मीदवार बनाया था। भाजपा ने इस क्षेत्र में हर बार नए चेहरों को उतार कर प्रयोग ही किए हैं। भारतीय जनता पार्टी के अंदर जिस प्रकार पिछले दिनों विवाद देखने को मिला खासकर महेश नेगी और अनिल शाही के बीच उसने पार्टी के अंदर चिंताएं बढ़ा दी हैं। मदन सिंह बिष्ट के मुकाबले महेश नेगी और अनिल शाही दोनों ही अपनी दावेदारी मजबूती से रख रहे हैं। अनिल शाही पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के साथ- साथ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के भी खास माने जाते हैं। पिछले चुनाव में वह महज 182 वोटों के अंतर से चुनाव हारे थे लेकिन इस बार उनके सामने चुनौतियां ज्यादा हैं। द्वाराहाट क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के मद्देनजर चौखुटिया में हुए आंदोलन में उनकी भूमिका की काफी आलोचना हुई थी। उस आंदोलन के चलते भारतीय जनता पार्टी की स्थिति यहां पर कुछ कमजोर हुई है। बहुत से लोग उन पर बाहरी होने का आरोप लगा रहे हैं।

भाजपा संगठन और आरएसएस की पृष्ठभूमि से जुड़े कुछ नए चेहरे भी ‘मिशन 2027’ के तहत टिकट की दौड़ में शामिल हैं। भाजपा अक्सर नए चेहरों पर दांव खेलने के लिए जानी जाती है। इसी के चलते एक नए उम्मीदवार के रूप में एक चेहरा आशुतोष शाही के रूप में उभर कर आया है। उनके पिता स्व विष्णु सिंह शाही भारतीय जनता पार्टी के बहुत पुराने कार्यकर्ता थे और संघ से भी लम्बे से समय तक जुड़े हुए थे। बग्वालीपोखर जिला पंचायत सीट से वो जिला पंचायत सदस्य भी रहे। आशुतोष शाही बैंक की सेवा को छोड़कर राजनीति में आए हैं और उसके बाद वह लगातार क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी दावेदारी से भाजपा के अंदर अन्य दावेदारों के लिए संकट पैदा हो गया है। महेश नेगी और अनिल शाही के बीच चलते विवाद के कारण अगर आशुतोष शाही मजबूत उम्मीदवार के रूप में सामने आ जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उत्तराखण्ड क्रांति दल की ओर से पुष्पेश त्रिपाठी के अलावा कोई दूसरा चेहरा नजर नहीं आता। दो बार के विधायक रहे पुष्पेश त्रिपाठी के लिए संतोष की बात यह है कि 2017 को छोड़ दें तो उत्तराखण्ड क्रांति दल ने 10 हजार के आस-पास अपना कैडर वोट बरकरार रखा है। अन्य राजनीतिक दलों का इस विधानसभा सीट पर कोई खास प्रभाव नजर नहीं आता।
बहरहाल, उत्तराखण्ड विधानसभा चुनावों में अभी वक्त बाकी है लेकिन यहां प्रत्याशी चयन में सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के सामने पेश आने वाली है क्योंकि राजनीतिक महत्वकांक्षाओं के चलते भाजपा के अंतर्विरोध सामने आने लगे हैं।

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