गर्मी से छटपटाता यूरोप अब जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी कीमत चुका रहा है। स्पेन, फ्रांस और कई अन्य देशों में हजारों अतिरिक्त मौतों ने खतरे की घंटी बजा दी है। सड़कें पिघल रही हैं, रेल सेवाएं प्रभावित हैं और जंगलों में आग का खतरा लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की जलवायु आपदा है 

यूरोप इस समय अभूतपूर्व गर्मी की चपेट में है। जिस महाद्वीप की पहचान कभी ठंडे मौसम, बर्फ से ढके पहाड़ों और लम्बी सर्दियों से होती थी, वहां अब तापमान 40 से 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। स्पेन, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, नीदरलैंड, इटली और ब्रिटेन सहित कई देशों में गर्मी ने दशकों पुराने रिकाॅर्ड तोड़ दिए हैं। इसका असर स्वास्थ्य, परिवहन, कृषि, ऊर्जा आपूर्ति और सामान्य जनजीवन पर साफ दिखाई दे रहा है। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष संकेत मान रहे हैं। सबसे गम्भीर चिंता बढ़ती मृत्यु दर को लेकर है। स्पेन और फ्रांस के शुरुआती सरकारी आंकड़ों के अनुसार जून महीने में ही गर्मी से जुड़ी दो हजार से अधिक अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। केवल स्पेन में एक हजार से अधिक लोगों की जान गई जबकि फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड में भी सामान्य दिनों की तुलना में मृत्यु दर बढ़ी है। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय रोग से जुड़े मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं और पहले से बीमार लोग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

कई देशों में प्रशासन ने रेड हीट अलर्ट जारी किया है। फ्रांस की राजधानी पेरिस सहित अनेक शहरों में लोगों को दोपहर के समय घरों से बाहर न निकलने की सलाह दी गई है। स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हुई है और निर्माण कार्यों सहित खुले में होने वाले कई कामों के समय में बदलाव किया गया है। लोगों से अधिक पानी पीने, धूप से बचने और कमजोर वर्गों का विशेष ध्यान रखने की अपील की जा रही है। भीषण गर्मी का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। जर्मनी में अत्यधिक तापमान के कारण ट्राम और रेल सेवाएं प्रभावित हुईं। कई स्थानों पर सड़कें नरम पड़ गईं और रेल पटरियों के फैलने से ट्रेनों की गति कम करनी पड़ी। बिजली की मांग बढ़ने से ऊर्जा व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। वहीं दक्षिणी यूरोप में जंगलों में आग लगने का खतरा लगातार बढ़ रहा है और अग्निशमन दल हाई अलर्ट पर हैं।

यूरोप की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि वहां का अधिकांश आवासीय और शहरी ढांचा भीषण गर्मी को ध्यान में रखकर विकसित नहीं किया गया था। घरों में सर्दी से बचाव के लिए मोटी दीवारें, डबल ग्लेजिंग वाली खिड़कियां और सेंट्रल हीटिंग सिस्टम तो हैं लेकिन एयर कंडीशनर और पंखे अभी भी बड़ी संख्या में घरों में उपलब्ध नहीं हैं। लगातार कई दिनों तक तापमान 40 डिग्री के आसपास रहने से घरों के भीतर भी गर्मी बढ़ जाती है। यही कारण है कि इस बार यूरोप में एयर कंडीशनर और कूलिंग उपकरणों की मांग तेजी से बढ़ी है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार उत्तर अफ्रीका से आने वाली गर्म और शुष्क हवाएं यूरोप के ऊपर बने उच्च वायुदाब क्षेत्र, यानी हीट डोम, के कारण कई दिनों तक फंसी रहीं। इससे तापमान सामान्य से काफी ऊपर पहुंच गया। वर्षा में कमी और सूखे जैसी परिस्थितियों ने जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ा दिया। जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन ने ऐसी चरम मौसम घटनाओं की सम्भावना कई गुना बढ़ा दी है। यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में यूरोप ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसी भीषण हीटवेव सामान्य घटना बन सकती है। इसका असर मानव स्वास्थ्य, खाद्य उत्पादन, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

भारत के लिए भी यह स्थिति एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। हालांकि भारत लम्बे समय से भीषण गर्मी का सामना करता रहा है और यहां का बुनियादी ढांचा अपेक्षाकृत अधिक तापमान के अनुकूल है, फिर भी हाल के वर्षों में यहां भी नए तापमान रिकॉर्ड बन रहे हैं। यूरोप का अनुभव बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब किसी एक देश या महाद्वीप की समस्या नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सामने मौजूद चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आपातकालीन राहत उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। शहरों की नई योजना, हरित क्षेत्रों का विस्तार, तापमान सहने वाला बुनियादी ढांचा, ऊर्जा दक्ष भवन, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और कार्बन उत्सर्जन में कमी जैसे दीर्घकालिक उपाय ही भविष्य में ऐसी आपदाओं के प्रभाव को कम कर सकते हैं। यूरोप की मौजूदा हीटवेव यह स्पष्ट संदेश देती है कि जलवायु परिवर्तन भविष्य का नहीं बल्कि वर्तमान का संकट बन चुका है।

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