देश की राजनीति में इन दिनों संसद के भीतर दो-तिहाई बहुमत के गणित को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसी बीच पश्चिम बंगाल की राज्यसभा की तीन सीटों पर उपचुनाव की घोषणा ने राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है। निर्वाचन आयोग ने अधिसूचना से लेकर मतदान तक का पूरा कार्यक्रम घोषित कर दिया है। 24 जुलाई को मतदान और उसी दिन मतगणना होगी। माना जा रहा है कि इन उपचुनावों के नतीजों पर सभी दलों की नजर रहेगी क्योंकि संसद में संख्या बल आने वाले समय की राजनीतिक रणनीति तय कर सकता है।
राजनीतिक गलियारों में ऐसी अटकलें हैं कि भाजपा नेतृत्व आगामी संवैधानिक विधेयकों को ध्यान में रखते हुए संसद में अपनी ताकत बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषक इसे भाजपा के कथित ‘मिशन 360’ से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि भाजपा ने इस तरह की किसी रणनीति की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। चर्चा है कि महिला आरक्षण, परिसीमन और ‘एक देश-एक चुनाव’ जैसे सम्भावित संवैधानिक सुधारों के लिए आवश्यक दो- तिहाई बहुमत सुनिश्चित करना भाजपा की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है। ऐसे में पार्टी सहयोगी दलों का दायरा बढ़ाने और विपक्ष के कुछ सांसदों का समर्थन हासिल करने जैसे सभी राजनीतिक विकल्प खुले रखना चाहती है। हालांकि इन दावों की किसी भी स्तर पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इन्हीं चर्चाओं के बीच विपक्षी दलों में सम्भावित राजनीतिक हलचल को लेकर भी अटकलें तेज हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की नजर अब समाजवादी पार्टी, डीएमके और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) जैसे प्रमुख विपक्षी दलों पर हो सकती है। हालांकि इन दलों ने ऐसी सभी अटकलों को खारिज किया है।
महाराष्ट्र में सबसे अधिक चर्चा एनसीपी (शरद पवार गुट) को लेकर है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार पार्टी के भीतर भविष्य की रणनीति को लेकर अलग-अलग राय होने की चर्चाएं हैं। कुछ नेताओं के कांग्रेस के साथ निकटता बढ़ाने की बात कही जा रही है जबकि कुछ के एनडीए के साथ जाने की सम्भावनाओं को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं। यहां तक कि सुप्रिया सुले की सम्भावित राजनीतिक भूमिका को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं हैं। हालांकि इन दावों की न तो एनसीपी (शरद), न कांग्रेस और न ही भाजपा ने आधिकारिक पुष्टि की है।
तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके फिलहाल मजबूत स्थिति में दिखाई देती है। इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा दक्षिण भारत में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है तो उसे डीएमके के प्रभाव वाले क्षेत्रों में राजनीतिक विस्तार की रणनीति अपनानी होगी, वहीं डीएमके लगातार दावा करती रही है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और किसी तरह की टूट की सम्भावना नहीं है।
उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी को लेकर चर्चाएं जारी हैं। अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने हाल के चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत की है लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सपा के कुछ प्रभावशाली नेताओं को भाजपा की ओर से अपने पक्ष में करने की कोशिशें हो सकती हैं। जैसा कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों के कुछ नेता हाल-फिलहाल में ऐसा दावा कर रहे हैं कि सपा के कई सांसद और विधायक उनके समर्थन में हैं। हालांकि समाजवादी पार्टी इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें विपक्ष को कमजोर दिखाने की राजनीतिक रणनीति बताती रही है।
देश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान दल-बदल और नए राजनीतिक गठबंधनों ने कई राज्यों का सत्ता समीकरण बदल दिया है। महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश और असम जैसे राज्यों में हुए राजनीतिक घटनाक्रम इस बात के उदाहरण हैं कि चुनावी गणित के साथ-साथ विधायकों और सांसदों की राजनीतिक निष्ठा भी सरकारों के गठन और सत्ता परिवर्तन में अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि अब सभी प्रमुख दल अपने संगठन को मजबूत बनाए रखने के साथ-साथ अपने सांसदों और विधायकों को एकजुट रखने पर विशेष जोर दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद में संख्या बल केवल सरकार बनाने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि बड़े संवैधानिक और नीतिगत फैसलों के लिए भी निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने संसदीय दल को मजबूत बनाए रखने के साथ-साथ सम्भावित सहयोगियों की तलाश में भी सक्रिय रहते हैं। आगामी विधानसभा चुनावों और भविष्य के लोकसभा चुनाव को देखते हुए यह राजनीतिक सक्रियता और तेज होने की सम्भावना है। यही कारण है कि विभिन्न क्षेत्रीय दलों में चल रही छोटी-छोटी राजनीतिक हलचलों पर भी राष्ट्रीय स्तर पर नजर रखी जा रही है क्योंकि इनका असर केवल राज्यों तक सीमित नहीं रह सकता बल्कि संसद के शक्ति-संतुलन पर भी पड़ सकता है।
जानकार कहते हैं कि भाजपा की रणनीति केवल चुनावी गठबंधन तक सीमित नहीं रहती बल्कि प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं और जनाधार वाले चेहरों को साथ जोड़ने पर भी उसका विशेष ध्यान रहता है, वहीं विपक्षी दल इसे अपने संगठन को कमजोर करने की कोशिश बताते हुए लगातार एकजुटता का संदेश देने में जुटे हैं।
फिलहाल डीएमके, एनसीपी (शरद गुट) और समाजवादी पार्टी में किसी बड़े राजनीतिक बदलाव या टूट की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन संसद के बदलते संख्या बल, राज्यसभा उपचुनाव, आगामी विधानसभा चुनावों और सम्भावित संवैधानिक सुधारों की चर्चाओं के बीच इन दलों को लेकर राजनीतिक अटकलें लगातार तेज हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ये चर्चाएं केवल सियासी कयास साबित होती हैं या आने वाले महीनों में देश की राजनीति में किसी नए शक्ति-संतुलन की भूमिका तैयार करती हैं।